(गणतंत्र दिवस के अवसर पर)

रोहित धनकर

भारतीय शिक्षा व्यस्था में धर्म-निरपेक्षता कभी भी बहुत मजबूत नहीं थी. सरकारी विद्यालयों में विभिन्न धार्मिक प्रतीकों की उपस्थिती और सरस्वती वन्दना ने कभी इसे पार चढ़ने ही नही दिया. पर वर्त्तमान सरकार के आने के बाद तो जो कुछ निरपेक्षता थी वह भी बड़े खतरे में लग रही है.

धर्म-निरपेक्षता

धर्म-निरपेक्षता का सिद्धांत व्यक्ती के लिए नहीं राज्य के लिए है. लोग अपनी मर्जी से जिसे चाहें उस धरम को माने, राज्य उनकी धार्मिक स्वतन्त्रता का सम्मान करने और रक्षा करने का वादा करता है. साथ ही धर्मं-निरपेक्षता के सिद्धांत की मांग होती है की राज्य की किसी भी क्रियाकलाप, नीती, संस्थान, उपक्रम आदि के निर्णयों और संचालन में किसी भी धर्म का कोई दखल नाहो. सभी नागरिकों के अधिकार उनके धर्म से निरपेक्ष एवं सामान होंगे.

जब राज्य के नीति निर्धारण और क्रियाकलापों में धर्म के दखल को हटाने की बात करते हैं तो फिर निर्णय किस आधार पर लिए जाएं? यह सवाल उठाता है. ऐतिहासिक रूप से बहुत से समाजों में समाज और राज्य की नीतिया और कानून बनाने में धर्म की बहुत बड़ी भूमिका रही है. अब यदि इस भूमिका के अस्वीकार करते हैं तो इसका कोई स्थानाप्पन तो चाहिए. यह स्थानाप्पन्न धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत के अनुसार मानवीय विवेक और अनुभव जन्य ज्ञान ही हो सकता है. अतः, धर्म-निरपेक्ष राज्य को अपनी नीतियाँ और क्रियाकलाप मानवीय विवेक और ज्ञान के आधार पर चलानी होती हैं.

धर्म में तो बहुत से सवालों के एक मात्र जवाब धर्मधीशों के पास और उनकी किताबों में उपलब्ध होते हैं. पर मानवीय ज्ञान और विवेक तो इस तरह की कोई एक धारा पर चलने वाली चीज नहीं हो सकता. उसमें तो विचार और मतभेद की बहुत गुंजाईश रहती है. यदि राज्य धर्म-निरपेक्ष के साथ लोकतान्त्रिक भी है तो उसे इन मतभेदों को सुलझाकर कोई यथासंभव सर्वमान्य नतीजों पर पहुँचाने में हर नागरिक की बराबर की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होती है.

धर्म-निरपेक्षता और सर्व-धर्म समभाव

जहाँ से धर्मनिरपेक्षता का आधुनिक विचार सर्व-धर्म समभाव से कुछ अलग रहा है. यह राज्य के कार्यों में धर्म की दखल के विरोध में पनपा. सभी धर्मों को सामान रूम से सम्मान देने की नजर से नहीं. अतः जब हम राज्य के संस्थानों में सभी धर्मों को बराबर की भागीदारी देनेकी बात करने हैं तो वह मूलतः धर्म-निरपेक्षता के विरूद्ध है. हालांकी भारत में अब चलन यही लग रहा है.

वैसे सर्व-धर्म समभाव भी, जितना मेरी समझ है, आज कल की सब धर्मों से भय खाने और उन से आक्रांत होने की भावना से अलग था. मेरे विचार से इसका सूत्रपात गांधी ने किया था. गाँधी के विचार से सभी धर्म इंसान के बनाए हुए हैं और क्योंकि इंसान अधूरे हैं, अतः, उसके बनाए सभी धर्म भी अधूरे हैं. साथ ही उन सब में कुछ सत्य भी है. जब सभी में कुछ सत्य का अंश है और सभी अधूरे हैं, तो सब को सम्भव से देखना चाहिए, किसी को किसी दूसरे पर तरजीह देने का कोई कारण नहीं.

साथ ही गांधी विवेक और नैतिकता विरोधी धर्म-शास्त्रों को नकारने की बात भी करते हैं. वे यह भी कहते हैं की कोई भी धर्म आज विवेचनात्मक विश्लेषण बच नहीं सकता. पर आज का हमारा सर्व-धर्म समभाव सभी धर्मों को विवेक के दायरे से बहार रखने और उनके आगे घुटने टेकने का बन गया है.

