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रोहित धनकर

कुछ दिन पहले में अपने गाँव गया था। यह झुंझुनु जिले में एक छोटा सा गाँव है। यहाँ एक मंदिर में दिन रात ज़ोर-ज़ोर से तथाकथित धार्मिक भजन लाउड-स्पीकर पर बजते रहते हैं। एक भजन के बोल सुनने की मैंने कोशिश की। बाकी तो मुझे याद नहीं है अब, पर एक पंक्ति मेरे मन में अटक गई। “खा के भांग का गोला, पर्वत पर मटक रहा बम भोला”।

सुनकर मुझे धक्का-सा लगा। मैं कोई धार्मिक किस्म का इंसान नहीं हूँ, बल्कि मैं तो यह भी नहीं मानता की दुनिया को बनाने-चलाने वाला कोई ईश्वर है या हमें अगले जन्म में हमारे कर्मों के फल मिलेंगे। मंदिर-वंदिर तो मैं केवल दोचार-बार पर्यटक के रूप में या किसी दोस्त का साथ देनेभर के लिए गया हूँ। पर सांस्कृतिक प्रदूषण से मुझे परेशानी होती है। यहाँ मामला अध्यात्म का नहीं बल्कि बौद्धिक और सौंदर्य की सांस्कृतिक समझ का था। शिव नाचते तो हैं हमारी संस्कृति में, पर उनका नाच “मटकना” नहीं “तांडव” होता है। शिव भांग भी खाते हैं, पर खा कर मटकने की बात मैंने पहली बार सुनी थी।

मेरे मन में मटकने की छवि फिल्मों में शरीर के अंगों को लय में हिलाने की है। और उसमें नृत्य का भी पूरा भाव आने के बजाय कुछ बेतुका-सा अर्थहीन या कामुक संकेतों वाला अंग संचालन होता है। संभव है मेरी “मटकने” की परिभाषा गलत हो, पर मुझे ऐसा ही लगता है। मटकना शब्द हम या तो बच्चों के भोले पैन के लिए उपयोग करते हैं, जिसमें वे बड़ों की नकल में हाथपैर हिलाते हैं, या कुछ अपमानजनक भाव के साथ बड़ों की बेतुकी-सी नृत्य कोशिश के लिए। मैंने मटकना कभी कलात्मक नृत्य के लिए नहीं सुना। तो मेरे गाँव के शिव-भक्तों के लिए अब शिव ने तांडव छोड़ कर मटकना शुरू कर दिया है। अर्थात लोकप्रिय हिन्दू धर्म बादल रहा है।

