कविता पर बेबुनियाद बवाल

May 22, 2021

रोहित धनकर

पिछले 3-4 दिन से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की पहली कक्षा की हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में एक छोटी-सी कविता को लेकर विवाद मचा हुआ है, कथित सामाजिक माध्यमों पर। सामाजिक माध्यम आजकल बहुत महत्वपूर्ण हो चलें हैं। बहुत लोगों के पास किसी बिन्दु पर गहनता में जानने का समय और रुची नहीं होती। विषय भी उनके चिंतन और कर्म क्षेत्र से हट कर हो सकता है, अतः हर एक से हर विषय पर समय लगाने की मांग भी नहीं की जा सकती। दूसरी तरफ इस प्रकार की सतही जानकारी और बहस के आधार पर लोग अपने विश्वास भी बनाते ही हैं। और हर नागरिक का हर विश्वास लोकतन्त्र की दिशा और दशा को प्रभावित भी करता ही है। इस लिए इन बहसों को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। यही कारण है सामाजिक माध्यमों के बढ़ते महत्व का।

खैर, कविता यहाँ दी हुई है। इसे पढ़ें और इसके नीचे दिये गए पढ़ाने के निर्देश भी पढ़ें।

कविता

यह कविता बच्चों से बातचीत करने, कल्पना करने का मौका देने और सोचने के लिए काम में ली जा सकती है। भाषा की कई क्षमताओं के लिए उपयोग की जा सकती है।

बवाल इस में आए शब्द “छोकरी”, “चूसना” और कथित द्विआर्थकता को लेकर उठाया जा रहा है।

“छोकरी” शब्द पर ऐतराज मुझे शिक्षक के नाते देखूँ तो हिन्दी में पूरानी वर्चश्वशाली मान्यताओं का हिस्सा लगता है। यह शुद्धता-वादी मानसिकता का और शुद्धता या मानकता एक छोटे तबके की खड़ी बोली में निहित होना मानने का परिणाम है। यह सोच बच्चों की पढ़ाई और हिन्दी की समृद्धी दोनों की जड़ें काटती है। एक बड़े ग्रामीण तबके की भाषा को केवल हिन्दी से बाहर नहीं करती, बल्कि उस को गँवारू-बोली का खिताब भी देती है। ऐतराज करने वाले लोग यह नहीं समझते की बच्चे नई चीज अपनी पुरानी समझ से जोड़ कर ही सीख सकते हैं। और जब विद्यालय आते हैं तो उनकी पूरी समझ अपनी भाषा में ही होती है। अतः छोकरी जैसे शब्दों को पुस्तकों से निकाल कर हम उनकी भाषा को नकारते हैं और उनकी समझ की जड़ें काट कर सीखने को मुश्किल बनाते हैं।

शैक्षिक दृष्टि से यह ऐतराज प्रतिगामी है। इस में संस्कृति की रक्षा का नारा शामिल करने से यह गैरबराबरी और वर्चश्व की राजनीती को भी बल देता है। और सामाजिक राजनैतिक नजर से भी प्रतिगामी हो जाता है।

“चूसना” शब्द पर ऐतराज कविता में द्विआर्थकता देखने का परिणाम लगता है। इस में भी “मेरी भाषा शुद्ध और शालीन भाषा” का दंभ है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में बहुत से कथन ऐसे होते हैं जो एक तबके के लिए सामान्य और किसी दूसरे के लिए ऐतराज करने काबिल हों। पर यहाँ तो मुझे कुछ ऐसा भी नहीं लगता। कविता में वैसे भी द्विआर्थकता खोजना बहुत आसान है। क्योंकि कविता बनती ही भावों की समृद्धता से है। मुझे लगता है यहाँ द्विआर्थकता ऐतराज करने वाले पाठकों के मन में उपजती है। और उसे वे इस कविता पर आरोपित कराते हैं।

यह तो हुई इस कविता पर ऐतराज की बात। पर मेरे मन में इस पर कुछ लिखने को लेकर झिझक भी थी। उस का कारण यह है की मुझे यह ऐतराज तो बेसमझी या फालतू विवाद उठाने की मानसिकता का नतीजा लगता है; पर मैं इस कविता को कोई बहुत अच्छा पाठ (text के अर्थ में) नहीं मानता। मेरी कविता की समझ तो बहुत ही सीमित है, पर अध्यापक के नाते मुझे इस में एक बड़ी समस्या लगती है। यह एक अकैडमिक बिन्दु है, शिक्षणशास्त्र से संबन्धित। इस को लेकर उपरोक्त प्रकार का विवाद नहीं उठाया जा सकता, ना ही इस विचार में से इस तराह के विवादों के लिए समर्थन मिल सकता है।

भाषा शिक्षण में मेरा मानना यह है कि टैक्स्ट की एक आंतरिक तार्किक-संगती होती है। वह सदा सामान्य अर्थों में सार्थकता और आम तर्क से जुड़ी हो यह जरूरी नहीं। बच्चों के लिए बिना अर्थ के शुद्ध तुकबंदी मात्र भाषा की शब्दावली और ध्वनी विन्यास का आनंद लेने के लिए बहुत जरूरी है। तो मैं यहाँ सामान्य अर्थ में सार्थकता की बात नहीं कर रहा। टैक्स्ट की आंतरिक तार्किक-संगती का उदाहरण आप अक्कड़ बक्कड़ में देख सकते है:

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ। सौ में निकाला धागा चोर निकाल कर भागा।

सामान्य अर्थों में इस में कोई सार्थक-तार्किकता और संगती नहीं है। बहुत शब्द अर्थहीन भी हैं। पर इस में विचारों और बिंबों का एक तारतमयपूर्ण प्रवाह है। जिस कविता पर बात चल रही है उसमें इस का अभाव है। मेरे विचार से भाषा के दुनिया को समझने में समार्थ उपयोग के लिए इस में ‘विचारों और बिंबों के तारतम्यपूर्ण प्रवाह’ के प्रती सचेतता और लगाव सीखना जरूरी है। अतः यह कविता मुझे बहुत बढ़िया कविता नहीं लगती बच्चों के लिए।

पर इस पर जिन बिन्दुओं पर ऐतराज उठाए जा रहे हैं वे निश्चित रूप से शिक्षा और राजनीती दोनों की दृष्टि से प्रतिगामी हैं। और उनको सिरे से नकार देना चाहिए। जिस मानसिकता से वे ऐतराज उपजे हैं उस का विरोध होना चाहिए।

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22 मई 2021


Why are we helpless in the face of this pandemic?

May 18, 2021

Rohit Dhankar

I don’t have all the data and needed information. But whatever information I get through newspapers and social media, I seem to be making forming beliefs, mostly with help from some speculation. Just wanted to share some of those half-formed beliefs, in order to prevent serious mistake through public scrutiny.

This is well recognized that we know much less about the pandemic than is needed to contain or stop it. But that is the character of pandemics and calamities, it cannot be sighted as a ‘reason why’ for helplessness. Containing a pandemic simply means containing an unknown evil.

The first and foremost reason is the ineptness, inefficiency and wrong priorities of the central government, and state governments as well. And that is irrespective of which party is in power. This is natural for the citizens to apportion the largest share of the blame on the central government, and that is justified at the moment. The central government is the biggest culprit.

The second reason to my mind is the abysmal state of our health and all other governing systems. In normal times all government systems function more on tokenism and pretension than actually realizing the professed goals. The work is done mostly on the paper, and the real world remains as it was. That has been the character of government departments. Then they suddenly want to start serious real work when the calamity hits them. And, as is natural, everything collapses. The present central government is in power for more than 6 years and was expected by many people to change this character at the least of the central government departments. It completely failed in doing it. One wonders if they ever wanted to make them better functioning.

