उचित मुकाम की तलाश में अध्यापन

September 5, 2021

हरिभूमि में प्रकाशित https://www.haribhoomi.com/full-page-pdf/epaper/pdf/raipur-full-edition/2021/09/05/raipur-raipur-main/49541 , पृष्ठ 4

रोहित धनकर

अध्यापन दुनिया के सब से पुराने पेशों में से एक है। और यहाँ मैं रूपकों में बात नहीं कर रहा हूँ, जैसे हम किसी से भी कुछ सीखें उसे गुरु या शिक्षक कह देते हैं। मैं अध्यापन के काम को एक पेशे के रूप में देख रहा हूँ। ऐसा काम जो उस के करने वाले की रोजी-रोटी का प्रमुख जरिया हो और उसकी सामाजिक पहचान का प्रमुख द्योतक हो। इस लेख का मुख्य विषय अध्यापन के पेशे की वर्तमान दशा और उसका अध्यापकों के जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव है।

अध्यापन के पेशे की दशा

जब भी अध्यापक की बात करते हैं तो आम भारतीय के मन में “गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः …” गूंजने लगता है। अध्यापन को महान पेशा, देश-समाज का निर्माण करने वाले काम की बात की जाती है। अध्यापन को देवत्व के स्तर तक उठा दिया जाता है। ये सब मुझे हमेशा मनुस्मृति के श्लोक “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।” की याद दिलाता है। यहाँ सवाल यह नहीं है कि मूलग्रन्थों में श्लोकों को किस तरह देखा जाता था। सवाल यह है कि हमारे समाज में आज जब ये या इस तरह के उद्गार परकट किए जाये हैं तो वे वास्तविक हैं या छलवा?

यदि शिक्षकों की सामाजिक हैसियत पर विचार करें तो पाएंगे की उन्हें वकील, डाक्टर, इंजीनियर जैसे पेशों से कम आँका जाता है। अधिकतर उनकी आमदनी भी पेक्षाकृत कम होती है। उनकी काम करने की परिस्थितियाँ बहुत सुधार के बावजूद अब भी साधन विहीन, ऊबाऊ और कठिन हैं। इन परिस्थितियों के बावजूद बच्चों के ठीक से ना सीखने के लिए और उनके सरकारी स्कूल छोड़ कर निजी स्कूलों में जाने के लिए दोष भी शिक्षकों को ही दिया जाता है।

ये सब देखकर लगता है कि “आचार्य देवोभव” और “गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु …” जैसी प्रशास्तियां सिर्फ दिखावे के लिए हैं, समाज शिक्षकों का जो वास्तविक मूल्य आँकता है वह तो उनको दी गई सुविधाओं, वेतन, और समाज में इज्जत में ही देखा जा सकता है।

अध्यापन के लिए आवश्यक योग्यतायें

जिस तरह से यह पेशा बहुत पुराना है ऐसे ही इस के लिए ज्ञान, मूल्य, दक्षताओं और चारित्रिक विशेषताओं पर भी पुराने जमाने से ही सोचा और लिखा जा रहा है। कई लोगों को आश्चर्य होगा कि चरक संहिता चिकित्सा सीखना आरंभ करने से पहले छात्र को सलाह देती है की गुरु का चुनाव सोच-समझ कर करे। और उस चुनाव के लिए जो मानदंड बताती है उन में से अधिकतर आज भी हम शिक्षकों की योग्यताओं और चारित्रिक विशेषताओं में रूप में स्वीकार करते हैं। स्थान कम होने के बावजूद मैं यहाँ चरक संहिता में आचार्य के गुणों को विस्तार से उद्धृत कर रहा हूँ:

शिष्य “शास्त्र की परीक्षा करने दे बाद आचार्य की परीक्षा करे। यथा वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो। जिसने कर्म को उचित रीति से देखा हो, केवल शास्त्र पढ़ा ही न हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शूची (पवित्र) हो। शस्त्र आदि क्रिया में वशी, सिद्धहस्त, नाना उपकरणों वाला, सब इंद्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहचानने वाला, उत्तम सूझ वाला, रोगी की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के ज्ञान से प्रकट स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाला, क्रोध से रहित, क्लेश सहन करने वाला, शिष्य से प्रेम-भाव रखने वाला, शास्त्र के तत्व को बताने में समर्थ आचार्य होना चाहिए।” स्पष्ट ही यहाँ  ज्ञान, दक्षताओं, मूल्यों और चारित्रिक विशेषताओं का पूरा वर्णन किया गया है।

इसी तरह बल्लाल सेन का दानसागर भी सीखने के लिए पढ़ कर सुनाने वाले, अर्थात, शिक्षक के गुण विस्तार से लिखता है। “पाण्डुलिपियों की व्याख्या करने वाला पाठक एक अनुभवी, जानकार और बुद्धिमान ब्राह्मण होना चाहिए। …पढ़ने में अच्छा होना चाहिए, शास्त्रों को जानना चाहिए, और शब्दों के अर्थ स्थापित करने की प्रणाली (जानने वाला), … मेहनती, विनम्र, बुद्धिमान … राजनीतिक व्यवस्था को जानने वाला, एक अच्छा वक्ता होना चाहिए, और उसकी आवाज ऐसी होनी चाहिए जिसे आसानी और स्पष्टता से सुना जा सकता है। ज्ञान की सभी प्रणालियों पर अधिकार होना चाहिए, तर्क की भ्रांतियों को जानना चाहिए, एक सुसंगत अर्थ बनाने में सक्षम होना चाहिए, ज्ञान का सम्मान करना चाहिए। कठिन ज्ञान से निपटते हुए भी सरल शब्दों में व्याख्या करने में सक्षम होना चाहिए…… शब्दों, वाक्यों, अध्यायों और संपूर्ण ग्रंथ का अर्थ जानना चाहिए। ग्रंथ के विभिन्न भागों को सुसंगत बनाना चाहिए, उन विषयों को भी विस्तृत करने में सक्षम होना चाहिए जिनका मूल लेखक ने केवल संक्षेप में उल्लेख किया है। वह अर्थ समझाने के लिए संदर्भ और उदाहरण देने में सक्षम होना चाहिए।”

समाज में उस जमाने में भी अध्यापक का क्या स्थान था कहना मुश्किल है। पर शास्त्रों में उसे दिये गए समान और उसमें चाही गई योग्यताओं में समंजस्य लगता है।

अध्यापन का पेशा

यहाँ “पेशा” शब्द आङ्ग्रेजी के “प्रॉफ़ेशन” के समानार्थक के रूप किया जा रहा है। एक पेशेवर (प्रॉफेश्नल) व्यक्ति की योग्यताओं के एक शिक्षा-दार्शनिक द्वारा किए विश्लेषण को अध्यापन के पेशे पर लगाएँ तो नतीजे कुछ निम्न प्रकार होंगे।

एक अध्यापक के पास बहुत-सी दक्षताओं और विशेषज्ञता होती है, जो बहुत विस्तृत ज्ञान के आधार पर पैदा होती हैं। अर्थात जैसा चरक-संहिता और दानसागर कहते हैं उसका ज्ञान विस्तृत और गहरा होना चाहिए और उसकी कक्षा में काम की दक्षतायें उस ज्ञान-आधार का सुविचारित परिणाम होनी चाहिएं, ना की केवल क्रियाओं के रूप में सीखी हुई। वह अपने विद्यार्थियों की मदद करने का इच्छुक और ईमानदारी से उनके विकास की चिंता करने वाल होना चाहिए। और अध्यापक और छत्र का रिश्ता सद्भाव और स्नेह का पर संस्थानिक होना चाहिए।

