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रोहित धनकर

[ मूल मंत्र क्या है? ज्ञान और नैतिकता में समृद्ध लोकतान्त्रिक समाज, जो आर्थिक विकास को मानव के साधन के रूप में देखता है; या फिर आर्थिक विकास और तकनीकी केंद्र में रखनी है और लोकतान्त्रिक मूल्य बस कई शर्तों में से एक शर्त है, और नागरिक उसके लिए संसाधन है?]

राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१९ का प्रारूप आखिरकार जनता के सामने आ गया है। ‘आखिरकार’ इस लिए की इसका लोगों को पिछले पाँच साल से इंतजार था। पहले दो दस्तावेज़ लग-भग प्रारूप जैसे जारी हो चुके हैं, और सरकार कई बार इसके जारी होने की तारीखें बदली हैं। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद। पर क्या ‘दुरुस्त’ आयद? इतने लंबे इंतजार के बाद लोगों की यह अपेक्षा तो जायज है कि राष्ट्र की शिक्षा नीती बहुत बढ़िया और शिक्षा को आगे कई वर्षों तक दिशा देने वाली होने के साथ-साथ शैक्षिक सिद्धांतों और भारतीय लोकतन्त्र की दृष्टि से भी खरी उतरे। इस दृष्टि से इस दस्तावेज़ को समझने की जरूरत है, इस के विश्लेषण की जरूरत है। शिक्षा राष्ट्र के जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है, इसे न तो नजरअंदाज किया जा सकता है न ही सरसरी नजर से देखा जा सकता है; और ना ही इसे किसी तात्कालिक फैशन के हवाले लिया जा सकता है।

यह लेख राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रारूप के इसी नजर एक से विश्लेषण का प्रयास है। जाहिर है, शिक्षा को और उस पर नीति को लोग बहुत अलग अलग नजरियों से देखते हैं, और संचार माध्यमों से अपने नजरिए बांटते हैं, ताकि कोई आम सहमती का नजरिया बनाया जा सके। यही लोकतन्त्र का तरीका है और यह हर समझदार नागरिक का कर्तव्य भी है। लेख के इस हिस्से में मैं प्रारूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 (प्रा-19) के सामान्य ढांचे और मान्यताओं पर विचार रखूँगा। विशिष्ठ अनुसंसाओं की चर्चा आगे के हिस्सों में होगी।

प्रा-19 को देखते ही एक बात जो दिमाग में आती है वह यह है कि यह शिक्षा नीति पहले की शिक्षा नीतियों से बहुत अलग है। सब से पहले तो यही की 1968 की शिक्षा नीति महज 7-8 पृष्ट की थी, 1986 की कोई 28-29 पृष्ट की; पर प्रा-19 अँग्रेजी में 484 और हिन्दी में 650 पृष्ट की है। लग सकता है कि यह कोई महत्व की बात नहीं है, इस पर क्या विचार करना? पर वास्तव में यह शिक्षा नीति की धारणा में बदलाव का संकेत है। शिक्षा नीति में जो चीजें निश्चित रूप से होनी ही चाहियें उनकी सूची  पर नीति निर्माताओं के बदलते विचारों का संकेत है। पहले की शिक्षा नीतियाँ शिक्षा में राष्ट्र से लेकर स्कूल तक निर्णय लेने के लिए एक ‘सैद्धान्तिक-ढांचा’ होती रही है। वे दिशा निर्देश देती है, वास्तविक ‘निर्णय’ क्या हों उनपर सिर्फ सिद्धांतों से सहमती की मांग होती रही है, विस्तार से क्या करना है और कैसे इस यह तय करना राज्यों का काम होता था। इसी लिए शिक्षा नीतियाँ शिक्षा-क्रम और शिक्षण-शास्त्र पर सिर्फ दिशा-निर्देश देती थी, कौनसे विषय हों, उनमें क्या-क्या हो आदि शिक्ष-क्रम निर्माताओं पर और अन्य विशेसज्ञों पर छोड़ दिया जाता था।

इस का कारण यह है कि शिक्षा नीति एक राष्ट्रीय दस्तावेज़ होता है, भारत में शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है, अर्थात इस के बहुत से पहलू राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हैं। शिक्षा-क्रम शिक्षा का एक ऐसा ही पहलू है। भारत में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या एक अनुसंसात्मक दस्तावेज़ होता है, राज्यों पर इसे मानने का कानूनी बंधन नहीं होता। हर राज्य अपना शिक्षा-क्रम स्वयं तय करता है। इस लिए नीतियाँ सिर्फ ऐसी बातें कहती थीं कि सम्पूर्ण राष्ट्र के स्कूली शिक्षा-क्रमों में कौनसी बातें लाज़मी तौर पर होनी चाहिए; जैसे: स्वतन्त्रता आंदोलन का इतिहास, संवैधानिक मूल्य, वैज्ञानिक सोच, पंथ-निरपेक्षता, आदि।