The third reason, we are a divided country and society. We are not putting all efforts for defeat the pandemic, simply because we first want to defeat a hated man, who is the prime minister. There is a ring in the air from some quarters, particularly on the social media, that the worst the situation, more the opportunity to heap abuse on Modi and BJP, irrespective of the cost to people. Some people will object to it. But there are too many people who are attacking it for everything for justified and unjustified reasons, and attacking viciously. Using completely unjustified terminologies like ‘deliberate genocide’ etc. to poison public mind. Another set of people is continuously defending government irrespective of its failure, however big its blunders might be. Neither of these sets is using their energy to help the society in containing the pandemic. The opposition is much more interested in ‘Modi should go’ than putting the issue on the back burner and fighting the problem for the time being. The opinion makers and intellectuals—supposed to be the conscience keeper of the society—are the worst afflicted by this morally crippling intellectual disease. Most of them seem to be incurable by now.

Fourth, we as a society lack civic responsibility. Many still don’t get it that preventive precautions in a pandemic is not entirely a personal choice. It has a selfish side of personal safely and survival. But also has a moral side of not becoming a danger to others. Behaviour of many people in public spaces is proof enough that the second aspect has not registered in the social consciousness yet.  

Above I said that the government is the biggest culprit because in a democracy the government is also responsible for all the other problems in the society. Improving the system, taking the opinion making intellectuals along and developing civic responsibility are also government’s responsibilities, up to a certain extent. However, there always be some people in the society who will act on the evil thought that “my enemy should definitely become blind even if I have to lose one eye in the bargain”. The government’s responsibility for such people is double edged. One, it should try to bring them to reason through persuasion. It they are too bent upon this evil idea; they should be exposed to the public. Here a war of perception may be necessary. If a government fails in both then it has only itself to blame, and the common citizen bears the burnt of its failure.

And at the end, a small story from black rustic humour, even if it is somewhat inappropriate in such a situation. In Hindi, don’t want to translate it into English.

दो जाट (जाटों से माफी चाहते हुए) भाइयों में बहुत प्रतिस्पर्धा और झगड़ा चल रहा था। दोनों ही बहुत धनवान नहीं थे। किसी कारण से एक के पास शिव आए। (क्यों आए थे कहानी में मैं भूल गया हूँ।) शिव ने जाट से कहा की तुम तीन वरदान मांग सकते हो। जो कुछ भी तुम चाहो। पर शर्त यह है कि तुम्हारे भाई को जो तुम अपने लिए मांगोगे उस से दुगुना मिलेगा। जाट मान गया, और नीचे लिखे तीन वरदान मांगे:

  1. “भगवन, मेरे लिए एक बड़ा-सा महल बनादे, जिसके चारों और बहुत ऊंची दीवार हो और उस में सिर्फ एक फाटक हो।” (शिव ने तुरंत ऐसा ही महल उसे के लिए बना दिया, पर उसके भाई के लिए दो बना दीते।)
  2. “भगवन, मेरे महल के फाटक में एक 400 फीट गहरा कुआं खोद दे।” (शिव ने तुरंत उसके फाटक को पूरा कवर कराते हुए एक कुआं खोद दिया। पर उसके भाई के दोनों महलों के फाटकों में दो-दो खोद दिये।)
  3. आखिर में जाट ने कहा, “भगवन, मेरी एक आँख फोड़ दे।” (शिव ने तुरंत जाट की एक आँख फोड़ दी, पर उसके भाई की दोनों ही फोड़ दी।)

Rest of the story depends on your imagination. But look around you if you find many of us being governed by this kind of Jaat-buddhi.

(I gain apologize to Jaats. I have neither any malice towards them, not do I think that they have this kind of buddhi. Here I retained the caste name as I have heard this story or joke originally simply because it seems to me that a better way to grow beyond casteism etc. is without attempting to exorcise our literature of its time-stamps. We have to rationally grow out of the biases without wiping out signs of historical wrongs, as they also record our history of moral and intellectual development as a society.)

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18th May 2021


‘हिंदुस्तान’ शब्द पर आपत्ती?

May 17, 2021

रोहित धनकर

मैंने 13 मई 2021 को अपने फ़ेसबुक पृष्ट पर यह लिखा था: “किसी को कोई ऐसी खबर कहीं से मिलजाए की कुछ हिन्दुस्तानी इस महामारी से एक जुट हो कर लड़ रहे हैं और अपने दुश्मनों के लिए भी शुभेच्छा रखते हैं; तो मेरहरबानी करके बताना। लगता है हम दो महामारियों से एक साथ लड़ रहे हैं। पर लड़ रहे हैं या सिर्फ ‘ग्रस्त’ हैं?”

इस पर दो महत्वपूर्ण सवाल उठे।

  1. हिन्दुस्तानी की जगह भारतीय कहना चाहिए था।
  2. क्या त्योहारों का कोई शुद्ध सांस्कृतिक, जिसमें मजहब शामिल ना हो, स्वरूप हो सकता है?

इन सवालों पर विचार करने की जरूरत है। मैं यहाँ सिर्फ पहले सवाल पर कुछ विचार रख रहा हूँ, दूसरे पर फिर कभी।

हिन्दुस्तानी से ऐतराज

इस मुद्दे पर विचार करने से पहले मैं एक छोटे से किस्से का जिक्र करना चाहता हूँ, क्यों कि जिस मूल से यह ऐतराज उठ रहा है उसे पहचानना जरूरी है। हम लोग एक बार केरल किसी अध्ययन के सिलसिले में गए थे। त्रिवेन्द्रम में हमारे पास एक दिन खाली था। इस लिए हम लोग कुछ दर्शनीय स्थान और बाजार आदि भी गए। उन स्थानों में एक वहाँ का प्रसिद्ध पद्मनाभास्वामी मंदिर भी था। हमारी टोली में एक बहुत सुलझे हुए, सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित और प्रबुद्ध मित्र भी थे। मैं उनके विचारों और प्रतिबद्धताओं की तब भी बहुत इज्जत करता था और आज भी करता हूँ। वे मेरे कुछ गिने चुने मित्रों में हैं। वे यह भी जानते थे कि मैं मजहबी आस्थाओं वाला व्यक्ति नहीं हूँ, और ईश्वर तो—चाहे वह पद्मनाभास्वामी के रूप में हो या अल्लाह मियां के रूप में—मुझे मानव बुद्धि को लकवा-ग्रस्त करने वाला विचार लगता है।

तो हुआ यह कि मुझे पद्मनाभास्वामी मंदिर में जाकर उसे अंदर से देखना था। मैंने उत्तर भारतीय मंदिर तो देखे थे, पर दक्षिण भारत के मंदिरों की वास्तु, कलापक्ष और अन्य बातों से अनजान था। और इन्हें देखना समझना मेरी सांस्कृतिक रुची का हिस्सा था। पर मंदिर में जाने के लिए नहा कर धोती पहननी पड़ती थी। यह उनका रिवाज था, शायद अब भी हो। नहाने की व्यवस्था वहाँ द्वार पर ही थी। मैंने वहीं एक दुकान से धोती खरीदी (मजहब और व्यापार का सदा ही गहरा रिश्ता रहा है)। नहाया और मंदिर में गया। हमारे मित्र नहीं गए मंदिर में।

