‘पीके’ के बहाने


रोहित धनकर

धर्म—मजहब, पंथ और रिलिजन के अर्थ में—बहुत कमजोर और डरपोक विचार है. यह बात खासकर धर्म के संगठित हो जाने पर सही उतरती है, और सब धर्मों के लिए सही है. चाहे वह हिन्दू धर्म हो, ईसाइयत हो, इस्लाम हो, बोद्ध धर्म हो या कोई और. उनकी हिंसक और आक्रमणकारी प्रवृत्ती धर्म के मूल में बैठे इस डर का नतीजा है, किसी ताकत का नहीं. यह डर स्वयं विश्वास के आधार-हीन, तर्कहीन और विवेकविहीन होने के कारण उपजता है. क्यों की धर्मं लोगों की असुरक्षा की भावना और जगत की रहस्यमयता पर पनपता है, अतः वह नासमझी और भय को सदा बनाए रखना चाहता है. लोग यदि समझने लगें और अपनी असुरक्षा को स्वयं संभालना सीखालें तो धर्म को बहुत बड़ा खतरा होता है. जो धर्म की इस कमजोरी की तरफ इशारा करता है धर्म उसको हिंसा से रोकना चाहता है. ‘पीके’ के साथ यही हो रहा है.

जिन हिन्दुओं को ‘पीके’ में दिखाए गए धर्म के टोटके, चालबाजियां, धोखे और छल आपत्तीजनक लगते हैं वे उनको मिटाते क्यों नहीं? सड़क पर लाल पत्थर रख कर रोज उगने वाले मंदिरों को ये क्यों नहीं हटाते? रामपाल और आशाराम जैसे बाबाओं के चरणों में ये सर क्यों झुकाते हैं? ‘पीके’ के तपस्वी जैसे धोखेबाज बाबा तो आज हर गली-मोहल्ले में हैं; इन के होने से तो इन हिन्दुओं को कोई शर्म नहीं आती. उनके होने की बात करने से, बता देने से शर्म क्यों आती है? ‘पीके’ का विरोध इस डर का नतीजा है कि धर्म की जड़ों की सड़ांध को लोग समझने लगेंगे तो उसकी धन कमाने की और सत्ता देने की क्षमता खत्म हो जायेगी.

‘पीके’ कोई कॉमेडी नहीं है, केवल कोई नासमझ ही उसे कॉमेडी कहेगा, यह एक तीखा व्यंग है. व्यंग (satire) और प्रहसन (comedy) का फर्क या तो लोग सकझते नहीं या फिर व्यंग को नरम साबित करने के लिए कॉमेडी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं. वैसे भी धर्म की जड़ में जितना छल होता है उस को उजागर करने के लिए कॉमेडी बहुत हल्का हथियार है, यह काम व्यंग ही कर सकता है.

लोकतंत्र में किसी चीज का विरोध करने के लिए, किसी छल को उजागर करने के लिए, व्यंग का उपयोग एकदम जायज है; बल्की लाजमी है. कुछ लोग अपने विवेकविहीन विश्वासों की रक्षा के लिए दूसरों के विचारों की अभिव्यक्ती पर आक्रमण नहीं कर सकते. उन्हें यह इजाजत नहीं दी जा सकती.

क्यों की अभिव्यक्ती की स्वतन्त्रता हमारा अधिकार है, इस लिए इस अभिव्यक्ती का विषय चुनने का भी अधिकार है. आप किसी लेखक को, कलाकार को, इस बात के लिए बाध्य नहीं कर सकते की वह धर्मों की जड़ में डर, मूर्खता और धोखा उजागर करे तो सब धर्मों में इन की बात करे. यह लेखक या कलाकार का चुनाव है की वह किस की बात करना चाहता है और किसकी नहीं. उसे न तो सब की बात करने के लिए मजबूर किया जासकता है ना ही सब की बात न करने पर दण्डित. ‘पीके’ हिन्दू धर्म पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है, और यह उसका हक़ है. इसके लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जासकता. इस्माल और ईसायत की बात उसमें केवल एक संकेत के रूम में है. मेरे विचार से फिल्मकार यह कहना चाहता है कि वह हिन्दू धर्म के माध्यम से कुछ समस्याओं पर सवाल उठा रहा है; ये समस्याएं इस्लाम औए ईसाइयत में भी हैं. कोई और उनको विस्तार से ले, चाहे तो.