एक पेशेवर के नाते शिक्षक की ज़िम्मेदारी है कि वह शिक्षा से संबन्धित विषयों पर अपनी निष्पक्ष राय समाज को दे। और समाज में उस की राय का सम्मान उसकी योग्यताओं, ज्ञान और समझ के आधार पर होता है, नाकि उसके पद के आधार पर। और एक अध्यापक अपनी सामाजिक और संस्थागत जिम्मेदारियों को तभी ठीक से निभा सकता है जब शिक्षा संबंधी विषयों पर उस की राय अपने ज्ञान के आधार पर, और राजनैतिक और आर्थिक कारणों से प्रभावित ना हो। अध्यापन के पेशे के लिए जरूरी है की इसकी तैयारी केवल संकुचित प्रशिक्षण द्वारा ना हो कर मूल्यों और स्वतंत्र चिंतन का विकास करने वाली व्यापक शिक्षा के रूप में हो। ये गुण ही अध्यापन के पेशे को नैतिक प्रभाव और वजन दे सकते हैं।

अध्यापक-शिक्षा

हमारे लिए सवाल यह है कि क्या हम अपने बी.एड. कालेजों और अध्यापक-शिक्षा के विभागों से अध्यापक शिक्षा की ऐसी व्यवस्था कर पाये हैं जो चरक-संहिता, दानसागर या पेशेवर अध्यापक के गुणों को विकसित करने वाली शिक्षा दे सके? या क्या हम अपने सेवाकालीन प्रशिक्षणों में ऐसी व्यवस्था कर पाये हैं? उपलब्ध जानकारी के अनुसार तो नहीं। क्या हम ऐसा शिक्षा तंत्र बना पाये हैं जो स्वतंत्र चिंतक और सक्षम अध्यापक को रोकने के बजाय उस की मदद करे? यह भी नहीं। अध्यापन के पेशे की दशा में सुधार और पेशेवर ज्ञान और विशेषज्ञताओं वाले अध्याकाओं की कमी तभी पूरी हो सकती है जब हम अध्यापक-शिक्षा और शिक्षा-तंत्र में ये क्षमाताएँ विकसित कर सकेंगे। जब तक यह नहीं होगा हम शिक्षक दिवसों पर बस ““आचार्य देवोभव” और “गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु …” जैसे झूठे दिखावे ही करते रहेंगे।

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4 सितंबर 2021


Personal Opinion and court order

September 2, 2021

Rohit Dhankar

My daughter sent me a link[1] to a news item in The Indian Express. The news item almost exclusively deals with the pronouncements of an Allahabad High Court Judge which are regarding culture, history and the nation. The legal aspect of the rejected bail plea is almost completely ignored. Which is fine, as it is the prerogative of the reporter and the newspaper to emphasize the aspects they consider important. And the aspect emphasized here by Mr. Asad Rehman is extremely important for the public to know and understand. The pronouncements of the judge are so seriously afflicted by what figuratively could be called ‘foot in mouth disease’ that I found it difficult to believe. And that prompted me to waste time in early morning to search and download the actual authentic signed copy of the order from Allahabad High Court website.

The order

The order in Hindi is a 12 page (about 3900 words) document which devotes about 4 pages to the legal aspect of the case and the remaining 8 on a lectures full of incorrect personal opinion. We need to understand both the parts.

The legal aspect

It is about a bail plea of one Mr. Javed, accused of cow theft and slaughter. The order states the charges, evidence presented, legal grounds and some relevant earlier judgments of High Courts and the Supreme Court. The counsels arguing on behalf of the state, according to the order, present eye-witness accounts, statement of a veterinary doctor and some circumstantial evidence. But the arguments of the counsel for the defendant are just pronouncement that all charges are false, no counter evidence is presented by him. One cannot ascertain by reading only the order if it leaves out the counter evidence presented by the defendant’s counsel, or he really presented no evidence. For that one must study the entire case, which is not the purpose of this quick take. Also, one must study the provisions of law the order quotes to ascertain whether they are accurate in letter and spirit.

However, as the case is made in the order under discussion the rejection of bail plea does not sound completely biased or unjust; through it might be legally debatable.

The personal opinion part

The two-thirds of the order is devoted to a completely unnecessary lecture, as said earlier, which is full of demonstrably false personal opinions. One wonders the court should involve itself in such pronouncements which are completely irrelevant to the facts of the case under consideration. Some examples of the pearls of wisdom in the order would be entertaining to see as they are.

“[1] सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुद्ध, वृहस्पति , शुक्र, शानी, राहू, केतू के साथ साथ वरुण, वायु, आदि देवताओं को यज्ञ में दी गयी प्रत्येक आहूति गाय के घी से देने की परम्परा है [2], जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है और [3] यही विशेष ऊर्जा वर्षा का कारण बनती है और वर्षा से ही अन्न पेड़, पौधे आदि को जीवन मिलता है।” (emphasis and numbering of the sentences is added)

What makes it bullshit is the smooth movement from correctly stated “parampara” in sentence 1, to personal and absolutely ludicrous opinion stated as a fact in sentence 2 to twisting the scientific fact of heat received from the sun being responsible for the rain, which is correctly stated to be the life giver to vegetables. Yes, it might be a “Parampara” among Hindus to use cow’s ghee in yajnas; but the claim that this kind of yajnas provide ‘special energy’ to the rays of the sun would have been laughable if it were not in a court order. And then, this yajna energy is supposed to be the cause of rains! One wonders how sound judgments given on the basis of this kind of logic and facts are likely to be.

Another nugget of wisdom: “वैज्ञानिक यह मानते है कि एक ही पशु गाय ही है जो आक्सीजन ग्रहण करती है, आक्सीजन छोडती है । पंचगव्य जो कि गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा तैयार किया जाता है कई प्रकार के असाध्य रोगों में लाभकारी है।”

Which scientist worth his salt would put his neck on the block to claim such stupidity, which goes against all scientific understanding of animal (including cows) metabolism? The writer of the order and his ilk are free to do whatever they want with the cow dung and urine (parts of panch-gavya) but is it worth claiming in a formal court order?

An example of the historical understanding available in the order: “9,500 वर्ष पूर्व गुरू वशिष्ठ ने गाय के कूल का विस्तार किया था।” 9,500 years back? We know precious little about the history of humans 9,500 years back. And what does “expansion of species of cow” (गाय के कुल का विस्तार) mean? How did a human (Guru Vashishth) manage that?

