जो अपराधी था …: स्टॉकहोल्म सिंड्रोम


रोहित धनकर

हाल ही में रास्ते चलते चलते किसी का एक जुमला मेरे कानों में अनायास ही पड़ा: “जो अपराधी था वही प्रेमी बन कर रहा”. वार्तालाप में आगे पीछे क्या था मैंने नहीं सुना. पर इस जुमले से तुरंत मेरे दिमाग में जो शब्द गूंजा वह “स्टॉकहोल्म सिंड्रोम” था. जैसा कि सर्व-विदित है स्टॉकहोल्म सिंड्रोम माने अपने प्रताड़क से प्रेम या मोह हो जाना, उसे के साथ अपनत्व की भावना पैदा होना. बात थोड़ी अजीब सी लगाती है, पर ऐसा होता जरूर है.

मैं सोचने लगा की कहीं स्टॉकहोल्म सिंड्रोम इंसानों में हम जितना सोचते हैं उस से ज्यादा व्यापक तो नहीं है? मनोवैज्ञानिकों का मत यह लगता है (इस पर मैंने ज्यादा नहीं पढ़ा है) कि यह बहुत व्यापक नहीं है. पर मुझे लगता है इसके कुछ रूप—शायद कुछ पुनर्व्यखा के साथ—बहुत व्यापक हो सकते हैं. उदाहरण के लिए क्या बहुत क्रूर तानाशाहों के दसकों तक चलने वाले राज को हम “जन-व्यापक स्टॉकहोल्म सिंड्रोम” के नजरिये से देख सकते हैं? मनोवैज्ञानिक स्टॉकहोल्म सिंड्रोम को एक आत्म-रक्षा (survival) की रणनिति के रूप में देखते हैं. जब आपके पास और कोई चारा नहीं  बचता तो आप अपने प्रताड़क को ही पसंद और खुश करने पगते हैं. इसी में आप अपने बचाव और मन की शांति देखने लगते हैं. अर्थात अन्याय और प्रताड़ना में ही आनंद लेना/कखुश रहना सीख लेते हैं. यदि यह एक व्यक्ति के साथ हो सकता है तो क्या यह समूहित चेतना में जन-व्यापक नहीं हो सकता? जब किसी समाज/देश के नागरिकों को किसी तानाशाह से मुक्ति की कोई उम्मीद न दिखे तो वे उसी के राज में देश के बचाव और उन्नति तक देखने लगें? आरंभिक विरोध को जब कोई क्रूत ताकत से लंबे समय तक दबादे तो लोगों को लगने लगे कि इसकी स्वीकारोक्ति में ही भलाई है. और वे उसे कालांतर में पसंद करने लगें.

इसी तरह शायद हम धर्म-गुरुओं के घिनोने कर्मों के उजागर हो जाने के बाद भी जब देखते हैं कि उनके चेले उन्हें बचाने की ही कोशिश करते रहते हैं तो इसे स्टॉकहोल्म सिंड्रोम के रूप में देख सकते हैं, शायद. किसी भावनात्मक या अन्य कारण से लोग आरम्भ में धर्म-गुरुओं के चक्कर में आ जाते हों. और इस प्रक्रिया में अपने ऊपर उनका नियंत्रण स्वीकार करलें. जब तक पता चले की इस नियंत्रण में शोषण और प्रताड़ना तक शामिल है तब तक वे इसी में अपनी निजात देखने लगें. जब यह नियंत्रक खतरे में हो तब उन्हें अपनी आरंभिक भवनातक समस्याएं याद आने लगें और इस से वे असुरक्षित महसूस करने लगें. यह असुरक्षा उन्हें उस धर्म-गुरु को बचने की कोशिश को मजबूर करदे. हम धर्म-गुरुओं के शिष्यों को भवनात्मक बंधकों के रूप में देख सकते हैं. तो शायद थोडा खिंचा हुआ पर फिर भी ये स्टॉकहोल्म सिंड्रोम का एक रूप जैसा लगाने लगता है.

