सारे आतंकी जिंदाबाद: आपत्ति और जवाब


[यह जवाब लंबा हो गया है, अतः अलग पोस्ट के रूप में दे रहा हूँ.]

सिराज जी,

आपकी टिप्पणी, सवालों और सलाह के लिए धन्यवाद. आप की बात अभी चल रही बहस के एक पक्ष को संक्षेप में पर मेरी समझ के अनुसार सफाई से रखती है.

आप की कुछ और जान लेने की सलाह तो मुझे मंजूर है ही. और गाहे बगाहे जानने की कोशिश भी करता रहता हूँ. यह किशिश व्यवस्थित रूप से मुकम्मिल नहीं हो पाती और हजार चीजों के चलते. पर मुझे यह भी लगता है की जिन के पास पूरी जानकारी नहीं है वे भी सार्वजनिक बहस में कुछ हद तक तो हिस्सा ले ही सकते हैं. यही सोच कर हिमाकत कर रहा हूँ.

ठीक से समझेने की कोशिश में मुझे आप की दलील कुछ यों लगी (यदि मैं गलत समझा हूँ तो जरूर बताएं):

  • आतंकी कामों और दंगा-फसाद के दोष में केवल मुसलमानों को ही फांसी की सज़ा दी जाती है.
  • बहुत सारे कानूनदां और बुद्धिजीवी फांसी की सज़ा के खिलाफ हैं.
  • बंबई बम ब्लास्ट फसाद के बदले में हुए, (क्यों की फ़सादियों को सज़ा नहीं मिली).
  • फ़सादियों की तादाद के कारण भारत में मुसलामानों को न्याय नहीं मिल सकता. पुलिस, वकील, अदालत सब मिली भगत में सबूत मिटा देते हैं, सब भीड़ देखते हैं, केस की मेरिट नहीं.
  • इस लिए याकूब मेमन को फांसी नहीं होनी चाहिए.

ऊपर बिंदु १ से ४ को आप तथ्यों के रूप में रख रहे हैं और बिदु ५ आप का बिना लिखा पर साफ़ निष्कर्ष लगता है. मेरी समस्या यह है कि मैं आपके १ से ४ तक के “तथ्यों” को तर्क के लिए मान भी लूं तो भी मुझे आप का अलिखित निष्कर्ष (५) सही नहीं लगता.

यह गंभीर मशाला है, अतः मुझे अपनी तरफ से पूरी कोशिश करनी चाहिए कि मेरी बात साफ़ हो सके. तो इसमें थोड़ा समय लग सकता है.

चाहे खाम-खयाली में ही सही मैं दो मान्यतायें ले कर इस तरह के मशलों पर सोचाता हूँ. पहले उन्हें लिख देना ठीक रहेगा:

  • यह कि कानून में और नैतिकता में एकल तथ्य अपने अपने आप में किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा सकते. तथ्य केवल किसी सामान्य कानून या सामान्य नैतिक नियम का आह्वान (invoke) करते हैं और निष्कर्ष उस सामान्य नियम के आधार पर निकाले जाते हैं.
  • यह कि “स्पष्टीकरण” (explanation) और “औचित्य” (justification) में फर्क होता है. स्पष्टीकरण केवल यह बताता है कि कोई घटना क्यों हुई, उसके पीछे क्या करण रहे; वह निश्चित तौर पर औचित्य साबित नहीं करता. औचित्य स्पष्टीकरण से तभी साबित होता है जब स्पष्टीकरण किसी सामान्य सिद्धांत का आह्वान कर पाए.

इन दो मान्यताओं के चलते मुझे लगता है कि आप के पूरे तर्क को जांचने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि आप के सुझाये तथ्य कौनसे सामान्य सिद्धांतों की तरफ इशारा करते हैं और क्या हम उन सिद्धांतों को मानने के लिए तैयार हैं. आइये देखते हैं कि हम लोग कहाँ तक सहमत हो सकते हैं. (वैसे यह संभव है कि आप मेरी ऊपर लिखी दो मान्यताओं से ही असहमत हों. तो हमें पहले इन मान्यताओं को स्थापित करना पड़ेगा, या कोई और मान्यताएं घड़नी पड़ेंगी जो हम दोनों मानते हों. नहीं तो बात आगे नहीं चल सकती. पर अभी मैं यह मने लेता हूँ की ये दो मान्यताएं आप को भी स्वीकार हैं.)

