[Demotivating Teachers का हिन्दी अनुवाद.]

रोहित धनकर

अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

[आशुतोष जी ने अंग्रेजी में Deccan Herald में छपे लेख Demoticating Teacher का हिन्दी अनुवाद करके भेजा है. मुझे लगा कुछ साथियों को शायद हिन्दी में पढ़ने में अधिक आशानी होगी, अतः यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.]

सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को सरकार और सामान्य तौर पर बट्टे-खाते में दाल्चुके हैं. इस प्रणाली में अनेक अच्छे विद्यालयों की मौज़ूदगी के बावज़ूद, जानबूझकर यह धारणा फैलाई जा रही है कि यह एक असफल व्यवस्था है. इस असफलता का ठीकरा अकसर शिक्षकों के सर पर फोड़ा जाता है. कहा जाता है कि उनमें अपने काम के प्रति उत्साह व प्रेरणा का सर्वथा अभाव है. शिक्षकों का कामकाज और उनकी प्रेरणा एक जटिल मसला है जो कई कारकों पर निर्भर करती है. यहां मैं केवल एक पर बात विचार करूंगा, जो मुझे बेहद ज़रूरी लगती है, बेशक अपने आप में इसे पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए.

शिक्षक शिक्षा व्यवस्था का सबसे शक्तिहीन कर्मचारी प्रतीत होता है. व्यवस्था उसके साथ बंधुआ मजदूर जैसा बर्ताव करती है. ऐसा तमाम निर्णयों को उसके हाथों से छीनकर किया जाता है. स्कूल के टाइमटेबल, पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक, शिक्षण विधि, छात्र के मूल्यांकन या अगली कक्षा में प्रोन्नति जैसे मामलों में उसका कोई दखल नहीं है. ये सारे फैसले व्यवस्था में ऊपर बैठे लोग लेते हैं. शिक्षक का काम इन्हें लागू करना भर है. लेकिन जब बच्चों के न सीख पाने की चर्चा होती है तो अकेले शिक्षक को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है. इससे ज्यादा अन्यायपूर्ण और क्या हो सकता है कि किसी और का फैसला शिक्षक पर थोप दो और फिर असफलता के लिए उसे जिम्मेदार ठहराओ?

सरकार के ऐसे कदमों और फैसलों की सूची खासी लम्बी है, जो शिक्षक के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाते हैं और अपने ही काम को लेकर उसे खुद की नज़रों में गिरा देते हैं. शिक्षा-मित्रों की तैनाती और ध्वस्त शिक्षक शिक्षा समेत आज के पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट- पार्टनरशिप) तक में इन्हें देखा जा सकता है. कुल मिलाकर सरकार के नेतृत्व में समाज शिक्षकों के मनोबल को नेस्तनाबूद करने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ रहा है.

पिछले दो दशकों में शिक्षकों को प्रेरित करने के तमाम प्रयासों में उन्हें विभिन्न तरीकों से नियंत्रित और संचालित करने के काबिल प्राणियों के तौर पर देखा गया. उनके व्यक्तित्व तथा स्व-निर्देशित कदम उठाने की क्षमता को न केवल हमेशा कम आंका गया, बल्कि कई बार उन पर हमला भी किया गया. उन्हें प्रेरित करने के नुस्खे नैतिक उपदेशों से आगे नहीं बढ़ पाते. कुछ सरकारें तो शिक्षकों को विपस्यना या जीवन विद्या जैसे कोर्स कराने पर आमादा हैं. इस तरह के अर्ध-आध्यात्मिक और नैतिकतावादी तरीके मात्र आडम्बर और निराशा का ही विस्तार करते हैं.

प्रेरणा को एक ऐसे “मनोवैज्ञानिक स्थिति” की तरह देखा जाता है, जो “किसी जीव को अपेक्षित लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने के लिए उकसाता है.” प्रेरणा की ऐसी विशुद्ध मनोवैज्ञानिक समझ मानती है कि आदमी पूरी तरह अपने अवचेतन से नियंत्रित होता है. यानी जीव अपने मनोविज्ञान, मनोवैज्ञानिक बनावट और सामाजित वातावरण का प्रतिफल है; लगभग व्यक्तित्वहीन- प्रयोगशाला में रखे किसी चूहे जैसा.

इस समझ से प्रेरणा के कुछ गौण पहलुओं को ही समझा जा सकता है. सचमुच महत्वपूर्ण बात है “क्रियाशीलता के बौद्धिक-कारण; जो किसी व्यक्ति के व्यवहार को उद्देश्य और दिशा देते हैं.” अगर हम चाहते हैं कि शिक्षक अच्छा प्रदर्शन करें तो इसके लिए उन्हें उनके ‘सचेत विवेक और फैसलों’ को आगे लाने का मौका देना होगा. किसी व्यक्ति को उसके सार्वजानिक व्यवहार के विवेकसम्मत कारणों के प्रति जिम्मेदार बनाने के लिए ज़रूरी है कि उसे हम उसे अपने बराबर मानकर इज्ज़त बख्शें. इस लिहाज से व्यवहार को निर्देशित करने वाले ‘अवचेतन के पहलुओं’ के बजाय सचेत कारकों पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है. इसका यह कतई मतलब नहीं कि अन्य कारकों के प्रभाव को ही नकार दिया जाय, बल्कि उन्हें व्यक्ति के सचेत विचार की रोशनी में लाया जाय ताकि वह उनसे निर्देशित होने के बजाय स्वयं उन्हें विश्लेषित और प्रभावित कर सके.

