शिक्षा का रुख २: उद्देश्य


रोहित धनकर

[ जो शिक्षक ‘सच बोलने’ को दक्षता मानेगा वह द्रोणाचार्य की तरह “सदा सच बोलो” वाक्य रटने को कहेगा, जैसे द्रोण ने कौरवों और पांडवों से कहा। और बहुत संभावना यही है कि इस तरह के शिक्षण में युधिष्ठिर की तरह का जागरूक छात्र भी “अश्वस्थामा मारा गया, नार या हाथी” करके उस दक्षता का उपयोग करेगा। महाभारत की इस कहानी में युधिष्ठिर “सत्य के जीवन मूल्य” का पालन नहीं किया, “सत्य बोलने की दक्षता का उपयोग किया”। ]

शिक्षा नीतियों में शिक्षा के उद्देश्य अलग से कोई उपशीर्षक दे कर पहले भी नहीं लिखे जाते रहे हैं। पर समाज की एक तस्वीर, उसे चरितार्थ बनाने में शिक्षा की भूमिका और उस के लिए शिक्षित व्यक्ति के गुण और योग्यताओं पर कुछ साफ तौर पर कहा जाता रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (शिनी-८६) में एक लोकतान्त्रिक समाज और शिक्षा के माध्यम से लोकतान्त्रिक मूल्यों के विकास की बात इस लेख के पिछले हिस्से में हमने देखी। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि शिनी-८६ में शिक्षा के माध्यम से लोगों में निम्न योग्यताएँ और मूल्य विकसित करने की कल्पना थी: “राष्ट्रीय मूल्यों को हर इंसान की सोच और जिंदगी का हिस्सा बनाने की कोशिश की जायेगी। इन राष्ट्रीय मूल्यों में ये बातें शामिल हैं : हमारी समान सांस्कृतिक धरोहर, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, स्त्री-पुरूषों के बीच समानता, पर्यावरणका संरक्षण, सामाजिक समता, सीमित परिवार का महत्त्व और वैज्ञानिक तरीके के अमल की जरूरत।” इसके अलावा शिक्षा का के उद्देश्यों में “आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों के लिए जरूरत के अनुसार जनशक्ति का विकास” शामिल था। अर्थात शिक्षा के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों के निर्माण की बात थी जो:

  1. संवेदनशील हों, और जिनकी दृष्टि प्रखर हो।
  2. जो अपनी समझ और चिंतन में स्वतंत्र हों। और वैज्ञानिक सोच को अमल में ला सकें।
  3. जो संविधान के मूल्यों को समझते हों और उनके लिए प्रतिबद्ध हों।
  4. जो आर्थिक उन्नति में योगदान दे सकें।

प्रारूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति (प्रा-१९) शिक्षा के उद्देश्य पूरे दस्तावेज़ में एक से अधिक जगह बिखरे हुए हैं। शिक्षा के माध्यम से जो इंसान बनाने की कल्पना है उसके प्रमुख गुण है: “अच्छा, सफल, नवाचारी, अनुकूलनीय, उत्पादक इंसान।” यह अंग्रेजी संस्करण का सही अनुवाद है। हिन्दी संस्करण में जो गुण लिखे हैं वे हैं: “बेहतर, अच्छा, सफल, नवाचारी, परिवर्तनशील, उत्पादक इंसान।” “बेहतर” शब्द जोड़ दिया है और “अनुकूलनीय” को “परिवर्तनशील” कर दिया गया है। “अनुकूलनीय” (adaptable) परिस्थिति के अनुसार ढलजाने वाला होता है। “परिवर्तनशील” तो परिस्थिति को बेहरी के लिए बदलने वाला भी हो सकता है। परिस्थिती के अनुसार ढलने में और परिस्थिती को उचित दिशा देने के लिए उसे बालने में बहुत फर्क है। यह इंसान शिनी-86 में चाहे गए इंसान जैसा नहीं है। पर आर्थिक और तकनीकी केन्द्रित ‘ज्ञान-समाज’ के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

