[द लैलेंटॉप पर ‘डज गॉड एक्सिस्ट’ डिबेट में मुफ़्ती शमाइल नदवी के आरंभिक वक्तव्य का विशेषण। यह लेख केवक मुफ्ती साहब के आरंभिक वक्तव्य की विवेचना तक सीमित है। समय हुआ तो अख़्तर साहब के आरंभिक वक्तव्य पर भी आगे एक छोटा लेख आ सकता है। यहाँ भाषा मैंने समय बचाने के लिए अंग्रेजी और हिंदी मिली-जूली राखी है, क्यों की यह बहस भी इसी तरह की भाषा में है।]
रोहित धनकर[1]
सार (Abstract)
ईश्वर के अस्तित्व पर होने वाली सार्वजनिक बहसें अक्सर यह मानकर चलती हैं कि यदि ज्ञान के “सही मानक” पहले तय कर दिए जाएँ, तो विवाद स्वतः सुलझ जाएगा। प्रस्तुत लेख एक लोकप्रिय टीवी-वक्तव्य की आलोचनात्मक जाँच विवेक और तर्क की दृष्टि से करता है। लेख का तर्क यह है कि समस्या किसी एक दार्शनिक स्थिति की नहीं, बल्कि ज्ञान के स्रोतों को मनमाने ढंग से सीमित करने, उपमाओं को प्रमाण का स्थान देने, विपक्षी मतों को सरलीकृत कर देने और लॉजिकल फ़ॉलेसीज़ की भरमार की है। परिणामस्वरूप वक्तव्य न तो ईश्वर के अस्तित्व को दार्शनिक रूप से सिद्ध करता है, न ही आधुनिक आपत्तियों का गंभीर सामना करता है।
वास्तव में मुफ़्ती साहब का वक्तव्य अवधारणात्मक भ्रांतियों, लॉजिकल फ़ैलेसीज़ और आत्म-विरोधाभाषों से भरा हुआ एक गर्वीला वक्तव्य है। यह ‘अध-जल गगरी छलकत जाय’ का बढ़िया उदाहरण है।
Keywords: God, modern philosophy, epistemology, science and religion, analogy, contingency
1. भूमिका: जब बहस दर्शन होने का दावा करती है
आधुनिक दर्शन किसी एक सर्वमान्य पद्धति का नाम नहीं है। यह अनुभववाद, तर्कवाद, विज्ञान-दर्शन, भाषा-दर्शन और अस्तित्वगत चिंताओं के बीच चलने वाला एक खुला संवाद है। ऐसे संदर्भ में मान्य-अमान्य मानदंडों को तय करना तो एक जायज कोशिश हो सकती है, पर उन को तय करने में बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी।
जिस वक्तव्य की यहाँ चर्चा है, वह बार-बार यह आभास देता है कि समस्या तर्कों की नहीं, बल्कि “गलत स्टैण्डर्ड” अपनाने की है। इस दावे की विवेक सम्मत जाँच जरूरी है।
2. विज्ञान को बाहर करना: एक सुविधाजनक लेकिन अवैध चाल
वक्तव्य का एक केंद्रीय दावा यह है कि विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व को न सिद्ध कर सकता है, न असिद्ध—और इसलिए उसे इस बहस से बाहर रखा जाना चाहिए।
यह निष्कर्ष सिर्फ़ आंशिक रूप से विवेकसम्मत है, पूरी तरह से नहीं। यह सही है कि अनुभवजन्य विज्ञान metaphysical दावों को directly सिद्ध नहीं करता। यह बात David Hume के बाद से लगभग सर्वमान्य है। पर इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि विज्ञान अप्रासंगिक हो जाता है। विज्ञान “सिद्ध” नहीं करता, बल्कि दावों की जाँच की शर्तें तय करता है और इनके आधार पर गलत दावों को पहचानता है।
