मोदी के वीसा पर बहस


रोहित धनकर

मेरी छोटी टिपण्णी “मोदी का वीसा और भारतीय संप्रभुता” पर दो गंभीर ऐतराज दर्ज किये गए है। मैं दोनों का उनकी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद करता हूँ, और अरुणा का मेरी बात को ठीक परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए। दोनों ही ऐतराज लंबे हैं, तो मैं ने सोचा इस संवाद को आगे बढाने के लिए मैं अपनी बात को थोड़ा और साफ़ करदूं। मैंने मूल टिपण्णी हिंदी में की थी इस लिए मैं इसे हिंदी में ही आगे बढ़ा रहा हूँ। पर एक तो मेरी वर्तनी बहुत खराब है और दूसरे टंकण बहुत कमजोर, सो इस में बहुत गलतियाँ होंगी। उनके लिए माफ़ी चाहता हूँ, आशा है गलतियों के बावजूद बात साफ़ तौर पर कह सकूंगा।

मुख्य बात पर आने से पहले: मनोज जी ने मेरे “दोगले” शब्द पर ऐतराज किया है, उनका मानना है की यह लैंगिक गली देने का तरीका है। यदि ऐसा है तो माफ़ी चाहता हूँ। मैंने इस शब्द का उपयोग “दोहरे मानदंडों” के लिए किया था।

मैं जानता हूँ की जो कुछ मैं कहने वाला हूँ वह आज के भारत में राजनैतिक पवित्रता के विरुद्ध जायेग। पर मैं यह भी मानता हूँ की राजनैतिक पवित्रता (political correctness) आम तौर पर विश्लेषण और चिंतन का गलाघोंटती है। लोकनन्त्र के लिए लोगों का बड़ी संख्या में राजनैतिक-पवित्रता का बाना पहन लेना बहुत अशुभ् हो सकता है। अतः अपनी बात कहा रहा हूँ।

मैं मूलतः नीचे लिखी बातें कहना चाहता हूँ:

१. भारतीय बुद्धिजीवी इस मामले में दोहरे मानदंड अपना रहे हैं।

२. अमेरिका से इस मामले में गुहार लगाना भारतीय संप्रभुता और भारतीय अस्मिता के विरुद्ध है।

इसके अलावा मैं एक बात अब और कहूगा:

३. मोदी और बीजेपी की राजनीती पर टिपण्णी।

दोहरे मानदंड

राजीव गाँधी और जीलानी के उदहारण मैंने दोहरे मानदंडों की बात साबित करने के लिए दिए थे। इस के और भी दर्जनों उदहारण दिए जासकते हैं। जिस अमेरिका से मोदी के विरुद्ध हम फतवा कायम रखवाना चाहते हैं उसी अमेरिका के चीन और मध्या-पूर्व में मानव-अधिकारों की बात उठाने पर उसे अपने हितों के लिए सत्ता का खेल कहते हैं और उसका विरोद्ध करते हैं।  जिस अमेरिका से हम मोदी के विरुद्ध अपनी बात की पुष्टि चाहते हैं उसी की इजराइल और फिलिस्तीन नीति को मानव-अधिकारों के विरूद्ध कहते हैं। मोदी ने मानव अधिकारों और इंसानियत के विरूद्ध जो गंभीर अपराध किये उनकी भर्त्सना हम दुनिया के सबसे बड़े दादा और मानव-अधिकार जैसी महत्त्वपूर्ण धारणा का दुरुपयोग करने वाले से चाहते हैं। अतः हम एक बड़े अपराधी से छोटे अपराधी के विरूद्ध फ़तवा चाहते हैं। मोदी के अपराध को भारतीय मानस में अक्षम्य बनाये रखने के लिए हम अमेरिका के अपराधों की अनदेखी करने को तैयार हैं, उसे मानवीय अपराधों के मामले में एक न्यायाधीश की भूमिका देने को तैयार हैं। ऐसे दर्जनों विरोधाभास गिनाये जासकते हैं। यह कहा जासकता है की अमेरिका ने हजार गलतियाँ की होंगीं, पर इस मामले में उसने सही कदम लिया है तो हमें उस को पुष्ट करना चाहिए। वास्तव में मैं इस बात का हामी हूँ, पर तभी जब (१) हम यह नियम हमेशां माननें, और (२) जब हम सही कदम को पुष्ट करते हैं तो गलत कदमों को अनदेखा ना करें। हम अपने देश की राजनीति में पहले नियम को नहीं मानते और अमेरिका के सन्दर्भ में दूसरे की अनदेखी कर रहे हैं।