यह अचानक नहीं हुआ है। बहुत दिन से चल रहा है। जिसे मैंने ऊपर ‘मंदिर’ कहा है वह मंदिर हाल ही में बना है। पहले उसे गाँव के लोग “धूणा” कहते थे। “धूणा” एक दूसरे शब्द “धूणी” का पुंलिंग है। “धूणी” माने आग जला कर तापने की जगह। “धूणा” साधुओं के स्थान को कहजाता था, क्यों की वहाँ एक निश्चित स्थान में सदा आग रहती थी, शायद गांजे की चिलम के लिए। तो इस आधार पर साधुओं के रहने के पूरे स्थान को ही धूणा कहदेते थे। इस गाँव के लिए यह धूणा खास है। मेरे बचपन में कोई 70 फूट लंबी और इतनी ही छोड़ी जमीन को मिट्टी की ‘डोल’ से घेर दिया गया था। इसमें सामने एक तरफ एक छोटा सा कमरा बना था, उसमें आग का स्थान, यानि धूणा था। कमरे के फर्श में से 5-6 सीढ़ियाँ नीचे जाती थी, जहां एक बहुत छोटा, शायद 6 फूट लंबा और 5 फूट छोड़ा कमरा बना था। उसे गुफा कहते थे। यह मानाजाता था की जिस पहले साधु ने यह धूणा स्थापित किया था वह इस गुफा में ध्यान करता था या समाधी लगता था। दूसरी तरफ एक लगभग 5 फूट ऊंचा कोई 9 फूट लंबा और इतना ही छोड़ा चबूतरा बना हुआ था। इस चबूतरे पर चारों कोनों में चार मिट्टी की ‘कुंडियाँ’ (मटके की तरह मिट्टी का बना खुला बर्तन) लगी रहती थीं जिनमें पक्षियों के लिए सदा पानी भरा रहता था। चबूतरे पर चढ़ने के लिए एक तरफ सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। चबूतरे के बीच में एक छोटा सा पत्थर लगा था, उसके आस-पास लोग प्रणाम करते थे, अगरबत्ती जलते थे, प्रसाद बांटने से पहले उस में से कुछ पत्थर पर श्रद्धा से चढ़ते थे। पक्षियों के लिए पानी गाँव की औरतें और लड़कियां ला कर कुंडियों में भारती थीं। विशेष रूप से जेठ के महीने में जब सब-कुछ सूखा और तप रहा होता था सुबह आठ बजे के आस-पास लड़कियों का कोई छोटा सा समूह धूणे पर पानी लेजाते हुए नजर आजाता था। कई बार ये गीत गाती हुई जाती थीं। गीत यातो बाबा से आशीर्वाद के लिए होते थे या इंद्र से बरसात की प्रार्थना करते हुए होते थे।

धूणे की गाँव में इतनी मान्यता के पीछे शायद एक कारण यह भी था की इसे स्थापित करने वाला साधु इस गाँव के लोगों में से ही एक व्यक्ति था, कोई 3-4 पीढ़ी पहले, जो साधु बन गया था। वह गाँव से कहीं चलगया और कोई 12-15 वर्ष बाद वापस आया। वापस आया तब वह साधु बना हुआ था और यह प्रसिद्ध हुआ की वह हिमालय में 12 वर्ष तप करके आया है। गाँव वाले उसी के कुनबे के थे, तो उनहों ने उसके लिए ऊपर वर्णित धूणा बना दिया। ऊपर जिस चबूतरे का जिक्र है वह उस साधु, गणेश नाथ, की समाधी पर बना हुआ था। ऐसा माना जाता था की गणेश नाथ ने वहाँ ‘जीवित समाधि’ ली थी। जीवित समधी लेने का तरीका यह बताया जाता था कि उन्होने गाँव वालों से एक गड्ढा कुदवाया, फिर उस में बैठ कर समाधि लागली। समधी लगाने से पहले गाँव वालों से कहा की गड्ढे के ऊपर एक कपड़ा तान दो, और 3-4 घंटे बाद आकार देख लेना। गाँव वाले जब कोई चार घंटे बाद देखने गए तो बाबाजी (गाँव में अब भी इन साधु को “बाबाजी” ही कहते हैं) का समधी अवस्था में ही प्राणान्त हो चुका था। इसी गड्ढे को भर कर उसके ऊपर उनकी समाधी बनादी गई।

कहते हैं की बाबाजी गणेशनाथ ने गाँव के उन सब लोगों की शराब छुड़वादी थी जो उसवक्त पीते थे। धूणे पर धार्मिक चर्चा होती थी। उनके पास और साधु भी आते थे। गणेश नाथ ने एक परिपाटी शुरू की थी की दशहरे के दिन धूणे में ‘भंडारा’ किया जाये। ‘भंडारा’ माने गाँव के सब लोग अपने यहाँ से अनाज, पैसे, दूध आदि एकत्रित करके धूणे पर खाना बनाते थे। उस शाम कोई अपने घर नहीं खाता था, सभी सामूहिक भोज में शामिल होते थे। बाहर से आने वालों के लिए भंडारे का खाना दो-पहर बाद से ही शुरू हो जाता था। और कोई भी आ सकता था खाने के लिए। बहुत सारे साधु और भिखारी आते थे।