विज्ञान को पूरी तरह बाहर कर देना दरअसल यह मान लेना है कि ईश्वर का प्रश्न किसी भी प्रकार के अनुभवजन्य संदर्भ से अछूता है। यह एक घोषणा है, तर्क नहीं। क्यों कि यदि ईश्वर इस जगत का निर्माता और इस में जो घटित होता है उस का नियंता है, तो वे घटनाएँ और निर्मिति अनुभवगम्य हैं, और उन के आधार पर तार्किक निष्कर्ष संभव है। अतः विज्ञान द्वारा खोजे गए तथ्य सीधे ईश्वर को चाहे सिद्ध-असिद्ध ना कर सकें, पर तर्क के आधार वाक्यों के रूप में काम में लिए जा सकते हैं। और यदि, ईश्वर नियंता और निर्माता नहीं है तो पूरी बहस ही खत्म हो जाती है, मुफ़्ती साहब के पास सिद्ध करने को कुछ बचता ही नहीं। अतः विज्ञान को एकल-विधि के रूप में तो बाहर किया जा सकता है, पर तर्क को आधार देने वाले स्रोत के रूप में नहीं।
3. “गलत औज़ार” की दलील: प्रश्न को पहले ही बंद कर देना
ईश्वर के प्रत्यक्ष प्रमाण की माँग को यह कहकर खारिज किया जाता है कि यह “गलत औज़ार” का इस्तेमाल है—जैसे मेटल डिटेक्टर से प्लास्टिक ढूँढना।
यह कोई गंभीर तर्क ही नहीं है। कारण सरल है: उपमा तभी काम करती है जब यह पहले से सिद्ध हो कि जिन वस्तुओं की बात हो रही है वे एक ही श्रेणी की हैं, कम से कम जिस पहलू की तुलना हो रही है उस पहलू में। यहाँ ईश्वर को non-empirical मान लिया गया है और फिर उसी आधार पर empirical माँग को अवैध ठहराया गया है। प्लास्टिक और मेटल दोनों एम्पिरिकल हैं। इस तुलना को अतीन्द्रिय नॉन-एम्पिरिकल के समकक्ष नहीं रखा जा सकता।
यह reasoning नहीं, question-begging है। जो बात साबित करनी है, वही पहले मान ली गई है।
4. “सिर्फ़ लॉजिक” और निश्चितता का भ्रम
वक्तव्य में बार-बार इस बात पर ज़ोर है कि ईश्वर के अस्तित्व पर दलील “दो और दो चार” जैसी होनी चाहिए—पूर्णतः निर्णायक, अपराजेय।
यह वक्तव्य की बड़ी समस्य है। गणितीय सत्य विश्लेषणात्मक (analytic) होते हैं। वे पूरी तरह से ऐक्सियम्स, पोस्चुलेट्स और परिभाषाओं के डिडक्टिव लॉइजिक के निष्कर्षों पर निर्भर करते हैं। ईश्वर जैसे दावे वस्तुगत और दार्शनिक (synthetic metaphysical) होते हैं। इन दोनों से एक ही तरह की निश्चितता की माँग करना category mistake है। यह तर्क को मज़बूत नहीं बनाता, बल्कि उसे गलत मैदान में खड़ा कर देता है। मुफ़्ती साहब शायद यह फर्क नहीं समझते। गणित की दुनिया अवधारणाओं से बनी काल्पनिक दुनिया है। वह हमें वास्तविक दुनिया को समझने के लिए फ्रेमवर्क भर देती है, जिसे हम वास्तविक दुनिया पर इम्पोज़ करते हैं। वह वास्तविक दुनिया के बारे में कुछ नहीं कहती। यदि मुफ़्ती साहब का गॉड भी गणित की अवधारणात्मक (वास्तविक कंटेंट को बिल्कुल बाहर करके) संख्याओं और ज्यामितीय आकृतियों की तरह है तो वह हमारे दिमाग़ की उपज है। हम नहीं वह हमारी निर्मिति है।
मुफ़्ती साहब तो स्वयं जो उदाहरण दे रहे हैं उसे भी ठीक से नहीं समझ सकते। उनका उदाहरण है:
- सौरभ साहब ये एक इंसान हैं।
- और तमाम इंसान कॉन्ससियस बीइंग हैं।