आप का कहना है कि फसादी और आतंकी अपराधों में केवल मुस्लमान अपराधियों को ही मौत की सज़ा मिलाती है. चलिए थोड़ी देर के लिए इस बात को तर्क के लिए मन लेते हैं. सभी सहमत होंगे की भारत के कानून में तो ऐसा नहीं की केवल मुसलमान अपराधियों को सज़ा मिले, और बाक़ी को एक ही तरह के अपराध के लिए कोई और सज़ा मिले. नाही ऐसा है की मुसलमान अपराधियों की फांसी की सज़ा पर तो अमल किया जाए और औरों की इसी सज़ा पर अमल न किया जाए. इन दोनों चीजों में कानून तो सब के लिए एक सा है. तो इस का अर्थ यह हुआ की कानून को लागू करने वाले लोग स्वयं क़ानून को पक्षपाती तरीके से लागू करते हैं. मुसलमान अपराधियों की फांसी की सज़ा पर तो अमल करते हैं और गैर-मुसलमान अपराधियों की सज़ा पर नहीं. इस जानकारी के आधार पर जब कोई कहता है कि मुसलमान अपराधियों को भी सज़ा ना दी जाए तो वह कौनसा सामान्य नैतिक सिद्धांत काम में ले रहा है? एक संभावना यह है: “अदालत से मिली सज़ा पर यदि एक के लिए अमल नहीं हुआ तो दूसरे के लिए भी नहीं होना चाहिए.” [इस पर ध्यान देना होगा की “अदालत से मिली सज़ा पर सब के लिए सामान अमल होना चाहिए” और “अदालत से मिली सज़ा पर यदि एक के लिए अमल नहीं हुआ तो दूसरे के लिए भी नहीं होना चाहिए” समानार्थक नहीं हैं.]

तो क्या हम “अदालत से मिली सज़ा पर यदि एक के लिए अमल नहीं हुआ तो दूसरे के लिए भी नहीं होना चाहिए” का नियम मानने के तैयार हैं? मनु शर्मा, बहुत से मुसलमान और हिन्दू माफिया सरगनाओं, और राज नेताओं के मामले में अदालत से हुई कैद की सज़ा का ठीक से पालन नहीं होता. क्या आप यह चाहेंगे कि किसी के लिए भी इस का पालन ठीक से ना हो? यदि ऐसा है तो फिर कानून और न्याय-व्यवस्था के कोई माने नहीं रह जायेगे.

एक नागरक के नाते मुझे क्या मांग करनी चाहिए? (इ) कि “जिनके मामले में अदालती सज़ा का अमल नहीं हुआ वह ठीक से करो” या (ई) “किसी के भी मामले में अदालती सज़ा पर अमल मत करो”? सिराज जी, मैं (ई) को स्वीकार नहीं कर सकता; हालांकी (इ) के लिए अपनी आवाज उठाने के लिए तैयार हूँ. मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि आप के तथ्य १ के आधार पर याकूब को फांसी से बचाने के लिए जिस तरह के सामान्य सिद्धांत/नियम आपको मानने पड़ेंगे वे हम-आप सब पर और समाज पर (और कानून और न्याय की धारणा पर) भारी पड़ेंगे. अतः यह रास्ता गलत है.