इस गाँव में शादी के अगले दिन सुबह नया जोड़ा सब से पहले आशीर्वाद लेने, गाँव की भाषा में ‘धोक’ खाने, गणेश नाथ की समाधि पर जाता था। बारात चढ़ने से पहले दूल्हा आशीर्वाद लेने उसी समधी पर जाता था। किसी भी शुभ मौके पर लोग आशीर्वाद लेने वहीं जाते थे। धर्म का बस यही सीधा दिखने वाला रूप प्रमुख था। मैंने मंदिर जाते लोगों को बहुत कम देखा है। वैसे इस गाँव में मंदिर था भी नहीं, नजदीक का मंदिर कोई दो किलोमीटर दूर एक बड़े गाँव में था, जहां इन लोगों के पूर्वज इस नए गाँव में आने से पहले रहते थे।

मैंने इस धूणे का इतना लंबा वर्णन उस वक़्त धर्म का सरल-सीधा सा रूप दिखाने के लिए किया है। साथ ही धूणे की गाँव के लोगों में मान्यता, उनके लिए एक सामूहिकता के प्रतीक के रूप में दिखाने के लिए भी। यह धूणा बड़ी सरल-सादी सी पर गंभीर जगह थी। यह यहाँ हिन्दू-धर्म का एक स्थानीय रूप था। उसमें अंधविश्वास तो था, पर छीछलापन नहीं था। जब रतजगे होते थे तो शिव तांडव भले ही करले मटकता नहीं था। इस धूणे का एक सम्मान पूर्ण, तड़क-भड़कविहीन स्थान था गाँव के जीवन में।

अब?

अब यह धूणे से मंदिर बन गया है। कई कमरे, चार ऊंचे शिखर, बड़े बड़े हाल, 15 फूट ऊंची चाहरदीवारी, पुरानी सीमा से आगे बढ़ कर चारगाह भी जमीन में। सामने बड़े इलाके में चारगाह की जमीन पर पेड़ लगाकर और तार-बंदी करके अतिक्रमण की कोशिश।

कुछ लोग कह सकते हैं की इस सब में बुराई क्या है? पुराने धूणे की जगह बड़ा पक्का मंदिर बना है। जहां तक चारगाह की जमीन पर अतिक्रमण का सवाल है, जिसे मौका मिलता है वह इस गाँव में अतिक्रमण करता ही है। नहीं, इन सब में तो बहुत छोटी बुराई है, बस मंदिर की इमारत में कोई कला कोई सौन्दर्य नहीं है, वह ऊलजलूल है। असली समस्या यहाँ जो चलता है वह है।

एक तो सुबह कोई साढ़े तीन बजे से रात के दस बजे तक कान फोड़ने वाले शोर के साथ तथाकथित भजन चलते रहते हैं। पूरे गाँव में सामान्य आवाज में बात करने में बाधा आती है। बच्चों की परीक्षा के समय भी यह शोर नहीं रुकता। स्कूल धूणे से केवल सौ मिटर पर है, बच्चों की पढ़ाई में बाधा पड़ती है। और जो भजन हैं वे सब घटिया फिल्मी गानों की धुन पर या हरयाणवी रागनियों पर आधारित हैं। एक उदाहरण मैं ऊपर दे चुका हूँ। एक और भजन (इस के बोल मुझे ठीक याद नहीं हैं) “सज रहा दुल्हा बनकर …..” है। यह शिव की बारात का वर्णन है और इसकी धुन “सज रही गली मेरी माय सुनहरी गोटे में…” पर है। यह सुनहरी गोटे वाला गाना महमूद की एक घटिया फिल्म “कुँवारा बाप” (शायद) से है। बहुत से तथाकथित भजन, जैसा ऊपर कहा, हरयाणवी रागनियों पर आधारित हैं। जो हरयाणवी रागनियाँ नहीं जानते उनके लिए: कुछ रागनियाँ अच्छी भी होती हैं। पर प्रसिद्ध वे हैं जो अधिकतर अश्लील गाने होते हैं, जो बहुत बड़े समूहों में लड़किया अश्लील नाच के साथ मंच पर गाती हैं। यह संगीत-नाट्य विधा मेरे इलाके में इतनी लोकप्रिय है कि कई बार लोग इसे देखने राजस्थान से हरियाणा जीप से 80-100 किलोमीटर चलकर जाने में भी कोई कष्ट महसूस नहीं करते।