- हमरे सौरभ साहब भी कॉन्ससियस बीइंग हैं।
मुफ़्ती साहब यह नहीं समझ पाये की यह सिलॉजिज्म ‘सत्य’ देती नहीं, उसे ‘प्रिज़र्व’ करती है। अर्थात् यदि “1. सौरभ साहब एक इंसान हैं” और “2. तमाम इंसान कॉन्ससियस बीइंग हैं” तो यह अटल सत्य है कि “3. सौरभ साहब भी कॉन्ससियस बीइंग हैं”। यह लॉजिकल कन्सेप्चूअल डिमांड है। वास्तविकता के बारे में इस से कोई नतीजा निकालने के लिए पहले दावे 1 और 2 को सत्य साबित करना पड़ेगा। और वह केवल तर्क से नहीं एम्पिरिकल स्टडी से ही संभव है, जिसमें एम्पिरिकल ऑब्जर्वेशंस, इंसान और कॉन्ससियसनेस के कॉन्सेप्ट्स और लॉजिक काम आयेगा। लॉजिक की भाषा में यह आर्गुमेंट “वैलिड” है, इसे वास्तविकता में स्वीकार्य और “साउंड” होने ले लिए वादे 1 और 2 सत्य होने चाहियें।
लॉजिक पैना हथियार है मुफ़्ती साहब, इस का बचकाना इस्तेमाल ज़ख़्मी कर सकता है।
5. पिंक बॉल और डिज़ाइन: उपमा की सीमा
निर्जन द्वीप पर मिली “पिंक बॉल” से डिज़ाइनर का निष्कर्ष निकालना सुनने में प्रभावी है। पर तर्क की दृष्टि से प्रभावशीलता वैधता का प्रमाण नहीं होती।
आज हम जानते हैं कि डिज़ाइन-उपमाएँ सीमित दायरे में ही काम करती हैं। किसी मानव-निर्मित वस्तु से निर्माता का निष्कर्ष निकालना और उसी तर्क को पूरे ब्रह्माण्ड पर लागू कर देना एक overextended analogy है। यहाँ उपमा प्रमाण का स्थान ले लेती है—और यहीं से दर्शन वक्तृत्व में बदल जाता है। बॉल की साइज (सीमाएँ) हम जानते हैं। माप सकते हैं। क्या ब्रहंड की कोई सीमा होने की हम कल्पना कर सकते हैं? सीमा है तो उस से आगे क्या है? आप बिग बैंग और एक्सपेंडिंग यूनिवर्स का उदाहरण देंगे तो समझ लें कि वह एक कन्सेप्चूअल मॉडल है, उस के माध्यम से हम कुछ ब्रह्मांडीय वस्तुओं की व्याख्या करते हैं, वह वास्तविकता का हू-ब-हू वर्णन नहीं है। विज्ञान वास्तविकता को समझने के लिए तार्किक/विवेक सम्मत मॉडल देता है, हमेशा वास्तविकता का यथार्थ वर्णन नहीं।
6. नास्तिक उत्तरों का सरलीकरण: Strawman की समस्या
वक्तव्य में नास्तिक या गैर-आस्तिक उत्तरों को या तो “अज्ञान से तर्क” या “डॉग्मा” कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह बौद्धिक रूप से अस्वीकार्य है।
“मुझे नहीं पता” कहना न logical fallacy है, न दार्शनिक कमजोरी। यह epistemic humility है—और कई बार यही सबसे ईमानदार दार्शनिक स्थिति होती है। नास्तिकता, अज्ञेयवाद और प्राकृतिकतावाद (naturalism) जैसी स्थितियों को एक ही श्रेणी में डाल देना बहस को आसान बनाता है, लेकिन सच्चा नहीं। और कोई भी नास्तिक कभी भी ‘ब्रह्मांड किसने बनाया या कैसे बना’ इस बारे में अनभिज्ञ होने को ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध तर्क के रूप में काम में नहीं लेता। यह मुफ़्ती साहब द्वारा स्ट्रॉ मैन आर्गुमेंट बनाया जा रहा है। यह लॉजिकल फ़ॉलसी है, जिसका आरोप वे बार बार नास्तिकों पर लगाते हैं।