अब आप का दूसरा तथ्य लेते हैं: बहुत से कानूनदां फंसी की सज़ा के विरुद्ध है अतः याकूब को फांसी नहीं होनी चाहिए. यहाँ आप यह कह रहे हैं कि “यदि बहुत से कानूनदां किसी कानून के विरुद्ध हों तो उसे अमल में नहीं लाया जाना चाहिए”. वर्त्तमान में बाल-विवाह, बलात्कार, दहेज़, दलितों पर अत्याचार, आदि जैसे विषयों पर जो कानून हैं उनके विरूद्ध बहुत से कानूनदां मिलजायेंगे. तो क्या उनसब को भी न माना जाए? किसी कानून पर समाज में असंतोष हो और कानूनदां और बुद्धिजीवी उस का विरोध करते हों तो उसे बदल ने के लिए दबाव तो बनाया जासकता है पर किसी एक मामले में जब तक वह कानून लागू है उसको ना मानना गलत होगा.

आप ३रे तथ्य के मध्याम से कह रहे हैं की “यदि किसी फसाद के अपराधियों को सज़ा ना मिले तो बदले में आतंकी करवाई यतो उचित है या उसका अपराध कम हो जाता है”. यहाँ मुख्य सिद्धांत बदले में हिंसा को स्वीकार करने का है. यदी यह सिद्धांत मान लिया जाए तो भारत के बहुत से हिन्दू-मुस्लिम फसाद विभाजन से होते हुए मध्यकाल में चले जायेगे. और आगे सदा के लिए चलते रहेंगे. हम दंगाइयों को सख्त सज़ा की मांग तो कर सकते हैं, पर बदले की कारवाई को उचित ठहराने की नहीं. यह ‘स्पष्टीकरण’ को ‘औचिय्त्य’ मानने की प्रक्रिया होगी; जिसका कहीं अंत नहीं होता.

आप का ४था तथ्य ३रे का ही अधिक भयानक रूप है. तो तर्क वही होगा जो तीसरे का है.

यह सब देखते हुए आपके तथ्यों को यदि सही मन लूँ तो भी मुझे याकूब की फंसी का विरोध उचित नहीं लगता. हाँ, उसे फांसी देने में कोई कानूनी गलती हुई है या प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है तो उसपर पुनः विचार करने के लिए मांग की जा सकती है. कल के सर्वोच्च न्यायलय के विभाजित फैसले से इस बात की संभावना बनाती है और उसपर विचार होना चाहिए. पर सीधा फांसी ना देने की बात मान्य नहीं हो सकती.

क्या आप के गिनाये चारों तथ्य सही हैं? मुझे लगता है कि उनमें कुछ सच्चाई तो हो सकती है पर वे उस हद तक सही नहीं हैं जिस हद तक आप उन्हें मनवाना चाहते हैं. यह वैसे ही एक मानसिकता बनाने की कोशिश है जैसे संघी हिन्दुओं को प्रताड़ित कहने की कोशिश करते हैं. दोनों को ही इस तरह की धारणाओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. पर इस पर फिर कभी.

******

5 Responses to सारे आतंकी जिंदाबाद: आपत्ति और जवाब

  1. dhirajapu says:

    Dear Rohit,

    I read your arguments with great interest. As always they are enlightening and always press to mull over different aspect of any issue. Your argument about the case of Yakub is interesting and I subscribe to idea that one should be punished (according to law) if found guilty despite of caste, religion, caste, creed etc. Thus I have agreement over the sentencing of Yakub (I believe that he was sentenced according to law and all the evidences were taken into consideration properly).

    However, if I stretch my imagination then I am little uneasy with some of the argument you have presented here (Kindly correct me if I have misunderstood you) and other’s concern. Please help me with my questions.

    You argue that ‘one’ should be punished despite of his/her religion if found guilty according to ‘the laws’ of our democratic state. Furthermore there should be uniformity in the justice that it should be applied in all the cases appropriately. In cases where it is not being followed, you are ready to raise your voice and demand for equal sentencing. While replying to this post you also say that, ‘there should be uniformity in punishment’ and ‘if not followed in one case then it should not be followed in others too’ are not synonyms. And for argument (perhaps) you also grant that constitutional laws are secular and talks about uniformity but people who are executing those laws are biased people (Kindly correct me if I am wrong so far).

