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रोहित धनकर

मेरी छोटी टिपण्णी “मोदी का वीसा और भारतीय संप्रभुता” पर दो गंभीर ऐतराज दर्ज किये गए है। मैं दोनों का उनकी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद करता हूँ, और अरुणा का मेरी बात को ठीक परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए। दोनों ही ऐतराज लंबे हैं, तो मैं ने सोचा इस संवाद को आगे बढाने के लिए मैं अपनी बात को थोड़ा और साफ़ करदूं। मैंने मूल टिपण्णी हिंदी में की थी इस लिए मैं इसे हिंदी में ही आगे बढ़ा रहा हूँ। पर एक तो मेरी वर्तनी बहुत खराब है और दूसरे टंकण बहुत कमजोर, सो इस में बहुत गलतियाँ होंगी। उनके लिए माफ़ी चाहता हूँ, आशा है गलतियों के बावजूद बात साफ़ तौर पर कह सकूंगा।

मुख्य बात पर आने से पहले: मनोज जी ने मेरे “दोगले” शब्द पर ऐतराज किया है, उनका मानना है की यह लैंगिक गली देने का तरीका है। यदि ऐसा है तो माफ़ी चाहता हूँ। मैंने इस शब्द का उपयोग “दोहरे मानदंडों” के लिए किया था।

मैं जानता हूँ की जो कुछ मैं कहने वाला हूँ वह आज के भारत में राजनैतिक पवित्रता के विरुद्ध जायेग। पर मैं यह भी मानता हूँ की राजनैतिक पवित्रता (political correctness) आम तौर पर विश्लेषण और चिंतन का गलाघोंटती है। लोकनन्त्र के लिए लोगों का बड़ी संख्या में राजनैतिक-पवित्रता का बाना पहन लेना बहुत अशुभ् हो सकता है। अतः अपनी बात कहा रहा हूँ।

मैं मूलतः नीचे लिखी बातें कहना चाहता हूँ:

१. भारतीय बुद्धिजीवी इस मामले में दोहरे मानदंड अपना रहे हैं।

२. अमेरिका से इस मामले में गुहार लगाना भारतीय संप्रभुता और भारतीय अस्मिता के विरुद्ध है।

इसके अलावा मैं एक बात अब और कहूगा:

३. मोदी और बीजेपी की राजनीती पर टिपण्णी।

दोहरे मानदंड

राजीव गाँधी और जीलानी के उदहारण मैंने दोहरे मानदंडों की बात साबित करने के लिए दिए थे। इस के और भी दर्जनों उदहारण दिए जासकते हैं। जिस अमेरिका से मोदी के विरुद्ध हम फतवा कायम रखवाना चाहते हैं उसी अमेरिका के चीन और मध्या-पूर्व में मानव-अधिकारों की बात उठाने पर उसे अपने हितों के लिए सत्ता का खेल कहते हैं और उसका विरोद्ध करते हैं।  जिस अमेरिका से हम मोदी के विरुद्ध अपनी बात की पुष्टि चाहते हैं उसी की इजराइल और फिलिस्तीन नीति को मानव-अधिकारों के विरूद्ध कहते हैं। मोदी ने मानव अधिकारों और इंसानियत के विरूद्ध जो गंभीर अपराध किये उनकी भर्त्सना हम दुनिया के सबसे बड़े दादा और मानव-अधिकार जैसी महत्त्वपूर्ण धारणा का दुरुपयोग करने वाले से चाहते हैं। अतः हम एक बड़े अपराधी से छोटे अपराधी के विरूद्ध फ़तवा चाहते हैं। मोदी के अपराध को भारतीय मानस में अक्षम्य बनाये रखने के लिए हम अमेरिका के अपराधों की अनदेखी करने को तैयार हैं, उसे मानवीय अपराधों के मामले में एक न्यायाधीश की भूमिका देने को तैयार हैं। ऐसे दर्जनों विरोधाभास गिनाये जासकते हैं। यह कहा जासकता है की अमेरिका ने हजार गलतियाँ की होंगीं, पर इस मामले में उसने सही कदम लिया है तो हमें उस को पुष्ट करना चाहिए। वास्तव में मैं इस बात का हामी हूँ, पर तभी जब (१) हम यह नियम हमेशां माननें, और (२) जब हम सही कदम को पुष्ट करते हैं तो गलत कदमों को अनदेखा ना करें। हम अपने देश की राजनीति में पहले नियम को नहीं मानते और अमेरिका के सन्दर्भ में दूसरे की अनदेखी कर रहे हैं।