प्रा-19 इतनी बड़ी इसलिए है कि इसमें कई चीजें समाहित करली गई हैं, जैसे: नीति, नीति को लागूकरने का कार्यक्रम, चुने हुए मुद्दों पर शिक्षा-क्रम का विस्तार, चुने हुए मुद्दों पर पढ़ाने की विधियों का विस्तार, आदि; और एक ही चीज को बार-बार कहना। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा-क्रम के विस्तार में जाने कि बजाय ये सैद्धान्तिक बातें कही गई हैं कि सारे भारत के शिक्षा-क्रमों में एक “सामान्य केंद्रक” (common core) होगा। उसमें कुछ राष्ट्रीय मूल्य भी दिये हैं। “इन राष्ट्रीय मूल्यों में ये बातें शामिल हैं : हमारी समान सांस्कृतिक धरोहर, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, स्त्री-पुरूषों के बीच समानता, पर्यावरणका संरक्षण, सामाजिक समता, सीमित परिवार का महत्त्व और वैज्ञानिक तरीके के अमल की जरूरत। यह सुनिश्चित किया जायेगा कि सभी शैक्षिक कार्यक्रम धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के अनुरूप ही आयोजित हों।” प्रा-19 में शिक्षा-क्रम पर विस्तार से अनुसंसाओं के बवाजूद “लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक समता” पर ज़ोर नहीं है, और 1986 की शिक्षा नीति की यह पंक्ति “यह सुनिश्चित किया जायेगा कि सभी शैक्षिक कार्यक्रम धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के अनुरूप ही आयोजित हों” शिक्षा में धर्म-निरपेक्षता पर जो बल देती है वह नहीं है। प्रा-19 सांप्रदायिक हो या किसी खास धर्म की तरफदारी कर रही हो ऐसा नहीं है, पर इस में वह दिशा निर्देश भी नहीं  है कि शैक्षिक कार्यक्रम पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होगा। इस नीति के लिए देश में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा नहीं  है।

दूसरी बात, शिक्षा-क्रम और शिक्षण-विधि के विस्तार में जाने का कारण यह हो सकता है कि नीति निर्माताओं को भरोसा नहीं है कि हमारा शिक्षा-तंत्र इस के सही विस्तार की, सही निर्णयों की और ठीक से लागू करने की काबिलियत और ईमानदार इच्छा रखता है। पीछे की नीतियां, शिक्षा-क्रम और शिक्षा का अधिकार कानून जिस तरह से शिक्षा-तंत्र ने लागू किए हैं उसे देखते हुए यह शक गैर-वाजिब भी नहीं है। शायद हमारा तंत्र न तो सक्षम है ना ही ईमानदार मेहनत करने वाला। पर इस समस्या का समाधान नीति के स्तर पर अनुचित विस्तार में जा कर तंत्र पर अनुचित बंधन लगाना नहीं हो सकता, इसके लिए तंत्र की काबिलियत और प्रतिबद्धता का विकास करना होगा। और यह कैसे किया जाये यह बताना नीति का काम है। नीति का काम सम्पूर्ण तंत्र के काम को अपने हाथ में लेलेना नहीं है।

प्रा-19 में इसकी शिक्षा-दृष्टि (educational vision) और शिक्षा के उद्देश्यों का बहुत ध्यान से विवेचन होना चाहिए। इस पर विचार करने से पहले राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 (शिनी-86) में शिक्षा-दृष्टि और उद्देश्य देखना समीचीन होगा। इस लिए नहीं की अब भी वही दृष्टि और उद्देश्य हों, बल्कि इस लिए कि हम बदली परिस्थिती में अनुसंसित बदलाओं को ठीक से समझ कर उनका औचित्य-अनौचित्य समझ सकें। शिनी-86 में एक बहुत छोटा-सा अधयाय है, “शिक्षा का सार और उसकी भूमिका” नाम से। यहाँ इसको पूरा देखना जरूरी है। आगे मैं उसे पूरा उद्धृत कर रहा हूँ, सिर्फ विभिन्न अनुच्छेदों को दी गई संख्याएं हटाई हैं: “हमारे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ‘‘सबके लिए शिक्षा’’ हमारे भौतिक और आध्यात्मिक विकास की बुनियादी आवश्यकता है। शिक्षा सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर करती है, जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है, वैज्ञानिक तरीके के अमल की संभावना बढ़ती है और समझ और चिंतन में स्वतन्त्रता आती है। साथ ही शिक्षा हमारे संविधान में प्रतिष्ठित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के लक्ष्यों की प्राप्ति में अग्रसर होने में हमारी सहायता करती है। शिक्षा के द्वारा ही आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों के लिए जरूरत के अनुसार जनशक्ति का विकास होता है। शिक्षा के आधार पर ही अनुसंधान और विकास को सम्बल मिलता है जो राष्ट्रीय आत्म-निर्भरता की आधारशिला है। कुल मिलाकर, यह कहना सही होगा कि शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का अनुपम साधन है। इसी सिद्धांत को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण की धुरी माना गया है।”

