कक्षा में उद्देश्य 2: गणित और जादू


रोहित धनकर

[शिक्षक साथियों से बात करते हुए बहुत बार एक सवाल उठता है कि कक्षा में पढ़ाते समय—खास कर प्राथमिक स्तर पर—हमारा ध्यान सिर्फ विषय-वस्तु पर ही रह सहता है। अधिक से अधिक निर्धारित शिक्षण बिन्दुओं पर, जो स्वयं आम तौर पर विषय-वस्तु पर अधिककर, अर्थात पुस्तक में दिये प्रश्नों का सही जवाब सीखने, तक ही सीमित होते हैं। अतः प्राथमिक कक्षाओं में अपने काम को शिक्षा के सामान्य या व्यापक उद्देश्यों से जोड़ने की कोशिश करना संभव नहीं है।

आजकल इंटरनेट पर बहुत से विडियो अपलोड किए जा रहे हैं, शिक्षकों के ही बनाए हुए। इन में से कई विडियो देख कर लगता है कि शिक्षक के पास (1) समझ है, (2) विषय क्या ज्ञान है, (3)  शिक्षण-विधि भी है, (4) बच्चों का स्तर भी जो चाहिए वह है, और (5) बच्चों की रुची भी या तो है या बनाई जा सकती है; फिर भी शिक्षक अपनी विषय-वस्तु को बच्चों के विवेक के विकास या development of reason—जो कि शिक्षा का शायद सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य है—से जोड़ने से सिर्फ एक कदम पहले रुक जाते हैं।

जैसा मैंने ऊपर कहा बच्चों और शिक्षक की समझ/ज्ञान संबंधी सारी बौद्धिक शर्तें तो पूरी होती हैं। फिर शिक्षक साथी रुक क्यों जाते हैं? एक कदम पहले? शायद समझते हों कि आगे का कदम बच्चे स्वयं पूरा कर लेंगे? या शायद उन्हें इस बात का कोई खास महत्व नहीं लगता? यह छोटा लेख इसी चीज को रेखांकित करने के लिए है।]

इंटरनेट पर एक बहुत छोटा-सा और रोचक विडियो मिला। इस में एक शिक्षक गणित में रुची जगाने के लिए एक बच्ची को गणित का कथित “जादू” सीखा रहे हैं। विडियो सफाई से बनाया हुआ है। जहां तक देखने से पता चलता है बच्ची समझ भी रही है। मुझे ऐसा भी लगता है कि इस विडियो से जैसा “जादू” यहाँ सिखाया है उसमें रुची भी बन सकती है। यहाँ यह देखते हैं इस “जादू” का (1) गणित में वास्तविक रुची जगाने के लिए, (2) गणित की प्रकृति समझने के लिए, (3) गणित में शोध-विधि (हाँ, ठीक पढ़ा, प्राथमिक स्तर पर गणित में शोध-विधि) के लिए आधार बनाने में, (4) गणितीय चिंतन के विकास में, और इस तरह (5) विवेक के विकास में कैसे योगदान दे सकता था। पर एक कदम पहले ही रुक गया।

विडियो का वर्णन

ठीक से समझने के लिए मुझे विडियो का कुछ वर्णन करना पड़ेगा। यह  आम बात है, और सब जानते हैं। पर इस वर्णन के बिना मैं जो कहना चाह रहा हूँ वह संभव नहीं लगता। अतः कुछ आम और ऊबाऊ वर्णन यहाँ जरूरी है। (विडियो यहाँ देख सकते हैं।)

इस विडियो में शिक्षक गणित के जादू के नाम से एक आम ट्रिक सीखा रहे हैं। ट्रिक कुछ ऐसे है:

शिक्षक ने एक 1 से 9 तक की कोई एक संख्या एक कागज पर लिख कर सब के सामने रख दी। इसी तरह जिस बच्ची को सिखा रहे हैं उसे से भी 1 से 9 तक की कोई एक संख्या कागज पर लिख कर सब के सामने रखवादी। बच्ची ने 6 लिखा, जो सब को दिखा दिया। लेकिन सिखाने वाले शिक्षक को नहीं। अर्थात शिक्षक नहीं जानता कि बच्ची ने क्या लिखा, और बच्ची नहीं जानती कि शिक्षक ने क्या लिखा। फिर बच्ची से निम्न संक्रियाएँ करने को कहा गया:

  1. अपनी लिखी संख्या को 2 से गुणा करो: 6X2=12
  2. जो परिणाम आया उस में 2 जोड़ो: 12+2=14
  3. जो परिणाम आया उस को 5 से गुणा कर दो: 14X5=70
  4. जो परणाम आया उस में से 2 घाटा दो: 70-2=68

इस के बाद शिक्षक बताते हैं कि यह “जादू” कैसे हुआ। इसके लिए वे एक और उदाहरण लेते हैं, जिसमें अपनी तरफ से 3 और बच्ची की तरफ से 4 लिखा हुआ मानते हैं। और फिर कहते हैं की यह जादू करने के लिए हम पहले तीन चरण वही रखेंगे, अर्थात:

  1. 4X2=8
  2. 8+2=10
  3. 10X5=50

अब चौथा चरण समझाने के लिए वे बताते हैं कि उनहों ने जो संख्या ली (3) उसे 10 में से घटाएँ (10-3=7) और अब इस 7 को 50 में से घटाएँ:

  1. 50-7=43

यह संख्या बच्ची की लिखी संख्या को पहले और उसके बाद शिक्षक लिखी संख्या को दाईं तरफ लिखने से बनती है। आखिर में कहते हैं:

“इस तरह से आप देख सकते हैं कि मथेमटिक्स जो है वह समझने की चीज है। उसको अगर हम लर्न करते हैं तो वह नहीं आएगा। अगर हम उसको एंजॉय करते हैं उसके साथ खेलते हैं अंकों के साथ, तो मथेमटिक्स जो है बहुत ही आसान विषय है।”

विश्लेषण और संभावनाएं  

इस विडियो का पहला भाग एक कलन-विधि (algorithm) है। कलन-विधि या algorithm एक या अधिक संक्रियाओं या/और प्रक्रियाओं की शृंखला होती है जिन्हें एक निश्चित क्रम में लागू करना होता है। भाग करने की विधी, गुना करने की विधी, जोड़ करने की विधि आदि जो हम कक्षाओं में सिखाते हैं, वे कलन-विधियाँ (alogoriths) ही हैं।

इस प्रक्रिया में दो व्यक्ती हैं। निर्देश देने वाला और उनका पालन करने वाला। यह एक ऐसी कलन-विधि है जिसमें दोनों एक-एक अंक लिखते हैं। फिर निर्देश देने वाला संक्रियाओं की एक ऐसी शृंखला करवाता है जिस से वह संख्या मिल जाये जो निर्देशों का पालन करने वाले के लिखे अंक को दहाई का अंक और निर्देश देने वाले के लिखे अंक को इकाई के अंक के रूप में लिखने से बनती है। कहने का तात्पर्य यह की गुणा-भाग आदि की कलन-विधियों और इस कलन-विधि में चरणों (अर्थात संक्रियाओं) का अंतर तो है, पर कोई अवधारणात्मक अंतर नहीं है।

यह सब इस लिए लिखा की कलन-विधियों के पीछे तार्किक कारण अर्थात तर्क होता है। कलन-विधियों को उन के पीछे के तर्क को समझे बिना रटा जा सकता है, जिसे यहाँ हमारे शिक्षक “लर्न करना” कह रहे हैं। बिना तर्क समझे रटी हुई कलन-विधियों का उपयोग भी सफलता पूर्वक किया जा सकता है। और आम तौर पर यही हम हमारे विद्यालयों में करवाते हैं। सवाल यह है कि क्या बिना तर्क के कलन-विधि को याद कर लेना और  लागू करना सीखने को समझना कह सकते हैं?