ऐसा व्यक्ति बनाने के लिए जो सिखाया जाना चाहिए उसमें प्रा-19 के अनुसार सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं कुछ दक्षताएं। उनकी सूची इंसान के उपरोक्त गुणों के तुरंत बाद दी गई है: “वैज्ञानिक स्वभाव; सौंदर्यशास्त्र और कला की समझ; भाषाएँ; सम्प्रेषण की क्षमता; नैतिक तर्क; डिजिटल साक्षरता; भारत का ज्ञान; और उन महत्वपूर्ण मुद्दों का ज्ञान जिनसे स्थानीय समुदाय, राज्य, देश और दुनिया रूबरू हो रहे हैं।” हिन्दी संस्करण में ‘स्किल्स’ का अनुवाद “हुनर और कौशल” किया गया है, और “वैज्ञानिक स्वभाव; सौंदर्यशास्त्र और कला की समझ; भाषाएँ; सम्प्रेषण की क्षमता; नैतिक तर्क” को सूची से निकाल दिया है। शायद अब देश में हिन्दी और अंग्रेजी भाषियों के लिए अलग अलग शिक्षा नीतियाँ होंगी!

दक्षताओं की यह सूची प्रा-19 में शिक्षा से प्राप्त की जाने वाली चीजों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह सूची बार बार दी गई है। शिक्षाक्रम और शिक्षण-शास्त्र पर अध्याय के आरंभ में ही उसे उद्देश्यों के रूप में लिखा गया है। इस जगह पर शिक्षा के उद्देश्य के रूप में “समग्र विकास” का भी जिक्र है, और कहा गया है कि शिक्षाक्रम को 21वीं सदी की दक्षताओं के लिए रूपांतरित किया जाएगा। 21वीं सदी की ये दक्षताएं हैं: “समालोचानात्मक चिंतन, रचनात्मकता, वैज्ञानिक स्वभाव, सम्प्रेषण की क्षमता, सहयोग, बहुभाभाषिकता, समस्या समाधान, नीतिशास्त्र,सामाजिक जिम्मेदारी, और डिजिटल साक्षरता।” प्रा-19 में शिक्षा के उद्देश्यों को हम एक साथ देखें तो वे कुछ इस तरह से होंगे:

  1. अच्छा, सफल, नवाचारी, अनुकूलनीय, उत्पादक इंसान।
  2. २१वीं सदी की दक्षताओं से लैश इंसान।

शिनी-१९ में दक्षताओं की बहुत लंबी सूची है। यह कई जगह पर बिखरी हुई है। इन में २१वीं सदी की दक्षताओं का प्रमुख स्थान है। पर प्रा-१९ के नीति निर्माताओं का दक्षता प्रेम २१वीं सदी की दक्षताओं तक सीमित नहीं है। उनके लिए “दक्षता” शिक्षा से संबन्धित एक मात्र प्राप्त करने योग्य वस्तु है, और सभी अवधारणों को समाहित करती है। हमें इस दक्षता-ग्रसित-मानसिकता को ठीक से समझना चाहिए।

यह ठीक है कि भारतीय शिक्षा के बारे में आम राय है कि यह सिर्फ जानकारी देती है, काम करने की काबिलियत नहीं देती। इस समस्या को अभी हमारे देश के शैक्षिक विमर्श में ठीक से नहीं समझा गया है। कई बार कहते आज की शिक्षा “सिर्फ जानकारी” देती है, कई बार “सिर्फ ज्ञान” देती है, कई बार “सिर्फ सिद्धान्त (theory)” देती है। मैंने ऊपर “जानकारी” लिखा है, क्यों की “ज्ञान” और “सिद्धान्त” में एक गहरी समझ और उनको चरितार्थ करपाना अवधारणात्मक स्तर पर शामिल होता है।

नई शिक्षा नीति कुछ करने की योग्यता पर बल देना चाहती है, जो उचित ही है। पर इस में कुछ करने की काबिलियतों के विभिन्न रूपों की समझ नहीं झलकती। ना ही “ज्ञान”, “सिद्धांत” और “कुछ करने की काबिलियतों” के रिश्ते को समझा गया है। इस लिए सारी मानवीय योग्यताओं को “दक्षता” ही मान लिया है। यह शैक्षिक विमर्श को बहुत उथला और संकुचित बना देता है, और इससे गंभीर नुकशान हो सकते हैं।

