रोहित धनकर

दैनिक भास्कर, १० अक्टूबर २०१४, नई दिल्ली से एक खबर छपी है: “जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस आयोजन के विरोध में कुछ छात्रों ने एफआईआर दर्ज कराई है, जिसके बाद हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध गलत प्रचार के आरोप में फारवर्ड प्रेस पत्रिका जब्त कर ली गई और उसके चार कर्मचारियों को गुरुवार सुबह गिरफ्तार कर लिया गया।”

कल रात को ही जे.अन.यु. से एक दोस्त ने इस खबर के बारे में बता दिया था. बहुत सारे काम बाक़ी पड़े होने के बावजूद मेरी उत्सुकता और चिंता के चलते मैंने सुबह के कई घंटे—और मेरा दिमाग केवल सुबह ही चलता है आजकल—फारवर्ड प्रेस पत्रिका पढ़ने और उस में से कुछ समझने में लगाये; यह देखने के लिए की उसमें ऐसा क्या है जिसके लिए पत्रिका को जब्त किया जाए और उसके कर्मचारियों को गिरफ्तार किया जाए. मैंने सुबह-सुबह पत्रिका के वे सारे लेख पढ़े जो हिन्दू देवी-देवताओं से सम्बंधित हो सकते हैं.

इन लेखों में मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके आधार पर पत्रिका को जब्त किया जाए और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया जाए. जैसा कि पत्रिका के सलाहकार संपादक का कहना है इस “अंक में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं है, जिसे भारतीय संविधान के अनुसार आपत्तिजनक ठहराया जा सके”. अतः यह गिरफ्तारी और जब्ती सरासर असंवैधानिक है, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सीधा हमला है, और इसका विरोध और भ्रत्सना होनी चाहिए. यह पुलिस की गुंडागिर्दी है.

अब कुछ विचार पत्रिका में प्रकाशित विषय-वस्तु पर भी करने की जरूरत है. मुख्य चीज जिसको शायद निशाना बनायागया है वह महिषासुर और दुर्गा को लेकर एक चित्र कथा है. चित्र-कथा का लब्बो-लबाब यह है: महिषासुर असुरों का राजा था. देव उसको मरना चाहते थे. पर वह ताकतवर था और देवों के बस में नहीं आ रहा था. देवों ने छल से उसे मारने के लिए दुर्गा को भेजा. दुर्गा ने उस से प्रणय निवेदन किया, अपने रूप जाल में बंधा, सात दिन उसके साथ रही और फिर मौका देख कर उसे छल से मार दिया और महल के दरवाजे छुपे हुए देवों के लिए खोल दिए. देवों ने असुरों का कत्ले आम कर दिया. चित्र कला की दृष्टी से चाहे उत्कृष्ट ना हों पर न तो भद्दे हैं, ना ही अश्लील.

यह भी चित्र कथा का हिस्सा है की बचे हुए असुरों ने पांचवें दिन महिषासुर की ह्त्या पर शोक-सभा की. जे.अन.यु. में महिषासुर दिवस इसी शोक की स्मृती में मनाया जा रहा है.

पर देवताओं के छल, दुर्गा के प्रणय-निवेदन और महिषासुर के साथ रहने की कथा पत्रिका के ज्ञानी लेखक लाये कहाँ से? देवों और असुरों के संग्राम और संबंधों पर पत्रिका में काफी सामग्री है. पर इस कहानी के पक्ष में कोई बहुत साफ़ प्रमाण नही हैं. इसे मिथकों का ‘बहुजन’ पाठ कहा जा रहा है? ये बहुजन कौन हैं जो इस पाठ को मानते हैं? यादवों, दलितों और आदिवासियों का नाम लेने से तो काम नहीं चलेगा. क्यों की यह कहना मुश्किल है की सभी लोग जो इन जातियों में हैं वे इस पाठ को स्वीकार करते हैं.

