Dharma in principle is no ethical wasteland: A rejoinder to Mr. Pavan Varma

November 25, 2022

Rohit Dhankar

This little piece is an initial rejoinder to Mr. Pavan K. Varma’s article in Asian Age. (https://www.asianage.com/opinion/columnists/030922/pavan-k-varma-whither-dharma-in-an-ethical-wasteland.html )

I am no scholar of Hindu-dharma, and Mr. Varma certainly understand these issues much better than I do. I am also not sure if Mr. Varma is writing this in full seriousness. But his piece actually tells us that our civilization is at best amoral if not completely immoral. Presently I do not believe that. However, will try to check proper sources in next week or so if his analysis is rationally sustainable. As it stands, it justifies nepotism (kuladharma), and power play (one’s station). One does not know what “conduct right for one’s age” (ashram-dharma) means? It we take producing children as dharma of a grihastha, it may result in particularly obnoxious conclusion of marital rape if the wife is unwilling!

The problem with his piece is not its claim that too many Indians today seem to behave in a manner that violates dharma, they of course do, and that is condemnable. The problem with his piece is that Mr. Varma claims that ‘that is our civilizational morality’. The puerile question whether a starving to death man taking an apple from another’s orchard is guilty of theft or not, ignores fundamental nature of moral dilemma. A moral dilemma by its very nature is a situation in which a moral agent is forced to choose one of two mutually contradictory values in that situation. In his example these values are ‘preservation of human life’ and ‘not stealing’ (asteya). One has to judge which value is of higher order in the moral code and conduct oneself with minimum transgression of that code. Preserving life here is of greater importance, therefore, the man certainly committed theft, and is guilty of theft in this example. But maybe he saved the greater value ‘human life’, therefore, his conduct is morally justified. It is not justification of theft; it is justification of conduct in a moral dilemma.  

All example he takes from Mahabharata can be explained with the use of ‘preserving dharma’ (let’s say ‘rule of law and righteous conduct by the king’) in the society and telling lies (Yudhishthira), breaking rule (Krishna in killing Karna), and so on. The preserving dharma in the society is higher value than one emergency instance of telling lie or breaking a rule. It is something like shooting a terrorist before he presses the trigger to kill hundred innocent people by a bomb-blast. This is everywhere in the world, not only in Indian civilisation. It is higher duty of a kshatriya to protect innocents from injustice than following a rule which itself is formulated as a practical guide to preserve the same higher duty.

As I said, I am no scholar of dharma, and will try to investigate the issue further. But Mr. Varma’s understanding of dharma in this piece as ‘that which achieves success’ in whatever goal one might have set is not rationally sustainable. The goal itself has to pass the test of dharma. “Preserving right conduct by the king” in case of Mahabharata examples and “preserving human life” in the case of stealing an apple in his example of a starving man, constitute higher order values than the values which were violated. That does not sanction any which goal in the name of kuladharma, varna-dharma or ashram-dharma etc. This is a flowed interpretation.

Similarly, the conclusion that “means need not be morally sanctioned” to achieve a “morally sanctioned goal” is flowed. The means which have lesser degree of moral transgressions that the ‘adharma’ likely to result from a failure in achieving the goal can be justifiably used; according to the same principle of resolving moral dilemma by choosing preservation of higher value. It does not sanction all means. Only those which have lesser moral transgression than the non-achievement of the goal.

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विश्वसनीयता का झण्डा और सच्चाई

November 13, 2022

रोहित धनकर

भाई ये तो क्रेडिबल हिस्ट्री करने का तरीका ना हुआ!

एक अङ्ग्रेज़ी नाम वाली मुख्यतः हिन्दी वेब-साइट है: क्रेडिबल हिस्ट्री (https://thecrediblehistory.com/)। इस पर कई काम की और अच्छी चीजें हैं, जिनकी आज हमारे देश में जरूरत है। यह साइट श्री अशोक कुमार पांडे चलाते हैं। और इस पर उनके बहुत से वीडियो हैं। अशोक जी ट्वीटर पर भी बहुत सक्रिय हैं और उनका एक बहुत बड़ा अनुयायियों (followers) का समूह है, आज कोई 1,70,000 के करीब। अशोक जी ने यह शोहरत मूलतः द कश्मीर फाइल्स का विरोध करते हुए पाई है। अशोक जी के अनुयायी उन्हें सत्य की प्रतिमूर्ती मानते हैं। मुझे इस में कोई शक नहीं की वे अपने वीडियो-दर्शकों, पुस्तक-पाठकों और ट्वीटर अनुयायियों (मैं भी उन में हूँ) को इतिहास संबंधी बहुत से तथ्य उपलब्ध करवाते हैं। और उनका यह काम श्लाघनीय है। इस से उनको विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी, जो की उन का घोषित लक्ष्य है) मिलती है।

पर यह लेख उनकी इस प्रकार पाई विश्वसनीयता के शूक्ष्म दुरुपयोग के बारे में हैं। उन्हें अर्ध-सत्य परोसने में और निहायत ही अतार्किक और गलत व्याख्या करने से कोई परहेज नहीं है, बशर्ते यह उनके उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो। साथ ही उनके अनुयायियों की बढ़ती संख्या और उनके वीडियो की सराहना के चलते वे ट्वीटर पर बहुत ही घमंडी और कई बार बदतमीजी के साथ जवाब भी देते हैं। मैं समझ सकता हूँ कि बार-बार मूर्खता पूर्ण ट्रोल करने वाले को ट्वीटर पर उसी की भाषा में, जो असभ्य या गर्वीली भी हो सकती है, जवाब देने की जरूरत पड़ सकती है। पर अशोक जी, अपना घमंड और अपनी सभ्यता की सीमा कोई ट्रोल ना करने वाला कठिन सवाल पूछले तब भी, या शयद तब ही अधिक, दिखाते हैं। मैं आगे उपरोक्त सभी आरोपों के उदाहरण दूंगा। पर पहले यह साफ करना जरूरी है कि किसी की व्यक्तिगत कारस्तानियों पर टिप्पणी के लिए, छोटे ही सही, लेख की क्या जरूरत है?

ट्वीटर एक सामाजिक-माध्यम (social media platform) है। यह एक लोकतान्त्रिक समाज में चिंतन के मुद्दे उठाने और उनपर अपना मत रखने के लिए काम में लिया जाता सकता है। किसी भी समाज में विचार-विमर्श की जरूरत के पीछे कई मान्यताएँ (assumptioins) हो सकती हैं। मेरे विचार से निम्न तीन मान्यताएँ सर्वाधिक महत्व पूर्ण हैं:

  • यह की समाज में हर विषय पर एकाधिक मत होंगे।
  • यह कि हर कोई दूसरों को अपना मत अभिव्यक्त भी करना चाहेगा और उन्हें अपना मत स्वीकारने के लिए प्रेरित भी करना चाहेगा।
  • यह की यह प्रेरणा किसी दबाव, भय, लालच के बिना विवेक आधारित ही होनी चाहिए, खास कर एक लोकतान्त्रिक समाज में।

अर्थात ट्वीटर पर एक संवाद चलता है, और यह संवाद विवेकशील रहे तभी लोकतान्त्रिक समाज की मदद कर सकता है। संवाद में दो और चीजों की जरूरत होती है: सत्य के लिए प्रतिबद्धता और प्रतिपक्षी से सहृदयता। ट्वीटर क्यों की एक सार्वजनिक माध्यम है और इसमें अनाम भागीदारी की खुली छूट है, अतः यह बहुत असभ्य और झूठ का भी बड़ा आखाड़ा बन जाता है। तो इसे ठीक रास्ते पर रखना यहाँ पर प्रसिद्ध और समझदार लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है। क्यों कि उनके लिए समझदारी पूर्ण संवाद चलाना ट्वीटर पर आने की पूर्व मान्यता है। मैं गलत हो सकता हूँ, पर मुझे लगता है कि एक समझदार लोकतान्त्रिक नागरिक के लिए यह जरूरी है। हाँ, कोई सिर्फ अपना अजेंडा चलाने भर के लिए, दूसरों को भ्रमित करने के लिए, अपना अहम तुष्ट करने के लिए या सिर्फ बदतमीजी के लिए आता है तो उसके लिए ये शर्तें जरूरी नहीं है। पर मैं समझता हूँ कि अशोक जी इन ओछे उद्देश्यों के लिए ट्वीटर पर नहीं है। उनका उद्देश्य, जहां तक मैं समझता हूँ, इतिहास को एक अधिक संतुलित और विवेकसम्मत नजर से देखने की वकालत करना और उसके लिए संसाधन उपलब्ध करवाना है। और यदि मेरा यह मानना सही है तो उनका घमंड, तथ्यों की तोड़-मरोड़ और असभ्य जवाब उनके ही उद्देश्यों के विरुद्ध है। तो समस्या हो जाती है कि उन्हें किस श्रेणी में रखें? इस लेख पर मेहनत करने के मेरे ये कारण हैं, पता नहीं उचित हैं भी या नहीं, पर यह शंका तो मन में रहती ही है। इन विचारों को सब के साथ साझा करने में यह शंका आड़े नहीं आना चाहिए।

अशोक जी के कुछ जवाबों की जांच

मेरा यह दावा नहीं है कि आशिक जी के सारे जवाब ऐसे ही होते हैं, यह भी नहीं है कि उनका बहुतांश ऐसा होता है। पर जितने होने स्वाभाविक माने जा सकते हैं उन से ज्यादा होते हैं। तो अभी सब से ताजा इदाहरण से आरंभ करते हैं।

घमंड

ट्वीटर पर @news24tvchannel की तरफ से राजनाथ सिंह की यह टिप्पणी आई: “सुभाष चंद्र बोस अविभाजित भारत के पहले प्रधानमंत्री थे”।

@Ashok_Kashmir : “अगर Government in Exile को पहली सरकार मानना है तो फिर राजा महेंद्रप्रताप पहले राष्ट्रपति और हबीबुल्लाह पहले प्रधानमंत्री थे। दूसरी निर्वासित सरकार जो बनी सुभाष उसके प्रमुख हुए। प्रोफ़ेसर रहे हैं आप फ़िज़िक्स के, तो हिस्ट्री में भी WhatsApp तथ्यों की उम्मीद आपसे नहीं की जाती।” [मेरी टिप्पणी: अशोक जी ठीक याद दिलवा रहे हैं कि पहली निर्वासित सरकार राजा महेंद्रप्रताप की थी। पर इस नतीजे पर भी पहुँच गए हैं कि राजनाथ सिंह WhatsApp तथ्यों पर चल रहे हैं। साथ ही प्रोफ़ेसोर रहने पर कटाक्ष भी। पर यह सब ट्वीटर पर चलता है, कुछ बुराई नहीं।]

@dhankar_r : Replying to @Ashok_Kashmir “Asking because I am not aware. I think Govt in Exile of Subhas Bose was recognized by some countries. Did Raja Mahendrapratap’s govt recognized by any country?” [मेरी टिप्पणी: यह सहज जिज्ञासा का प्रश्न है। क्यों कि कोई किसी के भी द्वारा मान्यता प्राप्त और कतई गैर मान्यता प्राप्त सरकारों में फर्क कर सकता है। अशोक जी ने कोई जवाब नहीं दिया।]

@Ashok_Kashmir : “Typo : बरकतुल्लाह पढ़ें।” [मेरी टिप्पणी: इस ट्वीट को देख कर मुझे अपना सवाल फिर याद आगया, अतः मैंने फिर पूछा।]