    Now others are objecting that the extreme punishment like death sentence falls in the bag of certain community, mostly. While for similar and even more heinous crimes people belonging to another community escapes from the extreme punishment. According to them this is happening repeatedly due to power politics in the society. Like; Hindus, who have committed similar crimes with more severity like mass massacre or riots killing more people, escaped the death penalty.

    In this case and for the sake of argument please tell me that what would be the problem if one demands that some ‘Yakub’ (can be anybody, name should not matter here) who is Muslim should be exempted from the death penalty because statistically mostly Muslims are getting death penalty. Hindus remains shielded from that (because practitioner of law are human and thus necessarily biased people and according to the posed allegations always favor Hindus and go easy on them), despite of the similar deeds.

    And reason and justification for such demands could be given that;
    1. We are already living in an imperfect society where democratic principles of equality are not being followed. (Case that Hindu extremist are exempted).
    2. People who execute those constitutional law (laws are democratic in nature) are biased and thus making the entire system and even laws undemocratic. Because law would not execute and follow itself, these would be followed and executed by human and it is already granted for argument that they are biased.
    3. Raising voice and public discourse would not create any change because historically it has not done so and only people belonging to ‘Muslim Community’ are being punished. And while intellectuals and concerned citizens are raising their voice against unfair use of ‘constitutional law’, the unfair use and practices are already strengthening power politics of ‘Hindu community’ and their bargaining power, while at the same time weakening the morals and faith and bargaining power of Muslim community.
    4. Since we cannot see future thus we also do not know that raising voice and public concern would necessarily result in the fair use of constitutional law or what time it would result. Suppose if it took 50 years for ‘uniform practice’ then still we are granting 50 year of injustice.
    5. Thus demanding letting some Muslim extremist or terrorist like Yakub, go because some Hindu extremists and terrorists walked away, would be better and fair judgment, rather than demanding some Muslim extremist sentence, due to the fear that certain democratic principle and society we want to reach or conceptualize, are at stake.

    Dhiraj

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  2. Priyamvad . says:

    ये महज इत्तेफाक ही तो है न??
    जस्टिस पी सथाशिवम और बी एस चौहान , जिन्होंने 2013 में याक़ूब मेमन को मौत की सजा के लिए वाजिब ठहराया , ने 2011 में एक और जजमेंट लिखा था जिसमे ये व्याख्या दी थी कि आसट्रेलियन पादरी ग्राहम स्टेन्स और उसके दो नाबालिग बच्चों को ज़िंदा जला देने वाला दारा सिंह क्यों फाँसी की सजा को डिज़र्व नहीं करता।
    उन्होंने कहा था हालाँकि इस केस में वैगन में सोते हुए ग्रैहम स्टेन्स और उसके दो नाबालिग बच्चों को ज़िंदा जला दिया गया था मगर इसका मक़सद /भावना ग्राहम स्टेन्स को उसकी धार्मिक गतिविधियों के लिए सबक सिखाना था जैसे कि आदिवासियों को ईसाई बनाना )
    (आपको बता दें कि ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है जस्टिस सथाशिवम ने ही तुलसी प्रजापति केस में अमित शाह के खिलाफ दूसरी FIR ख़ारिज की ।
    और इस वक़्त वो इसी सरकार द्वारा बनाये हुए केरल के राज्यपाल के रूप में समुद्र की लहरों का आनंद ले रहे हैं।)

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  3. Anonymous says:

    प्रियंवद जी, आप ने जो कुछ भी लिखा है वह किसी अनजान लिपी में आया है, जिसे मैं नहीं पढ़ सकता. कृपया देखलें, और हो सके तो इसे देवनागरी या रोमन लिपी में बना कर लिखदें. –रोहित

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      Thanks for appreciation. I am not a great writer, 🙂 Have never thought about methods of writing etc. Two things guide me: 1. I try to take as clear a position on issues as my intellectual capabilities allow me. 2. Try to put them in language as precisely as possible for me with as much if my reasons behind taking that position as time and space allows. Beyond this I have no hints. Sorry. Best wishes to you.

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