पत्रिका के इसी अंक में श्री संजीव चन्दन का एक लेख है, “दुर्गा और महिषासुर का मिथक: एक वस्तुनिष्ठ पाठ”. इस लेख में उपरोक्त चित्र-कथा का आधार देखा जा सकता है. श्री चन्दन का कहना है कि दुर्गा सप्तशती इस पाठ को आधार देती है. मूलतः उनका “वस्तुनुष्ठ” पाठ उनके अपने कथन के अनुसार ‘पंक्तियों के बीच की व्याख्या’ पर निर्भर करता है. वह व्याख्या कुछ इस प्रकार है:

  1. दुर्गा सप्तशती के अनुसार युद्ध के दौरान दुर्गा ने सुरा-पान किया.
  2. इस से कुछ लोग (पंक्ति-बीच-व्यखाकार) महिषासुर के वध को दुर्गा के स्त्री होने का फायदा उठा कर धोखे से की गई ह्त्या मानते हैं. (कैसे? पता नहीं.)
  3. बाद में असुर शुम्भ और निशुम्भ दुर्गा को अपने पास आने का प्रस्ताव देते हैं. श्री चन्दन के अनुसार “यहाँ भी कथा के भीतर उपकथा की संभावना है”.
  4. कैसे? लेखक के अनुसार “दुर्गा का अविवाहित होना यानि किसी देवता के द्वारा उसे पत्नी के रूप में न स्वीकार जाना, यानि वह उर्वशी, मेनका की तरह देवताओं की अप्सराओं में गिनी जा सकती है”. (प्रगति-वादी लेखक के इस कथन पर आगे कुछ विचार करेंगे.)
  5. महिषासुर की हत्या को ‘महिषासुर मर्दन’ कहा जाता है. लेखक के अनुसार ‘मर्दन’ ‘सेक्स के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है’. इसे युद्ध के दौरान सुरा-पान के साथ देखा कर उपकथायें तलाशी जा सकती हैं.

जिसे अंग्रेजी में “इन्तेर्प्रेटेटिव रीडिंग” कहते हैं और यहाँ लेखक “पंक्तियों के बीच की व्याख्या” कह रहे हैं उस विधा मैं से पूरी तरह अनभिज्ञ हूँ. मेरे गणितीय दिमाग को लगता है की यह एक ऎसी जादुई विधा है जिसके माध्यम से किसी भी आलेख का कोई भी मन-माना अर्थ बहुत ही आशानी से निकाला जा सकता है. वास्तव में यह इस बात की घोषणा है की लिखित शब्द का कोई अर्थ नहीं होता, अतः सारे अर्थ बराबर के आधिकारिक होते हैं. यह मानवीय ज्ञान की थाती को मूर्खता में तब्दील करने का यन्त्र है. खैर, अब हम थोड़ा श्री चन्दन की व्याख्या की पड़ताल करते हैं.

इस पड़ताल में हमें ‘पंक्ती-बीच-व्याख्या’ विधि के इस्तेमाल की जरूरत नहीं है. ऊपर लिखे १ से ४ तक के बिन्दुओं को मिला कर देखिये: दुर्गा सुरा-पान करती है, वह अविवाहित है, उसे कोई दो लोग अपने पास आने का प्रस्ताव देते हैं, अतः वह अप्सरा है और अपने स्त्री होने के पुरुष के लिए योनिक आकर्षण का वध के लिए उपयोग करती है. और लोगों के साथ सोने में उसे कोई ऐतराज नहीं है. यह चिंतन आये दिन स्त्रियों को अपने आप को ढक कर रखने की सलाह, किसी पुरुष की होने के निशान (सिन्दूर) लगा कर रखने का रिवाज, अकेली ना रहने की सलाह, आदि से कैसे अलग है? क्या यही मानसिकता नहीं है जो हर अकेली स्त्री को अपने लिए उपलब्ध मानने की आज कल के पुरुषों को इजाजत देती है?

चन्दन साहब को कैसे पता की पुरानी आर्य मानसिकता भी इतनी ही बीमार थी? यह अपनी आज की मानसिकता के आधार पर की गई लोलुप कल्पना नहीं है क्या?

श्री चन्दन को लगता है कि संस्कृत शब्द ‘मर्दन’ का अर्थ सेक्स भी है. मोनिएर-विलियमस का शब्द-कोष मर्दन के ये अर्थ देता है: “Mardana, n. crushing, grinding, rubbing, bruising, paining, tormenting, ruining, destroying, n. the act of crushing or grinding or destroying; Kav.; Kathas. ; BhP.; rubbing, anointing, cleaning or combing (the hair).” आप्टे लगभग शब्दसह सहमत है. इन अर्थों में योन कितना है यह कोई भी आशानी से देख सकता है. और फिर सन्दर्भ का भी योगदान होता है अर्थ के चुनाव में, जहाँ बात युद्ध और मरने की हो रही हो वहां आप “रबिंग, अनोइन्टिंग, क्लीनिंग, या काम्बिंग” चुनेंगे या कुछ और?

