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(सबलोग के मई २०१६ के अंक में प्रकाशित. यहाँ मामूली संपादन के साथ.)

रोहित धनकर

कुछ दिन पहले में अपने गाँव में था. सुबह देखा कि गाँव के कई स्थानों पर कई तरह की स्कूल-ड्रेसेज में बच्चों की छोटी-छोटी टोलियां खड़ी इंतज़ार कर रही थीं. हर एक की पीठ पर एक बड़ासा थैला जो खचाखच भरा हुआ था; ड्रेस में टाई, जूते, मौजे. उनकी अलग अलग स्कूलों की बसें आती और अपने हिस्से की टोली को लेकर चली जाती. कुछ ही देर में सारी टोलियों को विभिन्न बसे आकर ले गई.

ये नजारा देख कर मुझे अपनी पढ़ाई के दिन याद हो आये. इसी गाँव में एक विद्यालय है, जो तब भी था जब हम बच्चे थे. गाँव के सारे बच्चे उसी विद्यालय में पढ़ने जाते थे. एक ही शिक्षक था. एक बड़ा और दो छोटे कमरे थे. बड़ा-सा खेल का मैदान था. विद्यालय के चारों और गाँव वालों ने स्वयं मिट्टी की डोल बनाई थी. हम सब अपने आप वहां अपने अपने साधारण कपड़ों में जाते थे. कोई स्कूल-ड्रेस नहीं थी. हमारे पास कपड़े के थैले होते थे, पर छोटे-छोटे, और खचा-खच भरे हुए नहीं. हम लोग स्वयं ही सुबह स्कूल में सफाई करते थे—झाड़ू लगाने से लेकर कुएं से पानी लाने तक का काम बच्चे ही करते थे. बल्कि सबने कुछ पौधे भी लगा रखे थे, उनमें भी बच्चे खुद ही पानी देते थे.

अब उस स्कूल में कई कमरे हैं, पूरे खेल के मैदान के चारों और पक्की दीवार बनी है. उसमें शायद ८ अध्यापक हैं, पढ़ाई-लिखाई की सामग्री है. पर बच्चे उस स्कूल में नहीं जाते; दूसरे गाँव और पास के कस्बों के निजी स्कूलों में जाते हैं. यह हम सब जानते हैं की सरकारी स्कूल में फीस नहीं के बराबर है, प्राथमिक स्तर पर तो किताबें भी मिलाती हैं, बस का किराया भी नहीं देना पड़ता, शिक्षक भी निजी विद्यालयों के शिक्षकों कि बनिस्पत अधिक पढ़े-लिखे हैं, और खेल का मैदान और भवन भी सरकारी स्कूल का बेहतर है. फिर क्या बात है कि बच्चे वहां नहीं जाकर निजी विद्यालयों में जा रहे हैं?

मुझे पूरा विश्वास है की अधिकतर पाठकों को यह बड़ा बुद्धूपाने का सवाल लगेगा, क्यों की “सरकारी विद्यालयों में पढाई नहीं होती. निजी विद्यालयों में कोई बहुत बढ़िया न सही पर जैसी-तैसी भी पढ़ाई होती तो है.” यह आम उत्तर है और सभी इसे जानते और मानते हैं. पर यह बड़ा सतही उत्तर है. सवाल को आगे बढ़ाना पड़ेगा. यह पूछना होगा कि: यदी यह सही है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती, तो ऐसा क्यों है? और यदी यह इल्जाम सही नहीं है तो इसका इतना प्रचार कैसे हो गया? यह भी पूछना होगा की यदि पढ़ाई नहीं होती तो इस स्थिती को सुधारा क्यों नहीं जा सकता? जब शिक्षक हैं, संसाधन हैं, भवन है, हर स्कूल के संचालन के लिए विद्यालय प्रबंधन समिति है और पूरा तंत्र है, फिर भी पढ़ाई क्यों नहीं होती? क्या ऐसा है कि सरकार के उपक्रम काम कर ही नहीं सकते?

इन सब सवालों के बहुत साफ़ उत्तर नहीं हैं, या दिए नहीं जाते. अब तो सरकारें भी इनके ऐसे गोल-मोल उत्तर देने लगी हैं कि लग-भाग साफ़ है वे शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं, शिक्षा का काम पूरी तरह बाजार को देदेना चाहते हैं.