The order is full of such wisdom. As a final example let’s see the way logic and facts are used here: “[1], गाय को एक राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए और [2] गौ सुरक्षा को हिन्दुओं के मौलिक अधिकार में रखा जाए क्योंकि [3] हम जानते है कि जब देश की संस्कृति और उसकी आस्था पर चोट होती हैतो देश कमजोर होता है।” (sentence numbers added)

Sentence 3 is advanced as the logical ground for accepting the sentences 1 and 2. We all know that all cultures develop and change over time. All cultures have retrograde ideas in them, which may have been beneficial some time in history but have become harmful now. Human sacrifice and burying possessions of a king or important man with him after death were part of many cultures in the past, today they are obnoxious to all. Stratifying society in a caste structure was part of our culture, today we reject, condemn and are struggling to eradicate it. The ban on study of vedas by shudras and women was part of our culture, at the least in some dharmshastras; today this kind of ban is obnoxious to all. Cultures are not weakened by genuine criticism of retrograde ideas in them; they are destroyed by mindlessly sticking to wrong and ant-justice ideas. The cultures which stop recognizing their weaknesses and filth in them finally disappear.

The ban on cow slaughter and eating cow’s meet is not even historically proved fact among Hindus. There are references of ritualistic and even normal eating of cow’s meet in the same sources which the court order mentions; that is Vedas and Upanishads. Thus, the sentence 3 itself being doubtful and not always true can not support sentences 1 and 2. And even if one accepts it to be true, for the sake of argument, this does not lead to the conclusions that the cow should be declared national animal or declaring cow-protection as a fundamental right of Hindus.

What does it mean to declare ‘cow-protection’ as a fundamental right of Hindus? Who is stopping Hindus from protecting their own cows today? What difference will it make? It is my fundamental right to worship whatever god I believe in, in whatever manner I want to. Does that lead to worship in a manner which might cause harm or inconvenience to others? A Hindu has all the rights he wants to protect his own cow. Can it be extended to have rights on someone else cows and what they want to do with them?

Why should one bother about it?

The order is full of such logic and ‘facts’. One would ignore such orders if they were just once in while derailments of mind. But this kind of thinking and such arguments have become the staple of current political discourse in India. This kills logical thinking, obliterates distinction between one’s belief and scientific knowledge, obliterates distinction between myth and history, paints the nation as a single culture entity; and finally kills all rational debate.

Such views and logic in political debates are harmful enough but can still be seen as a part of churning of ideas. But when they start becoming a part of the legal literature and starts figuring in court orders then we are touching a new low. The legal system will lose public respect and trust, and the authors of its orders and judgment will lose all credibility as people of reason and fairness. How can one retain the trust in the soundness of judgment of someone who cannot see obvious flaws in logic, who has abysmally bad understanding of science, and who cannot make a distinction between history and mythology? That is why the question: Can biased personal opinion be made part of a court order?

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2nd September 2021


[1] https://indianexpress.com/article/india/cow-national-animal-india-court-7482909/lite/


Religion and Public Space

July 27, 2021

Rohit Dhankar

Religion and Public Space

The Hindu reported encroachment on a public park land by erecting religious structure. We all are too familiar with the temples and mosques (more temples than mosques) in the middle of roads, parks and odd nook sand corners in cities and towns, particularly in the North India. The Hindu report does not clarify which kind of religious structures they are, through it uses the word “shrine”, one may be inclined to think that most probably it is some kind of makeshift temple. This is blatant hoodwinking of people by some landgrabbers in the name of religion. In our beloved country religions can do what they want with impunity. The Hindu report also says that in spite of repeated complaints to the Residents Association which maintains the park, the police and other government bodies no response is received, no action is taken.

This is the usual response from the bodies supposed to be responsible for looking after public land and other spaces. Perhaps a combined effect of religion and briberies. Religions which are a solace to many believers and important part of their lives also have a very ugly public face; well, mostly an ugly public face. Unless all citizens, believer and non-believers, unanimously oppose the ugly public face of religion this scourge of Indian society and politics is likely to haunt us for long. The believers should understand that the land grab attempts in the name of religion violate the basic honesty of their own faith.

Another ugly public face of religion which no one wants to talk about is aggressive conversion attempts. Of course, our constitution gives freedom to preach one’s religion; and everyone should be committed to that ideal. But one should also understand that ‘conversion’ basically is a personal emotional, cognitive and spiritual (a vague concept used when one abandons reason) experience. That cannot be affected through fraud and material enticement. All conversion through fraud, superstitious preaching and enticement violates the right of citizens to make free choice. It is inherently violent, and a deliberate attack on the religious community from which fraudulent conversions are sought.

Public silence on encroachment on land under the garb of religion and on fraudulent aggressive conversions do not bode well for India. One will snatch our rights gradually, and the second is a ticking bomb that will aid to further fragmentation of Indian society.

Do I still retain citizen rights if I abandon my country and actively participate in foreign terrorist group planning to attach it?

“The Kerala High Court on Monday asked the Centre to respond to a petition by the mother of Nimisha Fathima, a Keralite woman languishing in a prison in Afghanistan, for the repatriation of her daughter and granddaughter.” Says a report in The Hindu. Another website reports: “The petition filed by Nimisha’s mother Bindu K alleged, “Not repatriating Nimisha and her child amounts to a violation of the fundamental right to life and denial of the right to education to the kid”.”

Nimisha Fatima made a choice of marrying an ISIS fighter, left the country and worked for establishing Islamic caliphate. The ISIS had dreams of establishing Islamic Rule in India under the same caliphate. Thus, Fatima not only sympathised with the nefarious dream of destroying India as we know it, but she actively contributed to make that a reality.

I have not checked the citizenship laws in this case (will do so when get some more time) but do have a few of question:

  1. If someone abandons one’s country to be part of a foreign terror group as heinous as ISIS; does that person still retain citizenship rights India?
  2. If yes; should such a person retain the citizenship rights?
  3. If should retain, supported by what democratic and/or humanitarian principles?

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27th July 2021


The direction that the NCF needs to take

July 23, 2021

In The Hindu, 23rd July 2021 https://www.thehindu.com/opinion/lead/the-direction-that-the-national-curriculum-framework-needs-to-take/article35478369.ece#comments_35478369

Shaping a National Curriculum Framework using only the National Education Policy will be shortsighted

Rohit Dhankar

The National Council of Educational Research and Training (NCERT) has tasked the State Councils of Educational Research and Training (SCERTs) to develop four State Curriculum Frameworks (SCFs). They pertain to School Education, Early Childhood Care and Education (ECCE), Teacher Education (TE) and Adult Education (AE). This is as in the recommendations of the National Education Policy (NEP) 2020.

At the first level, the NCERT will provide templates to the States to develop four draft SCFs, the drafts will feed into formulating the National Curriculum Frameworks, or NCFs, and the final version of the NCFs will be used as guiding documents to finalise the SCFs. The SCERTs are also supposed to develop 25 position papers, which will be similarly used to develop national position papers. The cycle seems to be designed to take onboard suggestions from all States, thereby making the NCFs representative and inclusive documents. The NCERT will also provide support to the SCERTs in terms of guidance, training of personnel, and technology platforms to develop these documents.

Much data collection

So far so good. But the NCERT will also provide e-templates for each of these tasks “which will be filled-up by the States/UTs [Union Territories]”. Similarly, survey questionnaires/multiple choice questions, or MCQs, will also be provided to conduct surveys among various stakeholders. Thus, massive data collection seems to be in progress. Such surveys are designed, let us accept, with all good intentions to take on board views from all sections of the population. This is without doubt a must in a democracy, particularly in matters of deciding the aims, the objectives, and the content of curriculum because it affects everyone.