यहाँ हमारे शिक्षक बंधु कह रहे हैं कि “इस तरह से आप देख सकते हैं कि मथेमटिक्स जो है वह समझने की चीज है।” क्या उन्हों ने समझाया या केवल कलन-विधि बताई? उन्हों ने ना तो बच्ची को और ना ही  दर्शकों को इस कलन-विधि के पीछे का तर्क समझाया। अतः उन्हों ने समझाया तो कुछ नहीं।

वे गणित के अध्यापक लग रहे हैं। अतः इस कलन-विधि के पीछे के तर्क को समझते तो होंगे, ऐसा हम मान सकते हैं। तो फिर उन्हों ने बच्ची को क्यों नहीं समझाया? कई कारण हो सकते हैं। पर एक कारण का संकेत उनकी इस मान्यता में मिलता है कि “अगर हम उसको एंजॉय करते हैं उसके साथ खेलते हैं अंकों के साथ, तो मथेमटिक्स जो है बहुत ही आसान विषय है”।

यह “खेलने” को परम-शिक्षण-विधि मानने का प्रचार हमारे यहाँ कुछ ना समझ कथित शिक्षण-शास्त्रियों ने डीपीईपी (डिस्ट्रिक्ट प्राइमरी एडुकेशन प्रोग्राम्म) के मध्याम से बहुत किया था। वे और उन से सीखे हुए शिक्षक-अध्यापक यह भूल गए कि खेलना बिना समझे भी संभव है। खेलना रुचि और अभ्यास की दृष्टि से तो बढ़िया शिक्षण-शस्त्र हो सकता है, पर यह समझ भी पैदा करदेगा यह जरूरी नहीं है।

जिन लोगों ने यह लेख यहाँ तक पढ़ा है, मैं मानता हूँ कि वे सब समझते हैं की उपरोक्त कलन-विधि में निर्देशक निर्देशित की लिखी संख्या को 10 से गुणा करवा कर उस में 10 जुड़वाता है। (पहले चरण में 2 से गुणा, तीसरे में 5 से गुणा, 2X5=10। दूसरे चरण में 2 जोड़ना, फिर योग को पाँच से गुणा करने पर ये जुड़ा हुआ 2 भी 5 से गिना हो गया, अर्थात 10 जुड़ गया।) अब इस तरह मिली संख्या से वह संख्या घटवाना जो निर्देशक की अपनी लिखी संख्या को दस में से घटाने पर मिलती है, अर्थात इकाई की जगह अपनी संख्या लाने की संक्रिया करवाता है।

सामान्य ढंग से उसे हम ऐसे दिखा सकते हैं:

मान लीजिये निर्देशित ने a लिखा, और निर्देशक ने b लिखा। अब:

  1. aX2=2a (2 से गुणा)
  2. 2a+2 (गुणनफल मेन 2 जोड़ना)
  3. (2a+2)X5=(10a+10) (योग को 5 से गुणा)
  4. (10a+10)-(10-b)=10a+10-10+b=10a+b (इस बार के गुणनफल से (10-b) घटना)

10a+b में साफ तौर पर दहाई का अंक a है, और इकाई का अंक b।

इस लकन-विधि को समझने का अर्थ है इस तर्क को समझना। पर शिक्षक ने तो यह नहीं समझाया। अर्थात उन्हों ने एक रोचक कलन-विधि बिना तर्क के बताई। जिस चीज के पीछे के कारणों और तर्क को हम नहीं समझते वह हमें जादू जैसी लगती है। गणित पढ़ाना जादू सिखाना नहीं होता, यह तो जादू को खत्म करना होता है। जादू खत्म होता है उसके पीछे के कारण या तर्क को समझाने से। जादू और तर्क का बैर है। गणित और जादू का भी बैर है।

गणित में रुची जगाने के लिए यह ट्रिक सिखाना तो ठीक है। पर यदि इसके पीछे का तर्क नहीं समझाया तो बच्चों के मन में गणित को एक रहस्य के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। अर्थात बच्चों के दिमाग में गणित की प्रकृती का गलत रूप स्थापित कर रहे हैं।

यहाँ शिक्षक बहुत कुछ पूछ/कर सकता था, जो गणित के सही स्वरूप को समझने में, विवेक के विकास में और शिक्षा के उद्देश्यों से इस गति-विधि को सरलता से जोड़ ने में मददगार हो सकता था। नीचे कुछ संकेत दिये हैं:

  1. यह पूछना (बच्चों से) कि क्या यह 1-9 के बीच की सभी संख्याओं के लिए किया जा सकता है?
  2. इस के पीछे तर्क क्या है?
  3. क्या तुम ऐसी ही कलन-विधि कोई और भी बना सकते हो?
  4. ऐसी कितनी कलन-विधियाँ बन सकती है?
  5. क्या उन सब में 4 ही चरण होने जरूरी हैं?
  6. इस कलन-विधि में गुणा, जोड़, और घटाव का उपयोग है। क्या ऐसी ही कलन-विधि चारों संक्रियाओं को काम में लेकर बनाई जा सकती है?
  7. क्या 1 से 20 तक की संख्याएं ले कर भी ऐसी विधि बनाई जा सकती है?
  8. इसी विधि में 10 से 20 तक की संख्याएँ लेने से क्या होगा?

यहाँ 1 से 4 तक के सवाल जो बच्ची विडियो में दिखाई है उस के समकक्ष बच्चों से पूछे जा सकते हैं और उन पर आगे काम करवाया जा सकता है। 5 से 8 तक के सवाल थोड़े अधिक गणित जानने वालों के लिए उपयुक्त होंगे।

कुछ सहज निष्कर्ष

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर शायद हम कुछ शिक्षा में उपयोगी निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

एक, इस तरह की गतिविधियों और आम गणित शिक्षण को गणितीय-चिंतन, गणित की प्रकृती, विवेक के विकास, कुछ मानने से पहले जांच और समझने का आग्रह, और शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों से सहज ही जोड़ सकते हैं। यह गणित का उपयुक्त शिक्षण होगा। ट्रिक्स भर सिखाना गणित में नहीं गणित की ट्रिक्स में रुची पैदा करता है।

दो, यह सब करने के लिए शिक्षक को स्वयं गणित की प्रकृती, उस की अवधारणात्मत संरचना, विवेक का अर्थ, विवेक के विकास का अर्थ, गणितीय चिंतन और शिक्षा के उद्देश्यों को समझना पड़ेगा। जो आम तौर पर या तो शिक्षक समझते हैं या बहुत ही थोड़े प्रयत्न से समझ सकते हैं।

तीन, इस के लिए शिक्षक को अपने स्वयं के दिमाग में यह बात साफ करनी होगी कि कुछ भी सिखाने में समझ और तर्क पर बल देने से वह शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों से स्वयं जुड़ जाती है। तर्क और समझ पर बल नहीं देने से जो सिखाया जाता है वह निस्क्रिय रहता है और व्यापक मानसिक विकास से नहीं जड़ पाता। अतः समस्या समाधान और आगे सीखने में मदद नहीं कर सकता।

चार, बच्चों की सोचने, तर्क करने और समझने की क्षमता पर विस्वास करना होगा। बच्चों में ये क्षमताएं हम जितना मानते हैं उस से ज्यादा होती हैं। हम यदि उनका इस तरफ ध्यान दिलवाएँ, इन क्षमताओं की सराहना करें और उन्हें उनका अभ्यास करने का मौका दें तो वे स्वयं ये सब करने लगेंगे। हाँ, इस में कुछ समय लग सकता है।

यह लेख उक्त विडियो की आलोचना या बुराई के लिए नहीं लिखा गया है। जहां तक इस में काम हुआ है वह बहुत बढ़िया हुआ है। लेख इस तरफ ध्यान दिलवाने के लिए है कि इतनी बढ़िया गतिविधी में थोड़ी-सी और मेहनत से हम कितना कुछ पा सकते हैं। और यह भी कि ये सब हमारी और बच्चों की क्षमताओं के भीतह ही है। बस हमारे विवेकशील-रुझान (rational disposition) और जागरूकता भर का सवाल है।

*******

25 मई 2020

One Response to कक्षा में उद्देश्य 2: गणित और जादू

  1. kandpalap says:

    badhiya lekh padhne ko mila hai… is algorithm ke pichhe ke tark ko samjhane ke liye jis tarah ke symbols ki jarurat pad rahi hai.. aur jaisa rigour ki jarurat padti hai.. us rigour kis sanskriti kakshaa me banna pahli chunauti hai…

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