प्रो. अहेमद कहते हैं की दोहरी जबान लोकतंत्र में कोई बड़ी बुराई नहीं है। वे शायद यह भूल गए की लोकतंत्र विवेकशील संवाद और आपसी भरोसे पर ही चल सकता है। संवाद में विवेकशीलता और सम्वादियों में आपसी भरोसा खत्म हो जाने पर भावनाओं पर आधारित भीड़-तंत्र में बदल जाता है लोकतंत्र। भारत में इस बीमारी के उदहारण और इसकी तीव्रता लगातार बढ़ रही है। दोहरे मापदंड विवेक और भरोसे के बहुत बड़े विनाशक होते हैं। हम इस देश में लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं तो हमें साफ़ मानदंडों और उनके कड़ाई से पालन की बहुत जरूरत है। हम अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए इन की जितनी अनदेखी करेंगें उतना ही लोकतंत्र का नुकशान करेंगे। और लोकतंत्र के बिना धर्म-निरपेक्षता, व्यक्ति की गरिमा और मानव-अधिकारों की रक्षा संभव नहीं है।

भारतीय संप्रभुता और अस्मिता

अमेरिका किस को वीसा दे और किसको ना दे यह उसका अंदरूनी मामला है, इस का फैसला वह अपने क़ानून के हिसाब से करेगा। (उमर को लगता है भी भारतीय संविधान हमें अमेरिका से इस मामले में पूछने का हक़ देता है। भारतीय संविधान हमें अपनी बात कहने का हक़ देता है, किसी दूसरे राष्ट्र से कुछ भी पूछने का नहीं।) मोदी के भारत में रहने और राजनीति करने पर आप रोक नहीं लगा सकते, भारतीय कानून के तहत उसके अपराधों की सजा नहीं दिलवा सकते। इसमें हम भारतीय सम्विधान और कानून की कमी देखते हैं। और उस कमी की तात्कालिक पूर्ती के लिए अमरीका के संविधान और कानून की मदद चाहते हैं। यह हमारी अपनी कमियों पर पर्दा डालना है, हमारी जिम्मेदारी हम किसी और से पूरी करवाना चाहते हैं।

एक रोचक बात यह है की मोदी को नायक मानने वाले और उसको खलनायक मानने वाले एक चीज पर पूरी तहह से सहमत है: कि अमेरिका की जमीन पवित्र जमीन है। दोनों समझते हैं की वहां पहुँच जाने से मोदी के पाप धुलजायेंगे। एक उसको पापमुक्त साबित करना चाहते हैं इस लिए उसे वहां जाने का हक़ दिलाना चाहते हैं; और दूसरे पापी बनाये रखना चाहते हैं इस लिए उसे वहां जाने से रोकना चाहते हैं। दोनों की कसौटी एक ही है: अमेरिका की पवन भूमि पर पहुंचना। भारतीय संप्रभुता और अस्मिता के लिए दोनों बराबर के घातक हैं। दोनों अमेरिका को और उसके काननों को न्यायाधीश मानाने को तैयार हैं।