7. बुराई की समस्या: भावनात्मक कहकर टाल देना
वक्तव्य में बुराई (evil) की समस्या को भावनात्मक तर्क बताकर दरकिनार किया जाता है। यह दावा आधुनिक दर्शन के इतिहास से अनभिज्ञता दर्शाता है। बुराई की समस्या न तो सतही है, न भावनात्मक। यह ईश्वर-दर्शन के सबसे गहन और तकनीकी प्रश्नों में से एक है। यदि ईश्वर है, वह समस्त का निर्माता है, वह ऑल-गुड है, और वह ओमनीपोटेंट (सर्व-समर्थ) है तो मुफ़्ती साहब को यह समझना चाहिए कि ये गुण आपस में टकराते हैं। एक ही बीइंग में ये गुण आत्म-विरोधाभासी है। अतः ऐसी कोई बीइंग लॉजिकली इम्पॉसिबल है। इसे “इमोशनल” कहकर हटाना समाधान नहीं, पलायन है। या बात को समझा ही नहीं गया है।
8. कंटिंजेंसी और नेसेसरी बीइंग: जहाँ तर्क अधूरा रह जाता है
कंटिंजेंसी आर्गुमेंट वक्तव्य का सबसे गंभीर दार्शनिक प्रयास है। आधुनिक दर्शन इसे गंभीरता से लेता है—लेकिन बिना आलोचना के नहीं। तीन समस्याएँ यहाँ साफ़ हैं:
- “ब्रह्माण्ड कंटिंजेंट है”—यह स्वयं एक विवादित दार्शनिक दावा है।
- “अनन्त कारण-श्रृंखला असम्भव है”—आधुनिक गणित और भौतिकी इस दावे को सहज नहीं मानती, इसे सिद्ध करना पड़ता है, सिस्टम विशेष में।
- “नेसेसरी बीइंग” से “इंटेलिजेंट, पर्सनल गॉड” तक पहुँचना—यह निष्कर्ष तर्क से नहीं निकाला जा सकता।
यह तर्क under-determined है: निष्कर्ष, उपलब्ध आधारों से आगे निकल जाता है।
पर क्यों कि कांटिंजेंसी आर्गुमेंट मुफ़्ती साहब का प्रमुख वॉर-हॉर्स है जिस पर चढ़ कर वे तलवार भांज रहे हैं, अतः इस का थोड़ा और विशेषण जरूरी है। कंटिंजेंसी आर्गुमेंट का संक्षिप्त रूप यह है:
- प्रत्येक आकस्मिक (contingent) तथ्य के लिए कोई न कोई पर्याप्त कारण होता है।
- अतः सभी आकस्मिक तथ्यों की समष्टि (totality) के लिए भी कोई पर्याप्त कारण होना चाहिए।
- वह पर्याप्त कारण स्वयं आकस्मिक नहीं हो सकता।
- अतः एक अनिवार्य सत्ता (necessary being)—जिसे ईश्वर कहा जाता है—अस्तित्व में है, जो इन सब कंटिंजेंट वस्तुओं/तथ्यों का फर्स्ट कॉज है।
यह दावे 1 और 2 एक्सप्लेनेशन की अवधारणात्मक डिमांड्स हैं। दावा 3 उस पर्याप्त कारण को नॉन-कंटिंजेंट होने की डिमांड है। यहाँ तक सब ठीक है, यह एपिस्टेमिक/कन्सेप्चूअल/रैशनल डिमांड है। विचार की डिमांड है। पर यह हमारे विवेक सम्मत चिंतन की प्रकृति बताती है। दावा 4 इस कन्सेप्चूअल (विचार की) डिमांड को बिना आधार के वास्तविक अस्तित्व की डिमांड में परिवर्तित कर देता है। यह लॉजिकल फैलेसी है। Necessity in thought does not license necessity in being. Many versions of the contingency argument and the design argument illegitimately move from conceptual or explanatory necessity (within thought or description) to ontological necessity (about what must exist in reality), without a valid epistemic bridge.