@dhankar_r : Replying to @Ashok_Kashmir “आपने अभी तक बताया नहीं उस सरकार को कितने देशों की सरकारों ने मान्यता दी थी? साथ में संदर्भ भी बताएगा।”

@Ashok_Kashmir : Replying to @dhankar_r “मेहनत करो थोड़ी। राजा महेंद्रप्रताप की जीवनी छपी है। उसमें सब डिटेल है।” [मेरी टिप्पणी: यह जवाब नहीं घमंड की अभिव्यक्ति है। और क्यों कि टालने की कोशिश है।]

@dhankar_r : Replying to @Ashok_Kashmir “आप का बात करने का अंदाज घमंडी और अपमान पूर्ण है, पर मुझे जानकारी चाहिए इस लिए पूछ रहा हूं। थोड़ा जीवनी कहां से कब छपी और पृष्ठ बता देंगे तो मदद मिलेगी।”

@dhankar_r : Replying to @Ashok_Kashmir “और मेहरबानी करके जीवनी का लेखक भी बतादें।”

इस का अभी तक कोई जवाब नहीं है। शायद आयेगा भी नहीं आयेगा। पर यह कोई बात नहीं, इतने ट्वीट्स में इस पर ध्यान जाना मुश्किल ही है। पर इस छोटे से संवाद में विश्वसनीय इतिहास (Credible History) की कुछ विवेचना की जरूरत है। शुरू से देखते हैं:

1. एक नागरिक (राजनाथ सिंह, मंत्री होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता) की टिप्पणी को ऐतिहासिक दृष्टि से दुरुस्त करने की कोशिश। [यह इतिहासकार का काम है और जरूरी है।]

2. दूसरे नागरिक (धनकर) की कुछ और सूचना के लिए प्रार्थना। [ऊपर ट्वीटर की भूमिका की विवेचना मानें तो यह आम बात है, और उपयोगी है; अशोक जी के अपने क्रेडिबल हिस्ट्री करने के लिए भी।]

3. जवाब देने के बजाय अस्पष्ट (vague) संकेत और घमंड। जीवनी छपी है: जीवनी या आत्मकथा? किसने लिखी? किसने छापी? पृष्ठ? कुछ नहीं।

[अर्थात इन की बात को बिना प्रमाण के मानलो और आप के पास समय, संसाधन या आवश्यक दक्षता नहीं है तो आप को चुनौती दे कर चुप करवाने की कोशिश। हमारे इतिहास को और उस पर मत को एक दिशा में लेजाने का यही तरीका पिछले कई दसकों से चल रहा है। इतना लंबा लेख इस छोटी सी बात पर लिखने का यही कारण है।]

अब इस घमंड के पीछे का ज्ञान देखते हैं। मैं यहाँ यह स्पष्ट करदूं कि मैं इतिहासकार नहीं हूँ; न क्रेडिबल, नाही डिस्क्रेडिटेड। और मेरी जांच अभी अधूरी है। पर मेरे विचार से ऐसे मुकाम पर है कि औरों की मदद के लिए साझा कर सकूँ।

मैंने राजा महेंद्र प्रताप सिंह की अङ्ग्रेज़ी में लिखी आत्मकथा My Life Story of Fiftyfive years (December 1886 to December 1941) देखी। पुस्तक राजा ने खुद अपनी संस्था World Federation, Dehradoon UP के लिए 1947 में प्रकाशित की। इस पुस्तक में जर्मनी, तुर्की और अफगानिस्तान के शासकों द्वारा उन्हें भारतीय राजाओं के नाम समर्थन (महेंद्र प्रताप सिंह का) पत्र देने का जिक्र है। अफगानिस्तान में आकार उन्होंने 1 दिसम्बर 1915 को प्रोविजनल गोवर्नमेंट ऑफ इंडिया (Provisional Government of India) की स्थापना की। अफगानिस्तान द्वारा चीन, जापान, जर्मनी, रूस, तुर्की, नेपाल और भारतीय राजाओं के लिए वैसे ही पत्र देने का भी जिक्र है। पुस्तक से यह भी स्पष्ट है की अफगानिस्तान का चीन को पत्र उन्होंने चीनी धिकारियों को सरकार के पास पहुंचाने के लिए देदीया। उन्हें चीन में अंदर नहीं जाने दिया गया। उन्हें नहीं पता की पत्र चीनी सरकार तक पहुंचा या नहीं। रूस के लोगों से वे मिले। पर ना तो पुस्तक पत्र देने के बारे में कुछ कहती है, और वहाँ उनकी निराशा को देखते हुए उनकी सरकार को मान्यता देना तो बिलकुल संभव नहीं लगता। इस सारे प्रकरण में उनको परिचय पत्र देने का तो जिक्र है, पर किसी भी देश की सरकार द्वारा मान्यता का जिक्र नहीं है। एक जगह अफगानिस्तान के शासक के साथ किसी संधि पर हस्ताक्षर की बात है, पर उस संधि में क्या था इस पर एक शब्द भी नहीं है। और आखिर में तो अफगानिस्तान सरकार ने उनको विदा ही कर दिया। पुस्तक में पत्रों में क्या लिखा था, लोगों के साथ उनकी क्या बात हुई, कुछ भी नहीं है।

महेंद्र प्रताप सिंह पहले 1912 (?) में अलीगढ़ विश्वविद्यालय के अपने कुछ मुस्लिम साथियों के साथ डॉक्टर अंसारी के नेतृत्व में तुर्की के पक्ष में लड़ने के लिए स्वयंसेवक के रूप में गए थे। जेहाद में बालकन राज्यों के विरुद्ध ओट्टोमन साम्राज्य की मदद के लिए। पर वहाँ उनके मुस्लिम साथियों को तो युद्धस्थल पर जाने दिया पर उन को मुस्लिम ना होने के कारण नहीं जाने दिया, तो मोहभंग अवस्था में वापस आगए। प्रोविजनल गोवर्नमेंट ऑफ इंडिया उन्होंने अपनी अगली यात्रा में बनाई। इस यात्रा में वे बहुत से देशों में भारत की स्वतन्त्रता के लिए सैन्य कारवाई की संभावना खोजने गए। बाकी देशों से बात अफगानिस्तान को अंग्रेजों के विरुद्ध “जिहाद” घोषित करने में मदद के लिए हो रही थी। प्रोविजनल गोवर्नमेंट ऑफ इंडिया इस समूहिक प्रयास के साथ भारत को आजाद करवाना चाहती थी। इस की योजना में उन को समर्थन मिला। पर सब योजना के स्तर पर ही रहा लगता है। उनकी सरकार को मान्यता का कोई जिक्र नहीं है।

मुझे नहीं लगता कि कोई मान्यता मिली होती तो राजा इतनी महत्वपूर्ण बात का जिक्र अपनी आत्मकथा में नहीं करते। तो अभी तो मैं यही मान रहा हूँ कि उनकी सरकार को कोई मान्यता नहीं मिली। पर मैं और स्रोत भी खोज रहा हूँ। कोई निश्चित स्रोत बता सकें तो मदद मिलेगी। असपष्ट कथन “महेंद्र प्रताप का समग्र साहित्य प्रकाशित हुआ है, उस में है”, “उनकी जीवनी प्रकाशित हुई है उसमें हैं”, “उनके एक लेख में है” आदि तरह के दावे तो मुझे क्रेडिबल हिस्ट्री करने के उचित तरीके नहीं लगते।

घमंड और गलत समझ

@Ashok_Kashmir: “चलिए आँकड़े बताता हूँ। मुग़ल काल को अधिकतम जनसंख्या थी 1691 में 16 करोड़। ये साहब कह रहे हैं यह 35 लाख लोग भुखमरी का शिकार थे। यानी 2.1% 2019 में जनसंख्या थी 120 करोड़। ग़रीबी रेखा के नीचे लगभग 8 करोड़। यानी लगभग 6.7% यानी इनके हिसाब से असल में जनता मुग़लकाल में अधिक सुखी थी” [मेरी टिप्पणी: यह क्रेडिबल हिस्ट्री है, आगे देखिये।]

@dhankar_r : Replying to @Ashok_Kashmir “भुखमरी” और “गरीबी रेखा से नीचे” एक ही बात होती है?

@Ashok_Kashmir: Replying to @dhankar_r “हाँ। आप ग़रीबी रेखा की परिभाषा पढ़िए।”

आगे आप इस ट्वीट में देख सकते हैं। https://twitter.com/dhankar_r/status/1510620574078619649

अशोक जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

क्रेडिबल इंटेरप्रेटेसन!!

घमंड और अर्ध-सत्य

एक और उदाहरण इस ट्वीट में देख सकते है। दूसरों को अधूरी बात के लिए दोषी ठहराना और खुद अधूरी बात कहना।

अशोक जी की टाइम-लाइन में आप को ऐसे दर्जनों उदाहरण मिलेंगे। और इसे ये क्रेडिबल हिस्ट्री कहना पसंद करते हैं। मैंने इनका उदाहरण इस लिए लिया है कि इतिहास के साथ चलाने वाली ये विचारधारात्मक व्याख्या चीजों की बहुत अधूरी, कई बार गलत और अपना उद्देश्य पूरा करने वाली व्याख्याएँ सत्य को विकलांग या फिर दफ्न ही कर देती हैं। हमें इस से सावधान रहने की जरूरत है। और यदि आशिक जी किसी शुभ उद्देश्य से इतिहास कर रहे हैं तो उनको भी सावधान रहने की जरूरत है।

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रोहित धनकर

13 नवम्बर 2022


ऋषि सुनक और हिन्दू होना

October 28, 2022

रोहित धनकर

श्री अपूर्वानंद ने ऋषि सुनक पर अपने लेख के साथ ट्वीट किया “ऋषि सुनक का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री होना विनायक दामोदर सावरकर के ‘पितृ भूमि-पुण्य भूमि’ वाले सिद्धांत को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है. अब हिंदू धर्म को भारत की क्षेत्रीयता से मुक्त करने का क्षण आ गया है.” यह हिस्सा लेख का अंतिम और कम महत्वपूर्ण भाग है। पर लेख के प्रचार के लिए अपूरवानन्द ने इसे चुना। पूरा लेख बहुत सी ठीक बातें कहता है, जैसे यह उद्धरण: “ऋषि सुनक का प्रधानमंत्री होना ब्रिटेन के लिए अवश्य गौरव का क्षण है क्योंकि इससे यह मालूम होता है कि ‘बाहरी’ के साथ मित्रता में उसने काफ़ी तरक्की की है. इसमें हिंदू धर्म या उसके अनुयायियों का कोई ख़ास कमाल नहीं है.” यह साफ ही है और सभी जानते भी हैं। ऐसी ही और भी बहुत सी बातें ठीक हैं। पर लेख की ध्वनी लताड़ की है, अपने आप को बहुत विज्ञ मानते हुए सुनक की उपलब्धी पर नाचने वाले हीन प्राणियों के प्रति हिकारत की। यह सिर्फ उनके मत का विरोध या उन्हें सही रास्ता दिखाना नहीं, बल्कि गरियाना अधिक है। पर यह उन की मर्जी, जो हिन्दू इस बात पर नाच रहे हैं उन हों ने अपने आप को इस लताड़ के लिए प्रस्तुत किया है, इस मौके का फायदा उठा कर कुछ लोग उन्हें रोशनी दिखा देते हैं तो उन्हें बहुत दोष नहीं दिया जा सकता।

मेरी इस टिप्पणी का उद्देश्य अपूर्वानंद के कुछ गलत नतीजों और गलत बयानी की तरफ इशारा करना है।

सोनिया और सुनक

अपूर्वानंद को लगता है कि कुछ हिंदुओं (क्या सिर्फ हिंदुओं द्वारा?) द्वारा सुनक और सोनिया कि तुलना को ‘असंगत’ मानना गलत है। उन के अनुसार सोनिया का वैसे ही स्वागत होना चाहिए जैसे ब्रिटेन ने सुनक का किया। (वैसे यह बता दें कि ब्रिटेन में सुनक पर बहुत नस्ल वादी आक्रमण भी हो रहे हैं।) सोनिया के प्रधानमंत्री बनाने का विरोध संविधान की दृष्टि से गलत है। पर सोनिया और सुनक की तुलना भी गलत है। सुनक ब्रिटेन में पैदा हुए, पाले-बढ़े-पढ़े। और शायद उस ने ब्रिटेन की राजनीति और अर्थव्यवस्था में योगदान दे कर अपनी योग्यता भी सिद्ध की। सोनिया इटली में जन्मी, नागरिकता सिर्फ तब ली जब राजीव गांधी के राजनीति में आने के लिए जरूरी हुआ। योगदान कुछ नहीं। अतः, दोनों की कोई तुलना नहीं। यह तुलना सच में असंगत है। पर दोहरा दूँ, यह लोगों में स्वीकार्यता के लिए है। जहां तक संविधान का सवाल है, सोनिया को भारत के नागरिक के नाते कोई भी पद प्राप्त करने का उतना ही हक है जैसा किसी और भारतीय को।

हिन्दू चुने हुए जन?

