देशप्रेम और शिक्षा-२


रोहित धनकर

अपनी पिछली फेसबुक पोस्ट में मैंने अपनी स्वयं की सामान्य समझ के आधार पर निचे लिखे प्रश्नों पर विचार किए लिए आम-जनों को आमंत्रित किया था. वह पोस्ट ये थी:

“देशप्रेम और शिक्षा-१

आज कल देशप्रेम, देशभक्ति, राष्ट्र और राष्ट्रीयता को लेकर बहुत विचारोत्तेजक समझे जाने वाले संवाद चल रहे हैं. उन्हें पढ़े से लगता है कि लोग बड़ी सिद्दत से और कुछ उत्तेजना के साथ बात कर रहे हैं. पर शायद संवाद में शामिल लोगों के मन में देशप्रेम आदि कि अवधारणाएं बहुत अलग अलग हैं.

  • आप के विचार से “देशप्रेम” का क्या अर्थ है?
  • देशभक्ति का क्या अर्थ है?
  • दोनों में क्या फर्क है? (यदि है तो?)”

कुछ लोगों ने अपने विचार रखे. कोई इन में समन्यध्वनी देखना चाहे तो मेरी समझ से वह कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त की जा सकती है:

  • देशप्रेम अपने देश से, उसके लोगों से प्रेम करने का नाम है. इस में उसकी कमियों और खामियों को देखने कि गुंजाईश है. देश से प्रेम तो इसमें है, पर इसे सर्वश्रेष्ट और सब तरह से निष्कलंक और संपूर्ण मानने कि भावना नहीं है. सुधर कि गुंजाईश देशप्रेमी देख सकता है और सुधार कि कोशिश करना भी अपना कर्त्तव्य मानता है.
  • देशभक्ति देश के सामने नतमस्तक होने कि भावना है, जिसमें उसे सर्वश्रेष्ट और सब तरह से उत्तम और संपूर्ण मानने कि भावना भी है.

बहुत से लोग देश-प्रेम में कुछ भी आपतीजनक नहीं देखते पर देशभक्ति में कुछ आपत्ती जनक देखते हैं.

इन विचारों को मैं अपनी तरह से स्पष्ट करना और सुलझाना चाहूँ तो पहले देश और प्रेम की धारणाओं पर विचार करना चाहूँगा. देश शब्द का उपयोग कई बार मात्र स्थान विशेष या भूभाग विशेष को इंगित करने के लिए किया जाता है. जैसे “मानव देश-कालबद्ध प्राणी है”. पर जिस अर्थ में हम यहाँ देश शब्द का उपयोग कर रहे हैं वह केवल स्थान या भूभाग को इंगित नहीं करता. उसमें और भी बहुत कुछ है. यह ठीक है कि देश कि धारणा में एक निश्चित भूभाग लाजिमी तौर पर शामिल है. जैसे हम लोग कुछ अधुरा और त्रुटिपूर्ण संकेत “कश्मीर से कन्याकुमारी” तक कह कर देते हैं. हमारा संविधान इस भूभाग को अधिक स्पष्ट और सटीक तरीके से परिभाषित करता है. भूभाग के अलावा देश कि धारण में उसके लोग भी आते हैं. अपनी भाषा, संस्कृति, चिंतन्धराओं के साथ. संपूर्ण सचेत स्वायत्त व्यक्तियों के रूप में. साथ ही इस भूभाग में प्रचलित सामाजिक व्यवस्था और स्थापित राजनैतिक व्यवस्था भी देश कि धारण का अनिवार्य हिस्सा है.

तो फिर देश का अर्थ होगा: एक भूभाग में रहने वाले लोग. उस भूभाग की संपूर्ण प्राकृतिक सम्पदा, लोगों की सामजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं, उन की भाषाएँ, उनकी विचार-धाराएँ और वो राजनैतिक व्यवस्था जिस में वे अपने आप को शासित करते हैं.