प्रो. अहमद को लगता है की यह कानूनी नहीं नैतिक भंगिमा है। यह मोदी की दोषमुक्ति की कोशिश के विरुद्ध कदम है। मैं पहली बात तो यह कहना चाहूँगा की यह निश्तित तौर पर कानूनी मामला है। मानव-अधिकार और वीसा देना दोनों कानून के तहत चलने वाली चीजें हैं। दूसरी बात यह की हर कानूनी मामला लाजमी तौर पर नैतिक होता है। मैं जो भारतीय संप्रभुता की चिंता कर रहा हूँ और भारतीय अस्मिता का हवाला दे रहा हूँ यह भी नैतिक मामला है, और संप्रभुता कानूनी भी है।

उमर को लगता है की मेरी बात संकुचित राष्ट्रीयता की बात है, वह आज की पीढ़ी है (मैं निशित तौर पर पुरानी पीढ़ी हूँ, J, और इसमें न मुझे ऐतराज है न ही शर्म) और आज की पीढ़ी को पूरी दिनया की चिंता है। यह अच्छी बात है, यदि ऐसा है तो। पर मेरा तर्क दुनिया की चिंता करने और पूरी मानवता को किसी मुद्दे पर सहमत करने के विरूद्ध नहीं है। मुझे कोई ऐतार्राज नहीं है यदि लोग अमेरिका की जनता को संबोधित करें, मानव सिधान्तों के आधार पर, बराबरी के स्तर पर, कम से कम इस मामले में। मुझे ऐतराज अमेरका के राष्ट्रपति को संबोधित करने में है। पूरी दिनया के लोगों में मानव होने के नाते संवाद होना चाहिय, विचारों का आदान-प्रदान और विवेकसम्मत आग्रह होने चहिये। मानव के नाते हम एक हैं, मैं समझता हूँ मानव के नाते हमारा भविष्य भी एक है। पर इस वक्त मानवीय समुदाय विभिन्न संस्कृतियों और राज नैतिक इकायों में बंटा हुआ है। ये राजनैतिक इकाइयाँ अपने हितों को सर्वोपरी रखती है और अपना प्रभुत्व दूसरी राजनैतिक इकाइयों पर और उनके नागरिकों पर जमाने की जद्दोजहद में मशगूल हैं। मोदी के वीसा सम्बन्धी गुहार–चाहे वह उसे वीसा देने की हो या उसका विरोध करने की–अमेरिका के वर्चस्व और उसके न्यायसिद्ध होने की स्वीकृती है। मुझे इस से ऐतराज है। मैं इस बात का हमायती हूँ की भारतीय अपनी न्याय का फैसला खुद करें। आज अमेरिका से मोदी के मामले में हम सहयोग चाहते हैं, तो कल आप उसकी आपके अंदरूनी मामलों में दख़ल का विरोध नहीं कर पायेंगे। और अमेरिका का दूसरे देशों के प्रति न्याय का इतिहास बहुत आस्वस्त करने वाला नहीं है।