शिक्षा अब नातो ईमानदारी से ली गई सरकार की जिम्मेदारी बची है, ना ही समाज हित में किया जाने वाला स्वयं-सेवी कर्म. अब यह पूरी तरह से दूकान-दारी बन गई है. आप कह सकते हैं कि शिक्षा का बाजारीकरण बड़ी तेजी से हो रहा है. मैं निजीकरण के बजाय बाजारीकरण का उपयोग जान भूझ कर कर रहा हूँ. किसी सामग्री की आपूर्ती जब बाजार से होती है तो उसमें बाजार की प्रतिस्पर्धा और अधिकाधिक मुनाफे के तत्त्व लाजमी तौर पर आजाते हैं. आपूर्ती करने वाले दुकानदार का एक मात्र उद्द्येश्य मुनाफा होता है. और जो दूकान ज्यादा चलेगी मुनाफा उसी में ज्यादा होगा. दूकान को ज्यादा चलाने के लिए या तो कीमत कम करनी पड़ेगी या लोगों को यह विश्वास दिलाना पड़ेगा कि इस दूकान में सामग्री की गुणवत्ता बेहतर है. वास्तव में गुणवत्ता बेहतर होना जरूरी नहीं है, ग्राहक के मन में गुणवत्ता के बेहतर होने का विश्वास ज़माना जरूरी है. इसी को बाजार की भाषा में ब्रांड-बिल्डिंग कहते हैं. ब्रांड-बिल्डिंग यानी ‘नाम चमकाना’, चमक नाम की बढ़ानी है, सामग्री की नहीं. तो शिक्षा के बाजारीकरण का मतलब है शिक्षा को बाजार में बेचने-खरीदने की वास्तु में बदल देना, और इस में दुकानदारी के सारे हथकंडों को खुली छूट देना.

सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता का सवाल बड़ा पेचीदा मशला है, और इस पर बहुत कुछ लिखा जारहा है. मैं यहाँ केवल दो बातों पर ध्यान देना चाहता हूँ: १. कि हम शिक्षा के बाजारीकरण की स्थिती में क्यों आये? और २. कि शिक्षा के बाजारीकरण के क्या नुकशान हो सकते हैं?

आजकल पूरी दुनिया में एक धारणा यह जोर पकड़ रही है कि कोई भी सरकारी उपक्रम ठीक से नहीं चल सकता. निजी-व्यवशायिक (अर्थात बाजारी) उपक्रमों में जो व्यक्तिगत देख-भाल और परवाह करने का तत्त्व होता है वह गैर-व्ययाक्तिक तरीके से चलने वाले सरकारी उपक्रमों में नहीं आ सकता, क्यों कि वहां नुकशान और मुनाफा दोनों ही किसी अदृश्य शक्ति—सरकार—के होते हैं. वास्तव में यह सिद्धांत मानव को मूलतः एक मुनाफाखोर प्राणी के रूप में देखता है. पर इंसान तो मुनाफे के अलावा बहुत से और मूल्यों और भावनाओं से भी संचालित होता है. और उसके मूल्य और भावाओं में परिवर्तन भी होता है. यदी आज हमने ऐसा समाज बना भी दिया है जिसमें मानव केवल मुनाफा ही देखता है तो कोई जरूरी तो नहीं की यह अपरिवर्तनीय स्वभाव होगया है मानव का. साथ ही बहुत से देश हैं जहाँ सरकारी शिक्षा-तंत्र ठीक से चल रहा है. सारे योरोप और अमेरिका में हमसे बेहतर चल रहा है. बहुत से आर्थिकरूप से कम विकसित देशों में भी हम से बेहतर चल रहा है. अतः सरकारी उपक्रमों के काम ठीक से न चलने के सिद्धांत का प्रचार केवल बाजार के लिए रास्ते खोलने के लिए किया जा रहा है.

शिक्षा के बाजारीकरण का पहला करण मुझे यह लगता है कि आजादी के बाद लगभग १९९० तक हमारी सरकारों ने शिक्षा तंत्र को ठीक से विकसित करने का प्रयास ही नहीं किया. हमारा शिक्षा तंत्र गैर-बराबरी वाला और आबादी के एक छोटे हिस्से के लिए अंग्रेज सरकार द्वारा बनाया गया था. वह कुछ हद तक चल रहा था, पर बहुत बढ़िया कभी नहीं था. आजादी के बाद उसके तेजी से विस्तार की जरूरत अनुभव होने लगी. पर विस्तार के लिए जो संसाधन चाहियें वह हमारे पास नहीं थे. न तो शैक्षिक-ज्ञान के रूप में, प्रशिक्षित अध्यापक और शिक्षाविदों के रूप में जितनी जरूरत थी उतने लोग थे, नाही अन्य आर्थिक संसाधन. तो हमारी सरकारों ने अनौपचारिक शिक्षा के नाम पर एक सस्ते मोडल का प्रचार किया. इस से शिक्षा और शिक्षक का मान घाटा और यह माना जाने लगा कि शैक्षिक काम के लिए कोई बहुत ज्ञान और योग्यता की जरूरत नहीं होती. कोई थोड़ा-सा भी पढ़ा-लिखा हो तो वह बच्चों को पढ़ा सकता है. पर लोग—जनता—स्कूलों के गिरते स्तर को देख रहे थे, और अनौपचारिक केन्द्रों की विफलता उनके सामने थी. अतः इस पूरी प्रक्रिया ने मुनाफे के लिए चलाये जाने वाले निजी विद्यालयों के लिए जगह बननी और इस तरह से बाजार के रास्ते शिक्षा में खुल गए. यह आम बात है, और यह मैं भी कई बार कह चुका हूँ.