जब मैं बाहर आया तो उनकी आखों में और जो कुछ उन्हों ने कहा (मैं भूल गया हूँ वास्तविक वाक्य क्या थे) उस में उलाहना तो था ही, एक तरह की हिकारत भी थी। कुछ ऐसा कहते हुए जैसे  कि मेरा मजहब में रुची ना होना बस एक दिखावा है। मुझे तब से आज तक इस प्रतिकृया पर आश्चर्य है। और यह भी आश्चर्य है कि बहुत संवेदनशील और प्रबुद्ध लोग भी इस तरह की भावनाओं के शिकार हो सकते हैं, चाहे कभी-कभार ही सही।

हो सकता है मैं गलत होऊं, पर मेरे विचार से यह एक प्रकार की विचारधारतमक प्रतिबद्धता का रूप है। जो संस्कृति और इतिहास में जो कुछ उस विचार के प्रतिकूल है उसे हिकारत से देखती है और उसका उच्छेद करना चाहती है। हमारे मित्र में तो सौभाग्य से यह प्रवृती उनके समग्र चिंतन में (उनका चिंतन बहुत सुलझा हुआ है) व्याप्त नहीं है। पर बहुत लोगों में यह अन-समझी विचारधारा को गटक लेने से उत्पन्न अंधता होती है। ऐसे भी लोग हैं, जो विचारधाराओं को समझने में कम रुची रखते हैं और किसी फैशन के चलते उनके मानने वालों में अपना नाम दर्ज करवाने में अधिक।

अब, ‘हिंदुस्तानी’ पर ऐतराज पर आते हैं। फेशबुक बातचीत में तो ऐतराज करने वाले व्यक्ति ने “हिंदुस्तान” और “हिंदुस्थान” शब्दों को भी अदला-बदली करके काम में लिया है। पता नहीं दोनों में कोई फर्क देखते हैं या नहीं।

इस बात को समझने के लिए हमें देखना पड़ेगा की यह भारत आखिर चीज क्या है? हम सभी जानते हैं की एक संवैधानिक लोकतन्त्र के रूप में तो भारत 1947 में ही बना। पर क्या एक राष्ट्र या देश के रूप में भी यह 1947 में ही बना? राष्ट्र के कुछ उलझे मशले को अभी बाद के लिए रखते हुए मैं ‘भारत एक देश के रूप में’ पर ही ध्यान दूंगा, और इसके विभिन्न नामों पर भी। यहाँ मैं लगभग सारी बात प्रोफेसर इरफान हबीब के एक भाषण से ले रहा हूँ जो उनहों ने 2015 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दिया था, भाषण का शीर्षक “Building the Idea of India” (भारत के विचार की निर्मिति) है। प्रोफेसर हबीब ही क्यों? एक तो वे इस भाषण में मूल-स्रोतों का जिक्र करते हैं, और दूसरे जिस वैचारिक पृष्ठभूमि से उपरोक्त ऐतराज आता है वहाँ हबीब साहब की बात को तवज्जो मिलने की अधिक संभावना है।[1] 

प्रोफेसर हबीब के अनुसार “एक देश के रूप में भारत का विचार पुरातन है। पेरी एंडर्सन का अपनी पुस्तक द इंडियन आइडियोलॉजी में यह आग्रह (assertion) कि इंडिया विदेशियों द्वारा, विषेशरूप से योरोपीयों द्वारा आधुनिक काल में दिया गया नाम है, पूर्णतया भ्रामक है।”[2] वे यह भी कहते हैं कि “पूरे भारत को पहली बार एक देश के रूप में मौर्य साम्राज्य में देखा गया।”[3] तब इसे जंबुद्वीप कहा जाता था। भारत नाम का उपयोग उनके अनुसार पूरे देश के लिए सब से पहले कलिंग के राजा खारवेल के शिलालेख में मिलता है, जो कि ईसा से एक शताब्दी पहले का है। तो बात यह है कि देश के रूप में भारत की अवधारणा दो हजार वर्षों से ज्यादा पुरानी है, वह 1947 में नहीं बना। इसके नाम कई रहे हैं, जंबुद्वीप और भारत उन नामों में से हैं।

तो फिर ‘हिंदुस्तान’ कब आया? और क्यों? हबीब साहब आगे कहते हैं कि ईरनियों ने सब से पहले हमें ‘हिन्दू’ नाम दिया। और ‘हिन्दू’ सिंधु नदी के लिए ईरानी नाम है। तो सिधु नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र प्राचीन ईरान में हिन्दू कहे जाते थे। हबीब साहब के अनुसार “स्थान” और “स्तान” में भेद है। उनके अनुसार संस्कृत में “स्थान” एक विशिष्ट छोटी जगह (spot) के लिए काम में आता है, जब की “स्तान” फारसी में क्षेत्र (region) के लिए।[4] तो ‘हिंदुस्थान’ और ‘हिंदुस्तान’ एक चीज नहीं हैं।

पर यहाँ असली मुद्दा तो ‘हिन्दू’ शब्द लगता है। तो देखते हैं इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कौन कहते थे। हबीब साहब कहते हैं कि अमीर खुसरो ने फारसी में एक लंबी कविता लिखी है जिसमें वह भारत की सब चीजों की बहुत सराहना कराते हैं। यहाँ कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है, पर हबीब साहब के अनुसार खुसरो इस में बहुत अन्य चीजों के साथ ब्राह्मणों और संस्कृत की भी सराहना कराते हैं। ब्राह्मणों की भी उनके ज्ञान के लिए और संस्कृत की उस के विज्ञान और ज्ञान की भाषा होने के लिए। वे सभी भारतीय भाषाओं के नाम लिखते हैं, भारत को मुसलमानों का भी देश बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि यहाँ तुर्की और फारसी भी बोली जाती हैं। वे कश्मीरी से लेकर मलाबारी तक सब भारतीय भाषाओं को ‘हिंदवी’ भाषाएँ कहते हैं। हबीब साहब ने साफ जिक्र नहीं किया है कि खुसरो भारत के लिए ‘हिंदुस्तान’ शब्द काम में लेते हैं या कोई और। पर क्योंकि कविता फारसी में हैं, जुबानों को ‘हिंदवी’ कह रहे हैं, तो बहुत संभावना है कि भारत को ‘हिंदुस्तान’ ही कह रहे होंगे। (मैं कविता ढूंढ रहा हूँ।) खुसरो मुसलमान थे, वे इस देश को मुसलमानों का भी देश बताते हैं, यहाँ की भाषाओं को हिंदवी भाषाएँ बताते हैं। और कम से कम मुझे पूरा विश्वास है इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कहते थे। और इन नामों में ‘हिन्दू’ शब्द है।

मैं इतिहासकार नहीं हूँ, और इस वक़्त संदर्भ देखने का समय भी मेरे पास नहीं है, पर मुझे लगता है कि मुगल साम्राज्य में और दिल्ली सल्तनत में भी इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कहा जाता था। तब तक तो, और खुसरो के काल में भी, हिन्दू शब्द “हिन्दू-धर्म” के साथ भी जुड़ गया था। और हिन्दू-धर्म इस्लाम से भिन्न है। और मुग़ल साम्राज्य में और दिल्ली सल्तनत में सत्ता मुसलमान राजाओं के हाथ में थी। इकबाल का ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ तो सबने सुना-गाया ही होगा। तो खुसरो और इकबाल को (इकबाल को केंब्रिज जाने पहले तक 😊) तो कोई परेशानी नहीं थी, इस देश को हिंदुस्तान कहने से।

अब यह भी आम समझ है कि जहां संवैधानिक और कानूनी जरूरत होगी वहाँ तो हमें भारत ही कहना चाहिए इस देश को, पर आम बात-चीत में, लेखन में, साहित्य में ‘हिंदुस्तान’ शब्द से आपत्ती क्यों और क्या है?