अतः मुफ़्ती साहब के वार-हॉर्स ने उन्हें बीच मैदाने जंग पटक दिया! उनकी पूरी बहस का केंद्र बिंदु ध्वस्त हो गया। वे कांटिंजेंसी आर्गुमेंट को पूरी तरह नहीं समझते।
9. ईश्वर है तो हम उसके प्रति उत्तरदायी हैं?
यह सेमेटिक गॉड्स की धारणा का हिस्सा है। सब ईश्वरों की धारणा का नहीं। उसमें भी यदि ईश्वर है भी, तो यह सिद्ध करना पड़ेगा कि हम उसके प्रति उत्तरदायी हैं। यह सिद्ध करना पड़ेगा कि अकाउंटेबल होने के लिए ईविल का होना जरूरी है। वैसे ईविल अस्तित्व की नहीं अवधारणा की चीज है। वस्तु अपने आप में ना ईविल हो सकती है ना ही गुड। वह बस ‘है’, उस का बस ‘अस्तित्व है’। ईविल और गुडनेस की उपाधि हम देते हैं।
10. विरोधाभास
इस वक्तव्य की एक बड़ी समस्या यह है कि यह विरोधाभासी है। और मुफ़्ती साहब को यह पता भी नहीं है कि वे कहाँ-कहाँ सेल्फ-कंट्राडिक्शन के दलदल में फँस रहे हैं। उदाहरण के लिए वे एम्पिरिकल एविडेंस को बहस से बाहर करते हैं, और फिर स्वयं ही इनफिनिट रिग्रेस का कन्सेप्चूअल नहीं वास्तविक (प्रैक्टिकल) उदाहरण माँगते हैं। वे यह भी नहीं समझते कि इनिफ़िनिटी केवल कन्सेप्चूअल हो सकती है, कभी भी एम्पिरिकल नहीं हो सकती। एम्पिरिकल इनफिनिटी यदि होती भी हो तो हमारा दिमाग़ और हमारी इन्द्रियाँ उस को ग्रास्प नहीं कर सकती।
11. निष्कर्ष: समस्या फ़ॉलेशियस तर्कों के साथ ढाँचे की भी है
विवेक की दृष्टि से इस वक्तव्य की मूल समस्या यह नहीं कि वह ईश्वर के पक्ष में है। समस्या यह है कि वह दर्शन को पहले से तय निष्कर्ष तक पहुँचने का औज़ार बना देता है। ज्ञान के कुछ स्रोतों को बाहर कर देना, उपमाओं को प्रमाण बना देना, और असहमतियों को सरलीकृत कर देना—ये सब मिलकर बहस को कुछ ना समझ लोगों के लिए प्रभावशाली तो बनाते हैं, पर दार्शनिक नहीं।
अंततः यह वक्तव्य न तो ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करता है, न आधुनिक दार्शनिक आपत्तियों का सामना करता है। यह हमें एक बार फिर याद दिलाता है कि कड़ी भाषा में गर्वीली घोषणा और ठोस तर्क एक चीज़ नहीं हैं।
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