पर इन दिनों मेरे दिमाग में एक सवाल बार बार आता है कि लोगों ने अपने गाँव में विद्यालय के गिरते स्तर को देख कर उसे बेहतर करने के लिए सरकारों पर दबाव क्यों नहीं बनाया? वेही लोग और तो हजार चीजों के लिए सरकारों पर दबाव बनाते रहे हैं? जैसे सड़क, बिजली, आदी. मुझे लगता है (यह मेरा कयाश है, जिसकी व्यवस्थित अध्ययन के मध्याम से जांच की जरूरत है) कि शिक्षा-व्यवस्था के विकास की लोगों द्वारा अनदेखी का एक बड़ा कारण हमारे समाज को पुराना कोढ़ जाती-व्यवस्था है. जातियों में बंटा होने के कारण हमारा कोई छोटे से छोटा समुदाय (जैसे कोई एक गाँव) भी एक-रस समुदाय कभी नहीं बन पाया. समूहिक भले की, सामूहिक हित की भावना उसमें कभी नहीं पनप सकी. ऎसी कोई भावना पैदा भी हुई तो जाती ने उसकी स्वाभाविक सीमायें तय करदी. जैसा आंबेडकर ने कहा है हिन्दू समाज एक खंडित समाज रहा है. और यह खंड-खंड होने का भाव हमारे मन को भी विखंडित और संकुचित कर चुका है. अतः, यदी गाँव में शिक्षा ठीक नहीं है, तो सारा गाँव उसके लिए एकसाथ होकर कोई प्रयत्न नहीं कर सकता था. सड़क और बिजली आदी में भी सामूहिक भले की बात होती है, पर एक तो वह उनके वैयक्तिक उपयोग तक सीमित रहती है दूसरे उनकी निजी व्यवस्था संभव नहीं है. शिक्षा एक जैसी होने से लोग कुछ हद तक एक जैसे हो जाते हैं. यह एक जैसा हो जाने का दर जातिग्रस्त मन को बहुत पसंद नहीं होता. साथ ही शिक्षा कि अलग व्यवस्था संभव है.

ऐसे में कोढ़ में खाज का काम किया हमारी अभाव की अर्थ-व्यवस्था ने. अभाव कि अर्थ-व्यवस्था प्रतिसर्धा को प्रोत्साहित करती है. अब थोड़ी कल्पना करें कि शिक्षा-व्यवस्था खराब हो चुकी है, सब अभाव-की अर्थ वयस्था में अपना-अपना जीवन सुधारने की कशिश में हैं, सामूहिक हित की भावना का विकास जाती के कारण संभव नहीं है, पर मैं अपने बच्चों की आर्थिक उन्नति चाहता हूँ; मुझे लगता है कि शिक्षा एक साधन है जो उनकी आर्थिक उन्नति की राह प्रसस्त कर सकता है. तो मैं क्या करूंगा?

हमारे देश में जातियों ने अपनी उन्नति के लिया जाती-छात्रावास और विद्यालय बहुत पहले बनाने शुरू कर दिए थे. पर वह बाजार का शिक्षा में प्रवेश न होकर विभाजित समाज में जाती के विकास की भावना और अन्य जातियों से प्रतिस्पर्धा की अभिव्यक्ती थी. अब एक नई स्थिती बन आई थी जिसमें पुराना सामंती जातीवादी एकत्व का भाव भी दबाव में था; स्थानीय राजनीती के कारण और स्वतन्त्रता आन्दोलन के विचारों के कारण जाती के नेताओं की जकड़न लोगों पर कमजोर होने लगी थी. ये दोनों बाते शुभ थीं, अच्छी थीं, इन्हों ने व्यक्ति पर सामंती जाती-वादी जकड़न को कम किया, और एक अन्यायपूर्ण सामूहिकता के सिद्धांत को कमजोर किया; पर इतना जल्दी कोई अधिक न्यायपूर्ण और कारगर जातीय सामूहिकता का सिद्धांत विकसित नहीं हो पाया. अतः जातीय विद्यालय बनाना पहले के बनिस्पत कठिन काम बन गया.