However, the gathering and the organisation of such data to be used in curricular decisions requires more than just good intentions. The kind of questionnaires and template that one develops can emphasise certain kinds of recommendations while muting some others. Similarly, the cleaning and organising of the data may pick up what is already in the minds of the people handling such data and filter out what does not fit within their thinking. Even if these two problems are somehow solved, the problem of what the majority ‘wants’ and what ‘ought to be’ done remains. For example, if one asks about public opinion on the medium of instruction for the ECCE, the overwhelming majority is likely to favour English. Does it mean this would be in the best interest of the children and society?

Some valid questions

A huge opinion gathering exercise preceded NEP 2020. One wonders why this could not prevent it from becoming a managerial policy geared to make education a training endeavour to produce a workforce for market needs. The policy is chock-a-block with words for values, capabilities and skills, all justified as needed for emerging market requirements. Furthermore, these lists are just heaps of words, devoid of any organising principle to decide priorities, inter-relationships and deriving curricular content and pedagogy from them. A similar unorganised list is repeated ad nauseum in the name of pedagogical recommendations. And yet, it fails to provide appropriate criteria to choose pedagogy at different stages and for different curricular areas.

The so-called foundational stage crumbles under the slightest scrutiny on organisational as well as pedagogical grounds. The ECCE plus Classes one and two (first five years of education, for the age group three years to eight years) is proclaimed as one stage. But the ECCE and Classes one and two will be run in separate institutions; their teachers’ qualifications, salaries, and training are supposed to be different; their curriculum frameworks are supposed to be different. One wonders what makes it a single block.

On pedagogical grounds, the capabilities of self-restraint, dealing with adults and people outside family, concentration span, responsible behaviour, self-directed activities and understanding the value of completing a task widely differ for a four-year-old and a six-year-old. These are the capabilities which determine the nature of pedagogy and formal learning; not the forming of synapses and the growth of brain mass.

Thus, the people developing NCFs have to deal with these issues in addition to finding a method of making proper sense of gathered public opinion. If the National Curriculum Framework for School Education (NCFSE) is purely guided by the NEP 2020, we are unlikely to ensure the sound development of our schoolchildren. Fortunately, there is a way through which the teams developing the NCF and the SCFs can mitigate — if not completely solve — the problems created by the NEP 2020 as well as take on board public opinion in an appropriate manner. Furthermore, such a framework can also help in making appropriate use of what is good in this policy, for it is not completely devoid of good recommendations. For example, flexibility in secondary education, examination reform, more exposure to Indian languages, and taking on board Indian knowledge systems can make our education system better.

Documents of value

One way out of this problem is to take a lot of help from the Secondary Education Commission Report (SECR) and Zakir Hussain’s Basic National Education (BNE) report. The purpose of surveys on public opinion is to create a consensus on basic values, and the vision and the direction our education system should take. The SERC assumes, without saying, that the democratic polity we adopted gives us that consensus. They also collected a lot of data, but that data was analysed and organised in the light of the vision of the individual, society, and education inherent in the democratic ideal. Thus, they had all the three necessary elements: the overall framework of values and future direction, current issues and problems of the education system, and public opinion. The SECR makes sense of the latter two in the light of the earlier. And it rigorously works out the aims of education, pedagogy and content to achieve those aims. The logical rigor is very clear in working our aims from the democratic values and pedagogy from the aims. It is somewhat loose in working out the content. But the direction is clear.

Another useful document in this regard is the BNE. The logical flow in this document may be somewhat amiss at one or two places in the beginning. But the rigorous derivation of educational aims from the vision of society, curricular objectives from the aims, and content from the objectives are starkly clear. These are coherent and rigorous documents because they place the values and principles of democracy and a morally, aesthetically and intellectually rich individual life at the starting point and try to resolve current economic problems in alignment with them. The current policy reverses the order. It is not that the content from these documents should be borrowed; rather, that the approach they take has much to teach. It is rigorous, rational, and very sound.

Interestingly, the first edition of the BNE was in 1938 (https://bit.ly/2V2I9ij), SECR was written in the 1950s. Patricia White, a British philosopher of education, first argued for making democracy the basis for working out the school curriculum in 1973. John White worked out a rigorous method for the same in a paper published in 1998. The BNE and the SECR do not philosophically argue or give the detailed exposition of the method; they make practical use of this approach. It is somewhat surprising that the reports and curriculum frameworks developed after the 1980s in our country are completely overwhelmed by the current problems or by the pedagogical ideals of child-centrism and simply assumed that vague assumptions about the democratic ideals mentioned here and there randomly was enough. The objectives and content in these later documents are based on other fashionable or political or current issues.

Placing the debate

It is time to again place the democratic ideal at the centre of our education. Not as an object of lip service or reverence, but as the source of a framework of values and principles to judge and justify all other aspects. Otherwise, we are likely to make the curriculum a political football, and stir up debates that border on cacophony. Let us remember that opinions without supporting arguments are nothing more than assertions. And one citizen’s assertions are only as good as another’s. This leaves the conclusion of the debate to the most powerful. The only way to wrest the judgment from the hands of the powerful is to have the curricular debates rooted in democratic values.

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Feedback of Participants Batch 1 of पढ़ना-लिखना

July 11, 2021

पढ़ना-लिखना

(An Online Course in initial Reading and Writing)

Feedback of Participants Batch 1

We have just completed the first batch of our online course “पढ़ना-लिखना”. At the end of the course participants feedback was collected through a Google Form. The feedback was taken on 10 simple questions, on scale 1 to 3. General idea behind the scale was 1 for minimum of quality or least appropriate, expressed in appropriate terms for the aspect of the course to which the questions were related; similarly, 2 for satisfactory and 3 for highest. Some highlights are given in the table below.

SN.QuestionsQuestions in short Participants’ Rating % 
   HighSatisfactoryLow
1How well could you understand the sessions?Undrsding.      92                 8       –  
2How useful do you consider the course?Usefulness      92                 8       –  
3How much of the course content was new for you?New      70                27        3
4How much opportunity was available for asking questions?Oprtnty. for Qs      81                19       –  
5How clear and relevant were the answers?Clrty. & Rlvnce. of As      62                38       –  
6How difficult was the language of Handouts?Ease of Hndts. Lang.      51                38       –  
7How clear were the instructions given for activities?Clrty. of Intrcts.      65                35       –  
8Can the activities you did in the course be used with children in class?Usflnss. of actvts.      97                 3       –  
9Satisfaction with feedback given on your submitted work?Stsfctn. on Fdback.      49                51       –  

More details here.