व्यक्तिगत तौर पर तो स्टॉकहोल्म सिंड्रोम का बहुत अध्यन हो ही चुका है. इस में प्रताड़ित अपने अपहरण–कर्ता/प्रताड़क को ही पसंद करने लगता है और उसी को अपना रक्षक समझने लगता है. इसमें शायद कुछ कारक होते हों. एक बात तो साफ़ ही है, कि प्रताड़क तात्कालिक रूप से तो अधिक शक्तिशाली लगता ही है. क्यों की वह तुरंत पीड़ा दे सकता है, तात्कालिक रूप से खाने/सोने की जरूरतों को पूरा करने को नियंत्रित करता है. जब की बहार पूरी फ़ौज भी उस वक्त तो कुछ नहीं कर सकती. यह शिकार के मन में धीरे-धीरे पहले उसकी सत्ता का डर और फिर सत्ता के सामने झुकाने की, उसकी पूजा करने की मानसिकता पनपा देता है. फिर प्रताड़क हमेशा प्रताड़ना के मूड में भी नहीं रहता. अतः वह भी सक्रिय कोशिश अपने शिकार से भवतात्मक जुड़ाव के लिए कर सकता है. शिकार के अपने बचपन में उसे जिस तरह से भय से नियंत्रित किया गया है और नियंत्रण स्वीकार करने पर जो सुरक्षा और शुकून मिला है वह ऎसी स्थिति में पुनः प्रभावी होने लगता है. हमारे विद्यालय और परिवार विभिन्न प्रकार के भय से ही आरंभिक नियंत्रण स्थापित करते हैं बच्चों पर.

आज कल एक नई और भयावह संभावना उभर आई है: साइबर बंधक बनाने की. सोशल मीडिया और स्मार्ट फ़ोन इस की भरपूर संभावनाएं देते हैं कि कोई किसी को फ़ोन के माध्यम से ही नियंत्रित और प्रताड़ित करने लगे. व्यक्ति इस नियंत्रण को पसंद न करे, और इस से निकलने की कोशिश भी करे आरम्भ में. पर जब ना निकल सके तो प्रताड़क जो चाहता है उसी में खुशी और शुकून ढूँढने लगे. प्रताड़क को ही पसंद करने लगे.

इस उदाहरणों से ऐसा लगता है कि स्टॉकहोल्म सिंड्रोम के कुछ रूप हम जितना सोचते हैं उस से कहीं  ज्यादा व्यापक हो सकते हैं.

एक बात तो साफ़ ही है कि हर स्थिति में स्टॉकहोल्म सिंड्रोम शिकार के इन्द्रीये-बोध (sense perception) और उसकी व्याख्या (interpretation) को विकृत करता है. यह उसकी सत्ता को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखने को मजबूर करता है. उस से जो कुछ भी थोड़ी राहत और सम्मान मिलाता है उसको बहुत मानाने लगता है. यह सब शिकार की समझ को धुंधला और शायद विकृत भी कर देते होंगे. इस सब की समस्या यह भी है की स्टॉकहोल्म सिंड्रोम में शिकार अपने शिकारी को ही बचाने की कोशिश करने लगता है. यदि परिस्थिति ऎसी हो जिसमें शिकार के सहयोग के बिना उसको बंधन-मुक्त करवाना संभव न हो तो यह एक दुष्चक्र बन जाता है. जिस से निकलना बेहद मुश्किल लगता है. स्टॉकहोल्म सिंड्रोम के शिकार के निर्णय स्वायत्त और विवेकसम्मत नहीं होते, वे एक विकृत समझ से संचालित हो रहे होते हैं. इस लिए शायद इसके लिए शिकार को दोष भी नहीं दिया जा सकता.