दूसरा, यहाँ से हर साल कुछ लड़के कावड़ ले कर जाते हैं। कावड़िए कैसे सड़कों को रोक कर शोर मचाते हुए चलते हैं यह सब जानते हैं। कल परसों मैंने एक टीवी चैनल पर सुना की उत्तर प्रदेश में तो कई जगह यातायात बंद करना पड़ा है। उन पर हेलीकाप्टर से सुरक्षा दी जा रही है। तो कावड़ लाना एक बड़ा तमाशा है। मेरे गाँव के कावड़िए जिस दिन वापस आएंगे, मैं ने  सुना है उस दिन रात को नाच-गाने का कार्यक्रम होगा। उसमें हरियाणा से कोई मंडली बुलाई गई है। मैंने एक बार यह कार्यक्रम होते देखा है। यह बेहद फूहड़ और कुछ हद तक अश्लील होता है, और इसे धार्मिक कार्यक्रम का नाम दिया जाता है।

तीसरा, अब इस तथाकथित मंदिर में गाँव की महिलाएं नहीं जाती। ना, कोई बंदिश नहीं है। बस साधु लंपट जैसा है। उसके आस पास बैठने वाले भी उसी का रूप लगते हैं। इस साधु को किसी ने कोई आध्यात्म की बात करते नहीं देखा। कोई किताब पढ़ते नहीं देखा। बस चिलम पीना और इधर उधर के काम। इतने मकान बनवाने के लिए पैसे कहाँ से आते हैं नहीं पता।

यह धूणा मूलतः गाँव की सामूहिक संपत्ति है। इस में जो कुछ चल रहा है इसे ठीक रह पर रखने के लिए, एक बार मैंने सारे गाँव की एक समिति बनाने की कोशिश की। जिससे की यहाँ की गति विधियाँ फूहड़ता की सीमा पार न करें, कि शोर पर नियंत्रण किया जा सके। पर दुरंधर राजनीतिज्ञों के चलते यह संभव नहीं हुआ। आस इस लंपट साधु और उसके पिछलगुओं को कोई नहीं रोक सकता। क्यों कि गाँव के कोई न कोई लोग, बादल-बदल कर, उसके पिछलग्गू बने ही रहते हैं।

तो? ये ब्लॉग का मशला क्यों है? यह एक गाँव में हिन्दू-धर्म का फूहड़ और छिछला होता हुआ रूप है। मैं जब कावड़िए देखता हूँ, यह देखता हूँ की वे फूहड़ भजन सीडी और एलेक्ट्रोनिक रूप में इस ‘मंदिर’ में हैं, तो विचार आता है कि क्या धर्म का यह फूहड़ और छिछला रूप बनना मेरे गाँव तक सीमित है? ये भजन और सीडी आदि तो कहीं बाहर बड़े पैमाने पर बनाते होंगे? मुझे डर है कि यह विकृति व्यापक स्तर पर आ रही है। यह गंभीर सांस्कृतिक प्रदूषण है। इस में उजड्डूपन, फूहड़पन, आक्रामकता और विचार हीनता है। हिन्दू धर्म पर फूहड़ और भद्दा हो कर अर्थहीन होजाने का खतरा है। इस में धार्मिक वाला हिस्सा तो धार्मिक लोग सोचें। पर इस से समाज के सोच में जो विकृती आ रही है वह बहुत चिंता जनक है।

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