इस के अलावा महिषासुर दुर्गा की चित्र कथा का पत्रिका में कोई और प्रमाण नहीं दिखा. हाँ, अपेक्षाकृत लम्बा लेख किन्हीं पॉल ई लारसन साहब का है. यह लेख अवेस्ता और वैदिक साहित्य की तुलना करके यह बताने की कोशिश करता है की कैसे पहले ‘असुर’ तो अच्छे गुणों वाले नैतिक लोग थे और कैसे देव बुराइयों की खान और बुरे लोग थे. दोनों ही आर्य थे, असुर एक-ईश्वर के मानने वाले थे और देव बहु-ईश्वरवादी. लेख में प्रमाणों के नाम पर कुछ वैसा ही है जैसा चन्दन साहब के लेख में. पर लारसन साहब के लेख में एकेश्वर और बहु-ईश्वर की बात को और एकेश्वर के साथ नैतिकता और अच्छे लोगों का होना तथा बहु-ईश्वर के साथ घमंड, ताकत की चाह और अन्याय का होना समझना हो तो उनके बारे में कुछ और जानना होगा.

श्री लारसन “ट्रुथ सीकेर्स इंटरनेशनल” के “यूएस बोर्ड” के संथापक सदस्य हैं. और इस जिम्मेदारी के तहत पिछले १२ वर्षों से भारत की नियमित यात्रा करते हैं. ट्रुथ सीकेर्स इंटरनेशनल का उद्येश्य है “BRINGING FREEDOM FROM CASTE THROUGH THE GOSPEL” अर्थात “गोस्पल के माध्यम से जाती से स्वतंत्रता दिलाना”. कैसे? ट्रुथ सीकेर्स की वेब साईट से एक छोटी सी बानगी देख लीजिये: “India’s caste system, a 3000 year old system of religiously defined slavery, restricts the occupation of priests to the highest caste, called Brahmins. They and they alone have the authority under Hinduism, to perform and preside over weddings, funerals, sacrifices, baby naming ceremonies, building dedications and other spiritual ceremonies and festivals. During the past decade, Truthseekers has labored to remove Brahmin tyranny over the lives of India’s low and out castes through the reconciliation of those castes and the denial of any spiritual superiority of the Brahmins, which is what Hinduism teaches.

This labor has produced results, and we’re seeing the reconciliation of the low and out castes and their rejection of Brahmin priests all over North India. This cultural shift creates a huge void. Who will solemnize weddings now? Who will determine the name of a child? This is the problem that Truth-Keepers Discipleship program will solve. We will disciple people into solid Christ followers who will have the authority, confidence and capacity to pastor the low and out castes, including performing and presiding over the spiritual ceremonies that Brahmins once did.”

श्री लारसन के बारे में ट्रुथ सीकेर्स इंटरनेशनल की साईट पर यह है: “He is amazed at all God is doing. Paul states he never dreamed that he would see so powerful a movement of God as we now see moving through the Backward Castes of India. Since 2003 Paul has made seventeen multi-week trips to India serving with TSI which he has carefully documented.”

कौन से सत्य की खोज में लारसन साहेब भारत की बार बार यात्रा कर रहे हैं यह इन उद्धरणों से साफ़ हो जाता है. दलित और पिछड़ों की स्वतंत्रता से लारसन साहब का आशय है ईसाई होना. भारत में ईसाइयत ने जाति को कितना दूर किया है यह बात भी सभी जानते हैं. पिछड़ों की शादी करवाने का और बच्चों के नाम कारण का धंधा ब्राह्मणों से छीन कर पादरी के हाथ में देने को वे स्वतन्त्रता दिलाना मानते हैं.

पत्रिका का यह अंक मूलतः यह बताता है कि जिसे ये ‘बहुजन’ कहते हैं (दलित, पिछड़े और आदिवासी) वे लोग असुर-श्रमण परंपरा के वारिस हैं. महिषासुर के वंसज हैं, और अब अपनी परंपरा का पुनर्संधान करके ब्रह्माणी परंपरा से निकलना चाहते हैं. अतः महिषासुर दिवस मनाते हैं. यह ‘पहचान की राजनीती’ का एक पैंतरा है. कोई अपनी पहचान असुरों से और महिषासुर से बनाना चाहता है तो किसी और को क्या ऐतराज हो सकता है? यदि किसी को ईसा और महिषासुर एक-दूसरे के बहुत नजदीक लगते हैं तो भी क्या ऐतराज हो सकता है?

पत्रिका के लेख ठीक-ठाक विमर्श से लेकर मूर्खता तक जाते हैं. कोई भरोसे मंद अकादमिक विमर्श की अपेक्षा इस से करना तो बेवकूफी ही होगी. साथ ही देवी भक्तों को और वैदिक देवताओं के भक्तों को पत्रिका की बहुत सी बातें ना पसंद होंगी, और आज के भारत में बुरी भी लग सकती हैं.