इसलिए, सबसे पहले शिक्षकों को नहीं, बल्कि समाज और शिक्षा व्यवस्था के नियंताओं के सोच को बदलने की ज़रूरत है. व्यवस्था को यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षक ही अकेला वह व्यक्ती है जो वास्तविक-शिक्षण कर्म में संलग्न है. कक्षा शिक्षा की असली कर्मभूमि है. इस नजर से शिक्षक इस व्यवस्था की सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर बैठा कर्मचारी नहीं रह जाएगा, बल्कि प्रमुख कर्ता बन जाएगा. शेष व्यवस्था का काम उसके शिक्षण-कर्म की जरूरतों के आधीन शिक्षक के मददगार की भूमिका निभाना रह जाएगा. ऊपर से नीचे तक के अफसरों की फौज और पूरा का पूरा ढांचा शिक्षण के वास्तविक कार्य में संलग्न शिक्षकों के सहायक माने जाएंगे.

तब शिक्षक नियंत्रित की जाने वाली कोई चीज़ नहीं रह जाएगा; बल्कि वह एक ऐसा सक्रिय शिक्षण-विशेषग्य होगा, जिसे मदद और सहयोग की दरकार है. इस सहयोग से आशय उसके फैसलों व कार्रवाइयों को निर्देशित करना नहीं बल्कि कार्य-क्षमताओं को मजबूती प्रदान करना होगा ताकि उसके फैसले व कर्म ज्यादा से ज्यादा स्वायत्त और उसकी खुद की समझ से प्रष्फुटित हों.

ग्रीष्म प्रहसन

शिक्षक को शिक्षा-व्यवस्था के केंद्र में रखना है तो बहुत समर्थ क्षमता-विकास कार्य-क्रम की जरूरत होगी; और यह  शिक्षा व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का सबसे महत्वपूर्ण कदम. अभी जो चल रहा है वह सेवारत प्रशिक्षण के नाम पर हर साल गर्मियों में होने वाला प्रहसन है. इसे बदलने की ज़रूरत है और इसकी जगह ऐसा सेवारत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम चाहिए जो सतत, सामंजस्यपूर्ण और साल-दर-साल की उपलब्धियों विकसित हो सके.

ऐसे कार्यक्रम को ‘क्लासरूम मैनेजमेंट’ और ‘कम्युनिकेशन स्किल्स’ के नाम पर बार-बार दोहराई जाने वाली नुस्कों से ऊपर ले जाना होगा. संकीर्ण कौशल सिर्फ बंधुआ मजदूर पर ही फिट बैठते हैं, आज़ाद खयाल वाले स्वायत्त शिक्षाकर्मी पर नहीं, जो अपने काम-काज के तौर-तरीके खुद इज़ाद करता है. इसके लिए एक बौद्धिक नज़रिए, शिक्षाशास्त्रीय समझ और व्यापक ज्ञान आधार की ज़रूरत पड़ती है. बौद्धिक नज़रिए के बगैर शिक्षाशास्त्रीय समझ और व्यापक ज्ञान आधार न तो विकसित किया जा सकता है और न ही काम का साबित होता है. इसलिए पहले कदम के रूप में शिक्षा को लेकर स्पष्ट नज़रिया, उसकी प्रकृति और समाज उसकी अनिवार्यता की साफ़ समझ बेहद ज़रूरी है.

शिक्षक की अगर ऐसी विश्व दृष्टि विकसित होती है जिसमें शिक्षा की उपयुक्तता सही ढंग से समझी जा सकती हो, तो बदले में एक शिक्षाकर्मी के बतौर उसका आत्मबोध विकसित होता है और वह किसी भी सभ्य समाज में अपने काम की अहमियत को आंक सकता है. सेवाकालीन प्रशिक्षण बारीकी से जांची-परखी बौद्धिक धारणाओं को विकसित करने का कार्यक्रम होना चाहिए, न कि आडम्बर को नैतिकता का खोल पहनाने का.

शिक्षा के सुस्पष्ट नज़रिए की रोशनी में बच्चे व उसे शिक्षित करने की ज़रूरत की समझ हासिल कर पाने से ही शिक्षा पद्धति का जन्म होता है. इसका आशय पढ़ाई-लिखाई के धंधे की टुकड़ों में बंटी तरकीबों से कतई नहीं है, बल्कि एक सुसंगत दृष्टिकोण से है. यह दृष्टिकोण शिक्षा का काम वहां से शुरू करने का होता है जहां बच्चा मानसिक तौर पर वर्त्तमान में है; और फिर उसे तर्कसंगत अन्वेषण और लगातार बढ़ती सामाजित चेतना के पथ आगे बढाता है.

इस परिपेक्ष में ज्ञान-आधार, विषयगत ज्ञान से बहुत आगे तक जाता है. इसमें ज्ञान क्या होता है, कैसे हासिल किया जाता है, कैसे जांचा-परखा जाता है, कैसे आलोचित व परिवर्धित किया जाता है या खारिज जाता है, जैसे सवालों की समझ भी शामिल है. एक समाज के बतौर हम सार्वजानिक शिक्षा प्रणाली को लेकर बढ़ रहे मोहभंग पर लगाम लगा सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें शिक्षा और शिक्षक के प्रति अपने नज़रिए में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा.

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