प्रा-१९ में दक्षताओं की बानगी के लिए ये सूची देखें: बिजली का काम, बागवानी, मिट्टी के बर्तन बनाना, लकड़ी का काम, सम्प्रेषण, डिजिटल साक्षरता, मात्रात्मक तर्क (quantitative reasoning), नेतृत्व, विश्लेषण, सहयोग,  समालोचनात्मक चिंतन, अंतःक्रिया (लोगों से), भाषायें, तार्किक-निगमन, समस्या समाधान, टीम वर्क, करुणा, अवधारणात्मक स्पष्टता, रचनात्मक सोच , सृजनात्मकता, सांस्कृतिक-समझ, सांस्कृतिक जागरूकता, जिज्ञासा, सहानुभूति, समता, नीतिशास्त्रीय-तर्क (ethical reasoning), धैर्य, समावेशिता, स्थानीय समुदायों के सामने महत्वपूर्ण मुद्दों का ज्ञान, भारत का ज्ञान, नैतिक तर्क (moral reasoning), बहुभाषिकता, धैर्य, दृढ़ता, विनोदप्रियता, चरित्र-बल, वैज्ञानिक स्वभाव, सौंदर्य और कला की समझ, सामाजिक संपर्क, सामाजिक जिम्मेदारी। पता नहीं यह शैक्षिक विमर्श में आवश्यक अवधारणाओं की अनभिज्ञता है या निष्पादन-कुशलता को ही सबकुछ मान लेने की धारणा।

पारंपरिक दृष्टि से ‘दक्षताएं’ उन मानवीय काबिलियतों को कहा जाता है जो (१) बारंबार आभास से साधी जाती हैं, (२) जिनके सीखने में ज्ञान का आधार अपेक्षाकृत संकुचित होता है और गहन-चिंतन जरूरी नहीं होता, (३) जिनका उपयोग जिस परिस्थिती में सीखी जाती हैं उन के आस-पास ही होता है, समान्यकरण की संभावनाएं बहुत सीमित होती हैं, और (४) जिनका उपयोग दक्ष-व्यक्ति की इच्छा पर पूरी तरह निर्भर करता है।

इस दृष्टि से वाहन-चलना एक दक्षता है। क्यों की इस पर ऊपर लिखी चारों शर्तें लागू होती हैं। और ‘करुणा’ दक्षता नहीं है, क्यों की वह भावों से पैदा होती है, करुणा पर आपका बस नहीं होता, और ‘करुणा’ को एक दक्षाता के रूप में उपोयोग करने का अर्थ होगा जहां करुणा नहीं है वहाँ करुणा का दिखावा करने का अभ्यास; यह अनैतिक और छद्म होगा। इसी तरह से समालोचनात्मक-चिंतन, वैज्ञानिक स्वभाव, सौन्दर्य-बोध, सांस्कृतिक-समझ और काला-बोध भी दक्षताएं नहीं हैं; क्यों की वे  ज्ञान के व्यापक आधार पर गहन-चिंतन से पैदा होतीहैं, सामान्यीकरण उनकी जरूरी शर्त है और वे व्यक्ति का चारित्रिक गुण बन जाती हैं। समानता, न्याय, समवेशिता, सामाजिक दायित्व, आदि भी दक्षताएं नहीं हैं, क्योंकि वे ऐसे नैतिक मूल्य हैं जो व्यक्ति के दूसरों के प्रती सम्मान और संवेदना से पैदा होते हैं, खास परिस्थिति में बारंबार अभ्यास से उनका नाटक करना ही सिखाया जा सकता है, इन मूल्यों की समझ और उनके लिए प्रतीबद्धता नहीं। धैर्य, चारित्रिक-दृढ़ता और विनोदप्रियता भी दक्षताएं नहीं हैं; ये चारित्रिक गुण जीवनानुभावों से विकसित होते हैं, इनका नाटक करने से नहीं।

दक्षताओं की इस आलोचना पर यह सवाल उठाया जा सकता है कि ‘ठीक है, कुछ शब्दों का हेर-फेर है, पर इस भाषाई मशले को आलोचाना का मुद्दा बना कर बाल-की-खाल निकालने की क्या जरूरत है?’