एक सवाल मन में यह भी उठता है कि क्या व्यक्ति स्टॉकहोल्म सिंड्रोम से अपनी स्व-विवेक द्वारा चिंतन करके निकल सकता है? क्या किसी बाहरी मदद के बिना वह इस तिलश्म को तोड़ सकता है? यह सिंड्रोम व्यक्ति की अस्मिता पर तो आघात करता ही है. साथ ही उसकी स्वतंत्रता भी बलि चढ़ जाती है. पर शायद हर इंसान स्व और स्वतंत्रता को बनाये रखने की कोशिश देर सवेर करता ही होगा. तो सवा-विवेक और सव-चिंतन से शायद यही तिलाश्म भी तोड़ा जा सकता है.

अंत में, वास्तव में एक संयोगवस कान में पड़े छोटे जुमले पर इतना सोचने की जरूरत नहीं थी, ख़ास कर ऐसी परिस्थिति में जब उसका पूरा सन्दर्भ पता न हो. पर मैं गाड़ी में बैठा था, गाड़ी ड्राईवर चला रहा था, ट्राफिक बहुत समय ले रहा था और मेरे पास करने को कुछ नहीं था. तो एक तरह से यह आलेख खाली दिमाग की शैतानी भी है. 😊 पर मुझे यह जरूर लगता है कि यह सिंड्रोम शायद काफी व्यापक है. और यदि सवा-चिंतन से इस से निकलना संभव है तो हमें समाज में कहीं उस की विधि सिखाने की व्यवस्था करनी चाहिए. क्यों कि साइबर बंधन को और किसी तरीके से रोकना शायद आगे आने वाले समय में संभव न रहे.

********

https://counsellingresource.com/therapy/self-help/stockholm/

http://scarysymptoms.com/?s=function+of+character

https://nobullying.com/stockholm-syndrome/

३० दिसंबर २०१७

3 Responses to जो अपराधी था …: स्टॉकहोल्म सिंड्रोम

  1. Anupama Garg says:

    Interesting post Rohit. Here are a few additional thoughts (not coming from research or study though):

    Stockholm syndrome can also be often seen in the entire job / slave market. I hire you as an employee (initially a valid, non-Stockholm reason), get you used to certain level of comforts and then slowly get you so used to them that now you have dependencies on these comforts.

    I see this sort of Stockholm syndrome not even being acknowledged and employers exploiting all the time. We all know of people who are stuck in toxic workplaces because at some level they believe that this toxic job is their only resort to a livelihood.I have myself been there multiple number of times till 2 years ago.

    To your question – Is it possible to break the pattern / a specific situation of abuse, without external help? Yes and no.

    Yes, but it needs years of self training, a very strong survivor’s instincts and a very high level of self-awareness.

    No, because most of us are not privileged enough to be raised in a way that we can break conditioning easily.

    Is there some way, we can teach people this skill? Well certainly yes. If we can raise them into independent, logical, rational thinkers, then, well yes. While an ideal solution is a long-term one on one mentorship, am sure short term courses can be developed too where intensive sessions can be helped to make people see how deeply conditioned they may be in more than a few major areas of their lives.

    Like any other habit, deconditioning and rational thinking is a habit too and once learnt and practiced long enough can lead to great results.

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  2. मुकेश जोशी says:

    Rohit Ji, with your due permission, I wish to post it on my facebook wall

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  3. Abhishek says:

    Rohit Ji,

    I like this post. I think, it has one more aspect of internalized oppression. The oppressed start believing and adhering the ways oppressed treat with them. That further becomes the model which the oppressed follow while treating with other fellow beings. I connect that with both the gender issue and the political shift in our country. The oppressed in both the cases when get empowered tend to follow the same ways their oppressor had. They just do not want to devise any other model for their practices.

    There needs to have enough discourses among the participants to develop such level of consciousness. More dialectic approaches need to be included in education processes whether in formal education or in any such activities at community level.

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