कविता पर बेबुनियाद बवाल

May 22, 2021

रोहित धनकर

पिछले 3-4 दिन से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की पहली कक्षा की हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में एक छोटी-सी कविता को लेकर विवाद मचा हुआ है, कथित सामाजिक माध्यमों पर। सामाजिक माध्यम आजकल बहुत महत्वपूर्ण हो चलें हैं। बहुत लोगों के पास किसी बिन्दु पर गहनता में जानने का समय और रुची नहीं होती। विषय भी उनके चिंतन और कर्म क्षेत्र से हट कर हो सकता है, अतः हर एक से हर विषय पर समय लगाने की मांग भी नहीं की जा सकती। दूसरी तरफ इस प्रकार की सतही जानकारी और बहस के आधार पर लोग अपने विश्वास भी बनाते ही हैं। और हर नागरिक का हर विश्वास लोकतन्त्र की दिशा और दशा को प्रभावित भी करता ही है। इस लिए इन बहसों को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। यही कारण है सामाजिक माध्यमों के बढ़ते महत्व का।

खैर, कविता यहाँ दी हुई है। इसे पढ़ें और इसके नीचे दिये गए पढ़ाने के निर्देश भी पढ़ें।

कविता

यह कविता बच्चों से बातचीत करने, कल्पना करने का मौका देने और सोचने के लिए काम में ली जा सकती है। भाषा की कई क्षमताओं के लिए उपयोग की जा सकती है।

बवाल इस में आए शब्द “छोकरी”, “चूसना” और कथित द्विआर्थकता को लेकर उठाया जा रहा है।

“छोकरी” शब्द पर ऐतराज मुझे शिक्षक के नाते देखूँ तो हिन्दी में पूरानी वर्चश्वशाली मान्यताओं का हिस्सा लगता है। यह शुद्धता-वादी मानसिकता का और शुद्धता या मानकता एक छोटे तबके की खड़ी बोली में निहित होना मानने का परिणाम है। यह सोच बच्चों की पढ़ाई और हिन्दी की समृद्धी दोनों की जड़ें काटती है। एक बड़े ग्रामीण तबके की भाषा को केवल हिन्दी से बाहर नहीं करती, बल्कि उस को गँवारू-बोली का खिताब भी देती है। ऐतराज करने वाले लोग यह नहीं समझते की बच्चे नई चीज अपनी पुरानी समझ से जोड़ कर ही सीख सकते हैं। और जब विद्यालय आते हैं तो उनकी पूरी समझ अपनी भाषा में ही होती है। अतः छोकरी जैसे शब्दों को पुस्तकों से निकाल कर हम उनकी भाषा को नकारते हैं और उनकी समझ की जड़ें काट कर सीखने को मुश्किल बनाते हैं।

शैक्षिक दृष्टि से यह ऐतराज प्रतिगामी है। इस में संस्कृति की रक्षा का नारा शामिल करने से यह गैरबराबरी और वर्चश्व की राजनीती को भी बल देता है। और सामाजिक राजनैतिक नजर से भी प्रतिगामी हो जाता है।

“चूसना” शब्द पर ऐतराज कविता में द्विआर्थकता देखने का परिणाम लगता है। इस में भी “मेरी भाषा शुद्ध और शालीन भाषा” का दंभ है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में बहुत से कथन ऐसे होते हैं जो एक तबके के लिए सामान्य और किसी दूसरे के लिए ऐतराज करने काबिल हों। पर यहाँ तो मुझे कुछ ऐसा भी नहीं लगता। कविता में वैसे भी द्विआर्थकता खोजना बहुत आसान है। क्योंकि कविता बनती ही भावों की समृद्धता से है। मुझे लगता है यहाँ द्विआर्थकता ऐतराज करने वाले पाठकों के मन में उपजती है। और उसे वे इस कविता पर आरोपित कराते हैं।

यह तो हुई इस कविता पर ऐतराज की बात। पर मेरे मन में इस पर कुछ लिखने को लेकर झिझक भी थी। उस का कारण यह है की मुझे यह ऐतराज तो बेसमझी या फालतू विवाद उठाने की मानसिकता का नतीजा लगता है; पर मैं इस कविता को कोई बहुत अच्छा पाठ (text के अर्थ में) नहीं मानता। मेरी कविता की समझ तो बहुत ही सीमित है, पर अध्यापक के नाते मुझे इस में एक बड़ी समस्या लगती है। यह एक अकैडमिक बिन्दु है, शिक्षणशास्त्र से संबन्धित। इस को लेकर उपरोक्त प्रकार का विवाद नहीं उठाया जा सकता, ना ही इस विचार में से इस तराह के विवादों के लिए समर्थन मिल सकता है।

भाषा शिक्षण में मेरा मानना यह है कि टैक्स्ट की एक आंतरिक तार्किक-संगती होती है। वह सदा सामान्य अर्थों में सार्थकता और आम तर्क से जुड़ी हो यह जरूरी नहीं। बच्चों के लिए बिना अर्थ के शुद्ध तुकबंदी मात्र भाषा की शब्दावली और ध्वनी विन्यास का आनंद लेने के लिए बहुत जरूरी है। तो मैं यहाँ सामान्य अर्थ में सार्थकता की बात नहीं कर रहा। टैक्स्ट की आंतरिक तार्किक-संगती का उदाहरण आप अक्कड़ बक्कड़ में देख सकते है:

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ। सौ में निकाला धागा चोर निकाल कर भागा।

सामान्य अर्थों में इस में कोई सार्थक-तार्किकता और संगती नहीं है। बहुत शब्द अर्थहीन भी हैं। पर इस में विचारों और बिंबों का एक तारतमयपूर्ण प्रवाह है। जिस कविता पर बात चल रही है उसमें इस का अभाव है। मेरे विचार से भाषा के दुनिया को समझने में समार्थ उपयोग के लिए इस में ‘विचारों और बिंबों के तारतम्यपूर्ण प्रवाह’ के प्रती सचेतता और लगाव सीखना जरूरी है। अतः यह कविता मुझे बहुत बढ़िया कविता नहीं लगती बच्चों के लिए।

पर इस पर जिन बिन्दुओं पर ऐतराज उठाए जा रहे हैं वे निश्चित रूप से शिक्षा और राजनीती दोनों की दृष्टि से प्रतिगामी हैं। और उनको सिरे से नकार देना चाहिए। जिस मानसिकता से वे ऐतराज उपजे हैं उस का विरोध होना चाहिए।

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22 मई 2021


Why are we helpless in the face of this pandemic?

May 18, 2021

Rohit Dhankar

I don’t have all the data and needed information. But whatever information I get through newspapers and social media, I seem to be making forming beliefs, mostly with help from some speculation. Just wanted to share some of those half-formed beliefs, in order to prevent serious mistake through public scrutiny.

This is well recognized that we know much less about the pandemic than is needed to contain or stop it. But that is the character of pandemics and calamities, it cannot be sighted as a ‘reason why’ for helplessness. Containing a pandemic simply means containing an unknown evil.

The first and foremost reason is the ineptness, inefficiency and wrong priorities of the central government, and state governments as well. And that is irrespective of which party is in power. This is natural for the citizens to apportion the largest share of the blame on the central government, and that is justified at the moment. The central government is the biggest culprit.

The second reason to my mind is the abysmal state of our health and all other governing systems. In normal times all government systems function more on tokenism and pretension than actually realizing the professed goals. The work is done mostly on the paper, and the real world remains as it was. That has been the character of government departments. Then they suddenly want to start serious real work when the calamity hits them. And, as is natural, everything collapses. The present central government is in power for more than 6 years and was expected by many people to change this character at the least of the central government departments. It completely failed in doing it. One wonders if they ever wanted to make them better functioning.