यह अनुच्छेद बहुत संक्षेप में पर बहुत स्पष्टता के साथ ये चीजें कहता है: मानव जीवन में शिक्षा का महत्व, राष्ट्रीय जीवन में शिक्षा का महत्व, लोकतन्त्र में शिक्षा के उद्देश्य और आर्थिक आधार के रूप में शिक्षा। यह शिनी-86 की ‘शिक्षा-दृष्टी’ (educational vision) है। आगे उद्देश्य, कार्यक्रम, शिक्षा-क्रम और शैक्षिक ढांचे आदि पर निर्णय लेने में यह दृष्टि “धुरी” का काम करेगी।

अब देखते हैं की प्रा-19 की वह धुरी क्या है? प्रा-19 अंग्रेजी में लिखी गई थी। फिर उसका हिन्दी अनुवाद हुआ। हिन्दी अनुवाद में शिक्षा-दृष्टि (vision): “राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१९ एक भारत केन्द्रित शिक्षा प्रणाली की कल्पना करती है जो सभी को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करके, हमारे राष्ट्र को एक न्यायसंगत और जीवंत ज्ञान समाज में लगातार बदलने में योगदान देती है।” मेरे विचार से यह ठीक अनुवाद नहीं हुआ है। इस लिए मैं निम्न अनुवाद काम में लूँगा।

“राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१९ एक ऐसी भारत केन्द्रित शिक्षा प्रणाली की कल्पना करती है जो सभी को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करके, हमारे राष्ट्र को  ‘कायम रहने वाले तरीके से’ (sustainably) एक समतापूर्ण और जीवंत ज्ञान समाज में बदलने में सीधा योगदान दे।”

यहाँ दृष्टि मूलतः एक ज्ञान-समाज की है, यह ज्ञान-समाज समतापूर्ण होना चाहिए, इस के निर्माण में शिक्षा को ‘सीधा’ योगदान देना चाहिए और बदलाव ‘कायम रहने वाले तरीके से’ होना चाहिए। बहुत अधिक तर्क के बिना भी यह साफ है की यह दृष्टि ‘ज्ञान-समाज’ केन्द्रित है। यह शिनी-86 की दृष्टि की तुलना में संकुचित है और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक और तकनीकी केन्द्रित नजरिए से लाई गई है। ऐसे कौन से नए बदालव हुए हैं कि प्रा-19 में मानव जीवन और लोकतान्त्रिक मूल्यों को एक शब्द ‘समतापूर्ण’ में समेट दिया गया है? या अब हमें मानव जीवन में  वैज्ञानिक तरीके के अमल की, समझ और चिंतन में स्वतन्त्रता की, और हमारे संविधान में प्रतिष्ठित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के लक्ष्यों की आवश्यकता नहीं रही? क्या वे प्राप्त कर लिए गए हैं? या वे तो सब जानते ही हैं और शिक्षा तो उन्हीं की राह पर चल ही रही है? या अब दुनिया बादल गई है इस लिए लोकतान्त्रिक समाज के बजाय ज्ञान-समाज अधिक महत्व पूर्ण हो गया है? यह सही है कि ज्ञान समाज की धारणा में यूनेस्को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, मानव अधिकारों, और लोकतान्त्रिक मूल्यों की बात करता है। पर ये सब आर्थिक विकास और संचार तकनीकी के संदर्भ में होते हैं। मूल मंत्र क्या है? ज्ञान और नैतिकता में समृद्ध लोकतान्त्रिक समाज, जो आर्थिक विकास को मानव के साधन के रूप में देखता है; या फिर आर्थिक विकास और तकनीकी केंद्र में रखनी है और लोकतान्त्रिक मूल्य बस कई शर्तों में से एक शर्त है, और नागरिक उसके लिए संसाधन है?

प्रा-19 को ध्यान से पढ़ने पर दूसरी, अर्थात आर्थिक और तकनीकी विकास की केन्द्रीयता साफ उभरती है। सवाल यह नहीं है आर्थिक और तकनीकी विकास की जरूरत है या नहीं; यह जरूरत तो है ही। सवाल यह है कि लोकतान्त्रिक मूल्य और संविधान आर्थिक विकास को दिशा दे या आर्थिक विकास की मांगें संविधान और समाज को दिशा दें। प्रा-19 की शिक्षा-दृष्टि इस मामले में कुछ असपष्ट है, और जितनी स्पष्टता उसमें है उसमें आर्थिक विकास केंद्र में दिखाता है।

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