यदि आप सारे भारतीय नागरिकों की समानता को दरकिनार करके हिन्दू-वर्चश्व[5] की राजनीति करने वालों की सुनें तो वे इस के मूल में हिन्दू धर्म, संस्कृति, आदि से घ्रणा, दुराव या उस को खत्म करने की साजिश की बात करेंगे। पर मेरे विचार से यह गलत है, जो लोग ऐसे ऐतराज करते हैं उन में से अधिकतर के मन में हिन्दू-धर्म या संस्कृति से कोई घ्रणा, बैर या दुराव नहीं होता। ना ही वे इनको खत्म करने पर आमादा हैं। बात कुछ और है।

मैं ठीक से नहीं जानता, पर मेरी दो काम-चलाऊ परिकल्पनाएं हैं।

पहली परिकल्पना है पंथ-निरपेक्षता (secularism) को गलत समझ कर उसका झण्डा उठाना। जहां तक मैं समझता हूँ पंथ-निरपेक्षता राज्य-नीति के रूप में सिर्फ इतनी मांग करती है कि राज्य की नीतियाँ, नियम-कानून  बनाने में और उनके क्रियान्वयन में नागरिकों की पांथिंक आस्थाओं का कोई दखल न हो। वे इस दुनिया के विवेकशील ज्ञान और मानवीय नैतिकता पर आधारित हों। सभी नागरिक राज्य और कानून की नजर में समान हों। व्यक्ति के स्तर पर भी यह अपनी आस्थाओं से विमुख होने की मांग नहीं करती। केवल यह मांग करती है कि नागरिक एक-दूसरे से पांथिक आस्था के आधार पर भेदभाव ना करें। पर इसे गलत समझलेने वाले कुछ और ही सोचते हैं। वे लोगों के चिंतन में से पांथिक आस्था को निकालने पर आमादा हो जाते हैं, या उनको हिकारत की नजर से देखने लगते हैं। बल्कि उस से आगे जा कर हमारी भाषा, संस्कृति  और सामाजिक-व्यवहार से कुछ शब्दों, विचारों और क्रियाकलापों को बहिष्कृत करना चाहते हैं। उनके विचार से जो कुछ भी पांथिंक आस्था से कभी इतिहास में निर्मित हुआ है या विकसित हुआ है, वह सब निकाल फेंकना चाहिए। भारत में इसका एक इस से भी अधिक विकृत रूप है। वह यह की जहां भी भारतीय संस्कृति, पंथ, हिन्दू-धर्म का जिक्र आता है, वह विषेशरूप से ताज्य है। इस लिए नहीं की हिन्दू-धर्म से कोई बैर है, बल्कि इस लिए कि भाषा और समाज में सब मजहबों संबंधी शब्दावली का बराबर का उपयोग होना जरूरी है, इन लोगों के विचार से। बहुमत यदि अपनी सांस्कृतिक शब्दावली काम में लेगा तो इन लोगों के विचार से समाज की बोल-चाल में बहुमत की शब्दावली अधिक सुनाई देगी। और यह तो अन्याय होगा!!

यह भ्रामक धारणा है। और संस्कृति, भाषा और पंथ-निरपेक्षता की गलत धारणाओं का परिणाम है। भाषाएँ और सामाजिक व्यवहार संस्कृतियों के वैचारिक और नैतिक विकास की छाप लिए चलते हैं। उन्हें अपनी संकुचित दृष्टि से शुद्ध करना चाहेंगे तो वे नकली हो जाएंगी और अपनी वैचारिक धार खो देंगी। और इसकी लोगों में प्रतिकृया होगी, जो कि जायज होगी, वह अलग।

मेरी दूसरी परिकल्पना यह है कि कुछ लोग पंथ-निरपेक्षता के अर्थों और सिद्धांतों से उतने संचालित नहीं होते जितना ‘ठप्पाकांक्षी पंथ-निरपेक्षता’ (certificate seeking secularism) से। उन्हें किसी समूह विशेष में मान्यता चाहिए कि ‘ये भी पंथ-निरपेक्ष हैं’। ये बार बार ऐसा कहेंगे या करेंगे जिससे लोगों का, खाशकर ठप्पा-व्यापारियों का, ध्यान जाये, जैसे कि कह रहे हों “मुझे देखो-देखो, मुझे देखो, मैं भी पंथ-निरपेक्ष हूँ”। यह प्रवृती हमारे यहाँ बहुत ज़ोर पकड़ रही है। कड़ी बात है, पर यह प्रवृत्ती पंथ-निरपेक्षता को बिना समझे गटक लेने से पैदा होती है।

ये दोनों कोई पक्के दावे नहीं है, बस काम-चलाऊ परिकल्पनाएं हैं अभी। और यह पहचानना बहुत मुश्किल होता है कि कहाँ बे-समझी पंथनिरपेक्षता बोल रही है और कहाँ उसकी ठप्पकांक्षी बहन। माफ करिए, यहाँ कोई जेंडर संबंधी दुराग्रह नहीं है, आप चाहें तो इसे ‘उसका ठप्पाकांक्षी भाई’ कह सकते हैं।

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16 मई 2021


[1] यहाँ एक बात साफ करने जरूरी है। मैं इतिहास का अध्यता या विद्वान नहीं हूँ। और जब मैं किसी तर्क के लिए किसी विद्वान के विचार काम में लेता हूँ तो इस का अर्थ यह नहीं है कि उसकी कही हर बात के लिए प्रतिबद्धता जाहिर कर रहा हूँ। एक ही विद्वान के निष्कर्ष बहुत प्रमाण-सिद्ध और विवेकशील भी हो सकते हैं और उससी के दूसरे निष्कर्ष गलत भी हो सकते हैं। तो मैं जो चीजें प्रमाणित लग रही हैं वेही ले रहा हूँ।

[2] यह इसी लेख के लिए किया गया फौरी अनुवाद है। ““the concept of India as a country was ancient, the assertion made by Perry Anderson in his book The Indian Ideology that the India is a name given by foreigners particularly Europeans in modern times, is a totally misleading statement.”

[3] “The first perception of the whole of India as a country comes with the Mauryan Empire.”

[4] Sthan always means in Sanskrit a ‘particular spot’. But ‘stan’ in Persian is a territorial suffix…”

[5] यहाँ मैं यह साफ करदूं कि मुझे “हिन्दू-वर्चश्व की राजनीति” को “हिन्दुत्व की राजनीति” कहने से ऐतराज है। क्यों कि मेरे विचार से सावरकर के बावजूद ‘हिन्दुत्व’ का अर्थ हिंदूपना या hinduness से अधिक कुछ नहीं है। और हिन्दू होने भर से वर्चश्व चाहने की तोहमत से मुझे ऐतराज है। इसे पारिभाषिक शब्दावली मनाने से भी यह समस्या खत्म नहीं होती।


Will we ever learn to listen and respond?

May 7, 2021

Rohit Dhankar

The fundamental rights related to expression, association and attempting to shape the society according to one’s ideals are not earned, they are granted just by virtue of being born human. They cannot be alienated. Therefore, democracy has to function on listening to all concerns and all thoughts and responding to them with rational arguments keeping fraternal feelings in heart. No matter how obnoxious in your personal opinion the others’ views are.  

Yes, there is selfishness, bigotry, stupidity and even evil in human heart. But if we want to include all humanity in our dreams of peace, justice, freedom and prosperity; we have to deal with all these things with humility and open mindedness. We have to remain open for dialogue; to listen with benevolence in heart and openness of reason in mind. Even to that which we consider evil. Genuine rational dialogue is the only way if, repeat, we want to include all humanity. If we shut our hearts and minds to those we consider bad, fools, bigoted or even evil, we have become too conceited to think of ourselves as custodians of the only truth and guardians of human morality.