वैसे भी हम सब जानते हैं की इस तरह का करारा व्यंग इस्लाम पर करना ज्यादा खतरनाक है. (यह बात बहुत से लोंगों को बड़ी फिरकापरस्त लगेगी, पर सही है.) इस के कई कारण हैं. एक तो यह कि हिन्दू धर्म का कोई केंद्रीय रूढ़-मत (dogma) नहीं है. बहुत सारे रूठ-मत है, इन में कोई भी सर्वमान्य नहीं है. इस का फायदा यह है कि कोई भी ऎसी चीज नहीं है जिसे कोई न कोई नकारता नहो, जिस पर अंगुली उठाने से पूरे धर्म पर अंगुली उठ जाए, जिसकी जड़ खोदने से पूरे धर्म की ही जड़ खुद जाए. पर इस के नुकशान भी हैं, जैसे यह कि धर्म के नाम पर कोई कुछ भी चाल-बाजी कर सकता है. दूसरा कारण हिन्दू धर्म की आलोचाने के कम खतरनाक होने का यह है कि बड़ी कटु आलोचना का इतिहास भी रहा है इस धर्म में. अब तो संध की करामातों के चलते इस खुलेपन के इतिहास को खतरा लग रहा है, पर अभी भी लोग इस की रक्षा करने में समर्थ हैं. तीसरा कारण यह है की इस्लाम में मुहम्मद और खुदा पर अंगुली उठाने का जवाब हिंसा से देने का पुराना रिवाज है.

जहाँ कोई एक रूढ़-मत नहीं होता वहां विभिन्न संभावनाओं को तलाशने की गुंजाईश थोड़ी ज्यादा मिलसकती है. और उस रूढ़-मत पर चोट से डर भी कम लगता है. हिन्दू धर्म के बारे में यह आशानी से कहा जासकता है कि लोगों ने अपनी जरूरत के मुताबिक भगवान् और देवता बना लिए, कई बार भ्रामक विश्वास के कारण और कई बार जान बूज कर अपने किसी फायदे के लिए, बल्की लोगों को छलने के लिए भी. मुहम्मद के बारे में यह कहना कि कुरआन देने वाला जिब्रील उसके मन का भ्रम या जान बूझ कर घड़ी गई छल-पूर्ण कल्पना थी, कहीं ज्यादा खरनाक है. रश्दी ने यही कहा था. बीबीसी हिंदी पर पाकिस्तानी पत्रकार वुसतुल्लाह ख़ान का एक लेख है ‘पाकिस्तान में भी कोई पीके बनाएगा?’ के शीर्षक से. उसमें वे कहते हैं “ऐसी फ़िल्म पाकिस्तान में बनाने का अभी किसी का हौसला नहीं और कारण आप जानते ही हैं.” यह कारण इस्लाम के लिए भारत में भी लागू होता है.

पर इस से ना तो किसी को ‘पीके’ के विरोध में हिंसा करने का हक़ मिलता है नाही हिरानी को पक्षपाती कहने का. यह उनका चुनाव था, और जायज था. इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, हिन्दू धर्म में ढकोशले और पाखंड की ज्यादा गुंजाईश है. यह पाखंड इसी धर्म में इस वक्त सबसे ज्यादा हो रहा है. और इस से होने वाला नुकशान भी इस वक्त ज्यादा लोगों को हो रहा है. तो व्यंग भी इसी पर सब से पहले होना चाहिए.

आखिर में एक स्पष्टीकरण और एक दावा: मैंने धर्म के बारे में जो कुछ ऊपर कहा है वह कई लोगों को बहुत सतही और भोंथरा लगेगा. इस में उनको विश्लेषण की गहनता और सूक्ष्मता (nuance) की कमी लगेगी. मैंने यह बात जान बूझ कर इसी तरह कही है. क्यों कि ‘पीके’ के सवाल भी इसी तरह के सीधे सादे हैं. उदहारण के लिए: इन इतने भगवानों में असली कौनसा है? कैसे पता चले? या, भगवान् को हमने बनाया या हमको भगवान् ने? ये बड़े सीधे और बुद्धूपने के सवाल हैं. पर कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म ईश्वर-मीमांसा भी इन का उत्तर नहीं दे सकती. हाँ, गहराई और सूक्ष्मता के नाम पर भ्रम जरूर फैला सकती है. इन का जो सीधा-सादा विवेक है उस की चमक धर्म-मीमांसा की सारी लफ्फाजी से कहीं ज्यादा है.

9 Responses to ‘पीके’ के बहाने

  1. Yasin Khan says:

    Extremely refreshing to go through the views amid the state of confusion wherher shall I speak or not. Thanks for appearing in time.

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  2. imran khan says:

    आप की बात अधूरी सी लगती हे । कहने की आजादी और किसी की भवना के बिच के फर्क को इस्पस्ट कीजिये । पी के पर कोई शक नहीं । पर उसके विरोध के पीछे क्या सच में धार्मिक आस्था को ठेस पहुंची हे । मेरे पास कई एस एम् एस आये जिसमे पी के विचार का समर्थन कम और आमिर को एक धार्म विशेष का व्यक्ति मानकर जादा पक्ष लिया जाता हे । फिर एक धार्मिक युद्ध लोगो के मन में नजर आता हे

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  3. Mahtab says:

    As always it was enlightening. Just one thing, Pakistan made at-least two movies that exposed the contractors of GOD i.e. ‘Khuda ke lye’ and ‘Bol’. These two movies are must watch as it exposes the mullah in more serious terms.