अब प्रेम की धारणा पर कुछ विचार करते हैं. यहाँ हम किसी व्यक्ति (इंसान) से प्रेम की बात नहीं कर रहे. बल्कि एक संश्लिष्ट अमूर्त सत्ता (entity) से प्रेम की बात कर रहे हैं. प्रेम अपने आप में एक बहुत जटिल, अस्पष्ट और व्यक्तिपरक भाव है. फिर भी शायद सार्वजनिक संवाद के लिए इस जटिल धारणा के कुछ तंतुओं को हम चिन्हित कर सकते हैं. मुझे लगता है प्रेम में एक भावना जिस सत्ता से प्रेम करते हैं उस के लिए शुभ-चिंता या उसके भले की सोचना या उसकी वेलबीइंग (welbeing) की फिक्र करना या होना होता है. यह फिक्र सिर्फ भाव के स्तर पर नहीं हो सकता, इसमें यदि देश के लिए कुछ अवांछनीय है तो उसे दूर करने की प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए. अर्थात हम कह सकते हैं कि प्रेम में दूसरा भाव भले के लिए कुछ करने का संकल्प या प्रतिबद्धता भी होती है. तीसरा भाव, जिस सत्ता से प्रेम हो उसके सानिध्य में सुख, सुकून महसूस करने का होता है. यह सुख सुकून किसी प्राप्ति का नहीं बस सानिध्य में होने भर का होता है. शायद चौथा भाव—विशेष रूप से देश-प्रेम के सन्दर्भ में—अपनेपन का, बेलोंगिनग्नेस (belongingness) का होता है. कि यह देश मेरा है और मैं इस का हिस्सा हूँ.

यदि हम देश प्रेम की यह धारणा लें तो कह सकते हैं कि किसी देश का हिस्सा होने कि भावना, उसके लोगों के भले कि परवाह करना, उस में लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्धता, इस की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक व्यवस्था में कुछ पसंद करना, उस की उपलब्धियों में गर्व महसूस करना, आदि देश-प्रेम कि भावना के हिस्से है. क्या इस का यह अर्थ है कि उसकी कमजोरियों, खामियों और गलतियों को न देखना भी देशप्रेम का हिस्सा है? मुझे ऐसा नहीं लगता. किसी भी चीज को सर्वांग-शुभ समझना बेवकूफी के आलावा कुछ नहीं हो सकता. हर सामाजिक व्यवस्था में, राजनैतिक व्यवस्था में, सांस्कृतिक मान्यताओं में बहुत कुछ गलत, सड़ाहुआ और बहुत बुरा तक होता है. मानव समाज अपने आप को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है, हजारों सालों से. इस कोशिश में उसने बहुत कुछ किया है जो अन्याय पूर्ण है, भद्दा है, गलत है, बुरा है. वह हमारे विकास की राह का हिस्सा है. उसे देखना, उसको बुरा कहना, उसकी आलोचना करना और उस से लड़ना, मिटाने के लिए, देशप्रेम की भावना के विरूद्ध नहीं, बल्कि देशप्रेम की भावना की आवश्यक शर्त है.

देश एक व्यक्ति से नहीं बनता. और लोग देश का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते हैं. उन में सहमतियाँ, असहमतियां दोनों होती है. देशप्रेम की यह आवश्यक शर्त है कि आप उनलोगों की इज्जत करें, उनके भले कि कोशिश करें. उन की भी जो आप से असहमत हों, जिन की भले की परिभाषा भी आप से बहुत भिन्न हो, उनको भी अपने सामान देश का नागरिक मानें. यदि आप किसी को गलत समझते हैं, तो उस से बन्दुत्व की भावना के साथ संवाद करें—साझे हित के लिए. पर उसे नकारना, उस को हीन मानना, उसको बल से दबाना, उसे मारना देशप्रेम की भावना के विरूद्ध है; क्यों कि देश के सब लोगों के हित की, भले की परवाह और उसके प्रति प्रतिबद्धता देशप्रेम का आवश्यक हिस्सा है.

अभी तक हमने अपने सहज बोध से देशप्रेम की कुछ आरंभिक बात की. अब थोड़ा यह भी देखलें कि क्या यह कोई ऎसी बात है को देशप्रेम की अन्य लोगों की धरना से एकदम अलग या विपरीत है.

