पढ़ने-लिखने की कमजोरी का बुनियादी संकट


रोहित धनकर

शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंता जाहिर करते रहना अब हमारी राष्ट्रीय आदत बन गई है। और इस कोरोना-ग्रसित वर्ष में तो यह करेलन नीम चढ़ गई है। अब तो बच्चों को सीखने के जो अवसर—जैसे तैसे भी—विद्यालय उपलब्ध करवाते थे वे भी बंद हो गए हैं। पर यह छोटा आलेख इस बड़ी समस्या के एक छोटे बिन्दु से संबन्धित है, पूरी समस्या से नहीं। बिन्दु छोटा है पर बुनियादी भी है। शिक्षा की गुणवत्ता की सब से अधिक चर्चित समस्या विद्यालयों का पढ़ना-लिखना सब बच्चों के ठीक से न सिखापाना है। पढ़ना-लिखना अपने आप में शिक्षा का एक महत्व पूर्ण हिस्सा तो है ही, जो बौद्धिक विकास के असीमित रास्ते खोलता है; पर साथ ही किसी भी तरह की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भी यह मूल शर्त है। इसी लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बड़ी बेचैनी से कहती है कि “सीखने की बुनयादी आवश्यकताओं (अर्थात , मूलभूत स्तर पर पढ़ना, लिखना और अंकगणित) को हासिल करने पर ही हमारे विद्यार्थियों के लिए  बाकी नीति प्रासंगिक होगी।” अर्थात इन चीजों के ठीक से न सीखपाने से तो यह सारी नीति अधिकांश बच्चों को कुछ भी लाभ नहीं पहुंचा पाएगी। अतः इस शिक्षा नीति के अनुसार “शिक्षा प्रणाली की सर्वोच्च प्राथमिकता 2025 तक प्राथमिक विद्यालय में सार्वभौम मूलभूत साक्षरता और संख्या-ज्ञान प्राप्त करना होगा।” मोटे तौर पर मूलभूत पढ़ना-लिखना सिखाने के बारे में हमारी सहमति शिक्षा नीति से यहीं तक है। बाकी सुझाए गए अधिकतर तरीके शायद ही कारगर हों।

इस समस्या के बहुत से कारण हैं। पर यहाँ मैं सिर्फ एक कारण—विद्यालयों में सिखाने के तरीकों—की बात करना चाहूँगा। और इस पर सोचना आरंभ करने के लिए यह लंबा उद्धरण प्रस्तुत है: “बहुत से लोग वर्तमान समय में बहुत गंभीरता से पढ़ना सिखाने का  सर्वश्रेष्ठ तरीका ढूँढने में, उधार लाने में या ईजाद करने में लगे हैं। और बहुतसों ने तो यह सर्वश्रेष्ठ तरीका ईजाद कर भी  लियाहै, ढूंढ लिया है। साहित्य में और जीवन में भी हम बहुत बार यह प्रश्न पढ़ते-सुनते हैं: आप किस विधि से पढ़ाते हैं? मैं स्वीकार कारता हूँ (कुछ अपराध बोध के साथ) कि यह सवाल अधिकतर वे लोग पूछते हैं जो बहुत कम शिक्षित हैं और जो एक लंबे समय से बच्चों को पढ़ाने का काम एक धंधे की तरह से कर रहे हैं। या फिर वे लोग पूछते हैं जो अपने अध्ययन-कक्षों से सार्वजनिक शिक्षा के साथ सहानुभूति दिखाते हैं। ये लोग इस सामाजिक सरोकार में मदद करने के लिए लेख लिखने को भी तैयार हो जाते हैं और पढ़ना सिखाने के लिए सर्वश्रेष्ठ विधि पर लिखित पुस्तक छपवाने के लिए योगदान के लिए भी। या फिर वे पूछते हैं जो अपनी ही विधि को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और उसके लिए बहुत पक्षपाती हैं। या फिर, अंत में, वे लोग जिनका पढ़ाने से कोई संबंध कभी रहा ही नहीं। और आमजन वह दोहराते हैं जो बहुमत कहता है।” इसके बाद लेखक विधि की समस्या के अलावा कुछ चीजों का जिक्र करते हैं और आगे कहते हैं: “यह सामाजिक-व्यवहार (फेनोमेना) खतरनाक है, क्यों की यह हमारे सार्वजनीन शिक्षा पर बने अभी अपरिपक्व विचारों पर और धुंध चढ़ा देता है।”

यह बहुत जल्दी में किया गया काम चलाऊ सा अनुवाद है, पर बात साफ है। थोड़ा अनुमान लगाइये यह कब और किसने कौनसे देश में लिखा होगा? क्या सब बातों से पूर्ण सहमती ना होते हुए भी यह विधि को लेकर अपने देश में चल रही बहस की झलक नहीं देता? यह टोल्स्तोय ने 1862 में रूस में लिखा था। इसे लिखे 158 वर्ष बीत चुके हैं, हम आज भी सर्वश्रेष्ठ विधि ढूंढ रहे हैं। अब हम शोध-आधारित विधियाँ खोजते हैं। शिक्षा में शोध की अपनी अच्छाइयाँ, बुराइयाँ और सीमाएं हैं। उसे हम अभी यहीं छोड़ते हैं। पर क्या सर्वा-श्रेष्ठ और शोध आधारित विधि के बजाय हमें उदार-चयनशील और कर्म-सिद्ध तरीकों की भी बात नहीं करनी चाहिए? उदार-चयनशील (eclectic) से आशय है कई विधियों में से हमारे संदर्भ के लिए उपयुक्त चीजें लेकर एक सुसंगत व्यावहारिक योजना बनाना। और कर्म-सिद्ध से अर्थ है जमीनी स्तर पर काम करके ठीक से सिखाने में सफलता प्राप्त कर सकने वाला तरीका।

पढ़ना-लिखना सिखाने के एक ऐसे ही सफल तरीके को हम एक ऑनलाइन कोर्स के माध्यम से साझा कर रहे हैं। यह सर्वश्रेष्ठ का दावा नहीं हैं। यह शोध-आधारित होने का दावा भी नहीं है। बस कर्म-सिद्ध और उदार-चयनशील भर होने की बात है, कई सफल हो सकने वाले तरीकों में से एक की बात, ना कि एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ की बात।

पढ़ना-लिखना सिखाने के एक ऐसे ही सफल तरीके को हम एक ऑनलाइन कोर्स के माध्यम से साझा कर रहे हैं। यह सर्वश्रेष्ठ का दावा नहीं हैं। यह शोध-आधारित होने का दावा भी नहीं है। बस कर्म-सिद्ध और उदार-चयनशील भर होने की बात है, कई सफल हो सकने वाले तरीकों में से एक की बात, ना कि एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ की बात।

कोर्स के बारे में कुछ और जानकारी

25 अप्रैल 2021

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