Inclusion means taking everyone’s concerns, aspirations and dreams on board and creating something like the Rig Veda aspires for.

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ (Rig Veda, 10:191:4)

“Common is your purpose; common your hearts; let your thought be common, so that it will go well for you together.” (Translated by Stephanie W. Jamison and Joel P. Brereton in The Rigveda: The Earliest Religious Poetry of India. OUP, 2014)

No, our dreams and aspirations are not common. They differ. One sees others dreams and aspirations as unjust and may be bad for humanity. And no, they are not all equally good for the flourishing of humanity. But we have to learn to listen to all of them, consider all of them this concern of well-being of all. And then strive with our reason and love to create common purpose, common heart and common thought, so that it goes well for us all together.

Presently our analysis is marred by categories of ‘my religion’ and ‘other religion’, upper caste and lover caste, leftist and rightist, government supporter and government opponents, and so on. In our arrogance we take these categories as rigid and iron clad; defining property of humans; ourselves and well as of others. This stops us from listening, paying attentions to others concerns and fears, their aspirations and dreams. We simply shun them, call them names and reject them in their totality. Simultaneously, we declare ourselves (on both sides) champions of humanity; and don’t even notice that by demonizing the other, considering the other unredeemable evil, we are rejecting the humanity of the other. And by rejecting humanity in the other we fall from our humanity, unnoticed by ourselves.

People don’t change by shunning, by rejecting, by coercion, fear and force. The only way is to listen and pay head. And remember that we may be as evil on the others’ eyes as s/he is in ours. We have to allow the other to stand on the same ground and use the yardstick of benevolence for all, reason, equality and freedom. In a serious and genuine dialogue, we may discover that the other has a heart that beats the same as ours and s/he was as mistaken about our intentions as we are of his/her.

Complete rejection of the other dehumanizes him/her, once the dehumanization of the opponent is normalized, the only option remains is complete subjugation of the other. Whichever side be successful in this evil project, democracy is lost, and humanity is insulted. We have no way but to learn to listen and respond with reason and love.

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7th May 2021


Some thoughts on Objectivity in Human Thinking

April 29, 2021

Rohit Dhankar

[I stumbled upon this today while looking for something else. This is part of an intense, often heated debate on deciding curriculum for MA Edu in 2013. Here I am sharing only a particular understanding of objectivity. It was a rejoinder to claim that there can not be any objective criteria for deciding which course should be included in Core Course. That decision will depend on the interest of individual faculty only. This note claims that it is possible to have objective criteria in all human endeavours.]

From a pragmatic point of view the notion of objectivity, perhaps, emerged out of the concern that different people ‘see’ a given situation differently; and these differences come in the way of dialogue, cooperation, and action. What makes us see a situation differently may be called our legitimate subjectivity, or idiosyncrasy and/or prejudice.Thus, one way of looking at objectivity could be to oppose it with subjectivity, idiosyncrasy and prejudice. But this already assumes that there is a ‘situation’ (reality, natural or social) which is common to two on lookers, there is something independent of the minds of the onlookers. It also assumes that this reality can be seen as it is, that is truthfully. Therefore, objectivity may assume the notions of reality and truth; and also, the possibility of attaining the truth about that given reality. Now these assumptions about the existence of reality independent of human minds and the knowability of that reality can be challenged. There may be good (objective? Or idiosyncratic?) grounds to challenge both the reality and its knowability.

The denial of the first—reality—is more difficult than the denial of the second—knowability. A complete denial of the any reality independent of our minds gets us into serious trouble. It leads directly to solipsism and involves denial of all other human beings except the subject, which is impossible to deny even if you hate Descartes. Let’s stay with this idea a little. Suppose that two of us—you and me—are standing in front of Parliament House in Delhi and looking at it. I say, “what an ugly building” and you say “not at all, it’s beautiful”. Our disagreement is about an attribute of the building and not about existence of the building. We both are accepting the existence of the building independent of our own minds; what we are disagreeing is about its aesthetic merit. We can generalise from here: we may not be able to agree on the beauty, shape, material it is made of, its size, even it being a building, and so on; but we do agree that ‘there is something out there, independent of both our minds’. We may not know what it is, what its true nature is; but cannot deny that there is something out there.

If you want to deny that there is something there, then you will have to say something like: “what building? I see nothing” in response to my first utterance. I might respond “ok, what an ugly object” and you might respond “what object? There is nothing there”. Then one of us is deluded. But even here there is a lot we both are admitting, and independent of our own minds to boot. We are admitting that we hear some sounds, that there is a common understanding of language—beauty, object, ugliness. If you want to insist that all this is entirely in your own mind, then you have to deny my existence. So, there is no dialogue; only soliloquy going on in your own head. End of the other, end of humanity, end of the work; I wish you happy living ever-after in your soliloquy, you have erased my existence!

So, for humans denial of the existence of independent reality is not possible. There is something outside our own minds. If we are debating curriculum in APU with our colleagues then there is something called curriculum, APU and our colleagues. And this existence is independent of our individual minds. This is objective. Objectivity here is not the same thing as reality or truth; this is an approach to truth; an approach which accepts existences of reality independent of our minds.

But what is the use of an objective acceptance of some independent reality if we can say nothing definite about it? It is useless for all our human purposes if its true nature is unknowable. It can in no way be used to decide our curricular issues or nay other issues in day-to-day living. But we have listened only to the first half of the story. We have been looking outside ourselves; ignoring our subjectivities. There might be something that provides a foot hold to objectivity right within out subjectivities. Let’s explore that next.

I notice that this discussion is becoming too long; so will directly jump to three fundamental characteristics that we all share and that can be used to construct markers of objectivity; if not the objectivity itself just yet.

One, we use language; and strangely understand each other; though not perfectly but enough to carry a conversation, express intentions, cooperate, quarrel, express love, express hate, help each other and to kill each other. We may deny that we perfectly understand each other through language but cannot say that we do not understand at all; if we do that, writing letters to faculty and debating curricular issues would be downright stupid; holding classes and creating the whole educational paraphernalia would be a first class folly; that is, in case the meaning of folly itself survives! Language includes not only commonly understood (imperfectly, I will not repeat it again and again) words, but also grammatical rules to use them in conjunction with each other to construct very complex meaning. And more, it includes criteria to judge whether a word is used appropriately or not; this is in addition to the grammatical rules. It contains the germ of notion of truth. This makes it possible for us to think and communicate that thought to others. Something even stranger: thoughts in all human languages seem to be translatable from one to another; again, not perfectly but good enough to communicate, cooperate, care, love, hate, fight and kill. So, there is something across the humanity that binds us together. Though it might be created by our own minds over the eons, it acts as independent of any particular human mind. It is common heritage of all humanity; and to use the hated word—it is universal in humanity. Too bad for nay sayers to anything universal, but cannot be helped. I understand that the language not only binds together, it also divides humanity. But please realise that it could not have been able to divide if it did not have power to bind together. This is a package deal; lets reap the benefits of it and try to mitigate as far as possible its evil effects.

The second, (I am not listing them in any order of priority), characteristic seems to be the availability of various forms of sensibility. We all have only five senses, normally speaking. And each sense gives us certain kinds of impressions of the common reality we live in. This gives substance to our concepts, our thoughts. And since the senses in their fundamental forms are universal across humanity, they provide a basis (only basis) for inter-subjective comparability and agreement across humanity. We just bumped another another hated universality!