प्रो. अहेमद कहते हैं की दोहरी जबान लोकतंत्र में कोई बड़ी बुराई नहीं है। वे शायद यह भूल गए की लोकतंत्र विवेकशील संवाद और आपसी भरोसे पर ही चल सकता है। संवाद में विवेकशीलता और सम्वादियों में आपसी भरोसा खत्म हो जाने पर भावनाओं पर आधारित भीड़-तंत्र में बदल जाता है लोकतंत्र। भारत में इस बीमारी के उदहारण और इसकी तीव्रता लगातार बढ़ रही है। दोहरे मापदंड विवेक और भरोसे के बहुत बड़े विनाशक होते हैं। हम इस देश में लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं तो हमें साफ़ मानदंडों और उनके कड़ाई से पालन की बहुत जरूरत है। हम अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए इन की जितनी अनदेखी करेंगें उतना ही लोकतंत्र का नुकशान करेंगे। और लोकतंत्र के बिना धर्म-निरपेक्षता, व्यक्ति की गरिमा और मानव-अधिकारों की रक्षा संभव नहीं है।

भारतीय संप्रभुता और अस्मिता

अमेरिका किस को वीसा दे और किसको ना दे यह उसका अंदरूनी मामला है, इस का फैसला वह अपने क़ानून के हिसाब से करेगा। (उमर को लगता है भी भारतीय संविधान हमें अमेरिका से इस मामले में पूछने का हक़ देता है। भारतीय संविधान हमें अपनी बात कहने का हक़ देता है, किसी दूसरे राष्ट्र से कुछ भी पूछने का नहीं।) मोदी के भारत में रहने और राजनीति करने पर आप रोक नहीं लगा सकते, भारतीय कानून के तहत उसके अपराधों की सजा नहीं दिलवा सकते। इसमें हम भारतीय सम्विधान और कानून की कमी देखते हैं। और उस कमी की तात्कालिक पूर्ती के लिए अमरीका के संविधान और कानून की मदद चाहते हैं। यह हमारी अपनी कमियों पर पर्दा डालना है, हमारी जिम्मेदारी हम किसी और से पूरी करवाना चाहते हैं।

एक रोचक बात यह है की मोदी को नायक मानने वाले और उसको खलनायक मानने वाले एक चीज पर पूरी तहह से सहमत है: कि अमेरिका की जमीन पवित्र जमीन है। दोनों समझते हैं की वहां पहुँच जाने से मोदी के पाप धुलजायेंगे। एक उसको पापमुक्त साबित करना चाहते हैं इस लिए उसे वहां जाने का हक़ दिलाना चाहते हैं; और दूसरे पापी बनाये रखना चाहते हैं इस लिए उसे वहां जाने से रोकना चाहते हैं। दोनों की कसौटी एक ही है: अमेरिका की पवन भूमि पर पहुंचना। भारतीय संप्रभुता और अस्मिता के लिए दोनों बराबर के घातक हैं। दोनों अमेरिका को और उसके काननों को न्यायाधीश मानाने को तैयार हैं।

प्रो. अहमद को लगता है की यह कानूनी नहीं नैतिक भंगिमा है। यह मोदी की दोषमुक्ति की कोशिश के विरुद्ध कदम है। मैं पहली बात तो यह कहना चाहूँगा की यह निश्तित तौर पर कानूनी मामला है। मानव-अधिकार और वीसा देना दोनों कानून के तहत चलने वाली चीजें हैं। दूसरी बात यह की हर कानूनी मामला लाजमी तौर पर नैतिक होता है। मैं जो भारतीय संप्रभुता की चिंता कर रहा हूँ और भारतीय अस्मिता का हवाला दे रहा हूँ यह भी नैतिक मामला है, और संप्रभुता कानूनी भी है।

उमर को लगता है की मेरी बात संकुचित राष्ट्रीयता की बात है, वह आज की पीढ़ी है (मैं निशित तौर पर पुरानी पीढ़ी हूँ, J, और इसमें न मुझे ऐतराज है न ही शर्म) और आज की पीढ़ी को पूरी दिनया की चिंता है। यह अच्छी बात है, यदि ऐसा है तो। पर मेरा तर्क दुनिया की चिंता करने और पूरी मानवता को किसी मुद्दे पर सहमत करने के विरूद्ध नहीं है। मुझे कोई ऐतार्राज नहीं है यदि लोग अमेरिका की जनता को संबोधित करें, मानव सिधान्तों के आधार पर, बराबरी के स्तर पर, कम से कम इस मामले में। मुझे ऐतराज अमेरका के राष्ट्रपति को संबोधित करने में है। पूरी दिनया के लोगों में मानव होने के नाते संवाद होना चाहिय, विचारों का आदान-प्रदान और विवेकसम्मत आग्रह होने चहिये। मानव के नाते हम एक हैं, मैं समझता हूँ मानव के नाते हमारा भविष्य भी एक है। पर इस वक्त मानवीय समुदाय विभिन्न संस्कृतियों और राज नैतिक इकायों में बंटा हुआ है। ये राजनैतिक इकाइयाँ अपने हितों को सर्वोपरी रखती है और अपना प्रभुत्व दूसरी राजनैतिक इकाइयों पर और उनके नागरिकों पर जमाने की जद्दोजहद में मशगूल हैं। मोदी के वीसा सम्बन्धी गुहार–चाहे वह उसे वीसा देने की हो या उसका विरोध करने की–अमेरिका के वर्चस्व और उसके न्यायसिद्ध होने की स्वीकृती है। मुझे इस से ऐतराज है। मैं इस बात का हमायती हूँ की भारतीय अपनी न्याय का फैसला खुद करें। आज अमेरिका से मोदी के मामले में हम सहयोग चाहते हैं, तो कल आप उसकी आपके अंदरूनी मामलों में दख़ल का विरोध नहीं कर पायेंगे। और अमेरिका का दूसरे देशों के प्रति न्याय का इतिहास बहुत आस्वस्त करने वाला नहीं है।