The third reason, we are a divided country and society. We are not putting all efforts for defeat the pandemic, simply because we first want to defeat a hated man, who is the prime minister. There is a ring in the air from some quarters, particularly on the social media, that the worst the situation, more the opportunity to heap abuse on Modi and BJP, irrespective of the cost to people. Some people will object to it. But there are too many people who are attacking it for everything for justified and unjustified reasons, and attacking viciously. Using completely unjustified terminologies like ‘deliberate genocide’ etc. to poison public mind. Another set of people is continuously defending government irrespective of its failure, however big its blunders might be. Neither of these sets is using their energy to help the society in containing the pandemic. The opposition is much more interested in ‘Modi should go’ than putting the issue on the back burner and fighting the problem for the time being. The opinion makers and intellectuals—supposed to be the conscience keeper of the society—are the worst afflicted by this morally crippling intellectual disease. Most of them seem to be incurable by now.

Fourth, we as a society lack civic responsibility. Many still don’t get it that preventive precautions in a pandemic is not entirely a personal choice. It has a selfish side of personal safely and survival. But also has a moral side of not becoming a danger to others. Behaviour of many people in public spaces is proof enough that the second aspect has not registered in the social consciousness yet.  

Above I said that the government is the biggest culprit because in a democracy the government is also responsible for all the other problems in the society. Improving the system, taking the opinion making intellectuals along and developing civic responsibility are also government’s responsibilities, up to a certain extent. However, there always be some people in the society who will act on the evil thought that “my enemy should definitely become blind even if I have to lose one eye in the bargain”. The government’s responsibility for such people is double edged. One, it should try to bring them to reason through persuasion. It they are too bent upon this evil idea; they should be exposed to the public. Here a war of perception may be necessary. If a government fails in both then it has only itself to blame, and the common citizen bears the burnt of its failure.

And at the end, a small story from black rustic humour, even if it is somewhat inappropriate in such a situation. In Hindi, don’t want to translate it into English.

दो जाट (जाटों से माफी चाहते हुए) भाइयों में बहुत प्रतिस्पर्धा और झगड़ा चल रहा था। दोनों ही बहुत धनवान नहीं थे। किसी कारण से एक के पास शिव आए। (क्यों आए थे कहानी में मैं भूल गया हूँ।) शिव ने जाट से कहा की तुम तीन वरदान मांग सकते हो। जो कुछ भी तुम चाहो। पर शर्त यह है कि तुम्हारे भाई को जो तुम अपने लिए मांगोगे उस से दुगुना मिलेगा। जाट मान गया, और नीचे लिखे तीन वरदान मांगे:

  1. “भगवन, मेरे लिए एक बड़ा-सा महल बनादे, जिसके चारों और बहुत ऊंची दीवार हो और उस में सिर्फ एक फाटक हो।” (शिव ने तुरंत ऐसा ही महल उसे के लिए बना दिया, पर उसके भाई के लिए दो बना दीते।)
  2. “भगवन, मेरे महल के फाटक में एक 400 फीट गहरा कुआं खोद दे।” (शिव ने तुरंत उसके फाटक को पूरा कवर कराते हुए एक कुआं खोद दिया। पर उसके भाई के दोनों महलों के फाटकों में दो-दो खोद दिये।)
  3. आखिर में जाट ने कहा, “भगवन, मेरी एक आँख फोड़ दे।” (शिव ने तुरंत जाट की एक आँख फोड़ दी, पर उसके भाई की दोनों ही फोड़ दी।)

Rest of the story depends on your imagination. But look around you if you find many of us being governed by this kind of Jaat-buddhi.

(I gain apologize to Jaats. I have neither any malice towards them, not do I think that they have this kind of buddhi. Here I retained the caste name as I have heard this story or joke originally simply because it seems to me that a better way to grow beyond casteism etc. is without attempting to exorcise our literature of its time-stamps. We have to rationally grow out of the biases without wiping out signs of historical wrongs, as they also record our history of moral and intellectual development as a society.)

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18th May 2021


‘हिंदुस्तान’ शब्द पर आपत्ती?

May 17, 2021

रोहित धनकर

मैंने 13 मई 2021 को अपने फ़ेसबुक पृष्ट पर यह लिखा था: “किसी को कोई ऐसी खबर कहीं से मिलजाए की कुछ हिन्दुस्तानी इस महामारी से एक जुट हो कर लड़ रहे हैं और अपने दुश्मनों के लिए भी शुभेच्छा रखते हैं; तो मेरहरबानी करके बताना। लगता है हम दो महामारियों से एक साथ लड़ रहे हैं। पर लड़ रहे हैं या सिर्फ ‘ग्रस्त’ हैं?”

इस पर दो महत्वपूर्ण सवाल उठे।

  1. हिन्दुस्तानी की जगह भारतीय कहना चाहिए था।
  2. क्या त्योहारों का कोई शुद्ध सांस्कृतिक, जिसमें मजहब शामिल ना हो, स्वरूप हो सकता है?

इन सवालों पर विचार करने की जरूरत है। मैं यहाँ सिर्फ पहले सवाल पर कुछ विचार रख रहा हूँ, दूसरे पर फिर कभी।

हिन्दुस्तानी से ऐतराज

इस मुद्दे पर विचार करने से पहले मैं एक छोटे से किस्से का जिक्र करना चाहता हूँ, क्यों कि जिस मूल से यह ऐतराज उठ रहा है उसे पहचानना जरूरी है। हम लोग एक बार केरल किसी अध्ययन के सिलसिले में गए थे। त्रिवेन्द्रम में हमारे पास एक दिन खाली था। इस लिए हम लोग कुछ दर्शनीय स्थान और बाजार आदि भी गए। उन स्थानों में एक वहाँ का प्रसिद्ध पद्मनाभास्वामी मंदिर भी था। हमारी टोली में एक बहुत सुलझे हुए, सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित और प्रबुद्ध मित्र भी थे। मैं उनके विचारों और प्रतिबद्धताओं की तब भी बहुत इज्जत करता था और आज भी करता हूँ। वे मेरे कुछ गिने चुने मित्रों में हैं। वे यह भी जानते थे कि मैं मजहबी आस्थाओं वाला व्यक्ति नहीं हूँ, और ईश्वर तो—चाहे वह पद्मनाभास्वामी के रूप में हो या अल्लाह मियां के रूप में—मुझे मानव बुद्धि को लकवा-ग्रस्त करने वाला विचार लगता है।

तो हुआ यह कि मुझे पद्मनाभास्वामी मंदिर में जाकर उसे अंदर से देखना था। मैंने उत्तर भारतीय मंदिर तो देखे थे, पर दक्षिण भारत के मंदिरों की वास्तु, कलापक्ष और अन्य बातों से अनजान था। और इन्हें देखना समझना मेरी सांस्कृतिक रुची का हिस्सा था। पर मंदिर में जाने के लिए नहा कर धोती पहननी पड़ती थी। यह उनका रिवाज था, शायद अब भी हो। नहाने की व्यवस्था वहाँ द्वार पर ही थी। मैंने वहीं एक दुकान से धोती खरीदी (मजहब और व्यापार का सदा ही गहरा रिश्ता रहा है)। नहाया और मंदिर में गया। हमारे मित्र नहीं गए मंदिर में।