The third characteristic is the capabilities of our minds to organise the sense impressions we receive from our senses and create meaning (with the help of language of course). We do seem to accept some common ways of thinking; our minds, at the most fundamental level, seem to work on similar lines. For example, it is not possible for human mind to accept both p and not-p simultaneously. (Example: p = “the earth exists” not-p = “the earth does not exist”.) Human mind is incapable of annihilating space, human mind if incapable of unthinking the self (unthinking is not the same thinking as ‘not thinking about’). Under the force of several such things human mind recognises undeniable conceptual connections. The third hated universality we are incapable of getting rid of. Let’s call this one logic, in a rough sense, a better word would be reason, if acceptable to those who deride reason day-in and day-out.

So, we have four (at the least) niches in human nature[1] itself which could be used to construct markers of objectivity and then finally construct a workable notion of objectivity. A first and rough formulation of these markers could be as follows:

  1. Universal capability of humans to have a Language. “L” is capital here to indicate it is not a particular language like Hindi, English, Kannada or Chinese. But a natural Human Language.
  2. The greater the inter-subjective agreement (expressed largely through language) greater the objectivity.
  3. The greater the intra-subjective and inter-subjective logical consistency the greater the objectivity.
  4. The greater the intra-subjective and inter-subjective agreement in sense perceptions the greater the objectivity.

In using these criteria we have to remember that number 2 without support form numbers 3 and 4 does not constitute objectivity at all. In a given community—which can be very large—lots of people may agree that the earth is cuboid, or that Krishna projected his virat-swaroop in Kaurava’s Raj Sabha, or that Muhammad met archangel Gabriel in the cave. Without appropriate support from criteria 3 and 4 mare agreement will not constitute objectivity of these claims. Yes, it will give strength to belief of the members of that believing community. But humans are perfectly capable of holding wrong beliefs very strongly or even fanatically. Thus, it seems these criteria act in conjunction with each other; and I think that the criteria 3 and 4 are more important.

This rough (to be improved upon someday) formulation forces us to forgo our hankering for absolute objectivity, but gives us something good enough to work with. We will also notice, if pursue the issue further, that limits of achievable objectivity in different human affairs might differ. In mathematics and science these limits may be very high; in social sciences we may have to live with relatively weaker objectivity; and in ethics and aesthetics the matters might be even more complicated. But in each area of human understanding we seem to be able to create workable notions of objectivity.

The fundamental basis of this kind of construction of objectivity is common reality we live in, high degree of similarity in our sense perceptions and high degree of similarity in our rational faculty.

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Slightly edited on 29th April 2021


[1] I know some will jump and accuse me of assuming universal human nature, and say that it is impossibility. I believe I have partially answered the possible challenge and rest could be dealt with when it comes. But yes, I do believe that there is such a thing as universal human nature.


पढ़ने-लिखने की कमजोरी का बुनियादी संकट

April 25, 2021

रोहित धनकर

शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंता जाहिर करते रहना अब हमारी राष्ट्रीय आदत बन गई है। और इस कोरोना-ग्रसित वर्ष में तो यह करेलन नीम चढ़ गई है। अब तो बच्चों को सीखने के जो अवसर—जैसे तैसे भी—विद्यालय उपलब्ध करवाते थे वे भी बंद हो गए हैं। पर यह छोटा आलेख इस बड़ी समस्या के एक छोटे बिन्दु से संबन्धित है, पूरी समस्या से नहीं। बिन्दु छोटा है पर बुनियादी भी है। शिक्षा की गुणवत्ता की सब से अधिक चर्चित समस्या विद्यालयों का पढ़ना-लिखना सब बच्चों के ठीक से न सिखापाना है। पढ़ना-लिखना अपने आप में शिक्षा का एक महत्व पूर्ण हिस्सा तो है ही, जो बौद्धिक विकास के असीमित रास्ते खोलता है; पर साथ ही किसी भी तरह की शिक्षा ग्रहण करने के लिए भी यह मूल शर्त है। इसी लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बड़ी बेचैनी से कहती है कि “सीखने की बुनयादी आवश्यकताओं (अर्थात , मूलभूत स्तर पर पढ़ना, लिखना और अंकगणित) को हासिल करने पर ही हमारे विद्यार्थियों के लिए  बाकी नीति प्रासंगिक होगी।” अर्थात इन चीजों के ठीक से न सीखपाने से तो यह सारी नीति अधिकांश बच्चों को कुछ भी लाभ नहीं पहुंचा पाएगी। अतः इस शिक्षा नीति के अनुसार “शिक्षा प्रणाली की सर्वोच्च प्राथमिकता 2025 तक प्राथमिक विद्यालय में सार्वभौम मूलभूत साक्षरता और संख्या-ज्ञान प्राप्त करना होगा।” मोटे तौर पर मूलभूत पढ़ना-लिखना सिखाने के बारे में हमारी सहमति शिक्षा नीति से यहीं तक है। बाकी सुझाए गए अधिकतर तरीके शायद ही कारगर हों।

इस समस्या के बहुत से कारण हैं। पर यहाँ मैं सिर्फ एक कारण—विद्यालयों में सिखाने के तरीकों—की बात करना चाहूँगा। और इस पर सोचना आरंभ करने के लिए यह लंबा उद्धरण प्रस्तुत है: “बहुत से लोग वर्तमान समय में बहुत गंभीरता से पढ़ना सिखाने का  सर्वश्रेष्ठ तरीका ढूँढने में, उधार लाने में या ईजाद करने में लगे हैं। और बहुतसों ने तो यह सर्वश्रेष्ठ तरीका ईजाद कर भी  लियाहै, ढूंढ लिया है। साहित्य में और जीवन में भी हम बहुत बार यह प्रश्न पढ़ते-सुनते हैं: आप किस विधि से पढ़ाते हैं? मैं स्वीकार कारता हूँ (कुछ अपराध बोध के साथ) कि यह सवाल अधिकतर वे लोग पूछते हैं जो बहुत कम शिक्षित हैं और जो एक लंबे समय से बच्चों को पढ़ाने का काम एक धंधे की तरह से कर रहे हैं। या फिर वे लोग पूछते हैं जो अपने अध्ययन-कक्षों से सार्वजनिक शिक्षा के साथ सहानुभूति दिखाते हैं। ये लोग इस सामाजिक सरोकार में मदद करने के लिए लेख लिखने को भी तैयार हो जाते हैं और पढ़ना सिखाने के लिए सर्वश्रेष्ठ विधि पर लिखित पुस्तक छपवाने के लिए योगदान के लिए भी। या फिर वे पूछते हैं जो अपनी ही विधि को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और उसके लिए बहुत पक्षपाती हैं। या फिर, अंत में, वे लोग जिनका पढ़ाने से कोई संबंध कभी रहा ही नहीं। और आमजन वह दोहराते हैं जो बहुमत कहता है।” इसके बाद लेखक विधि की समस्या के अलावा कुछ चीजों का जिक्र करते हैं और आगे कहते हैं: “यह सामाजिक-व्यवहार (फेनोमेना) खतरनाक है, क्यों की यह हमारे सार्वजनीन शिक्षा पर बने अभी अपरिपक्व विचारों पर और धुंध चढ़ा देता है।”