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  4. rdhankar says:

    The Issue of hurt religious felings needs in-depth analysis. I can not go into the details of the argument, but ‘hurt feeling’ to ‘anger to vadalise or violance’ does not seem to be a simple connection to me. I have reasons to believe that most of the hurt-feeling is actually a sham without any feelings, with a lot of power play in it. and it seems to be the case with Hussain drawing a nude saraswati, Rushdie questioning Muhammad’s prophethood and Taslima bringing out a delibrately hidden detail of Muhammad’s life.

    I have seen ‘Khuda ke liye’ long back. do not remember the details now. But do remember thinking that this is a very well made film and questions a certain interpretatioj of Islam. However, the film never questions the Islam’s central dogmas: Muhammad’s supposed prophethood and Allah being the only God. It wants to clarify misinterpretation of Islam. Imagin PK trying to expose Tapaswi with the help of sophisticated Hindu theology. That will re-establish the Hindu theology and exose Tapaswee as a misinterpretation of it. That is what Khuda ke liye does. and the film actually fails even to answer the central question its starts to explore: can a muslim girl marry aganst her fathers wishes? The film avoids asnwering the question at all. the final ‘answer’ is: this girl is not even a Muslim. That is no answer to the issue raise. as a result inspite of being a very good and cauragious film “Khuda ke liye” refrain from raising fundamental questions on theology. also, a satire has much more sting than a serous debate. therefore, satire is more potent to attack religion. One can try reading https://history.hanover.edu/texts/voltaire/volreaso.html .

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  5. Anonymous says:

    आपने बहुत अच्छा और सही लिखा है। एक बात मैं दर्ज कराना चाहता हँ कि पाकिस्तान में 2011 में बोल नाम से एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी। इसमें इस्लाम में मौजूद लैंगिक भेदभाव और पितृसत्ता को जिस बेबाकी उधेड़ा गया था वह काबीले तारीफ है। आपसे आग्रह है कि वह फिल्म ज़रूर देखे। उसकी अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल सकती है –

    http://www.imdb.com/title/tt1891757/?ref_=fn_tt_tt_1

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  6. प्रियंवद says:

    आपकी बातों से ज़्यादातर सहमति है|… हमारे यहाँ ईश्वर की अवधारणा को संभवतः सबसे ज़ोरदार चुनौती चार्वाकों ने दी है| लेकिन इस फिल्म पीके की समस्या यह नहीं है जिसके कारण हमारे तथाकथित ‘हिन्दू बहादुर’ उसका विरोध कर रहे हैं…फिल्म तो अंत तक आते आते दूसरे ‘गोले’ में भी ‘सही नंबर वाले’ ईश्वर की अवधारणा का बीज बो देती है…दरअसल पीके ईश्वर की अवधारणा को पुष्ट करती हुई फिल्म ही है| पीके जिस तरह की जिज्ञासा और सवाल के साथ शुरू होती है वह बहुत संभावनाशील लगता है लेकिन बहुत आहिस्ते से फिल्म अपने सारे सवालों को छोड़ती चली जाती है…और इन सारे सवालों को एक बार फ़िर से ढक देने के लिए एक ‘सही नंबर’ वाला ईश्वर सामने आ जाता है| इस फिल्म में ही एक जगह कहा गया है – ‘जो डर गया वो मंदिर गया’ फिल्म अपने अंत तक आते-आते बेहद डरी हुई सी दिखने लगती है| यह डर अनायास भी नहीं था बानगी हम सभी देख ही रहे हैं…

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  7. gyanprakash sharma says:

    aapki bat me dum h apne astitva ka khatra jinhe lagta h ye satik swal kam hi uthate h dusari bat me pura sach hi h ki agar mus lim dharma per swal ho to sampradayik hinsa tak bhi jor pakad le — aapke vichar alochna se autprot h

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  8. sudhir says:

    one of my colleagues who watched the movie in a theater said that people around him were not laughing at all even on the most funny things exposed in the movie. this is very serious, when a generation stops laughing at its follies it stops introspecting. this is the juncture when satire irritates and one sees the conspiracy of others in it and the very purpose of satire gets killed. the whole scenario is a result of a number of factors social, historical, technology, economy and politics. the movies hints at many but to many the hints are elusive for an example the mention of internet aarti, online darshan, home delivery of prasad raises the question on how in a superstitious and frightened society the science and technology is used (abused?) …so such a serious movie but how much will it be able to move the things is a question.

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  9. Anonymous says:

    Pk s a good eye opener movie and your article too. I have noticed some people always want to be in news to maintain his charm & popularity and for that they use different mediums ex. Few months back Sai bai was in target and now its PK.

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