“हिंदुओं में अच्छी खासी संख्या है जो हिंदू धर्म को विशेषाधिकार प्राप्त धर्म मानती है और खुद को चुने हुए जन. इसलिए वह शेष को उन अधिकारों के योग्य नहीं मानती जो उसे मिलने चाहिए. जो श्रेष्ठतावाद गोरे ईसाइयों में पाया जाता है, हिंदू भी उससे ग्रस्त हैं, इसमें संदेह नहीं.”

यह नितांत कुप्रचार है। आजकल कई हिन्दू अपने धर्म को श्रेष्ठ मनाने की बात जरूर करते हैं। पर वे अपने आपको चुने हुए जन नहीं मानते। “चुने हुए जन” की धारणा ही हिन्दू-धर्म में अनुपस्थित है। यह यहूदी धारणा है जो आगे ईसाइयत और इस्लाम में आई। और आज की दुनिया में मुसलमान इस भाव से सर्वाधिक ग्रसित हैं। कुछ हिंदुओं को अपने धर्म को बेहतर मानने का आधार वे उस की सहिष्णुता और खुलेपन को मानते हैं। यह चुंने हुए जन मानना नहीं है। कहा जा सकता है कि फिर भी कुछ लोग हिन्दू-धर्म को श्रेष्ठ तो मानते ही हैं। पर सोचने की बात यह है कि अपूर्वानंद एक बाहरी अवधारणा को, जो दुनिया में बहुत बड़े खून-खराबे का आधार रही है, हिन्दू-धर्म पर चस्पा करके उसे बदनाम कर रहे हैं।

सुनक का भोजन और गोपूजा

सुनक क्या खाते हैं क्या नहीं, इस से हमें कोई लेना देना नहीं है। बहुत से हिन्दू गौमांस खाते हैं। यह उनकी मर्जी। पर श्री अपूर्वानंद का यह कहना कि “स्वयं सुनक को अपने भोजन के अभ्यास और गोपूजा में अंतर्विरोध न नज़र आए, यह भी स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए” ठीक नहीं है। यह इस बात की तरफ इशारा है कि सुनक गौमांस भी खाते हैं और गौपूजा भी करते हैं, और उन्हें यह अंतर्विरोध नजर नहीं आता। मुझे नहीं पता अब सुनक गौमांस खाते हैं या नहीं। पर उनके अगस्त 2015 में दिये गए एक साक्षात्कार में अंजलि पूरी लिखती हैं “मैं हिन्दू होने के बारे में स्पष्ट हूँ”, वे कहते हैं। उदाहरण के लिए कहा कि वे गौमांस नहीं खाते, “और यह कभी कोई समस्या नहीं बनी।” (“I am open about being a Hindu,” he says. He points out, for instance, that he doesn’t eat beef “and it has never been a problem”.)[1] तो अपूर्वानंद ही जानें वे किस अंतर्विरोध की बात कर रहे हैं।

सुनक, सावरकर और हिन्दू-धर्म

आगे जो अपूर्वानंद जी कह रहे हैं उसकी उन जैसे विज्ञ व्यक्ति से अपेक्षा नहीं थी। उन का कहना है “ऋषि सुनक का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री होना विनायक दामोदर सावरकर के ‘पितृ भूमि-पुण्य भूमि’ वाले सिद्धांत को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है. अब हिंदू धर्म को भारत की क्षेत्रीयता से मुक्त करने का क्षण आ गया है.”

सब से पहली बात तो यही है कि सावरकर हिन्दू-धर्म और हिन्दुत्व में फर्क करते हैं। “हिन्दुत्व हिन्दू-धर्म का समानार्थी नहीं है” (“Hindutva is not identical with Hindu Dharma”)[2] (121) अपूर्वानंद “हिंदू धर्म को भारत की क्षेत्रीयता से मुक्त करने का क्षण आ गया” बताते हैं। लगता है उनके लिए यह क्षण बहुत देर से आया, सावरकर ने तो हिन्दू धर्म को भारत की भौगोलिक सीमा में कभी बंधा ही नहीं। सावरकर के लिए हिन्दू-धर्म उन सभी वैदिक और अवैदिक पंथों को समाहित करता है जिनका उद्भव भारत में हुआ। और पंथ में सावरकर की समझ के अनुसार कोई न कोई मजहबी विचार या रूढ़ी (dogma) जरूर होती है, जो कि हिन्दुत्व की धारणा में जरूरी नहीं है। सावरकर के लिए हिन्दू-धर्म भारतीय-पंथों की समग्रता (Indic religions) है। और वे विश्व में कहीं भी हो सकते हैं। ऋषि सुनक यदि मंदिर जाते हैं, गाय की पूजा करते हैं, तो उनके विश्वास कुछ भी हों उन का आचरण हिन्दू-धर्म के दायरे में है, बिना किसी “क्षेत्रीयता से मुक्त” करने की मुहिम के।

पर क्या सावरकर के लिए भारत की भौगोलिक सीमाएं हिन्दुत्व की भी सीमाएं हैं? उनकी पुस्तक “हिन्दुत्व” के अनुसार तो नहीं। वे इसे स्पष्ट रूप से नकारते हैं। भारत से बाहर रहने वाले हिंदुओं के बारे में वे कहते हैं (मेरा काम चलाऊ अनुवाद) “क्या हिंदुस्थान की सीमाओं से बाहर के देशों में रहने भर से कोई गैर-हिन्दू हो जाता है? निश्चय ही नहीं। क्यों कि हिन्दुत्व की पहली शर्त यह नहीं है कि कोई भारत भूमि से बाहर न रहता हो, बल्कि यह है कि वह या उसके वंशज जहां कहीं भी रहते हों, वे सिंधुस्थान को अपने पूर्वजों की भूमि मानते हों।” (“But will this simple fact of residence in lands other than Hindusthan render one a non-Hindu? Certainly not; for the first essential of Hindutva is not that a man must not ‘reside in lands outside India, but that wherever he or his descendants may happen to be he must recognize Sindhusthan as the land of his forefathers.”[3]

सावरकर के अनुसार तो सुनक सिर्फ हिन्दू-धर्म के दायरे में ही नहीं आते, बल्कि हिन्दुत्व के दायरे में भी आते हैं। यहाँ यह साफ कर दें कि सुनक ने ऐसा कुछ नहीं कहा है, ना उनको हिन्दुत्व का हिस्सा साबित करना यहाँ उद्देश्य है। हम तो बस सुनक ने जो कहा उस पर सावरकर की धारणा लगा कर देख रहे हैं। ऊपर बताए गए साक्षात्कार में सुनक कहते हैं: “मैं जनगणना में ब्रिटिश-भारतीय पर निशान लगाता हूँ, इस के लिए हमारे यहाँ एक वर्ग (category) है। मैं पूरी तरह ब्रिटिश हूँ, यही मेरा घर और मेरा देश है, पर मेरी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत भारतीय है, मेरी पत्नी भारतीय है। मैं हिन्दू होने के बारे में स्पष्ट हूँ,” उन्होने कहा। उन्होने बताया, उदाहरण के लिए कि वे गौमांस नहीं खाते, “और इस से कभी कोई समस्या नहीं हुई।” (“British Indian is what I tick on the census, we have a category for it. I am thoroughly British, this is my home and my country, but my religious and cultural heritage is Indian, my wife is Indian. I am open about being a Hindu,” he says. He points out, for instance, that he doesn’t eat beef “and it has never been a problem”.)

तो सुनक कहते हैं कि वे पंथिंक रूप से हिन्दू हैं, अर्थात उन की कथित पुण्य-भूमि भारत है। उनके पूर्वज भारत भूमि से आए हैं, उनकी सांस्कृतिक विरासत भारतीय है। भारत से बाहर रहने वाले हिंदुओं के लिए सावरकर की यही तीन शर्तें हैं।

हिन्दुत्व की धारणा और हिन्दू-वर्चश्व की राजनीति

(इस लेख का आगे का हिस्सा अपूर्वानंद जी के लेख से संबन्धित नहीं है, क्यों की हम सावरकर की बात कर रहे हैं इस लिए लगे हाथ कुछ और टिप्पणियाँ है।)

क्या हिन्दुत्व की धारणा में गैर हिंदुओं से भेद-भाव की भी धारणा शामिल है? यह सवाल पूछना महत्वपूर्ण है क्यों कि एक पूरी जमात है जो हिन्दुत्व की धारणा पर संसार भर में आक्रमण कर रही है। उसे समूल नष्ट करने के लिए गोष्ठियाँ आयोजित करती है। देखते हैं।

सावरकर की बहू-उद्धृत परिभाषा यह है:

आसिन्धु सिन्धु-पर्यन्ता यस्य भारत-भूमिकाः।

पितृभू पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः ॥

(अर्थ: प्रत्येक व्यक्ति जो सिन्धु से समुद्र तक फैली भारतभूमि को साधिकार अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है।)

सावरकर अपनी पुस्तक हिन्दुत्व में इस का संदर्भ बार बार देते हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं की यह श्लोक सावरकर ने लिखा है। रामसाद गौड़ अपनी पुस्तक “हिन्दुत्व”[4] में इसे उपयुक्त परिभाषा मानते हैं और साथ ही इस बात का भी जिक्र कराते हैं की कुछ लोगों के अनुसार यह श्लोक लोकमान्य तिलक ने रचा है। जो भी हो, यह सावरकर के नाम से ही अधिक प्रसिद्ध है। 

इस पर विस्तार करते हुए सावरकर “पुण्यभूमि” में दो पहलू देखते हैं। एक, मजहबी या पांथिक; कि भारत भूमि पांथिक दृष्टि से उस व्यक्ति की पुण्यभूमि हो, अर्थात उसके तीर्थ स्थान भारत में हों। दो, उसकी सांस्कृतिक भूमि भारत हो। अर्थात भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति मानता हो।