यह बहुत जल्दी में किया गया काम चलाऊ सा अनुवाद है, पर बात साफ है। थोड़ा अनुमान लगाइये यह कब और किसने कौनसे देश में लिखा होगा? क्या सब बातों से पूर्ण सहमती ना होते हुए भी यह विधि को लेकर अपने देश में चल रही बहस की झलक नहीं देता? यह टोल्स्तोय ने 1862 में रूस में लिखा था। इसे लिखे 158 वर्ष बीत चुके हैं, हम आज भी सर्वश्रेष्ठ विधि ढूंढ रहे हैं। अब हम शोध-आधारित विधियाँ खोजते हैं। शिक्षा में शोध की अपनी अच्छाइयाँ, बुराइयाँ और सीमाएं हैं। उसे हम अभी यहीं छोड़ते हैं। पर क्या सर्वा-श्रेष्ठ और शोध आधारित विधि के बजाय हमें उदार-चयनशील और कर्म-सिद्ध तरीकों की भी बात नहीं करनी चाहिए? उदार-चयनशील (eclectic) से आशय है कई विधियों में से हमारे संदर्भ के लिए उपयुक्त चीजें लेकर एक सुसंगत व्यावहारिक योजना बनाना। और कर्म-सिद्ध से अर्थ है जमीनी स्तर पर काम करके ठीक से सिखाने में सफलता प्राप्त कर सकने वाला तरीका।

पढ़ना-लिखना सिखाने के एक ऐसे ही सफल तरीके को हम एक ऑनलाइन कोर्स के माध्यम से साझा कर रहे हैं। यह सर्वश्रेष्ठ का दावा नहीं हैं। यह शोध-आधारित होने का दावा भी नहीं है। बस कर्म-सिद्ध और उदार-चयनशील भर होने की बात है, कई सफल हो सकने वाले तरीकों में से एक की बात, ना कि एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ की बात।

पढ़ना-लिखना सिखाने के एक ऐसे ही सफल तरीके को हम एक ऑनलाइन कोर्स के माध्यम से साझा कर रहे हैं। यह सर्वश्रेष्ठ का दावा नहीं हैं। यह शोध-आधारित होने का दावा भी नहीं है। बस कर्म-सिद्ध और उदार-चयनशील भर होने की बात है, कई सफल हो सकने वाले तरीकों में से एक की बात, ना कि एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ की बात।

कोर्स के बारे में कुछ और जानकारी

25 अप्रैल 2021


Asymmetry and lack of information are the reasons Mr. Patwardhan

December 5, 2020

Rohit Dhankar

Mr. Anand Patwardhan’s article in The Indian Express is a well written informative article, which raises a very important question. This question has two parts:

  1. Why is Faisal Khan, a human rights activist, in prison for an act of peace?, and
  2. What explains Hindutva’s rage against Faisal?

Faisal Khan offered namaj to Allah in a temple in Mathura, the priest lodged a complaint and Faisal was arrested. Mr. Patwardhan’s article is raising these questions on the outcome of this incident. I will dispose off the first question first: why Faisal should be in jail for offering namaj in a temple? The direct and clear answer is he should not be. This is a motivated and unjust act, which is against the ethos of India, Indian constitution and Hindu-dharma.This is an act of injustice under public pressure, and possibly present day UP government’s unreasonable attitude to religious issues is also playing a part in it.

But the second question Mr. Patwardhan raises is more important and is not considered seriously by Indian intelligentsia. Even Mr. Patwardhan raises this question more as a rhetorical device to automatically indict what he calls ‘Hindutva’. He neither offers any analysis nor any insights into it. Though he offers a supposed to be ‘clue’ in Badshah Khan’s answer to why the original Khudai Khidmatgars suffered worst “massacres and persecutions” at the hands of the British. Badshah Khan’s answer, according to Mr. Patwardhan, being “because the British thought a non-violent Pashtun was more dangerous than a violent one”. Mr. Patwardhan wants to apply the same logic to the present situation.

This may have been true in the case of Badshah Khan and original Khudai Khidmatgars, but to offer it as an explanation of so-called “Hindutva’s rage” in Faisal’s case is less of a reasoned argument and more of emotional appeal to the respect and affection thinking Indians have for Badshah Khan. It works as a device to avoid thinking about present day communal problems in India. A full analysis of the issue will require perhaps several articles seriously analysing concepts like ‘Hindutva’ and ‘Brahmanism’, and their pernicious use in political discourse today.

Without getting into the longer discourse, however, I would like to hint at three very simple reasons worth exploring further.

First, there is a very serious asymmetry in Islamic and Hindu thinking on religious matters that reflects in behaviour of people. In the context of the issue being discusses, as far as religious thought goes, and the way most of the Hindus think there are no theological strictures against offering namaj in a temple. But one cannot offer an arati in a mosque. And that rejection of arati or pooja in a mosque is at the level of theology as well as the thinking of a common Muslim; thought I am not as certain regarding the thinking of a common Muslim as I am about the theological part of it.

I feel, at present may not have any strict proof, that if there were any possibility of offering an occasional pooja in a mosque most of Hindus will have no objection to offering an occasional namaj in a temple. In the presently surcharged communal atmosphere and due to this asymmetry, offering of namaj in a temple can very easily be interpreted as a kind of taking over, or at the least sharing unequally the temples, but keeping mosques exclusive. This exceptionalism is the problem.

This asymmetry runs deep. One would hardly find a human rights activist who is a Hindu and is particular to do his arti or pooja on prescribed times wherever he happens to be. And it would be even a rarer one who would like to express communal harmony though doing pooja in a mosque. There is no blame involved in these remarks, these are the ways of thinking and general spontaneous behaviours of Hindus and Muslims. And they have their right to their respective beliefs and thinking. When due to various reasons people become aware of these differences and start analysing the fundamental asymmetries become visible and naturally start bothering people.

Such asymmetries are one of the main reasons for worry of many Hindus caused by Hindu girls marrying Muslim boys. Without going into details, a Hindu (man or woman) may marry a non-Hindu without conversion as per her religious tradition, but a Muslim cannot. Also, due to punishment for apostasy a Muslim can not convert easily. Conversion is much easier for a Hindu for many reasons. This situation results an open-minded Hindu converting to Islam, and only rarely to a Muslim converting to Hindu-dharma.

Another problem cause by this asymmetry in openness in discourse on religion is the periodic eruption of communal problems for so-called insult to this or that religious figures. An article in OpIndia today quotes Saif Ali Khan saying  about an upcoming movie that “… we will make him [Ravana] humane, …, justify his abduction of Sita”. The Hindu mythology has aften been reinterpreted. Duryodhana is presented in positive light, Karna is justified in literature; and Mahabharata itself has enough room for this kind of interpretation. Similarly, in some not very well known attempts Mahishasur is portrayed in positive light and Durga is shown as marrying him to finally deceive and kill. Another example of is Aubrey Menen’s Ramayana that describes Sita herself going with Ravana in a bargain to save lives of Rishis who were being killed by Ravana’s soldiers. In this retelling of Ramayana Sita also admits sleeping with Ravana without being forced. The point I am making is that Hindu mythological texts—which are considered by large section of Hindus as holy scriptures—have a tradition of various retellings and interpretations. And in my view, this is a healthy tradition, Hindus should keep it alive.

But I am also certain that Saif Ali Khan’s remarks, and if the movie turns out to be as he claims, will raise controversy and anger.

Again, I think that the very significant part of this intolerance of such retellings is because of the asymmetry I mentioned above. Any comment, analysis and reinterpretation of Muhammad and Islamic thought generates huge anger and triggers riots and murders. Because of the past experiences of Rangila Rasul, The Satanic Verses and many other incidents no one explores hints available in Islamic history about Ayesha’s relationship with a camel driver or Muhammad’s killing of Jewish tribe. Thus, some Hindus feel that their religious figures could be reviled, but one can say anything of Islamic figures.