मोदी-बीजेपी की राजनीति और उसका विरोध

मेरे चिचार से बीजेपी की राजनीति लोकतंत्र के विरूद्ध है, क्यों की वह धर्मनिरपेक्षता के विरूद्ध है। मोदी और संघ उस राजनीति के सबसे खतरनाक चहरे हैं। जो भारतीय धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र की चिंता करते हैं उन को इस राजनीति से निपटने के तरीके ढूँढने चहियें। पर मैं जानता हूँ की भारत में उन लोगों की संख्या भी करोड़ों में है जो बीजेपी और मोदी की राजनीति को लाकतंत्र के हित में और देश के लिए शुभ मानते हैं। मैं उन सब को एक साथ संकुचित रूप से अपने हित साधने वाले, या मूर्ख या दूसरों से घ्रणा करने वाले पाखंडी नहीं कह सकता। निश्चित रूप से उनमें संकुचित मानसिकता वाले, दूसरों से घ्रणा करने वाले, हिन्दुओं का वृचास्वा चाहने वाले और मूर्ख भी है। पर उनमें परिप्रेक्ष्य के भेद रखने वाले फिर भी लोकातान्तान्त्रिक मानसिकता वाले भी हो सकते हैं। मैं अपने विश्लेषण के प्रति इतना आश्वस्त और निशित नहीं हो सकता की मेरे विचारों के अलावा बाकी सब को या तो मूर्ख मानलूं या धूर्त। ऐसा मानना मेरी स्वयं की लोकतंत्र में विवेकसम्मत आस्था की पोल खोलदेगा। लोकतंत्र सबको सोचने की, उसकी अभिव्यक्ति की और उसपर अमल करने की स्वतंत्रता देता है। हर एक की आवाज की कीमत स्वीकार करने की जरूरत है। पहले सुनेंगे और समझेंगे तभी सम्वाद होगा, विरोध या सहमति होगी। मैं जैसे इस वक्त अमेरिका से मोदी वीसा का विरोध दर्ज कारने वालों की बात सुन हरा हूँ और उसपर अपना विचार रख रहा हूँ, ठीक इसी तरह मोदी की राजनीति करने वालों की बात भी मुझे सुनानी होगी और उसका विरोध करना होगा। उन्हें निश्चित तौर पर गलत मान कर अनदेखा करना या धूर्त मान लेना  न लोकतान्त्रिक सोच है न ही विवेक सम्मत। [यहाँ “मैं” शब्द का उपयोग एक आम नागरिक के लिए किया गया है, यह रोहित धनकर के लिए व्यक्ति-वाचक नहीं है।]

पर जब एक नागरिक बीजेपी की हिंदुत्व-वादी राजनीति को विभेदकारी मानता है तो उसे जाती वादी राजनीति को भी विभेदकारी मानना होगा। अतः, प्रांतीय, जातिवादी और क्षेत्रीयता वादी राजनीती को विभेदकारी कहना हिंदुत्व-वादी राजनीति का समर्थन हो यह जरूरी नहीं है। यह जहाँ कहीं भी राजनैतिक अशुभ दीखता है उसको वैस ही कहना भर है। मुझे कोई भी मंदिर में मत्था टेकने वाला, धर्म-गुरुओं के चरणों में लोटने वाला, मजार पर चादर चढाने वाला और इफ्तार दावत करने वाला राजनेता धर्मनिरपेक्ष नहीं लगता। यह उनका व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति का सवाल नहीं है, यह वास्तव में उनका जनता को विभिन्न संकेत देने और धर्म के नाम पर वोट मांगे के लिए प्रचार है। यह वे जनता के खर्च पर और अपनी राजनैतिक भूमिका में करते हैं। यदि मीडिया इस पर ध्यान देना छोडदे तो यह सब बंद हो जायेगा। हाँ, यह सब एक जैसा विभेदकारी नहीं है। पर विभेद को भुनाने की कोशिश फिर भी सामान है। इस वक्त हमारे देश में शायद ही कोई लोकतांत्रिक राजनीति कर रहा है। राजनेता या तो जादी वादी हैं, या धर्म-वादी या परिवारवादी (सामंतवादी)। ले दे कर आखिर में वामपंथी बचते हैं जो इन सब से बहुत हद तक मुक्त हैं, पर वे न इमानदार चिन्तक  हैं ना ही दोहरे मानदंडों से मुक्त। यह सब कहने का अर्थ यह नहीं हो सकता की यह हिन्दुत्ववादी राजनीति का समर्थन है। यह सच्चाई–जैसी मुझे दिखती है–का बयान भर है।

आखिर में हमें–जैसा मैंने अपनी टिपण्णी में पहले कहा है–इस विभेद कारी राजनीति से अपने बलबूते पर, अपनी संप्रभुता और अस्मिता की रक्षा करते हुए लड़ना होगा। इसमें दूसरों के प्रमाण-पत्र केवल हमें और विभाजित करेंगे और प्रतिक्रिया पैदा करेंगे।