जब मैं बाहर आया तो उनकी आखों में और जो कुछ उन्हों ने कहा (मैं भूल गया हूँ वास्तविक वाक्य क्या थे) उस में उलाहना तो था ही, एक तरह की हिकारत भी थी। कुछ ऐसा कहते हुए जैसे  कि मेरा मजहब में रुची ना होना बस एक दिखावा है। मुझे तब से आज तक इस प्रतिकृया पर आश्चर्य है। और यह भी आश्चर्य है कि बहुत संवेदनशील और प्रबुद्ध लोग भी इस तरह की भावनाओं के शिकार हो सकते हैं, चाहे कभी-कभार ही सही।

हो सकता है मैं गलत होऊं, पर मेरे विचार से यह एक प्रकार की विचारधारतमक प्रतिबद्धता का रूप है। जो संस्कृति और इतिहास में जो कुछ उस विचार के प्रतिकूल है उसे हिकारत से देखती है और उसका उच्छेद करना चाहती है। हमारे मित्र में तो सौभाग्य से यह प्रवृती उनके समग्र चिंतन में (उनका चिंतन बहुत सुलझा हुआ है) व्याप्त नहीं है। पर बहुत लोगों में यह अन-समझी विचारधारा को गटक लेने से उत्पन्न अंधता होती है। ऐसे भी लोग हैं, जो विचारधाराओं को समझने में कम रुची रखते हैं और किसी फैशन के चलते उनके मानने वालों में अपना नाम दर्ज करवाने में अधिक।

अब, ‘हिंदुस्तानी’ पर ऐतराज पर आते हैं। फेशबुक बातचीत में तो ऐतराज करने वाले व्यक्ति ने “हिंदुस्तान” और “हिंदुस्थान” शब्दों को भी अदला-बदली करके काम में लिया है। पता नहीं दोनों में कोई फर्क देखते हैं या नहीं।

इस बात को समझने के लिए हमें देखना पड़ेगा की यह भारत आखिर चीज क्या है? हम सभी जानते हैं की एक संवैधानिक लोकतन्त्र के रूप में तो भारत 1947 में ही बना। पर क्या एक राष्ट्र या देश के रूप में भी यह 1947 में ही बना? राष्ट्र के कुछ उलझे मशले को अभी बाद के लिए रखते हुए मैं ‘भारत एक देश के रूप में’ पर ही ध्यान दूंगा, और इसके विभिन्न नामों पर भी। यहाँ मैं लगभग सारी बात प्रोफेसर इरफान हबीब के एक भाषण से ले रहा हूँ जो उनहों ने 2015 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दिया था, भाषण का शीर्षक “Building the Idea of India” (भारत के विचार की निर्मिति) है। प्रोफेसर हबीब ही क्यों? एक तो वे इस भाषण में मूल-स्रोतों का जिक्र करते हैं, और दूसरे जिस वैचारिक पृष्ठभूमि से उपरोक्त ऐतराज आता है वहाँ हबीब साहब की बात को तवज्जो मिलने की अधिक संभावना है।[1] 

प्रोफेसर हबीब के अनुसार “एक देश के रूप में भारत का विचार पुरातन है। पेरी एंडर्सन का अपनी पुस्तक द इंडियन आइडियोलॉजी में यह आग्रह (assertion) कि इंडिया विदेशियों द्वारा, विषेशरूप से योरोपीयों द्वारा आधुनिक काल में दिया गया नाम है, पूर्णतया भ्रामक है।”[2] वे यह भी कहते हैं कि “पूरे भारत को पहली बार एक देश के रूप में मौर्य साम्राज्य में देखा गया।”[3] तब इसे जंबुद्वीप कहा जाता था। भारत नाम का उपयोग उनके अनुसार पूरे देश के लिए सब से पहले कलिंग के राजा खारवेल के शिलालेख में मिलता है, जो कि ईसा से एक शताब्दी पहले का है। तो बात यह है कि देश के रूप में भारत की अवधारणा दो हजार वर्षों से ज्यादा पुरानी है, वह 1947 में नहीं बना। इसके नाम कई रहे हैं, जंबुद्वीप और भारत उन नामों में से हैं।

तो फिर ‘हिंदुस्तान’ कब आया? और क्यों? हबीब साहब आगे कहते हैं कि ईरनियों ने सब से पहले हमें ‘हिन्दू’ नाम दिया। और ‘हिन्दू’ सिंधु नदी के लिए ईरानी नाम है। तो सिधु नदी के पूर्व के सभी क्षेत्र प्राचीन ईरान में हिन्दू कहे जाते थे। हबीब साहब के अनुसार “स्थान” और “स्तान” में भेद है। उनके अनुसार संस्कृत में “स्थान” एक विशिष्ट छोटी जगह (spot) के लिए काम में आता है, जब की “स्तान” फारसी में क्षेत्र (region) के लिए।[4] तो ‘हिंदुस्थान’ और ‘हिंदुस्तान’ एक चीज नहीं हैं।

पर यहाँ असली मुद्दा तो ‘हिन्दू’ शब्द लगता है। तो देखते हैं इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कौन कहते थे। हबीब साहब कहते हैं कि अमीर खुसरो ने फारसी में एक लंबी कविता लिखी है जिसमें वह भारत की सब चीजों की बहुत सराहना कराते हैं। यहाँ कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है, पर हबीब साहब के अनुसार खुसरो इस में बहुत अन्य चीजों के साथ ब्राह्मणों और संस्कृत की भी सराहना कराते हैं। ब्राह्मणों की भी उनके ज्ञान के लिए और संस्कृत की उस के विज्ञान और ज्ञान की भाषा होने के लिए। वे सभी भारतीय भाषाओं के नाम लिखते हैं, भारत को मुसलमानों का भी देश बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि यहाँ तुर्की और फारसी भी बोली जाती हैं। वे कश्मीरी से लेकर मलाबारी तक सब भारतीय भाषाओं को ‘हिंदवी’ भाषाएँ कहते हैं। हबीब साहब ने साफ जिक्र नहीं किया है कि खुसरो भारत के लिए ‘हिंदुस्तान’ शब्द काम में लेते हैं या कोई और। पर क्योंकि कविता फारसी में हैं, जुबानों को ‘हिंदवी’ कह रहे हैं, तो बहुत संभावना है कि भारत को ‘हिंदुस्तान’ ही कह रहे होंगे। (मैं कविता ढूंढ रहा हूँ।) खुसरो मुसलमान थे, वे इस देश को मुसलमानों का भी देश बताते हैं, यहाँ की भाषाओं को हिंदवी भाषाएँ बताते हैं। और कम से कम मुझे पूरा विश्वास है इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कहते थे। और इन नामों में ‘हिन्दू’ शब्द है।

मैं इतिहासकार नहीं हूँ, और इस वक़्त संदर्भ देखने का समय भी मेरे पास नहीं है, पर मुझे लगता है कि मुगल साम्राज्य में और दिल्ली सल्तनत में भी इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कहा जाता था। तब तक तो, और खुसरो के काल में भी, हिन्दू शब्द “हिन्दू-धर्म” के साथ भी जुड़ गया था। और हिन्दू-धर्म इस्लाम से भिन्न है। और मुग़ल साम्राज्य में और दिल्ली सल्तनत में सत्ता मुसलमान राजाओं के हाथ में थी। इकबाल का ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ तो सबने सुना-गाया ही होगा। तो खुसरो और इकबाल को (इकबाल को केंब्रिज जाने पहले तक 😊) तो कोई परेशानी नहीं थी, इस देश को हिंदुस्तान कहने से।

अब यह भी आम समझ है कि जहां संवैधानिक और कानूनी जरूरत होगी वहाँ तो हमें भारत ही कहना चाहिए इस देश को, पर आम बात-चीत में, लेखन में, साहित्य में ‘हिंदुस्तान’ शब्द से आपत्ती क्यों और क्या है?