One can build an argument that, well, Hindu-dharma has that tradition of toleration to showing of their religious figures in ‘bad light’ but Islam does not. So, one should behave accordingly. The problem in this argument is that all religions are also political ideologies, identity building instruments and tools for attempted hegemony. These things have come on surface much more starkly in the current atmosphere. Thus, the tradition of openness can easily be used in loosening the faith of one people, and cannot be use for the same purpose for the other group. This makes the playing field unequal. It also reflects in numerous personal encounters of people, where egos flareup. Reflects in power of identity creation and generating unifying issues—right or wrong—and therefore in bid to political power. Thus, either all religions have to be equally open in these matters or equally closed. Asymmetry will not do. If we keep our constitution in mind and safeguard freedom of expression then the only logical course is equal openness, and not being cowed down by any threat of any group. Unfortunately our track record of this fair treatment is abysmally bad.

Two, people perhaps did not know the full story of Faisal Khan. If they knew, and were properly informed, about Faisal’s track record of harmony, it seems to me there would have been less public support to the people who want to punish him. However, here I am taking Mr. Patwardhan’s account of his work and intentions as accurate. (The problem is in the present atmosphere at least I am left with very little trust in whatever is published. This is because of the experience of people’s cherry picking and distortions in their writing. There are hardly any exceptions these days; be they right-wing, left-wing, liberal, non-liberal, or whatever. Without any prejudice to Mr. Patwardhan, I am reading his account of Faisal Khan in this general atmosphere. That is why the cautious comment that I am taking his account as accurate.) Lack of full information can be used for generating rage.

The third reason is complete blackout of any discussion of these asymmetrical issues. Anyone who mentions them is immediately dubbed as communal. In creating public harmony this is extremely important to understand the theological limits of all parties and working out a solution keeping that in mind.

The theological openness of Hindu-dharma is seen a vulnerability by many Hindus in the present day India. I know that there shall be an immediate reaction to my mention of ‘theological openness’ of Hindu-dharma here. But it can not be denied that as far as belief in the divine, ways of offering prayer and adherence to religious rituals is concerned, popular as well as philosophical Hindu-dharma is quite open. Accepting this does not mean closing one’s eyes from the caste problems, various other kinds of rigidities and objectionable elements in Hindu society. But this theological openness coupled with lack of knowledge of their own dharmas among Hindus and the theological-philosophical problem of non-availability of clear criteria for who is and is not a Hindu become vulnerabilities in the face of aggressive identity formation and proselytization. Many of these are internal problems of the Hindu society and Hindu-dharma. Part of the rage is also because of frustration with these problems of their own, being exploited by others.

What is interesting in India is that such problems of religious communities other than Hindus, even if they are because of their perception and not real, are discussed with adequate sensitivity. But when the issues of Hindus come, they are either outright dismissed or attributed to propaganda of Sangh Parivar or, worse still, blamed on some fundamental evil streak in the very idea of Hindu-dharma. A common Hindu in India is as good or bad, wise or ignorant, as anyone else. S/he certainly is more open as far as the religious views and commitments are concerned. Therefore, her perceived problems need understanding and then equally sympathetic attempts to dispel them, in case they be unreasonable. And need to be addressed in case they are reasonable. But the intelligentsia discourse, as said above, is unsympathetic to them. As a result, the pent-up anger.  An alternative discourse on social media is developing to address this issue. Which is often, through not always, unhealthy and unreasonable; but it appealing to people. I feel if the main stream intellectual discourse starts discussing these problem with fairness both anger will go away and the alternative discourse will become more healthy and better informed.

At the end: ff Mr. Patwardhan’s account of Faisal Khan is accurate, then we need more Faisal Khans who can offer namaj in temples. But we also need many open minded religious Hindus who are working for harmony and want to express that through poojas in Mosques.

********* 5th December 2020


Blasphemy: its uses and abuses

November 16, 2020

Rohit Dhankar

These days, again, deliberate blasphemy is becoming a hotly debated topic on social media.  This new wave of interest in blasphemy started after slaying of the French teacher Samuel Paty for showing Muhammad cartoons. This act of mindless bigotry invited President Emmanuel Macron’s tough stand against Islamic terrorism, which, in turn, provoked further Islamic violence in Europe and threatening protest in many parts of the Islamic world. Many Islamic clerics and Muslim politicians supported by large numbers of believers in Islam seem to hold the view that the only punishment for insulting Muhammad is beheading. The underlying message of this attitude is that ‘in expressing your views publicly and debating in your own countries you will have to behave according to standards dictated by us, or we will kill you’. A completely unjustifiable supremacist stand on part of Islam. This is a successfully practiced centuries old, though crude, method of controlling peoples thinking. Limiting discourse is a sure way of controlling thinking, as thoughts develop in conversation in societies.

This tendency, though most pronounced and most violently practiced in Islam, is by no means unique to Islam. All religions and all believers in religious precepts do have this tendency, even if not always practiced so violently. As a reaction another section of people is resorting to mindless blasphemy. I came across some examples on a twitter handle depicting Rama and Muhammad in a homosexual embrace and a similar depiction of Sita and Kali.

The twitter handle announces more ‘art’ like this, involving Hindu Goddess Kali and Muhammad. The person(s) seems to be mainly interested in Islamic religious figures and Hindu gods/goddesses. In my view this is precisely the kind of blasphemy that needs to be avoided and discouraged. By discouraging, however, I most certainly do not mean beheading, trolling, banning or any kind of forcible restriction. All I mean is expressing opinion against such art.

To my mind this expresses only filth of mind. Why do I say that?

When blasphemy is used as a tool against curbing of freedom of expression and action it serves a purpose of widening discourse and making an important point to protect freedom. But when it is indulged in only to test the limits of tolerance of real or pretending believers it creates undue reaction which will eventually harm the openness of discourse.

To use it as a tool against imposition of undue restrictions on freedom of expression one has to make relevant points through it. For example if one makes cartoons of Rama to bring out or critique issues in his preaching, behaviour; or preaching and behaviour of his followers, believers and pretending believers; then it serves a point in the ongoing ideological struggle and discourse. There can be many issues in Ramayana of this nature, depending upon one’s interpretation. One can take Shanbuk’s killing, Rama’s and Lakshamana’s behaviour with Shurpanakha, Sita’s agni-pariksha, Sita’s banishment to forest, and so on.

Similarly, with Muhammad. One can take his bigotry, issues of child marriage, behaviour with his wives and slave girls, his preachings on war-booty, claims of revelation, claims of angels fighting alongside Muslims, necessity of fighting in jihad and so on. This kind of blasphemy will serve the purpose of bringing out issues in Quran and Muhammad’s own behaviour.

But making caricatures of sexual indulgence and imagining other kinds of deliberately insulting caricatures serves no purpose. Of course, one can stretch the point that Quran pronounces horrendous punishment for homosexuality, and therefore, showing Muhammad in homosexual relations is a comment on his preaching on the issue. But in my view, it should be done only if there are any indications of Muhammad himself being inclined to homosexuality, if there is reliable evidence of such acts on his part. Simply because he was against homosexuality does not justify, to my mind, such caricatures. Also, if there is any evidence in mythology (any version of Ramayana) of Rama being inclined to homosexuality it may bring out a point in the discourse.

What I am trying to argue is that the blasphemy regarding religious figures and divinities (prophets, gods, sons and daughters of The God, etc.) should be around the historical or theological evidence. That will help in bringing out characteristics of those figures which arrest discourse and human freedom. And will weaken the arguments of their believers on the basis of authority of these figures. On the other hand mindless juvenile filth will discredit the attempts of useful and positive blasphemy, will create a reaction against it and destroy its power of pungent irony and deep cutting satire.

On the pain of repetition, I am not talking of banning blasphemy or killing for it. All I am arguing for is a thoughtful use that opens up minds and avoiding uses which will finally blunt the weapon itself.

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16th November 2020