यदि यह बाल की खाल निकालना है तो इस की जरूरत कई कारणों से है। पहला तो यह कि, शिक्षा में कोई भी योग्यता विकसित करने के लिए विद्यार्थियों के कोई विषय-वस्तु सिखानी पड़ती है। उदाहरण के लिए रोज़मर्रा के हिसाब-किताब के लिए लिखना, पढ़ाना, संख्यापद्धति, गणित की संक्रियाएँ, आदि सिखानी होती हैं। शिक्षाक्रम बनाने वाले और शिक्षकों का किसी योग्यता के प्रति नजरिया यह तय करने में काम आता है कि वे कौनसी विषय-वस्तु चुनें और किसी विधि से सिखाएँ। समता और स्वतन्त्रता को दक्षता मानना वैसा ही है जैसे सच बोलने को दक्षता मानना। जो शिक्षक ‘सच बोलने’ को दक्षता मानेगा वह द्रोणाचार्य की तरह “सदा सच बोलो” वाक्य रटने को कहेगा, जैसे द्रोण ने कौरवों और पांडवों से कहा। और बहुत संभावना यही है कि इस तरह के शिक्षण में युधिष्ठिर की तरह का जागरूक छात्र भी “अश्वस्थामा मारा गया, नार या हाथी” करके उस दक्षता का उपयोग करेगा। महाभारत की इस कहानी में युधिष्ठिर “सत्य के जीवन मूल्य” का पालन नहीं किया, “सत्य बोलने की दक्षता का उपयोग किया”।

मानवीय मूल्यों, सृजनात्मकता, समालोचानात्मक चिंतन, विवेक, वैज्ञानिक स्वभाव आदि का विकास दक्षताओं की तरह करने की कोशिश का नतीजा यह होगा कि शिक्षार्थियों के चिंतन, निर्णय और व्यवहार उनकी भावनात्मक, बौद्धिक और नैतिक समृद्धि से नहीं बल्कि यांत्रिक नियमों से संचालित होंगे। उनमें व्यक्तित्व की गहराई, अपने चिंतन पर विश्वास और आधिकारिक आत्मा-चेतना के बजाय एक प्रकार की थोथी और दिखावटी आत्म-चेतना विकसित होगी। आधिकारिक आत्मचेतना से मेरा आशय है ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ होना, और अपने आप को पहचान कर अपने नैतिक सिद्धांतों, योग्यताओं, भावनाओं और इच्छाओं में समरसता स्थापित कर पाना; जो की शिक्षा का एक बहुत महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है।

इस दृष्टि से यह स्पष्ट है की प्रा-१९ में शिक्षा के उद्देश्य इस की शिक्षा-दृष्टि से तो संगत हैं; क्यों की वह शिक्षा-दृष्टि ही एकतरफा है। पर मानव जीवन की भावनात्मक-नैतिक-बौद्धिक समरसता और भारतीय लोकतन्त्र में प्रखर-स्वतंत्र-चेता नागरिक की वर्तमान जरूरत की दृष्टि से एकांगी हैं। इस असंतुलन को दूर करने के लिए २१वीं सदी के दक्षाओं पर आधारित उद्देश्यों के बजाय भारतीय सांस्कृतिक  और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित उद्देश्य चाहियें। हम अपनी दृष्टि और उद्देश्य पश्चिम और यूनेस्को से शब्दावली, भाषा और भाव सहित यों का यों नहीं ला सकते। हमें अपनी ही सांस्कृतिक-संवैधानिक नजर से अपने धेय बनाने होंगे और विश्वभर में जो कुछ भी शुभ उस दृष्टि खरा उतरता है और उसे आगे विकसित करने में मदद करता है उसे, पर सिर्फ उसे ही, खुले मन से अपनाना होगा। पर सब से पहले अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक धरातल पर अपनी दिशा तय करनी होगी।  

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