यह स्थिती शिक्षा की निजी दूकान खुलने के लिए बहुत उपयुक्त थी. अतः जो शिक्षा से मुनाफा कमाना चाहते थे उन लोगों ने निजी वद्यालय खोल लिए. परिणाम स्वरूप सरकारी शिक्षा-तंत्र का विकल्प बन गया जिसका उपयोग लोग अपने बच्चों के लिए पैसे देकर कर सकते थे. इसका एक बड़ा प्रभाव यह हुआ की समाज के समर्थ तबके के कोई हित सरकारी शिक्षा तंत्र में निहित नहीं रह गए. अतः वह तेजी से ढलान के रस्ते पर चलने लागा और उसकी खाली की गई जगह को बढ़ता शिक्षा का बाजार भरने लगा.

शिक्षा में बाजार की बढ़ती दखल को १९९० तक आते आते सरकारें शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्ती की राह समझने लगीं और उन्हों ने जान बूझ कर शिक्षा की दुकानों का कभी खुला और कभी छद्म समर्थन किया. आज स्थिती यह है कि शिक्षा के बाजारीकरण को रकने का कोई रास्ता नहीं दीख रहा है लोगों को. और सरकारें उसको अब जनता के पैसे से बढ़ावा देने की योजनायें बना रही हैं.

अब शिक्षा के बाजारीकरण के एक बड़े नुकशान की कुछ बात करने की जरूरत है. वैसे इसके नुकशान बहुत हैं पर स्थानाभाव के कारण हम केवल एक की ही बात करेंगे. हम ने अभी तक इसबात पर ध्यान नहीं दिया है कि शिक्षा का बाजारीकरण शिक्षा का तेजी से बजारूकरण भी करता है. बात को ठीक से कहने के किये मैं बाजारीकरण और बजरूकरण के फर्क पर संक्षेप में कुछ पहले कहूँगा. जैसा कि ऊपर लिखा बाजारीकरण माने शिक्षा को बाजार में खरीदने-बेचने की वास्तु बनादेना. जिसके पास पैसा हो खरीदे, न हो तो बिना शिक्षा के रहे. या जहाँ कुछ मुफ्त में मिलरही हो वहां से लेले. पर इस में दूकान अच्छी चलाने की सारी विधियाँ काम में लेनी पड़ती हैं बाजार के मालिकों को. और उसमे सब को अपना नाम चमकाना होता है. सभी जानते हैं की अभिभावक का मूल उद्येश्य अपने बच्चों की आर्थिक उन्नति होता है. तो वे ऎसी शिक्षा को अधिक गुणवत्ता पूर्ण मानते हैं जो अच्छी नौकरी मिलने में सहायक हो.

इस स्थिती का नतीजा यह होता है कि शिक्षा में बाजार में बिकने वाली दक्षताओं का बोल-बाला होता जाता है और उसके मानव-निर्माण वाले और सामाजिक-मानवीय पहलु लुप्त होने लगते हैं. यह शिक्षा का बाजारूकरण हैं. वह पूरी तरह उपयोगवाद के एक उपकरण में तबदील होने लगती है. ऎसी शिक्षा की सफलता केवल और केवल दक्षताओं और काम की निपुणता से नापी जाने लगती है. पर उन दक्षताओं का उपयोग कहाँ तो जन हित में है और कहाँ जन-विरोधी यह समझ नहीं बन पाती. अर्थात शिक्षा एक स्वचेता मानव के विकास में मदद करने के बजाय पूंजीवाद के एक उपकरण का निर्माण करने लगती है.

आज हमारी शिक्षा इसी राह पर बढ़ रही है. सवाल यह है कि क्या हम इस समस्या का कोई समाधान निकाल सकते हैं? इस लेख में तो अब स्थान नहीं बचा, पर मुझे लगता है कि जैसे सारी मानवीय समस्याओं के हल होते हैं, इसका भी है, या हम बना सकते हैं. मुझे यह भी लगता है कि ऐसा हल विकसित हने से पहले हमें बड़े पैमाने पर निजी-स्वार्थ और सामूहिक हित में संतुलन बनाना सीखना पड़ेगा.

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