मोदी-बीजेपी की राजनीति और उसका विरोध

मेरे चिचार से बीजेपी की राजनीति लोकतंत्र के विरूद्ध है, क्यों की वह धर्मनिरपेक्षता के विरूद्ध है। मोदी और संघ उस राजनीति के सबसे खतरनाक चहरे हैं। जो भारतीय धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र की चिंता करते हैं उन को इस राजनीति से निपटने के तरीके ढूँढने चहियें। पर मैं जानता हूँ की भारत में उन लोगों की संख्या भी करोड़ों में है जो बीजेपी और मोदी की राजनीति को लाकतंत्र के हित में और देश के लिए शुभ मानते हैं। मैं उन सब को एक साथ संकुचित रूप से अपने हित साधने वाले, या मूर्ख या दूसरों से घ्रणा करने वाले पाखंडी नहीं कह सकता। निश्चित रूप से उनमें संकुचित मानसिकता वाले, दूसरों से घ्रणा करने वाले, हिन्दुओं का वृचास्वा चाहने वाले और मूर्ख भी है। पर उनमें परिप्रेक्ष्य के भेद रखने वाले फिर भी लोकातान्तान्त्रिक मानसिकता वाले भी हो सकते हैं। मैं अपने विश्लेषण के प्रति इतना आश्वस्त और निशित नहीं हो सकता की मेरे विचारों के अलावा बाकी सब को या तो मूर्ख मानलूं या धूर्त। ऐसा मानना मेरी स्वयं की लोकतंत्र में विवेकसम्मत आस्था की पोल खोलदेगा। लोकतंत्र सबको सोचने की, उसकी अभिव्यक्ति की और उसपर अमल करने की स्वतंत्रता देता है। हर एक की आवाज की कीमत स्वीकार करने की जरूरत है। पहले सुनेंगे और समझेंगे तभी सम्वाद होगा, विरोध या सहमति होगी। मैं जैसे इस वक्त अमेरिका से मोदी वीसा का विरोध दर्ज कारने वालों की बात सुन हरा हूँ और उसपर अपना विचार रख रहा हूँ, ठीक इसी तरह मोदी की राजनीति करने वालों की बात भी मुझे सुनानी होगी और उसका विरोध करना होगा। उन्हें निश्चित तौर पर गलत मान कर अनदेखा करना या धूर्त मान लेना  न लोकतान्त्रिक सोच है न ही विवेक सम्मत। [यहाँ “मैं” शब्द का उपयोग एक आम नागरिक के लिए किया गया है, यह रोहित धनकर के लिए व्यक्ति-वाचक नहीं है।]

पर जब एक नागरिक बीजेपी की हिंदुत्व-वादी राजनीति को विभेदकारी मानता है तो उसे जाती वादी राजनीति को भी विभेदकारी मानना होगा। अतः, प्रांतीय, जातिवादी और क्षेत्रीयता वादी राजनीती को विभेदकारी कहना हिंदुत्व-वादी राजनीति का समर्थन हो यह जरूरी नहीं है। यह जहाँ कहीं भी राजनैतिक अशुभ दीखता है उसको वैस ही कहना भर है। मुझे कोई भी मंदिर में मत्था टेकने वाला, धर्म-गुरुओं के चरणों में लोटने वाला, मजार पर चादर चढाने वाला और इफ्तार दावत करने वाला राजनेता धर्मनिरपेक्ष नहीं लगता। यह उनका व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति का सवाल नहीं है, यह वास्तव में उनका जनता को विभिन्न संकेत देने और धर्म के नाम पर वोट मांगे के लिए प्रचार है। यह वे जनता के खर्च पर और अपनी राजनैतिक भूमिका में करते हैं। यदि मीडिया इस पर ध्यान देना छोडदे तो यह सब बंद हो जायेगा। हाँ, यह सब एक जैसा विभेदकारी नहीं है। पर विभेद को भुनाने की कोशिश फिर भी सामान है। इस वक्त हमारे देश में शायद ही कोई लोकतांत्रिक राजनीति कर रहा है। राजनेता या तो जादी वादी हैं, या धर्म-वादी या परिवारवादी (सामंतवादी)। ले दे कर आखिर में वामपंथी बचते हैं जो इन सब से बहुत हद तक मुक्त हैं, पर वे न इमानदार चिन्तक  हैं ना ही दोहरे मानदंडों से मुक्त। यह सब कहने का अर्थ यह नहीं हो सकता की यह हिन्दुत्ववादी राजनीति का समर्थन है। यह सच्चाई–जैसी मुझे दिखती है–का बयान भर है।