भारतीय संकृति को अपनी संस्कृति ना मानने के कारण और तीर्थ स्थान बाहर होने के कारण ही सावरकर मुसलमानों और ईसाइयों को ‘हिन्दू’ नहीं मानते। जहां तक संस्कृति की बात है, यह सिर्फ हिन्दू मानने की बात नहीं है, और ना ही मुसलमानों में बहुतों के इस संस्कृति को अपनी संस्कृति ना मानने का सवाल सिर्फ सावरकर के मन में था। यहाँ तक कि बहुत से मुसलमानों के भारतीय संस्कृति के प्रति रुख को लेकर जवाहर लाल नेहरू भी पाशोपेश में थे। नहीं तो वे 1948 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में यह सवाल नहीं उठाते। नेहरू ने कहा कि वे भारतीय संस्कृति पर गर्व कराते हैं। और पूछा कि क्या अलीगढ़ विश्वविद्यालय के छत्र भी इसे अपनी ही संस्कृति मानते हैं या वे इसमें अजनबी महसूस कराते हैं? (“I have said that I am proud of our inheritance and our ancestors who gave an intellectual and cultural pre-eminence to India. How do you feel about this past? Do you feel that you are also shares in it and inheritors of it and, therefore proud of something that belongs to you as much as to me? Or do you feel alien to it and pass it by without understanding it or feeling that strange thrill which comes from the realization that we are the trustees and inheritors of this vast treasure?”[5]) हम सब जानते हैं कि बहुत से मुसलमान आज भारतीय संस्कृति के वारिस मानते हैं अपने आप को। पर यह भी सच है कि ज़्यादातर मौलाना और मुस्लिम राजनीतिज्ञ इस संस्कृति को कुछ पराई सी ही मानते हैं। और मुस्लिम समाज के दिमाग पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत है। नेहरू के यह सवाल पूछने का अर्थ है कि सिर्फ हिन्दुत्व को परिभाषित करने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समरसता और विकास के लिए भी सांस्कृतिक जुड़ाव जरूरी है।

सवाल को साफ करने के लिए हमें अपने आप को हिन्दू मानने में, अर्थात हिन्दुत्व की यह परिभाषा स्वीकार करने में और भारत या विश्व में हिंदुओं का राजनैतिक या धार्मिक वर्चश्व चाहने में फर्क करना होगा। अवधारणा के तौर पर यह सिर्फ परिभाषा है, जो  हिन्दुत्व की तीन (पूर्वजों संबंधी, पंथ संबंधी और संस्कृति संबंधी) शर्तें बताती है, कि कौन हिन्दू है, कौन नहीं। वर्चश्व की राजनीति आगे बढ़ कर इस दृष्टि से जो हिन्दू हैं उनकी सत्ता चाहती है, और दूसरों को उस से बाहर रखना चाहती है। तो हम “हिन्दुत्व” एक धारणा के रूप में और “हिन्दुत्व-वादी” एक राजनैतिक विचारधारा के रूप में फर्क कर सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे “इस्लाम” या “इस्लामिक” और इस्लामिज्म (Islamism) में करते हैं।

सवाल यह है: क्या हिन्दू-वर्चश्व हिन्दुत्व की परिभाषा में अंतर्निहित है? मुझे नहीं लगता। कोई अपने आप को इन तीन शर्तों के अनुसार हिन्दू मान सकता है, इन को हिन्दू को परिभाषित करने के लिए महत्वपूर्ण मान सकता है; और साथ ही राजनीति में पूरी तरह से बराबरी और समान अधिकारों को समर्पित हो सकता है। हिन्दुत्व, सावरकर के लिए हिन्दू होने तीन शर्तें; और हिन्दू-वर्चश्व की राजनीति करना दो अलग-अलग बातें हैं। इस लिए जो लोग आए दिन हिन्दुत्व की लानत-लमानत करते रहते हैं, हिन्दुत्व को जड़ से उखाड़ने की विश्वव्यापी मुहिम चलाते हैं, वे वास्तव में हिन्दू होने पर आक्रमण कर रहे हैं। और सिर्फ हिन्दू होने मात्र को, अपने आप को हिन्दू संस्कृति का हिस्सा मानने भर को “हिन्दू-वर्चश्ववादी” ठहराते हैं।

सावरकर और उन की हिन्दुत्व की धारणा पर और भी बहुत कुछ कहा जाता है। यह ठीक है की सावरकर की राजनैतिक विचारधारा में बहुत चीजें हैं जिन का विरोध जरूरी है। पर कुछ तोहमतें गलत भी लगाई जाती है। अतः तीन सवाल सावरकर को लगतार गलियाँ देने वालों के लिए:

  • सावरकर ने कहाँ कहा है की मुसलमानों या अल्पसंख्यकों को हिंदुओं से कम नागरिक अधिकार दिये जाने चाहियें? संदर्भ पुस्तक और पृष्ठ सहित दीजिये।
  • सावरकर ने कहाँ कहा है कि अल्पसंख्यकों को हिंदुओं से कम राजनैतिक अधिकार दिये जाएँ?
  • सावरकर ने किसी के भी जनसंहार की बात कहाँ की है?

ये तीनों आरोप हमारे प्रबुद्धजन सावरकर पर लगाते ही रहते हैं, अतः कोई संदर्भ बता सकें तो मदद मिलेगी।

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२८ अक्तूबर २०२२

रोहित धनकर


[1] https://www.business-standard.com/article/opinion/lunch-with-bs-rishi-sunak-115080601060_1.html

[2] V. D. Savarkar, Hindutva, VEER SA VARKAR PRAKASHAN Savarkar Sadan, Bombay 28. P.121.

[3] ibid 119

[4] रामदास गौड़, हिन्दुत्व, प्रकाशक शिवप्रसाद गुप्त, सेवा-उपवन, काशी, विक्रम संवत 1995, पृष्ठ 7। 

[5] Jawaharlal Nehru’s Speeches Volume one, Publication Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India, 1967, p.335


Who is responsible for two-nation theory?

August 17, 2022

Rohit Dhankar

We keep on blaming Savarkar, Hindu Mahasabha, Sir Syed, Muslim League etc. for originating the two-nation theory. But never look for its roots. Actually, if you really want to understand the origins of two nation theory in India you should look into The Quran. The development can be summarized as follows:

‘A closed exclusive nation’ to ‘Idea of special nation and separate rest of the world’ to ‘Application in India through separation’ to ‘Two nation theory’.

The Quran: I am quoting only two verses. You can find plenty more. To my mind these verses form a permanent disposition of distance, district and ill-will for all non-believers in the minds of the Muslims. And that shows world wide.

 Verse 3:118: “0 you who believe! Take not as (your) Bitanah (advisors, consultants, protectors, helpers, friends) those outside your religion (pagans, Jews, Christians, and hypocrites) since they will not fail to do their best to corrupt you. They desire to harm you severely. Hatred has already appeared from their mouths, but what their breasts conceal is far worse. Indeed We have made plain to you the Aydt (proofs, evidences, verses) if you understand.”

Verse 5:51: “O you who believe! Take not the Jews and the Christians as Auliya’ (friends, protectors, helpers), they are but Auliya’ of each other. And if any amongst you takes them (as Auliya’), then surely he is one of them. Verily, Allah guides not those people who are the Ztilimun (polytheists and wrong doers and unjust).”

Sirhindi (1563-1624): “The honour of Islam lies in insulting Kufr and Kafirs”, Sirhindi was aghast that idol-worshippers had places of honour, when they needed to be kept at arms length, like dogs.” (MJ Akbar, Tinderbox, page 38)

Shah Waliullah (1702-63): “Shah Waliullah proposed a theory of distance and the protection of ‘Islamic purity’ as his prescription for a community that was threatened by the cultural power and military might of the infidel. While he thanked Allah for keeping the blood in his own veins ‘pure’ and ‘Arab’, he recognized that the majority of Indian Muslims were converts from Hinduism; there was enormous cultural overlap in their habits and behaviour. He feared a lapse into Hindu practices among Indian Muslims in the absence of the religious leadership that had been preserved by political power.

Islam could survive in India, he argued, only if Muslims maintained physical, ideological and emotional distance from Hindus. He urged Muslims to live so far from Hindus that they Would not be able to see the smoke from their kitchens.” (ibid, page xii)

Sir Syed: “The English have conquered India, and all of us along with it. And just as we made the country obedient and our slave, so the English have done with us.” (Speech of Sir Syed Ahmed Khan at Meerut, 1988)

“Is it possible that under these circumstances two nations — the Mahomedans and the Hindus — could sit on the same throne and remain equal in power? Most certainly not. It is necessary that one of them should conquer the other and thrust it down. To hope that both could remain equal is to desire the impossible and the inconceivable. At the same time you must remember that although the number of Mahomedans is less than that of the Hindus, and although they contain far fewer people who have received a high English education, yet they must not be thought insignificant or weak. Probably they would be by themselves enough to maintain their own position. But suppose they were not. Then our Mussalman brothers, the Pathans, would come out as a swarm of locusts from their mountain valleys, and make rivers of blood to flow from their frontier in the north to the extreme end of Bengal. This thing — who, after the departure of the English, would be conquerors — would rest on the will of God. But until one nation had conquered the other and made it obedient, peace could not reign in the land. This conclusion is based on proofs so absolute that no one can deny it.”

Notice the pan-Islamism and arrogance emerging out of it. If you think that the Muslim community does not have such people, who harbour same arrogance and pa-Islamism then better read and listen more to Maulanas.

Savarkar: This is the background in which Savarkar is writing.

“A Hindu then is he who feels attachment to the land that extends from Sindhu to Sindhu as the land of his forefathers – as his Fatherland; who inherits the blood of the great race whose first and discernible source could be traced from the Himalayan altitudes of the Vedic Saptasindhus and which assimilating all that  was incorporated and ennobling all that was assimilated has grown into and come to be known as the Hindu people; and who, as a consequence of the foregoing attributes has inherited and claims as his own the Hindu Sanskriti, the Hindu civilization, as represented in a common history, common heroes, a common literature, common art, a common law and a common jurisprudence, common fairs and festivals, rites and rituals, ceremonies and sacraments. Not that every Hindu has all these details of the Hindu Sanskriti down to each syllable common with other Hindus; but that, he has more of it common with his Hindu brothers than with, say; an Arab or an Englishman. Not that a non-Hindu does not hold any of these details in common with a Hindu but that, he differs more from a Hindu than he agrees with him. That is why Christian and Mohammedan communities. who, were but recently Hindus and in a majority of cases had been at least in their first generation most unwilling denizens of their new fold, claim though they might have a common Fatherland, and an almost pure Hindu blood and parentage with us, cannot be recognized as Hindus; as since their adoption of the new cult they had ceased to own Hindu civilization (Sanskriti) as a whole. They belong, or feel that they belong, to a cultural unit altogether different from the Hindu one. Their heroes and their hero-worship, their fairs and their festivals, their ideals and their outlook on life, have now ceased to be common with ours. Thus the presence of thit third essential of Hindutva which requires of every Hindu uncommon and loving attachment to his racial Sanskriti enables us most perfectly to determine the nature of Hindutva without any danger of using over lapping or exclusive attributes.” (Savarkar, Hindutva, page 100)

And no, we may not agree with his idea of a Hindu and certainly not with his idea of citizenship based in Hindutva (Hinduness). But to give the devil his due we have to recognize the historical background, the Muslim politics of his time, the Khilaphat movement that enhanced the Pan-Islamic consciousness and constant riots.