तो क्या मैं यहाँ अपनी ही आरम्भ में कही बात का विरोध कर रहा हूँ? मैं ने आरम्भ में कहा है कि “इन लेखों में मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके आधार पर पत्रिका को जब्त किया जाए और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया जाए. जैसा कि पत्रिका के सलाहकार संपादक का कहना है इस “अंक में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं है, जिसे भारतीय संविधान के अनुसार आपत्तिजनक ठहराया जा सके”. अतः यह गिरफ्तारी और जब्ती सरासर असंवैधानिक है, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सीधा हमला है, और इसका विरोध और भ्रत्सना होनी चाहिए. यह पुलिस की गुन्दागिर्दी है.” साथ ही मैं अब कहा रहा हूँ की पत्रिका प्रमाण विहीन मूर्खताओं से भारी है और इस में ऎसी चीजें हैं जो देवी भक्तों को बुरी लग सकती हैं.

मेरे विचार से इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है. मैं पत्रिका की वैचारिक धरा से असहमत हूँ, कुछ आलेखों को छोड़ कर उसमें कुछ गंभीरता से ध्यान देने काबिल नहीं है. पर लोकतंत्र में लोगों को अपने विचार रखने की, उन्हें प्रचारित करने की पूरी स्वतंत्रता जरूरी है. चाहे उन विचारों को हम गलत और मूर्खतापूर्ण ही क्यों न मानें. अतः इन लोगों को देवी दुर्गा के बारे में एक दूसरा विमर्श आरम्भ करने का हक़ है. इस में देवी भक्तों को बुरा लगता है तो लगे.

पत्रिका को पढने से एक बात मुझे और महसूस हुई. इसके करता-धर्ता और संघ परिवार के मूल चिंतन में कोई खाश फर्क नहीं है. स्त्रियों के बारे में मैंने ऊपर चन्दन साहब के लेख में यह दिखाया है. अब इतिहास के बारे में भी देखलें. श्री लारसन बताते हैं कि “No sense of individual or group identity can successfully survive without a story of origin and destiny. The community must believe that it has an ordained place in the order of things. It is from the story of our past that we understand the present and gain hope and direction for the future.

Thus the celebration of Mahishasura, the great king of the Asuras, martyred at the hands of the treacherous Aryans, provides for the renewal of both identity and hope for the oppressed Dalitbahujans. Such counter-cultural commemorations reconstruct and empower the identity of today’s oppressed Indian Asuras.”

तो पहचान इंसानियत और इंसानी बराबरी के आधार पर नहीं, उद्गम की कहानी और उसकी महानता के आधार पर बनती है. येही तो संघ परिवार कहता है. लारसन साहेब इस के साथ यह भी बताते हैं ‘बहुजन’ को कि वे ‘दमनकारी बहुईश्वरवादी आख्यान को छोड़ें और स्वतंत्र करने वाली एकेश्वरवादी आशा के गले लगायें’. बहुईश्वरवादी सिर्फ आख्यान है, और एकेश्वरवादी चिंतन “आशा”. तो रास्ता कुछ यूँ है: दुर्गा से महिषासुर और वहां से ईसा. पर यह पत्रिका का विचार नहीं है, उसमें एक लेखक श्री लारसेन की आशा भर हो सकती है.

निष्कर्ष यह कि पत्रिका का चिंतन आधारहीन और भोंडा है. तर्क बचकाने और उथले हैं. मुख्या मशला भारत की कुछ जातियों को असुर परंपरा में बताना और दुर्गा को देवों/आर्यों के नियंत्रण में एक चाल-बाज छलिया स्त्री बताना है. इस पहचान की लड़ाई के गंदले पानी में मछली पकड़ने के लिए एक ईसाई समूह भी ललचाई आँखों से देख रहा है और ईसायत की पुरानी परंपरा—दूसरे धर्मों की भोंडी व्याख्या करने—का पूरा निर्वाह कर रहा है. पर लोकतंत्र में शब्द के माध्यम से ये सब करने को विमर्श मानना होगा और इसको पूरी इजाजत और संरक्षण भी देना होगा. अतः, पुलिस करवाई गलत, गैर संवैधानिक और नाजायज है. उन लोगों को अपनी अधकचरी व्याख्याओं के प्रकाशित करने का हक़ है और सभी लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों को पत्रिका पर पुलिस करवाई का विरोध करना चाहिए.

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