आखिर में हमें–जैसा मैंने अपनी टिपण्णी में पहले कहा है–इस विभेद कारी राजनीति से अपने बलबूते पर, अपनी संप्रभुता और अस्मिता की रक्षा करते हुए लड़ना होगा। इसमें दूसरों के प्रमाण-पत्र केवल हमें और विभाजित करेंगे और प्रतिक्रिया पैदा करेंगे।

उमर की कुछ और चिंताएं

उमर को लगता है की मेरी मूल चिंता सम्प्रभुता होती तो मेरी टिपण्णी का बहाव कुछ और होता। यह पूरी बात बिना कहे इस तरफ इशारा है कि में मोदी की राजनीति की तरफदारी कर आहा हूँ। अर्थ निकालने का यही तरीका राजनैतिक पवित्रता का परिचायक है, यह हर उस बात का जो हमें पसंद नहीं है कोई ऐसा अर्थ निकालना है जो उस वक्त अस्वीकार्य माना जाता है। यह राजनैतिक पवित्रता (political correctness) का संवाद को खारिज करने का तरीका है। वैसे मैं कह्दुं कि जो लोग मोदी की राजनीति के हिमायती हैं उनको भी अपनी बात बिना झिझक के कहने का हक़ है, और मैं उनमें होता तो बिना झिझक ऐसा कहता, उमर को अंदाजा लगाने की जरूरत नहीं होती।

उसे आश्चर्य है की मैं राष्ट्रवादी कब से हो गया! मैं तो सदा ही राष्ट्रवादी था। यह अलग बात है की मेरा राष्ट्रवाद न मुझे अपने राष्ट्र की खामिया देखने से रोकता है, ना दूसरे राष्ट्रों को दुश्मन मानाने को प्रेरित करता है और ना ही मेरे देश के और लोगों को राष्ताविरोधी कहने को प्रेरित करता है। उमर, राष्ट्रवादी होना गाली नहीं है, संकुचित होने की निशानी भी नहीं है और मूर्खता भी नहीं है। यह वर्त्तमान समाय में मानवता के अपने आपको विभिन्न इकाइयों में संगठित करने की स्वीकृति भर है। मैं जनता हूँ की राष्ट्रवाद को संपूर्ण मानवता को एक मानने का और मानवीय भाईचारे का विरोधी माना जाता है। पर मैं इस चिंतन से सहमत नहीं हूँ। पर साफ़ करदूं कि मुझे पता नहीं है की राष्ट्रवाद को “patriotism” का समानार्थी नानाजाता है या “aggressive nationalism” का, मैं  यहाँ इस का उपयोग “patriotism” के अर्थ में कर रहा हूँ और इस में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती।

उमर को ऐसा भी लगता है की यदि हम अपने आतंरिक मामलों की बात करते हैं तो भारत का जाफना में और बंगलादेश में हस्तक्षेप गलत था। यहाँ बात बहुत लंबी हो जायेगी अतः मैं इतना ही कहूँगा की (१) दोनों मामलों के इतिहास में और गहराई से जाना होगा, और (२) श्रीलंकाई नागरिकों का मत जानना होगा, पाकिस्तानी और बंगलादेशियों के मत जानने होंगे कुछ भी कहने से पहले।

एक और चिंता यह है कि चुनाव जीतने से कोई निर्दोष नहीं हो जाता। ठीक बात है, पर केवल हमारे कहने से भी कोई दोषी नहीं हो जाता। दोषियों और निर्धोशियों का फैसला हमलोग मिलकर और अपने न्यायतंत्र से करेंगे। जिन्हें हम दोषी मानते हैं उनके विरूद्ध अभियान चलाने का हमारा हक़ है, सवाल सिर्फ यह है की वह अभियान हम कैसे चलाते हैं। अभियान चलने के सारे तरीके जायज नहीं माने जा सकते। मेरा विरोध तरीके से है, अभियान से नहीं।

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