जो लोग आम नागरिक के तौर पर देशप्रेम को इतना समझना चाहते हैं उनके लिए स्टैनफोर्ड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फिलोसोफी में पट्रीओटीज्म (partiotism) नाम से एक अच्छा लेख है. यह दार्शनिक दृष्टि से देशप्रेम कि धारणा, उस में वैविध्य, हर प्रकार के देशप्रेम की नैतिक हैसियत, उस की राजनैतिक जरुरत आदि पर विचार करता है. यह शायद उन विद्वानों के लिए नहीं  है जो इस धारणा की समग्र बौद्धिक विवेचना करना चाहते हैं. पर, एक, जो अपने लिए कोई सुविचारित निर्णय लेना चाहें, और दो, बोद्धिक होने का नाटक करने वाले लोगों के अधकचरे विचारों की थोड़ी विवेक सम्मत जांच करना चाहें, उनके लिए अच्छा लेख है. मैं इस लेख से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी इस की विवेचना को बहुत उपयोगी पाता हूँ. यह लेख स्टेफेन नाथानसन के हवाले से देशप्रेम (patriotism) की एक परिभाषा देता है:

“देशप्रेम में निम्न चीजें होती हैं:

  1. Special affection for one’s own country (अपने देश के प्रति विशेष स्नेह)
  2. A sense of personal identification with the country (देश के साथ एक व्यक्तिगत पहचान)
  3. Special concern for the well-being of the country (देश के भले के लिए विशेष चिंता)
  4. Willingness to sacrifice to promote the country’s good (देश के भले के लिए त्याग करने इच्छा)”

यहाँ अनुवाद कुछ जल्दी में किया और भोंथरा सा है, पर शायद यहाँ के लिए काम करेगा.

सेकेंडरी एजुकेशन कमीशन रिपोर्ट में देशप्रेम (patriotism) के बारे में कहा है: “True patriotism involves three things–a sincere appreciation of the social and cultural achievements of one’s country, a readiness to recognize its weaknesses frankly and to work for their eradication and an earnest resolve to serve it to the best of one’s ability, harmonizing and subordinating individual interests to broader national interests.” अर्थात: “सच्चे देशप्रेम में तीन चीजें होती हैं: अपने देश की सामाजिक सांस्कृतिक उपलब्धियों की सच्ची सराहना (शायद सच्ची/ऑब्जेक्टिव पहचान?), इस की कमियों को स्वीकारने को तैयार हिओना और उनको दूर करने के लिए काम करना, तथा, एक प्रतिबध्धता इस की बेहतरी के लिए यथा शक्ति काम करने की. व्यक्तिगत हितों का व्यापक राष्ट्रीय हितों के साथ सामंजस्य बनाना और जरुरत हो तो उन्हें व्यापक राष्ट्रीय हितों के अधीन स्वीकारना.”

इन दोनों परिभाषाओं के ऊपर हमारी विवेचना से तुलना करके देखना उपयोगी हो सकता है. इन की समालोचना करने की जरुरत है. जो आगे भी चलती रहेगी.

पर यहाँ अगले चरण में जाने की भी जरुरत है. यदि हम देशप्रेम की ये परिभाषा या इन में से कोई परिभाषा स्वीकार करें तो कुछ सवाल उठाते हैं.

  • क्या देशप्रेम सार्वभौम मानवीय नैतिकता के साथ सांगत है या मानवीय नैतिकता से इस की कहीं टकराहट होने की संभावना है? (आज कल बहुत लोग मानते हैं कि देशप्रेम व्यापक मानवीय नैतिकता से संगत नहीं है. उन में बहुत से बड़े नाम भी हैं, जैसे टॉलस्टॉय. क्या ये लोग देशप्रेम की आलोचना में न्यायसंगत (justified) हैं?)
  • क्या देशप्रेम एक नागरिक के लिए नैतिक आवश्यकता है?
  • क्या देशप्रेम शिक्षा का एक अनिवार्य उद्देश्य होना चाहिए?

इन सवालों पर आज कि स्थिति में साफ़ विचार करने की जरुरत है. आप सब के विचार इस लेख पर और विशेषरूप से अंत में लिखे सवालों पर आग्रह के साथ आमंत्रित हैं. क्यों कि उन्ही से अगले लेख की दिशा तह होगी.

******

२४ जुलाई २०१८

One Response to देशप्रेम और शिक्षा-२

  1. Ankita Sharma says:

    When we love and still keep our rational faculty intact, I don’t see any conflicting junctures between love for the country and universal brotherhood. Bhakti has no or little scope of corrections, modifications but devotion has its own advantages too. To me, the key lies in rationality in emotional faculty of the human brain.
    P.S. after long read such a beautiful Hindi 😊

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