But he also said this: “When once the Hindu Maha Sabha not only accepts but maintains the principles of “one man one vote” and the public services to go by merit alone added to the fundamental rights and obligations to be shared by all citizens alike irrespective of any distinction of Race or Religion …. any further mention of minority rights is on the principle not only unnecessary but self-contradictory. Because it again introduces a consciousness of majority and minority on Communal basis. But as practical politics requires it and as the Hindu Sanghatanists want to relieve our non-Hindu countrymen of even a ghost of suspicion, we are prepared to emphasise that the legitimate rights of minorities with regard to their Religion, Culture, and Language will be expressly guaranteed : on one condition only that the equal rights of the majority also must not in any case be encroached upon or abrogated. Every minority may have separate schools to train up their children in their own tongue, their own religious or cultural institutions and can receive Government help also for these,—but always in proportion to the taxes they pay into the common exchequer. The same principle must of course hold good in case of the majority too.” (Quoted by Ambedkar, Pakistan, page 138)

Yes, he did want the Indian polity to be dominated by Hindu ideas and ideals. And, again, in view of a secular nation, we may disagree with thius, but we should also note that he wanted equal rights for minorities with guarantee of religious, cultural and linguistic protection. Demonizing Savarkar again and again for an evil which has many roots, and one of those roots, a very virulent one is in the Quran is not fair. Especially when there is a robust tradition among Muslim scholars and politicians of seeing themselves separate nation and a strong desire to dominate and insult the kafir Hindus.

Jawahar Lal Nehru: So, yes we do disagree with Savarkar and cannot determine our polity on the ideas of Hindutva alone, but if he was so unjustified in his misgivings about Muslims, why did Jawahar Lal Nehru, that paragon of secularism, of all people, ask the Muslim students of Aligarh Muslim University on … January 1948: “I have said that I am proud of our inheritance and our ancestors who gave an intellectual and cultural pre-eminence to India. How do you feel about this past? Do you feel that you are also shares in it and inheritors of it and, therefore proud of something that belongs to you as much as to me? Or do you feel alien to it and pass it by without understanding it or feeling that strange thrill which comes from the realization that we are the trustees and inheritors of this vast treasure? I ask you these questions, because in recent years many forces have been at play diverting people’s minds into wrong channels and trying to pervert the course of history. You are Muslims and I am a Hindu.”

The present-day politics and our ideology should not blind us. We do need an answer to Nehru’s question. Yes, many open-minded Muslims have answered that question in affirmation most emphatically. But are we certain that the Muslim community as a whole has answered that question yet?

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17th August 2022


Free speech, Nupur and Zubair

July 26, 2022

Rohit Dhankar

[This is a personal response to a particular person. May not be of public interest. Posting on blog because tweeter can not handle detailed response like this.]

I am inclined to do a little commonplace analysis in this write-up. Nothing profound or great. The only reason I am indulging in it is that this kind of conversations are too common on social media and there are some very common fallacies in such thinking. Since these fallacies are very common, they merit some discussion even if at a common sense, and intellectually not really of great importance.

This analysis is on a small twitter exchange between me and an acquaintance. Since the conversation is already in the public space, I am taking liberty of quoting in full here and then analyzing without asking for permission of the other participant. I have left the spelling mistakes in tweets as they are, without editing. Parts of tweets I am using will be given in quotation marks “”, and text written now without quotation marks. The letter numbering [a], [b], etc. is done for the sake of analysis and was not part of the original tweets. In spite of my involvement in this conversation, the real objective here is to see the character of conversation and the kind of arguments used, not any kind of explanation.

Rohit: [a] “If @zoo_bear is you icon of free speach, you do not know what free speach happens to be. Period.”

[a1]: Here I am stating that Zubair can not be an icon of free speech. My reason would have been obvious to any one who have been reading my tweets. The objection is not to Zubair’s tweets which some people considered insulting to Hindu gods. Actually I supported that part as his right to free speech. My reason was that Zubair himself used tweets to ridicule Hindus and their gods, but when Nupur did the same he campaigned internationally to draw attention to supposed to be insult to Muhammad. This shows his double standards, therefore, any one who considers him an icon of free speech does not understand that free speech votaries have to give this right to all. They can not themselves enjoy this right and object to others having the same right.

[a2] Also it is useful to note that here my comment is directed to a group which campaigned for Zubair, not to any individual. This distinction matters in free speech as well as in civilized conversation.

zafar: [b] “U supported Nupur’s speech in ur tweets. If u think that was free speechthen u also don’t know what free speech is.”

[b1]: Here Zafar is claiming that if I supports Nupur then I do not know free speech.

[b2]: Also note that here he is directly attacking me as an individual. Compare it with [a2] above.

Rohit: “Yes, I supported Nupur and what she said. I also supported Zuber’s tweets. Can you tell me why I dont understand what free speech is? More directly: [c] why supporting Nupur shows lack of understanding of free Speech?”

[c]: The question here is: why supporting Nupur shows lack of understanding or knowledge of free speech? (The further analysis is keeping this question in mind.)

Zafar: 1. [d] “In ur tweets u were critical abt zubair u even wrote that icon wala tweet”

[d]: That is true. I was critical of Zubair but because of his double standards and not for his tweets.

Zafar: [e] “but on Nupur u were more soft snd even u retweeted a tweet mentioning she said truth.”

[e]: I wrote an article on this. I felt no need to be critical of Nupur on the issue of free speech, as I don’t consider her to be in the wrong. Also, I proved with references that what she said was true according to Islamic scriptures. And I supported Nupur’s right to free speech as a citizen, did not consider her any kind of paragon of free speech as the so-called liberals made out of Zubair.

Zafar: “Yes in ur article u wrote for both on similar points 👍”

Zafar: [f] “Free speech is also not absolute. In our constitution there is space for control if it conflicts with others’ liberty or [g] if it can create troubles in the country. [h] Practicing Faith is also free & [i] “her way of speaking so called truth against prophet was not in a normal conversation’s tone.”

There are three points here I will take them one by one:

[f]: Yes, free speech is not absolute. But (i) what Nupur said did in no way interfered with any one’s liberty. (ii) Interference with liberty with “speech” I found no where in the legal provisions. However, while thinking about free speech I do not accept article 295A which came after the Rangila Rasool controversy. I know that is legal provision and I can be punished for violating it. But in my thinking I consider Satanic Verses, Aubrey Menen’s Ramayana, Rangila Rasool, Charlie Hebdo cartoons, Danish cartoons, many pictures about Durga, Sita, Rama, Mahishasur, etc. within free speech. However, this can not be used to charge that I do not understand free speech. It only shows that my limits are wider than accepted in India. It involves to bias, contradiction and double standards. In this particular case I don’t even think that Nupur can be punished even under 295A. Because she referred to what is written and is often repeated by Islamic scholars themselves. I think this is pure pretension on the part of some Muslims. And I find it very difficult to understand how educated intelligent people can hide behind saying it aggressively or in national debate. I myself find Muhammad’s story of riding a horse like animal to heaven unbelievables.

[g]: “if it can create troubles in the country”: This is very spacious ground. The recent events (killing of at the least two people) prove this. Even saying that “I support Nupur” can be seen as creating trouble, as two people are already killed for this. And it continues. This can be used by bigoted people to subdue and silence citizens. I find it bizarre that people who shout about civil liberties from roof tops justify pretended outrage on such issues.

[h] “Practicing Faith is also free”. Sure, but Nupur’s statements did not interfere with any one’s practicing his/her faith. Actually, this is an example of trying to control others in the name of one’s faith. If I consider Rama as maryada-puroshottam that is my thinking. How can I stop you from saying that Rama killed Shambuk? If you consider Muhammad as an example of great human being, how can you stop me from saying that he married a six year old girl?

[i] “her way of speaking so called truth against prophet was not in a normal conversation’s tone.”

True. It was not. But she is not obliged to respect Muhammad because Muslims do. What she said was not “so called truth”, it is written in Quran and Bukhari, it is true enough. If she said it in an attacking manner, which she did, it can be considered rude and uncivilized. But not violation of any law. Also, Rahmani was doing the same in a more sophisticated manner. Though the ‘paragon of free speech’ Zubair edited that out in his propaganda.

Zafar: [k] “Its like if someone taunts someone about reality of his/her mother & father in a ridiculous way then it can offense someone. Faith is like that.”

[k]: This one is important and most common fallacy. First, lets try to understand the difference between a private citizen (someone’s father) and a public figure (Muhammad). One, a private citizen’s views and acts have limited impact on people’s lives, only on those who come in direct contact with him. Two, in case of a private citizen we are either in face to face contact or may come in direct contact. Thus, a private citizen can not be publicly criticized, and can not be insulted. One has to be civilized with him/her. A public figure, say Muhammad or Ram, is used to preach certain kinds of behaviors at a mass scale. Therefore, their acts, examples, and views will effect every citizen’s life. That gives every citizen a right to criticize, ridicule, make fun of and even insult them. This comparison of one’s parents and religious figures stems out of fallacious thinking. It is too common, at least educated and intelligent people should not use it. It does not matter if someone considers Rama or Muhammad more dear than their parents. The issue if not the devotee’s feelings. This issue is impact of their preachings on others’ lives.

Also, if X goes to Y uninvited and says “My father is such a great man.” Then Y immediately gets the right to quote X’s father’s misdeeds if there are any. The people who do not like Muhammad criticized should not praise him publicly, should not give examples of his behavior publicly, should not say that Quran (created by Muhammad) is given by Allah and is eternally true. If these claims are made publicly they will be criticized publicly. Same goes with Rama and Krishna, and Veda and Ramayana and so on.

Zafar: “Bt i believe that her way was right or wrong that should b decided by court.”

Zafar: [l] “But we clearly know that in zubair’s case police was proactive to take action so both cases r not on same platform.”

[I]: Irrelevant. My tweet was not about biases or favoritism of the government. It was only about Zubair being a bad example for champion of free speech. It could be easily proved that (i) he is biased, (ii) uses double standards, and (iii) even have spread fake news.

Conclusion:

(i) The direct attack early in the tweets is uncivilized.

(ii) The charge of not knowing free speech is unsubstantiated.

(iii) The support advanced to charge in (ii) does not stand.

People who want to use social media for democratic discourse should follow better standards of conversation.

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26th July 2022


Truth and True

July 25, 2022

Rohit Dhankar

A friend on FB (Sachin) tagged me, among others, to a post, in which he posed the following two questions:

“This says that “Truth” and “True” not the same. Then other questions coming to my mind,

1. How do you differentiate Truth/True from “Reality” and “Fact”?

2. When we discuss JTB Account in Epistemology, what do we refer to: “Truth” or “True”.”

It refers to the following picture:

Pic 1                                                                                                                                                          

First let’s take Sachin’s questions:

He mentions four concepts “Truth”, “True”, “Reality”, and “Fact”.

The Context

Our concepts and language functions in a context. By context here I mean the background ideas, assumptions, beliefs and so on. The four concepts mentioned by Sachin here require a background to understand, discuss and talk about.

We have to necessarily imagine a “mind”, which is thinking about these concepts. These concepts are part of the content of that mind. We cannot deny the existence of at the least one mind, that is our own. Which means at the least one mind which is asking this question ‘exists’.

Let’s be a little graceful and without any justification grant ‘existence’ to other minds with whom we are in conversation. As far as we know there are about 6 billion more wandering about this earth, with whom we can potentially be in conversation.

Pic 2: This shows us

Reality:

The first question we can ask in this context is: are these minds ‘real’, that is do they ‘actually exist’? We assume or believe they do. This is one part of reality. But these minds have ideas, thoughts, images, and so on as their contents. What these ideas are about? What these images are of? Is there anything ‘outside’ these minds? Existing independently of them? Most people believe ‘yes’.