मुझे लगता है गाँधी धर्म-निरपेक्षता की बात नैतिक और व्यक्ति के स्तर पर कर रहे थे. राज्य के स्तर पर उनके समभाव के विचार को ले आने के कई गंभीर परिणाम निकले हैं. इसके चलते आज सभी धर्म अधिक से अधिक सार्वजनिक हस्तक्षेप की मांग करने लगे हैं. नतीजा यह है की एक जुम्मे की नमाज के लिए सड़क रोकना चाहता है तो दूसरा गणेश की मूर्ती लगाकर, एक मुहम्मद पर लेखन को बंधना चाहता है तो दूसरा राम पर. सब एक-दूसरे से ज्यादा बंदिशों और गोलबंदी की प्रतियोगिता में आगये हैं. कोई भी गांधी की विवेक-पूर्ण विवेचना को स्वीकार कररने को तैयार नहीं है.

धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र

पिछले कुछ दिनों (महीनों में) हिंदुत्ववादियों और बीजेपी सरकारों द्वारा किये गए कुछ कामों में धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरे की घंटी साफ़ सुनाई देने लगी है. छत्तीसगढ़ में एक विद्यालय में जबरन सरस्वाती की तस्वीर लगवाना, हरियाणा में सभी विद्यालयों में गीता पढ़ाने की घोषणा, अहमदाबाद में सभी विद्यालयों में सभी बच्चों से सरस्वती की पूजा करवाना; ये सब शिक्षा में हिन्दू धर्म के एकतरफा दखल के उदाहरण हैं. सब छोटे-छोटे लग सकते हैं, पर येही मिलकर हमारे शिक्षातंत्र का धर्मनिरपेक्षता का झूठा मुलम्मा भी उतार देंगे.

और धर्मनिरपेक्षता नहीं रहने पर लोकतंत्र भी नहीं बच सकता. लोकतंत्र विचार और अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता, समानता और न्याय पर टिकता है. किन्हीं ख़ास धार्मिक कर्मकांडों और विचारों को तरजीह देना स्वतन्त्रता, न्याय और समानता सभी को नकारना है. आर्थिक और सामाजिक बराबरी पर तो बाज़ार और विकास के नाम पर बराबर चोटें हो ही रही हैं; अब शिक्षा के माध्यम से यह धार्मिक प्रचार बच्चों के दिमागों पर कब्जा करने की मुहीम भी चलाने लगा है. इस सिलसिले को हम नहीं रोक पायेगे तो विद्यालय अंधविश्वास और धार्मिक भेदभाव के गढ़ बनजायेंगे. और धर्म-निरपेक्षता गई तो लोकतंत्र भी नहीं बचेगा.

धर्म और संस्कृती

शिक्षा बिना संस्कृती के असंभव है. और सभी संस्कृतियों के विकास में धर्म भी शामिल रहा है. अतः, जब आप धर्म को शिक्षा से बहार करने की कोशिश करते हैं तो संस्कृती भी बहार होसकती है. और बिना सांस्कृतिक जड़ों वाली शिक्षा अधूरी ही हो सकती है. समस्या यह है की, उदाहरण के लिए, सरस्वती एक हिन्दू देवी भी है और विद्या का संस्कृत प्रतीक भी. रामायण का पथ धर्म-ग्रन्थ के रूप में भी होता है और उसका अध्ययन एक सांस्कृतिक ग्रन्थ के रूप में भी. गीता और कुरआन बहुत से लोगों के लिए धर्म-ग्रन्थ हैं; पर जीवन-दर्शन के ग्रंथों के रूप में भी पढ़ा जासकता है. गांधी ने कहा है “मुझे यह कहते हुए अपनी बात साफ़ करादेनी चाहिए कि मैं उन सभी धार्मिक सिद्धांतो के अस्वीकार करता हूँ जो विवेक की सहमती प्राप्त नहीं कर सकते और जो नैतिकता के विरूद्ध हैं. मैं विवेकहीन धार्मिक भावना को केवल उसी स्थिती में बर्दास्त कर सकता हूँ जब वह अनैतिक ना हो”. (फौरी अनुवाद मेरा है) [I should clear the ground by stating that I reject any religious doctrine that does not appeal to reason and is in conflict with morality. I tolerate unreasonable religious sentiment when it is not immoral.—Gandhi]

हम लोग गांधी के मन्त्रों की दुहाई देना बहुत पसंद करते हैं. क्या हम धार्मिक माने जानेवाले ग्रंथों को गाँधी की उपरोक्त सलाह के साथ विद्यालयों में सांस्कृतिक ग्रन्थ मान कर लाने के लिए तैयार हैं? क्या हरयाणा सरकार गीता को विद्यालयों में विवेक की कशौटी पर कसने और जो विवेक-विरुद्ध तथा नैतिकता के विरूद्ध पाया जाए उसे अस्वीकार करने को तैयार है?

आज की भारतीय शिक्षा में काम करने वाले लोगों की एक बड़ी जिमेदारी भारतीय संस्कृती की एक ऎसी विवेकपूर्ण तस्वीर बनाना है जो समावेशी हो और जिसे विवेक की शख्त नजर के साथ विद्यालयों में पढ़ाया जा सके. यह धर्म के भूत को भी रोक सकेगी और हिन्दुत्ववादियों के सांस्कृतिक नारे की हवा भी निकाल देगी.

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