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रोहित धनकर
अमेरिका नरेन्द्र मोदी को वीसा नहीं देरहा, इस से बीजेपी बहुत दुखी है। मोदी तो खैर है ही दुखी। इस से कुछ भारतीय बुद्धिजीवी बहुत खुश हैं। कुछ सांसद भी हैं जो ओबामा को चिट्ठी लिख रहें हैं कि मोदी को वीसा न दिया जाए। मोदी सांप्रदायिक राजनेता है, यह शायद सही है। उसका गुजरात के दंगों के पीछे शायद हाथ भी है। इसके बावजूद बुद्धिजीवियों और सांसदों का यह व्यवहार आत्महीनता का और दोगला है।

हम इस बात को छोड़ दें की अमेरिका ने कितने साम्प्रदायिक और हिंसा में लिप्त राजनेताओं को वीसा दिया है और दे रहा है। पर बुद्धिजीवी लोग कभी भी उन राजनेताओं के लिए इस तरह के वोरोध का झंडा नहीं उठाते जो खुले आम सांप्रदायिक है, हिंसा का प्रचार करते हैं और हिंसा में लिप्त हैं। कश्मीरी उग्रवादी और हुर्रियत के जीलानी इस की मिशाल हैं। यह कहा जा सकता है की जीलानी जनता का चुन हुआ सरकार चलने के लिए जिम्मेदार राजनेता नहीं है। ठीक है, मान लेते है कि सरकार चलने वाले राजनेता की जिम्मेदारी अधिक है। पर एक जनता का चुना हुआ प्रधानमंत्री रहा है भारत में जिस का सीधा हाथ बड़े सम्प्रदायिक दंगों में था। इंदिरा गाँधी की हत्या के समय राजीव गाँधी के बयान और हिसा में लिप्त कोंग्रेसियों की तरफदारी इस का प्रमाण है। अमेरिका ने राजीव गाँधी को वीसा देने से मन नहीं किया। भारतीय बुद्धिजीवियों ने कही इस का विरोध नहीं किया। यह दोगला पना  है। पर हम लोग बहुत सामंती मानसिकता वाले लोग है। हम अपने परिवार के ससदस्य की मौत का बदला पूरे सम्प्रदाय से लेने को सम्प्रदायिकता नहीं मानते शायद। राजीव ने अपनी माँ की मौत का बदला लिया इस लिए वह सांप्रदायिक नहीं हुआ। मोदी ने एक सम्प्रदाय के लोगों की मौत का बदला लिया इस लिए वह साम्प्रदायिक है। यह दोगला तर्क है।

पर इस से भी ज्यादा महत्व पूर्ण बात एक और है। मोदी एक भारतीय है जिसे एक प्रदेश की जनता ने अपना मुख्यमंत्री चुना है। वह जनता पूरी की पूरी सांप्रदायिक हो सकती है, पर यह चुनाव भारतीय संविधान के मुताबिक हुआ है। यह संविधान भारत को एक संप्रभु राष्ट्र बताता है। हमारे बुद्धिजीवी लोग और इसी संविधान के तहत चुने सांसद भारत के अंदरूनी मामलों में बहार के उस राष्ट्र का समर्थन चाहते हैं जिसे वे ही लोग पानी पी पी कर गालियाँ देते रहते हैं। जिसे वे दुनिया भर में अपने हित के लिए हिंसा और युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। अपने देश की राजनीति में आये सांप्रदायिक विकार को दुरुस्त करने की सीधी जिम्मेदारी लेने के बजाय एक चालाक और अपने हित के लिए न्याय की अनदेखी करने वाले दादा राष्ट्र की मदद लेने में इनको कोई ऐतराज नहीं है। हमारे अन्दर कौन धर्मं-निरपेक्ष है और कौन सांप्रदायिक इस का फैसला हम अपने ही नागरिक भाइयों से संवाद के द्वारा करने की बजाय उनकी आवाज को एक दूसरे देश के हस्तक्षेप से दबाना चाहते हैं। इस में हम अपने संविधान, अनपे नागरिकों और अनापने राष्ट्र की अवमानना नहीं मानते। लगता है हमारे लिए अपने विचार को स्थापित करने के लिए सब किछ जायज है। अपने ही देश में हमारे विरोधी विचार को दबाने के लिए गैर संवादी और विकेक-इतर तरीकों को काम में लेना हमें उचित लगता है। हम अपने विचार की सत्यता के प्रति इतने आस्वस्थ हैं की उस के अलावा किसी चिचार के साथ संवाद से रास्ते निकालने या अपने भूले हुए नागरिकों को विवेक से लोकतंत्र के रास्ते पर लाने के बजाय उधार की ताकत से उनको नीचा दिखाना चाहते है। यह दूसरों को अपने आतंरिक मामलों में आमत्रित करने के अलावा क्या है? यदि साम्प्रदायिकता का यह विकार और बढ़ता है तो इसे दूर करने के लिए क्या हम अमेरिका को अपने ही देश के विरूद्ध युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे? मुझे नहीं लगता किसी और की ताकत हमें अपनी इस बीमारी से निजात दिला सकती है, हम इस के लिए अपनी संप्रभुता को बेचने के लिए तैयार हो जाएँ तो भी नहीं।

यह टिपण्णी मोदी को स्वीकार करने की हामी नहीं है, बल्कि मोदी जैसी खतरनाक राजनीति को अपने राष्ट्र के विवेक से रोकने की वकालत है। यदि हम में यह दम नहीं है तो न हम लोकतंत्र की रक्षा कर पाएंगे न ही संप्रभुता की।