The central meaning of reality is ‘the state of the world as it is’. The totality of all existence. Some people believe that ‘yes, there is a world outside our minds, but we do not know it as it is’. That is, the picture of this world we make in our minds does not exactly match with it as it exists, but is mediated, formed, by our minds. In this sense the reality is the totality of existence ‘as it appears to us’. These two are varieties of reality about actual existence outside our minds.

Pic 3: we are within this somewhere

But there can also be a reality1 that we construct in our minds. For example, Euclid geometry can be seen as a reality constructed through axioms, postulates, definitions, and proven theorems. There is nothing of this which we can call material outside our minds which we experience. All of it is inside our minds but still something of this is independent of our minds. “Independent” here only means ‘which we cannot imagine as we please, it has its own rules’. For example,

If A=B, and B=C, then A=C.

You can deny the italic underlined part of this (A=B, and B=C), but if you do accept it, then the bold part (A=C) can not be denied.

Reality: 1. “The state of the world as it is”.  2. “The state of the world as it appears to us”.

Reality1: Coherent axiomatic system we construct in our minds.

Fact:

A part of reality under our consideration or focus, as it is. As it actually is.

Pic 4

[The picture is from Epistemology: the theory of knowledge by Daniel Cardinal, Jeremy Hayward,
Gerald Jones]

True:

Let’s consider a statement: “There is a tree in front of my house”. We say this statement is ‘true’ when there is actually a tree in front of my house; if there is none, we say it is ‘false’. We designate a statement true or false. Thus, the term “true” is used to express epistemic status or appraisal of a statement. In other words, ‘true’ expresses is epistemic status of a statement.

Truth:

Property of the content of a statement. Property of a proposition. When the claim made through a statement matches with reality we say, ‘it expresses the truth’. Otherwise, we say ‘what it expresses is not a truth’. The nature of truth in Reality (refer above) and Reality1 differs. This is complicated and admits varieties depending on what is being discussed. In the above proposition (There is a tree in front of my house) it refers to the world outside my mind, for realists, at the least. But there can also be mathematical truths, which refer to axiomatic systems. Truth is that which a true proposition indicates.

The Picture

As far as my understanding goes this picture can be used to make some points with discussion.

However, in itself it is somewhat misleading. What is called TRUTH (C) in the picture I would call ‘fact’ or ‘part’ of reality. A and B are two different perceptions from two different stand points. The issue of true and truth arises only when these two perceptions are articulated in language, through statements. Before that they are just perceptions, from two stand points. Neither true, not false.

Pic 5

Roughly speaking the two corresponding statements could be:

A: “It is rectangular”.

B: “It is circular”.

Where “It” refers to the object C, that is a cylinder.

Recall, the term ‘true’ we use to designate an epistemic status to a statement. Both statements A and B are false. As a cylinder is a three-dimensional object, while a rectangle and a circle are two dimensional. Therefore, they do not match with the reality.

These statements can be modified as below:

A1: From my standpoint it appears to be rectangular.

B1: From my standpoint it appears to be circular.

Now both statements are true. Because what they express corresponds (matches) with the reality as it appears. Notice, now the issue is ‘matching with the perception’ and not with the reality itself. 

One may go further. As one can argue that:

P1: The object appears rectangular from one standpoint. and

P2: Appears circular from another standpoint forming exact right angle (between the lines of sight from both standpoints).

P3: Only a cylindrical object can fulfill both conditions P1 and P2.

Therefore, P4: This object is a cylinder.

Now, P4 is true, what it expresses is the truth. Because it matches with the reality.

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25th July 2022


डर हमें मूर्ख और दब्बू बना रहा है (2)

July 4, 2022

रोहित धनकर

… कल आए आगे

भाग 2: सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

हमारे कथित-उदारवादी और बहुत से राजनीतिज्ञ लगातार कह रहे हैं कि देश में मुस्लिम हिंसक प्रदर्शनों और उदयपुर में कन्हैया लाल की हत्या के लिए नूपुर शर्मा जिम्मेदार है। और अब तो इस चिंतन पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी मौखिक मुहर लगा दी। न्यायालय ने कहा “The way she has ignited emotions across the country. This lady is single handedly responsible for what is happening in the country.” (मेरे द्वारा काम चलाऊ अनुवाद: “जिस तरह से उस ने (नूपुर ने) देशभर में भावनाएं भड़काई हैं, देश में जो कुछ हो रहा है उस के लिए यह महिला अकेली जिम्मेदार है।”) न्यायाधीशों ने और भी बहुत कुछ कहा, पर मैं अपना ध्यान इस लेख में इसी कथन पर केन्द्रित करना चाहता हूँ।

सब से पहले हम यह समझलें कि किसी से यह आग्रह कि “दूसरों को बुरी लगाने वाली बात नहीं बोलनी चाहिए”, सभ्य समाज में व्यवहार कुशलता का और नैतिकता का आग्रह है। जहां तक हो सके इस को मानने में मुझे कोई आपत्ति नहीं लगती। हालांकि इस की भी सीमा होती है। पर “अ” के कथन को “ब” की करणी के लिए “जिम्मेदार” मानना बिलकुल अलग बात है, और इस के निहितार्थ बहुत खतरनाक हैं। यदि यह बात सर्वोच्च न्यायालय में पीठासीन न्यायाधीश कहता है, तब यह एक कानूनी चोला धारण कर लेती है। हमारे सभी कथित-उदारवादी बुद्धिजीवी इस कथन का पक्ष ले रहे हैं। और तो और वकीलों की संस्था बार असोशिएशन भी इस का पक्ष ले रही है। ये सब बहुत खुश हो रहे हैं और उसे सरकार और पुलिस को न्यायालय की लताड़ बता रहे हैं।

यही कारण है की इस छोटी सी बात का मैं यहाँ लंबा विश्लेषण कर रहा हूँ। मेरे पास इस पर न कोई गहन ज्ञान है न कोई महान नैतिक सिद्धान्त, पर इस के तार्किक निहितार्थों को एक साथ देखना मुझे जरूरी लगता है। तभी हम इस विचार और टिप्पणी की गंभीरता और उस से संभव नुकसान को ठीक से देख पाएंगे। यह विश्लेषण भी मैं सिर्फ एक दिशा मेन कर रहा हूँ, इस के निहितार्थ समझने की दिशा में। नूपुर शर्मा के मुकदमे पर इस का क्या प्रभाव हो सकता है यह इस लेख का विषय नहीं है। बस इस कथन या लताड़ के निहितार्थ भर समझना चाहता हूँ।

  1. देश में क्या हो रहा है? नूपुर की टिप्पणी के बाद हुई कुछ चीजें (सब नहीं)
    1. मुसलमानों द्वारा उग्र प्रदर्शन हुए हैं, हिंसक दंगा हुआ है, पुलिस की गोली से दो ( शायद ?) लोग मरे हैं, “सिर तन से जुदा” के नारे लगे हैं, लोगों ने नूपुर को मारने की कासमें खा कर उनके विडियो सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित किए हैं, मारने के लिए दूसरों को उकसाया है, इनाम घोषित किए हैं, नूपुर के समर्थन करने वाले एक व्यक्ती की जघन्य हत्या हुई है, उस का विडियो वाइरल करके और लोगों को मारने का आग्रह किया है, एक और व्यक्ती की हत्या भी नूपुर के समर्थन से जुड़ी है या नहीं इस की जांच चल रही थी। अब यह सामने आया है कि यह भी इसी कड़ी का हिस्सा है, अर्थात दो हत्याएँ हो चुकी हैं।
    1. हिंदुओं द्वारा “कट्टर मुल्लों” को “काटने” ने नारे लगे हैं, श्री राम को नबी का बाप घोषित करने वाले नारे लगे हैं। नूपुर के समर्थन में जुलूस निकले हैं।
  2. सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि इन सब के लिए “अकेली” नूपुर जिम्मेदार है। इसे हम कैसे समझें?
    1. निहितार्थ 1:
      1. मुहम्मद के बारे में ऐसी टिप्पणी से जिसे मुसलमान पसंद नहीं करते, (चाहे वह उन्हीं के शास्त्रों के अनुसार सत्य हो), मुसलमान भड़काते हैं। यह भड़काना या तो एक यांत्रिक क्रिया है, जो बिना सोचे समझे होती है; या स्वाभाविक है। पर दोनों स्थितियों में इस प्रतिक्रिया पर उनका बस नहीं है। क्यों कि उनका बस होता तो भड़कने या ना भड़कने का चुनाव वे खुद कर सकते थे। और ऐसे में ज़िम्मेदारी नूपुर की नहीं भड़कने वाले मुसलमानों की भी होती। इस का अर्थ यह हुआ कि मुसलमान अपने ऊपर बिना नियंत्रण वाले मतारोपित (indoctrinated) व्यक्ति हैं, जिन की व्यक्तिगत चुनाव और अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी की योग्यता या तो विकसित नहीं हुई या फिर खत्म हो गई है।
      1. भड़काने के बाद हिंसा और हत्याएँ भी स्वचालित, बिना आत्म-नियंत्रण के होती हैं, उन पर भी मुसलमानों का कोई बस नहीं हैं। अतः वे जिम्मेदार नहीं हैं।
      1. पर मुसलमान तो हम सब के समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक हैं। और नागरिकता सिर्फ आत्म-नियंत्रण और स्वयं के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की ही होती है। ऐसा नहीं हो तो नागरिक को किसी अभिभावक की जरूरत होती है जो उस के लिए जिम्मेदार हो, उसके लिए निर्णय ले। वयस्क मुसलमान तो स्वतंत्र नागरिक है, हम सब मानते हैं। हम उनके समान अधिकारों की बात कराते हैं, अधिकार बिना ज़िम्मेदारी के नहीं होते।
      1. नूपुर की ज़िम्मेदारी होने की टिप्पणी का यह अर्थ तो कोई भी भारतीय नागरिक नहीं मानेगा, कोई भी मुसलमान नहीं मानेगा। कोई भी कथित-उदारवादी भी नहीं मानेगा, वे तो सदा मुस्लिम अधिकारों की ही बात करते रहते हैं। और मुसलमानों को स्वयं के कर्मों की ज़िम्मेदारी से इस अर्थ में मुक्त करना तो उनके अधिकारों को भी छीन लेगा। जहां तक मैं समझता हूँ, यह अर्थ तो सर्वोच्च न्यायालय भी नहीं मानेगा।
      1. अतः सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का यह निहितार्थ तो नहीं हो सकता कि मुसलमान अपने कामों के बारे में सोच कर निर्णय नहीं ले सकते, कि उनका अपनी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण नहीं है।
    1. निहितार्थ 2
      1. मुसलमानों में अपने कामों और कथनों का चुनाव करने की और उनपर नियंत्रण की योग्यता तो सभी इंसानों, भारतीय नागरिकों सहित, जैसी ही है। पर मुहम्मद पर टिप्पणी से उनको गुस्सा आता है, गुस्से में वे हिंसा करते हैं, हत्याएँ भी करते हैं।
      1. ये हत्याएँ और हिंसा उन के धर्म-शास्त्रों के अनुसार जायज ही नहीं बल्की अनिवार्य हैं। इस लिए उनको यह करने का हक़ है। तो ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति की (नूपुर की) हुई जिसने इस जायज गुस्से, हिंसा और हत्या को आरंभ करने वाली टिप्पणी की। यही हिंसा करने वाले मुसलमानों की भी मान्यता है।
      1. यदि यह निहितार्थ मान्य है तो 1929 (?) में राजपाल की हत्या से लेकर आज तक नबी और इस्लाम की शान में गुस्ताखी के नाम पर जितनी हत्याएँ हुईं वे सब जायज हैं, उन में मुसलमानों का कोई दोष नहीं है। आगे यदि मुसलमान किसी बात/कथन पर नाराज हो जाते हैं, और कथन करने वाले या उस को समर्थन देने वाले की हत्या कर देते हैं, तो यह उस व्यक्ति की स्वयं की ज़िम्मेदारी है। मुसलमानों की नहीं।
      1. अर्थात भारत के नागरिकों को इस्लाम से संबन्धित वही बात कहनी चाहिए जिसकी इजाजत मुसलमान देते हैं। भारतीय संविधान इस क्षेत्र में मुसलमानों की इच्छा के आधीन है।
      1. पर मुसलमान तो सिर्फ इस्लाम पर कुछ कहने से ही नाराज नहीं होते; वे तो मस्जिद के आगे संगीत से, सड़क रोक कर नमाज पढ़ने से माना करने पर, मस्जिद से अजान के शोर की शिकायत करने पर, और आम जीवन की ऐसी बहुत सी चीजों पर नाराज होते हैं। तो अर्थ यह हुआ की भारत के बाकी नागरिकों को अपना जीवन मुसलमानों की मान्यताओं के अनुसार जीना चाहिए। नहीं तो मारे जाएंगे, और यह मारा जाना जायज होगा।
  3. निहितार्थ 2 को मानने के कारण:
    1. ऐसा लगता है की कथित-उदारवादियों और न्यायालय की मान्यता कि “देश में जो हो रहा है उस के लिए अकेली नूपुर जिम्मेदार है” की परतों को तर्क से उधेड़ते जाएँ तो अंत में निहितार्थ 2 पर आकार टिकेगी। वे साफ तौर पर इसे स्वीकार तो नहीं कराते, शायद इतने कड़े ढंग से मानते भी ना हों, पर अर्थ तो यही निकलता है।
    1. पर यह तो बहुत खतरनाक मान्यता है। इसे अपने होशो-हवास में नातो कथित-उदारवादी स्वीकारेंगे ना ही न्यायालय। हालांकि उनका व्यवहार और उन के कथन यही सिद्ध करते हैं।
    1. तो फिर उन के ऐसे खतरनाक सिद्धान्त के अनुसार व्यवहार करने, भाषण देने, पर दूसरों के सामने बोल कर स्वीकार ना करने के क्या कारण हो सकते हैं? मैं नहीं जनता।
    1. पर एक अनुमान यह हो सकता है कि वे जानते हैं कि कुछ मुसलमान मुहम्मद, कुरान और इस्लाम पर कुछ कहने से नाराज होंगे। कि वे हिंसा करेंगे, हत्या भी कर सकते हैं।
    1. पर भारतीय राज्य में, न्याय व्यवस्था में और समाज में इतना साहस और ताक़त नहीं है कि वे मुसलमानों की इस हिंसा को रोक सकें। वे सब इन मुसलमानों के सामने असहाय हैं।
    1. जब किसी बुराई को रोक नहीं सको तो जीवन बचाने के लिए, व्यवस्था बचाने के लिए, देश बचाने के लिए उसे स्वीकार करलो। मुझे लगता है असली सिद्धान्त यह है। बाकी लफ्फाजी है।
    1. इस का अर्थ यह है की समाज, देश, हमारा चिंतन और हमारी जुबान; मुसलमानों के पास बंधक है।
    1. यह हद दर्जे की कायरता है।