उमर की कुछ और चिंताएं

उमर को लगता है की मेरी मूल चिंता सम्प्रभुता होती तो मेरी टिपण्णी का बहाव कुछ और होता। यह पूरी बात बिना कहे इस तरफ इशारा है कि में मोदी की राजनीति की तरफदारी कर आहा हूँ। अर्थ निकालने का यही तरीका राजनैतिक पवित्रता का परिचायक है, यह हर उस बात का जो हमें पसंद नहीं है कोई ऐसा अर्थ निकालना है जो उस वक्त अस्वीकार्य माना जाता है। यह राजनैतिक पवित्रता (political correctness) का संवाद को खारिज करने का तरीका है। वैसे मैं कह्दुं कि जो लोग मोदी की राजनीति के हिमायती हैं उनको भी अपनी बात बिना झिझक के कहने का हक़ है, और मैं उनमें होता तो बिना झिझक ऐसा कहता, उमर को अंदाजा लगाने की जरूरत नहीं होती।

उसे आश्चर्य है की मैं राष्ट्रवादी कब से हो गया! मैं तो सदा ही राष्ट्रवादी था। यह अलग बात है की मेरा राष्ट्रवाद न मुझे अपने राष्ट्र की खामिया देखने से रोकता है, ना दूसरे राष्ट्रों को दुश्मन मानाने को प्रेरित करता है और ना ही मेरे देश के और लोगों को राष्ताविरोधी कहने को प्रेरित करता है। उमर, राष्ट्रवादी होना गाली नहीं है, संकुचित होने की निशानी भी नहीं है और मूर्खता भी नहीं है। यह वर्त्तमान समाय में मानवता के अपने आपको विभिन्न इकाइयों में संगठित करने की स्वीकृति भर है। मैं जनता हूँ की राष्ट्रवाद को संपूर्ण मानवता को एक मानने का और मानवीय भाईचारे का विरोधी माना जाता है। पर मैं इस चिंतन से सहमत नहीं हूँ। पर साफ़ करदूं कि मुझे पता नहीं है की राष्ट्रवाद को “patriotism” का समानार्थी नानाजाता है या “aggressive nationalism” का, मैं  यहाँ इस का उपयोग “patriotism” के अर्थ में कर रहा हूँ और इस में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती।

उमर को ऐसा भी लगता है की यदि हम अपने आतंरिक मामलों की बात करते हैं तो भारत का जाफना में और बंगलादेश में हस्तक्षेप गलत था। यहाँ बात बहुत लंबी हो जायेगी अतः मैं इतना ही कहूँगा की (१) दोनों मामलों के इतिहास में और गहराई से जाना होगा, और (२) श्रीलंकाई नागरिकों का मत जानना होगा, पाकिस्तानी और बंगलादेशियों के मत जानने होंगे कुछ भी कहने से पहले।

एक और चिंता यह है कि चुनाव जीतने से कोई निर्दोष नहीं हो जाता। ठीक बात है, पर केवल हमारे कहने से भी कोई दोषी नहीं हो जाता। दोषियों और निर्धोशियों का फैसला हमलोग मिलकर और अपने न्यायतंत्र से करेंगे। जिन्हें हम दोषी मानते हैं उनके विरूद्ध अभियान चलाने का हमारा हक़ है, सवाल सिर्फ यह है की वह अभियान हम कैसे चलाते हैं। अभियान चलने के सारे तरीके जायज नहीं माने जा सकते। मेरा विरोध तरीके से है, अभियान से नहीं।

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9 Responses to मोदी के वीसा पर बहस