यदि आप सारे भारतीय नागरिकों की समानता को दरकिनार करके हिन्दू-वर्चश्व[5] की राजनीति करने वालों की सुनें तो वे इस के मूल में हिन्दू धर्म, संस्कृति, आदि से घ्रणा, दुराव या उस को खत्म करने की साजिश की बात करेंगे। पर मेरे विचार से यह गलत है, जो लोग ऐसे ऐतराज करते हैं उन में से अधिकतर के मन में हिन्दू-धर्म या संस्कृति से कोई घ्रणा, बैर या दुराव नहीं होता। ना ही वे इनको खत्म करने पर आमादा हैं। बात कुछ और है।

मैं ठीक से नहीं जानता, पर मेरी दो काम-चलाऊ परिकल्पनाएं हैं।

पहली परिकल्पना है पंथ-निरपेक्षता (secularism) को गलत समझ कर उसका झण्डा उठाना। जहां तक मैं समझता हूँ पंथ-निरपेक्षता राज्य-नीति के रूप में सिर्फ इतनी मांग करती है कि राज्य की नीतियाँ, नियम-कानून  बनाने में और उनके क्रियान्वयन में नागरिकों की पांथिंक आस्थाओं का कोई दखल न हो। वे इस दुनिया के विवेकशील ज्ञान और मानवीय नैतिकता पर आधारित हों। सभी नागरिक राज्य और कानून की नजर में समान हों। व्यक्ति के स्तर पर भी यह अपनी आस्थाओं से विमुख होने की मांग नहीं करती। केवल यह मांग करती है कि नागरिक एक-दूसरे से पांथिक आस्था के आधार पर भेदभाव ना करें। पर इसे गलत समझलेने वाले कुछ और ही सोचते हैं। वे लोगों के चिंतन में से पांथिक आस्था को निकालने पर आमादा हो जाते हैं, या उनको हिकारत की नजर से देखने लगते हैं। बल्कि उस से आगे जा कर हमारी भाषा, संस्कृति  और सामाजिक-व्यवहार से कुछ शब्दों, विचारों और क्रियाकलापों को बहिष्कृत करना चाहते हैं। उनके विचार से जो कुछ भी पांथिंक आस्था से कभी इतिहास में निर्मित हुआ है या विकसित हुआ है, वह सब निकाल फेंकना चाहिए। भारत में इसका एक इस से भी अधिक विकृत रूप है। वह यह की जहां भी भारतीय संस्कृति, पंथ, हिन्दू-धर्म का जिक्र आता है, वह विषेशरूप से ताज्य है। इस लिए नहीं की हिन्दू-धर्म से कोई बैर है, बल्कि इस लिए कि भाषा और समाज में सब मजहबों संबंधी शब्दावली का बराबर का उपयोग होना जरूरी है, इन लोगों के विचार से। बहुमत यदि अपनी सांस्कृतिक शब्दावली काम में लेगा तो इन लोगों के विचार से समाज की बोल-चाल में बहुमत की शब्दावली अधिक सुनाई देगी। और यह तो अन्याय होगा!!

यह भ्रामक धारणा है। और संस्कृति, भाषा और पंथ-निरपेक्षता की गलत धारणाओं का परिणाम है। भाषाएँ और सामाजिक व्यवहार संस्कृतियों के वैचारिक और नैतिक विकास की छाप लिए चलते हैं। उन्हें अपनी संकुचित दृष्टि से शुद्ध करना चाहेंगे तो वे नकली हो जाएंगी और अपनी वैचारिक धार खो देंगी। और इसकी लोगों में प्रतिकृया होगी, जो कि जायज होगी, वह अलग।

मेरी दूसरी परिकल्पना यह है कि कुछ लोग पंथ-निरपेक्षता के अर्थों और सिद्धांतों से उतने संचालित नहीं होते जितना ‘ठप्पाकांक्षी पंथ-निरपेक्षता’ (certificate seeking secularism) से। उन्हें किसी समूह विशेष में मान्यता चाहिए कि ‘ये भी पंथ-निरपेक्ष हैं’। ये बार बार ऐसा कहेंगे या करेंगे जिससे लोगों का, खाशकर ठप्पा-व्यापारियों का, ध्यान जाये, जैसे कि कह रहे हों “मुझे देखो-देखो, मुझे देखो, मैं भी पंथ-निरपेक्ष हूँ”। यह प्रवृती हमारे यहाँ बहुत ज़ोर पकड़ रही है। कड़ी बात है, पर यह प्रवृत्ती पंथ-निरपेक्षता को बिना समझे गटक लेने से पैदा होती है।

ये दोनों कोई पक्के दावे नहीं है, बस काम-चलाऊ परिकल्पनाएं हैं अभी। और यह पहचानना बहुत मुश्किल होता है कि कहाँ बे-समझी पंथनिरपेक्षता बोल रही है और कहाँ उसकी ठप्पकांक्षी बहन। माफ करिए, यहाँ कोई जेंडर संबंधी दुराग्रह नहीं है, आप चाहें तो इसे ‘उसका ठप्पाकांक्षी भाई’ कह सकते हैं।

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16 मई 2021


[1] यहाँ एक बात साफ करने जरूरी है। मैं इतिहास का अध्यता या विद्वान नहीं हूँ। और जब मैं किसी तर्क के लिए किसी विद्वान के विचार काम में लेता हूँ तो इस का अर्थ यह नहीं है कि उसकी कही हर बात के लिए प्रतिबद्धता जाहिर कर रहा हूँ। एक ही विद्वान के निष्कर्ष बहुत प्रमाण-सिद्ध और विवेकशील भी हो सकते हैं और उससी के दूसरे निष्कर्ष गलत भी हो सकते हैं। तो मैं जो चीजें प्रमाणित लग रही हैं वेही ले रहा हूँ।

[2] यह इसी लेख के लिए किया गया फौरी अनुवाद है। ““the concept of India as a country was ancient, the assertion made by Perry Anderson in his book The Indian Ideology that the India is a name given by foreigners particularly Europeans in modern times, is a totally misleading statement.”

[3] “The first perception of the whole of India as a country comes with the Mauryan Empire.”

[4] Sthan always means in Sanskrit a ‘particular spot’. But ‘stan’ in Persian is a territorial suffix…”

[5] यहाँ मैं यह साफ करदूं कि मुझे “हिन्दू-वर्चश्व की राजनीति” को “हिन्दुत्व की राजनीति” कहने से ऐतराज है। क्यों कि मेरे विचार से सावरकर के बावजूद ‘हिन्दुत्व’ का अर्थ हिंदूपना या hinduness से अधिक कुछ नहीं है। और हिन्दू होने भर से वर्चश्व चाहने की तोहमत से मुझे ऐतराज है। इसे पारिभाषिक शब्दावली मनाने से भी यह समस्या खत्म नहीं होती।