कथित-उदारवादी आपनी विचारधारा के चलते और उस विचारधारा से मिलने वाली प्रशंसा के फ़ायदों के लिए इस कायरता को स्वीकार कर सकते हैं। वे ऐसा भी मान रहे हो सकते हैं कि वास्तव में अल्पसंख्यकों का यह अधिकार होता ही है। पर ऐसा लगता नहीं। क्यों की हिंदुओं के इस अधिकार को वे पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में स्वीकार नहीं करते। वे अपनी भारतीयता और हिन्दू को दोषी मानने की आदत के चलते यह भी मान सकते हैं की सारा दोष है ही हिंदुओं का। पर इस के लिए उन्हें पूरी तरह मतारोपित (indoctrinated) या मूर्ख मानना होगा। मेरे विचार से वे विवेचना शक्ति रखने वाले औसत से ज्यादा बुद्धिमान लोग हैं, तो कारण मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ। पर शायद वे यह मानते हैं कि भारत के लिए बहुसंख्यक हिंदुओं का सांप्रदायिक हो जाना, अल्प संख्यक मुसलमानों की सांप्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक है। अतः हिंदुओं को लगातार दोष दे कर, अपराध बोध के सहारे उनकी सांप्रदायिकता को नियंत्रित करना चाहते हों। इस पर कभी फिर लिखूंगा जब मुझे कुछ और ठीक से समझ आ जाएगा। यहाँ सवाल यह है की भारतीय समाज इस कायरता को क्यों स्वीकार करे? भारतीय समाज में मैं सभी मजहबों और धर्मों को मानने वालों की बात कर रहा हूँ। एक कारण यह हो सकता है की मजहबी-अंधे मुसलमानों की मुख्य टकराहट हिंदुओं से है। अतः बाकी अपने आप को या तो निरपेक्ष मान रहे हैं या सुरक्षित। इस लेख में उनको मैं बस बाकी दुनिया के देशों को देखने भर की सलाह दूंगा।

तो फिर हिन्दू इस को क्यों स्वीकार करें? और जो लोग इस कायरता को स्वीकार नहीं करना चाहते उनके पास तरीका क्या है? आरिफ़ मुहम्मद खान आरती टिक्कू के साथ एक वार्तालाप (https://www.youtube.com/watch?v=wsCO2Dt5hUE) में इस भय से निजात पाने का और इस पर हत्याएं करने वालों को जवाब देने का और सरकार की आँख खोलने का एक तरीका बताते हैं। इस विडियो को 13 से 16 मिनट तक सुनें। वे कुछ भिन्न परिस्थितियों में स्पेन का उदाहरण देते हैं। पर वह तरीका वर्तमान भारतीय परिस्थिति में और सामाजिक माध्यमों को काम में लेते हुए यहाँ भी सफ़ल हो सकता है। श्री खान का स्पेन में ईसाई युवकों द्वारा अपनाया तरीका तो आप स्वयं सुनलें। यहाँ उसका परिवर्तित रूप नीचे लिखे कुछ बिन्दुओं के आधार पर बनाया जा सकता है:

  • पहले यह समझें की ईशनिन्दा को सामान्यकृत किसी एक मजहब के लिए नहीं किया जा सकता। छूट लेनी है तो सब से लेनी होगी।
  • आज कल हिन्दू भी ईशनिन्दा (यह उनकी अवधारणा ही नहीं है, वे प्रतिकृया में मुसलमानों की नकल कर रहे हैं) के लिए गिरफ्तार और दंडित करने की बात करने लगे है। उन्हें समझना चाहिए कि यह गलत दिशा है।
  • इस मुहिम में भाग लेने वालों को पहले चरण में मुहम्मद और देवी-देवताओं को अपमान जनक रूप से पेश नहीं करना चाहिए। बल्कि आज के सहृदय व खुश इंसान के रूप में पेश करना चाहिए।
  • उदाहरण के लिए मान लीजिये हो सामाजिक माध्यमों पर हजारों-लाखों लोग एक साथ कृष्ण के साथ या काली के साथ बातचीत करने हुए, हँसते हुए और हाथ में मदिरा का पात्र और सामने स्टीक रखी हुई दिखाएँ। दृश्य बैठक व्यवस्था आदि की दृष्टि से महाभारत कालीन हो सकता है।
  • इसी तरह मुहम्मद को भी हाथ में मदिरा के गिलास और सामने सलामी या सोसजेज़ के साथ दिखाएँ। दृश्य मुहम्मद के जमाने की अरब संस्कृति के अनुसार हों सकता है।
  • ये दृश्य दोनों तरह के कट्टर लोगों को आपत्ति जनक लगेंगे। पर हजारों (कम से कम 50 हजार) एक दिन में एक साथ पोस्ट होंगे तो न कट्टर पंथी कुछ कर पाएंगे, ना ही सरकार। फिर बात-चीत भी ऐसी दिखाई जा सकती है जो सम्मान जनक पर सवाल करने वाली है।
  • यदि यह चरण सही-सलामत पार हो जाये तो आगे सोचा जा सकता है।

यह मैं किसी को चिड़ाने के लिए करने की बात नहीं कर रहा, बल्की मजहब और धर्म पर आलोचना की स्वतन्त्रता, जो कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हिस्सा है, को समाज में सहज मान्यता दिलवाने के लिए करने की बात कर रहा हूँ। शालीनता पर दृढ़ता के साथ। पर इस के लिए एक अच्छी मजबूत रीढ़ की हड्डी, तथा साफ और ईमानदार दिमाग की जरूरत है। मैं नहीं जनता भारत में ये चीजें जरूरी मात्रा में उपलब्ध हैं या नहीं।

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2 जुलाई 2022

रोहित धनकर

यहाँ अभिव्यक्त विचार मेरे हैं। मैं जिन संस्थाओं से जुड़ा हूँ उनके नहीं, नाही वे संस्थाएं इन विचारों का समर्थन करती हैं।


डर हमें मूर्ख और दब्बू बना रहा है

July 3, 2022

रोहित धनकर

भाग 1: ईशनिन्दा

हम यदि भारतीय आलोचक और सृजनात्मक मेधा को कुंद नहीं करना चाहते तो हमें हर नागरिक को ईशनिन्दा (blasphemy) का हक देना होगा। सभी लोकतंत्रों में मजहबी गुरुओं, ईश्वरों और पैगंबरों की आलोचना और निंदा की भी छूट है। भारतीय संस्कृति में देवों पर कटाक्ष, उनकी आलोचना और उनकी हंसी उड़ाने की पुरानी परंपरा है। चाहे हम अपनी परंपरा के हिसाब से देखें, चाहे लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हिसाब से, अवतारों, देवताओं, और पैगंबरों की आलोचना, निंदा और उनकी हंसी उड़ाना मजहब के दिमाग पर सिकंजे से निकलने के लिए जरूरी है। साथ ही हर मजहब एक राजनैतिक विचारधारा (ideology) भी है, खास कर आज पहचान-राजनीति (identity politics) के जमाने में। भारतीय संविधान में शरिया और हिन्दू-राष्ट्र के लिए गुंजाइश निकालने की बात रोज हो रही है। ऐसे में यदि आप मुहम्मद, कुरान, अल्लाह, मनु, देवता, कृष्ण आदि की आलोचना का हक नहीं देंगे, तो लौकिक राजनैतिक विचारधाराओं (secular political ideologies) के साथ अन्याय होगा। क्यों की उनके परवर्तकों, मनीषियों पर कटाक्ष और उन पर कथित-अपमानजनक टिप्पणियाँ तो आप करने देंगे; पर मजहबी राजनैतिक विचारधाराओं के परवर्तकों की मूर्खता, धोखेबाज़ी, झूठ और हिंसा पर लोगों को कटाक्ष नहीं करने देंगे। यह विचारधारा लोकतान्त्रिक बहस में कानूनी असमानता बनाती है। और अंत में लोकतन्त्र की जड़ खोद देगी। क्यों की कोई भी मजहबी राजनीति लोकतन्त्र को सहन नहीं कर सकती।