  1. Mohammad Umar says:

    rohit sir, maafi chahta hoon. meri mansha katai aapko narendra modi ji ka samarthak kahne ki nahi rahi hai. main janta hoon ki aap katai us vichardhara ke samarthak nahi ho sakte jo desh ki ganga jamni tahzeeb ki khilafat karti ho. yadi aapko meri baat se aisa ahsaas hua tau bahut maafi chahta hoon. …….aapne itna vistar se likh kar bahut si baatein spast kar di hain. aapki tarah main bhi amrika aur amriki neetiyon ka virodhi hoon. katai nahi chahta ki chote badmash ki shikayat bade badmash ya dada se ki jaani chahaiye ……aur usey apne ghar me ghusne ka bulava diya jana chahaiye . …….lekin ‘rastravad’ aur ‘antarik mamla’ ke muddey par aap jis tarah ka nazariya yahaan rakh rahe hain us par abhi bhi sasammaan ashmati hai. yadi hamara “rastravaad” samaaj ke bhitar rach bas gaye mavaad ko aantarik mamla mankar chipaaye rakhne ko kah raha hai to mere vichar se yah theek nahi hai. aapki yeh baat jas ki tas rakh raha hoon ‘ राष्ट्रवादी होना गाली नहीं है, संकुचित होने की निशानी भी नहीं है और मूर्खता भी नहीं है। यह वर्त्तमान समाय में मानवता के अपने आपको विभिन्न इकाइयों में संगठित करने की स्वीकृति भर है।’ rohit sir, rastravaad ki aapki yeh paribhasha kuch logon ko hindu rastravadi, indian mujahiddeen, jammu kashmir libration front, ulfa, khaap ya fir maraathi manush baney rahne ki izaazat deta hai. is tarah dekhein to ‘rastriya samprabhuta’ khand khand aur tukda tukda hokar bikhar rahi hai. is paribhasha ke anusaar kal ko koi raaj thaakre keh sakta hai ( aur asal me keh bhi raha hai) ki maharastra me hum maraathi log ” maanavta ki ek sangathit ikaai hain” aur “rastravaadi” ki tarah hi vo bhi ek “rajyavaadi” banakr yeh kah sakne ka adhikari hai ki uske rajya ke ” aantarik maamle” me kisi baahri ( bihaari ya uttar bhartiya ya dilli ki sarkar ) ko bolne ka haq nahi hai. khaap panchaayat bhi kah sakti hain ki ye unki vo bhi maanavta ki ‘ek sangathit ikaai hain” aur ye unki jaati ka ‘aantarik mamla’ hai tau kisi bahar wale ko bolne ka haq nahi hai ……….

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    • rdhankar says:

      प्रिय उमर,
      इस सारी बात-चीत में मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा जिसके लिए आपको माफ़ी मंगनी चाहिए. हर संवाद में ज हम कहना चाहते है उसके विभिन्न अर्थ निकल ही आते हैं, अतः आपको किसी भी तरह की झझक होने की जरूरत नहीं है.
      मैं देश के प्रति सम्मान और लगाव की बात कर रहा हूँ, शायद राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग गलत है यहाँ. अंग्रेजी का शब्द “patriotism” शायद मेरी भावना के अधिक नजदीक है। हिंदी में उसे शायद “देशप्रेम” कहना अधिक ठीक होगा। मैं मानवता के विभिन्न भू-राजनैतिक इकाइयों में बंटे होने की बात कर रहा हूँ, यानी देशों में बंटे होने की। इसमें प्रदेशवाद और अन्य विभाजक भावनाओं को बढ़ावा देना शामिल नहीं है। पर अभी वक्त नहीं है, बाकी फिर कभी। एक बार फिर, आप संवाद को जिसतरह आगे बढ़ा रहे हैं उसमें कुछ भी अवमानना और माफ़ी मांगने जैसा नहीं है, सो इसकी चिंता बिल्कुल छोड़ दें।
      शुभ कानों सहित
      रोहित

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  2. Ram says:

    @ Umar, Rohitji ne apne jawab me samaj me rach bas gaye mavad ko antarik mamala man kar chipaaye rakhne ke liye kahi bhi vakalat kanhi nahi ki hai, par is par bade badmash se guhar lagane par unki asahmati hai jo vajib hai. Dusara rashtravadi hone ma matlab dusaro ke loktantrik hako ka gala ghotna nahi hota. Or koi bhi manvata ki sarthak ikai yadi loktantrik dayaro me reh kar kam kare to usame kya aapati ha ? Kya rashtrawadi hona loktantra virodhi hona hota hai ? Sangthan, sansthae banane ka adhikar to hamara loktantrik samvidhan bhi deta hai umar bhai. Dusara kutch logo ko samaj me rach bas gaya mavad samaj ke ek khas hisse me hi najar aata hai jabki anya jagah rach bas gaye mavado ki vo jan boojh kar andekhi karte hai or mere hisab se jab tak vo esa karte rahege tab tak vo in mavado ko phalne, phoolne me sahyoug he karenge isase jyada or kuch nahi.

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  3. Samir Samnani says:

    If I used metaphor then it was’ perfect square’ cut way the confusions are explained by rohit Sir. This complement will make me hard core rohit Sir fan in many eyes which I can’t control, this how our perception are built across the years if I would be in China this has been seen differently. Same this the problem with Namo, narendra modi, disputed personality. If we argue, media hype and many controversies around one man shows how he reach peoples from different walk of life. Now coming to the point: I belive that internal issues shud be discussed internally unless and until third party is our ideological Father! Many may Believe! Any country evaded other countries was America after world war Two! Second patriotism is nothing wrong unless and until it’s threats global citizen human rights or security. This is debatable. Snowden recent revelations about America scanning database of friend countries. And third point, modi may be wrong but he is certified three times with 2/3 majority by gujarties under the constitution of India. We should not forget that. Recent killing of 17 year black in America and court judgement to free white on basis of self defence we know That! Rajiv Gandhi ‘big tree’ metaphor and following innocent killing we Know! Why I am pointing this we need to see modi and visa row on neutral way., Why only modi is culprit but we forget Rajiv Gandhi, bush, advani many others this suffice double standards. I am not saying modi has done right or wrong but SIT has given him clean chit and still case is going so judgement shud be leave upon court. So now question is we shud voice our demand outside of India if constitution permit us then we shud do that. If we do such a mistake then every leader will be prosecuted outside of India…..

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  4. Samir Samnani says:

    Sir need ur permission to share this document on Facebook to clear doubts of my friends. If yes pls reply.

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  5. Samir Samnani says:

    Thanks sir

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  6. हरिश्चन्द्र says:

    प्रिय रोहित जी,
    पिछले कुछ दिनों से आपके आलेखों पर दृष्टि जा रही है। आपका चिंतन तार्किक होता है, आप विद्वान भी हैं और एक कुशल वक्ता भी। इसलिए आप की बातों को सत्यवचन के रूप में मान लिया जाता है। ऐसा अक्सर होता है कि आप अपने व्याख्यानों में एक संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते हैं (किसी खास विचारधारा से प्रेरित होने की बजाए निष्पक्ष होना) लेकिन जहां तक आपके राजनीतिक चिंतन की बात है उसमें आपका आग्रह प्रत्यक्ष दिखता है। और आप जब दर्शन (विशेष तौर पर आस्था और धर्म-दर्शन) की बात करते हैं उस समय भी आपकी शैली निष्पक्ष तो कतई नहीं दिखती।
    एक ओर तो आप यह कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी की विचारधारा खतरनाक है लेकिन करोड़ों लोग चूंकि उनके समर्थक हैं इसलिए उन्हें गलत भी नहीं कह सकते। सवाल यह है कि आपने संघ को और नरेन्द्र मोदी को कितना जाना है और कितना जानने की इच्छा रखते हैं या फिर जितना जानते हैं उतने में ही संतुष्ट हैं क्योंकि वह जानकारी आपके परिकल्पना की प्रतिपुष्टि करती है।
    मैने कभी किसी भी प्रबुद्ध को राहुल गांधी, शीला दीक्षित, मुलायम सिंह, लालू यादव, कलमाड़ी, राजा या किसी अन्य का विरोध करते हुए नहीं देखा (क्षमा कीजिएगा, विरोध का अभिप्राय.. प्रधानमंत्री बनने के विरोध से है).. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री बनना या प्रयास करना किसी का भी जन्मसिद्ध अधिकार है लेकिन नरेन्द्र मोदी के संदर्भ में यह बात लागू नहीं होती क्योंकि वह तो खतरनाक है। अभी पिछले दिनों नोएडा में एक इमानदार अधिकारी को सस्पेंड होना पड़ा है क्योकि उसने इमानदारी के जोश में एक खास धर्म की भावनाएं आहत कर दी। प्रबुद्ध वर्ग के तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
    पहले नरेन्द्र मोदी को जानिए.. समझिए.. संघ की शाखाओं में शामिल होइए। उसके बाद भी आपको यह विचारधारा खतरनाक लगे तो अवश्य विरोध कीजिए। सवाल यह है कि कितने लोगों ने संघ का प्रत्यक्ष अनुभव किया है।
    विरोध करने वालों से मैं इतना ही कहना चाहुंगा कि प्रबुद्धों में भी भेड़चाल की प्रवृत्ति होती है..आवश्यकता इस बात की है कि मोदी विरोध के इस फैशन को अपनाने का आपका आग्रह क्या है।
    रही बात हिन्दू राष्ट्रवादी की तो इसमें बुरा क्या है। यदि कोई यह कहता है कि वह मुस्लिम राष्ट्रवादी है या क्रिस्तान राष्ट्रवादी.. या फिर नास्तिक राष्ट्रवादी तो इसमें गलत क्या है.. लेकिन कोई कहे तो।
    भारत में ऐसे भी लोगों की तादाद खासी है जिन्हें अपने आपको किसी दूसरे देश से आया हुआ मानने में गर्व का अनुभव होता है और वे ऐसा व्यावहार भी करते हैं जैसे कि उन्हें धरती को पदद्लित करने का धार्मिक अधिकार दिया गया हो।
    ऐसे माहौल में अगर कोई खुद को राष्ट्रवादी कहने की हिम्मत करता है तो उसमें बुराई क्या है??

    धन्यवाद।

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    • Anshumala says:

      Harishchandraji,

      Sorry, I don’t know how I can type here in Hindi, therefore am asking the question in English.

      Are you suggesting that to understand any person’s/group’s political position or ideology, we must necessarily join the group and look at their leaders closely? Given the thousands of big or small groups that operate in any society/nation, that seems like an impossible demand on any citizen. All one can try to do is judge their public positions, statements, actions and their repercussions to try to reach any conclusion. (That is itself not simple since people’s actions and statements can be contradictory to each other).

      Still, there are often fairly clear political/partisan positions, giving a clear indication of where the person/group belongs, namely left, right or center, and even on that continuum, the extent to which a position is taken. After that it is the individual’s free choice what s/he is convinced of being the correct and convincing position to adopt or support it personally. In a democracy, no citizen needs to be apologetic of making that choice, particularly if s/he is rationally convinced that it is the correct position, even if s/he is not directly involved in power politics. That applies to Rohitji as well as you or me.

      I do not know what you really mean when you are making an implicit demand of remaining ‘unbiased’ (nishpaksha) while thinking philosophically. Does it mean taking no political stand, if one is an academic or a philosopher? I would expect that thinkers would have given a deeper thought to political questions (which are almost always moral choices), and their political positions would be typically more well-mulled over as compared to lay-people, and would not be made simply for reasons of past loyalties, emotions, attachments and the like. I expect that of Rohitji too, and therefore would look for justifications he offers for a chosen stand. I would expect that of you as well, as a fellow reader, for me to get convinced of (or not accept) what you/Rohit or anybody else is saying.

      anshumala

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