सब मजहबों और धर्मों में उनके आरध्यों की निंदा पर आक्रोश होता है। वह अभिव्यक्त भी होता है। पर सब में ना तो वह समान होता है नाही जघन्य हत्याओं तक पहुंचता है। या तो न्यायालयों में मुकदमों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है या सड़कों पर प्रदर्शन के माध्यम से। हो सकता गिनेचुने अवसरों पर कुछ तोड़-फोड़ हो जाये, पर वह जल्द ही नियंत्रित करली जाती है। पर मुस्लिम (इस पूरे लेख में मैं “मुस्लिम”, “मुसलमान” शब्दों से सिर्फ उन मुसलमानों की बात कर रहा हूँ जो मजहबी-अंधे और कट्टर हैं। मेरी टिप्पणियाँ उन मुसलमानों पर नहीं हैं जो नबी आदि के नाम पर हत्याओं के विरोधी हैं) प्रतिकृया इस से बहुत अलग होती है। वह बहुत व्यापक होती है, हिंसक होती है और हत्याएं करती है। यह भय पैदा करने के लिए होती है। भय जरूरी है कट्टर-इस्लाम के लिए। क्यों की इस का विवेकशील, नैतिक, और आध्यात्मित आधार बहुत ही कमजोर है। कुरान को तार्किक दृष्टि से पढ़ने पर यह एकदम साफ हो जाता है कि यह मजहब डर और लालच पर चलता है। फिर भी मुसलमान इसे शांति का मजहब साबित करना चाहते हैं। मुहम्मद को आदर्श मानव सिद्ध करना चाहते हैं। यदि खुली विवेचना होगी तो कुरान की आयतें और हदीस उनके शांति और मुहम्मद के आदर्श मानव होने के दावों की धज्जियां उड़ा देंगी। इस लिए लोगों को कुरान, मुहम्मद और हदीस पर खुल कर बात करने से रोकना जरूरी है। क्यों की विवेक सम्मत तर्क में वह कहीं टिकेगा नहीं, इस लिए जघन्य हिंसा के माध्यम से डर पैदा करना जरूरी है। यह ठीक वैसे ही हिंसा और डर पर चलता है जैसे बंबईय्या फिल्मों के गुंडों की हफ्ता वसूली हिंसा से फैलाये डर पर चलती है। डर गायब, तो हफ्ता गायब। डर गायब तो इस्लाम के शांति और मुहम्मद के आदर्श होने के दावे गायब। तो बोलने वाले को मार दो, यही रास्ता बचता है।

ऐसा नहीं है की विरोध, प्रदर्शन और हिंसा की धमकी हिन्दू भीड़ नहीं देती। देती है। हुसैन के चित्रों पर विरोध इसका उदाहरण है। और भी बहुत से उदाहरण है विभिन्न पुस्तकों पर प्रतिबंध और प्रदर्शन और हिंसा की धमकी के। जैसे औब्रेय मेनन की ‘The Ramayana’, रामानुजन का लेख ‘Many Ramayanas: The Diversity of a Narrative Tradition in South Asia’, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कोर्स से हटवा दिया गया था। पर इन सब में, जहां तक मैं जनता हूँ, किसी का गला नहीं काटा गया। और हिन्दू बहुमत ने ही इन उग्रता से विरोध करने वालों को नियंत्रित कर लिया। क्यों की हिंदुओं में इस तरह की मजहबी कट्टरता का विरोध करने वाले बहुत लोग हैं। साथ ही हिन्दू शास्त्रों में कहीं कथित ईशनिन्दा के लिए कत्ल की आज्ञा नहीं है। इस्लाम में एक तो इस तरह की हिंसा के विरोध करने वाले कम हैं, जो हैं वे स्वयं डरते हैं, अतः बोलते नहीं। और इस्लाम की किताबें इस की अनुमति ही नहीं आज्ञा देती हैं।

यदि दो किताबों में लिखे हुए और उस पर मजहबी लोगों की प्रतिकृया की तुलना करें तो आप बहुत फर्क पाएंगे। औब्रेय मेनन की ‘द रामायण’ 1954 में प्रकाशित हुई और हिन्दू विरोध के कारण 1956 से प्रतिबंधित है। यह राम कथा को एक आम कथा के रूप में पेश करती है, किसी धार्मिक कथा के रूप में नहीं। बहुत से चरित्रों का मज़ाक उड़ाती है जिनमें दशरथ, लक्ष्मण, ब्राह्मण, ऋषि और राम भी हैं। पर कुछ ऐसे वाक्य भी हैं जिन पर आज तो हिन्दू भी बहुत उग्र हो जाएँगे। एक दृश्य में लंका विजय के बाद लक्ष्मण और सीता बात कर रहे हैं। जिस में सीता यह स्वीकार करती है कि उसने ऋषियों को बचाने के लिए रावण से एक सौदा किया था। उस के तहत वह रावण के साथ सोई थी, और इस में रावण ने उसे बाध्य नहीं किया।

धार्मिक हिंदुओं के लिए यह बहुत अपमान जनक है। इस पुस्तक में ऐसी और भी बातें हैं। पर क्या विरोध हुआ? हाँ। क्या हत्या हुई? नहीं। जहां तक मैं जनता हूँ हत्या की धमकी तक नहीं दी गई। किताब अब भी प्रतिबंधित है भारत में, पर दुनिया भर बार में मिलती है। यहाँ तक की अमेज़न इंडिया पर भी मिलती है। मेनन को किसी ने नहीं मारा, उन की मृत्यु 1989 में, 77 वर्ष पाकर, त्रिवेन्द्रम में हुई।

‘द सटेनिक वरसेस’ (शैतानी आयतें) शलमान रश्दी का उपन्यास है। यह बहुत जटिल शैली में लिखा प्रतीकात्मक उपन्यास है, इस शैली को साहित्य वाले ‘जादुई वास्तविकता’ (magical realism) कहते हैं। पाठक को बहुत सावधान रहना पड़ता है यह ध्यान में रखने के लिए कि क्या कौनसे चरित्र के सपने में चल रहा है, और क्या वास्तव में। इस में बहुत कुछ है जिस पर मुसलमान नाराज हो सकते हैं। मैं सिर्फ दो उदाहरण दूंगा। जहीलिया विजय के बाद जब महौन्द की सेना उस के सभी आलोचकों को ढूंढ कर दंड दे रही थी या उसका चलाया मजहब कुबूल करने पर माफ कर रही थी, तब एक मामूली कवि, बाल, जिसने महौन्द पर एक व्यग्यात्मक कविता लिखी थी, वह बहुत डर गया। और जा कर एक वैश्यालय में छुप गया, जिस का नाम “हिजाब” था। कुछ दिन बाद वहाँ की औरतों के आपसी मनोरंजन के लिए और व्यापार बढ़ाने के लिए वहाँ एक नाटक शुरू हुआ। सब औरतें और वहाँ की मालकिन बाल से नाटक में पैगंबर की तरह बात और व्यवहार करने लगीं, और वहाँ जो औरतें थीं उन के नाम पैगंबर की पत्नियों की नकल पर रख दिये। आदि।

द सैटेनिक वरसेस में एक और घटना है जो दार्शनिक और धर्मशास्त्र की दृष्टि से इस से भी ज्यादा खतरनाक है। जाहिलिया (Jahiliya) के लोग महौन्द (Mahound) (Jahiliya और Mahound से रश्दी का क्या तात्पर्य है यह गूगल बाबा से पूछ लें) को एक प्रस्ताव देते हैं कि यदि अल्लाह लत, उज्जा और मनत को मान्यता देदे तो वे महौन्द के दीन को मान्यता दे देंगे, और महौन्द को शहरी की परिषद का सदस्य चुनलेंगे। महौन्द अपने पहाड़ पर जाता है। वापस आता है तब बहुत कुछ कहता है जिसमें अल्लाह इन तीनों देवियों को और उन की सिफारिश (intercession) को स्वीकार करता है। अर्थात उन की भी पूजा की जा सकती है और उन की सिफारिश कयामत के दिन लोगों को जन्नत या जहन्नुम भेजने में काम आएगी।

पर इस से महौन्द के साथी बहुत नाराज और निराश होते हैं। उन के विरोध के कारण महौन्द फिर अपने पहाड़ पर जाता है, और दूसरी आयतें आती हैं। जिन में जिब्रील बताता है की कल वाली आयतें जिब्रील के वेश में शैतान ने दीं थी, वे अल्लाह की तरफ से नहीं शैतान की तरफ से थीं। और आज अल्लाह की तरफ आई आयतों के अनुसार ये देवियाँ काल्पनिक हैं, और इनकी कोई मान्यता नहीं है। यह उदाहरण इस्लाम के लिए दार्शनिक और धर्मशास्त्र की दृष्टि से बहुत खतरनाक है। तार्किक दृष्टि से देखे तो यह कुरान को महौन्द की जाने-अनजाने कल्पना साबित कर देता है, जो उस की इच्छाओं से संचालित होती है, अल्लाह से नहीं। एक बड़ी तार्किक समस्या यह है कि चालो इन कुछ आयतों का को पता चल गया कि वे शैतान से आईं थीं। पर ऐसी और कितनी आयतें होंगी यह कैसे पहचानें? इस बात की क्या गारंटी है कि महौन्द जिसे अल्लाह का दूत जिब्रील समझ रहा है वह शैतान नहीं है जिब्रील के वेश में? तो फिर यह किताब अल्लाह की है या शैतान की कैसे तय करें? जहां तक मैं समझता हूँ इस्लामिक धर्मशास्त्र (theology) में इस पहेली का कोई हल जरूर होगा। पर इस बात को ऐसे उठाना मुसलमानों ने धोर आपत्तीजनक माना।

ये दोनों उदारण निहायत ही आपत्तिजनक और भड़काऊ हैं। और उपन्यास में ऐसा और भी बहुत कुछ है। पर उपन्यास में यह अपनी जगह एक साहित्यिक कल्पना भी है। और पश्चिमी लोकतंत्रों ने इसे साहित्य में जगह देने को उपयुक्त माना, साथ ही अभिव्यक्ति और सृजना की स्वतन्त्रता का हिस्सा भी माना। पर भारत ने पुस्तक के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। आग दुनिया भर में फ़ेल गई। हिंसक प्रदर्शन हुए, कई देशों में। ईरान के खुमैनी ने रश्दी का सिर कलम करने का फतवा जारी कर दिया और बीस लाख डालर का इनाम भी घोषित किया। करोड़ों की लागत से इंग्लैंड और अम्रीका ने रश्दी की सुरक्षा की व्यवस्था कई वर्षों तक की। पर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को बरकरार रखा। इस मामले में कई अनुवादकों और प्रकाशकों की हत्याएं हुई।

ऊपर लिखी चीजें सब जानते हैं। यहाँ यह सब दोहराने का कारण इस बात को चिह्नित करना है की कथित ईशनिन्दा पर आक्रोश सब मजहबों और धर्मों में हो सकता है, पर उस की ऊग्रता और प्रतिबद्धता भिन्न-भिन्न है। उसे बराबर करके देखना भ्रामक है। बाकी विरोध परदर्शित करते हैं और न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं। कट्टर इस्लाम को मानने वाले लगातार हत्याएं और हिंसा करते हैं। इस इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए इस्लाम बाकी सब से ज्यादा खतरनाक है। और इस का विरोध भी, जो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता चाहते हैं उनकी तरफ से, बाकी सब से ज्यादा होना चाहिए।

(जारी …. भाग 2: सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी कल)

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2 जुलाई 2022

रोहित धनकर

यहाँ अभिव्यक्त विचार मेरे हैं। मैं जिन संस्थाओं से जुड़ा हूँ उनके नहीं, नाही वे संस्थाएं इन विचारों का समर्थन करती हैं।