जन-बहस की मुश्किलें

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रोहित धनकर

पुलवामा में सीआरपीएफ़ के जवानों पर हमले और इस में 42 जवानों की मौत के बाद गली-कूचों में फिर से वही बहस शुरू हो गई है जो इन दुखद घटनाओं के बाद हमेशां शुरू हो जाती है। इस बहस में बहुत से सवालों पर उप-बहसें चल रही हैं। काँग्रेस और बीजेपी का व्यवहार, बीजेपी का अतीत और वर्तमान व्यवहार, कश्मीरी लोगों से देश के विभिन्न भागों में दुर्व्यवहार या आक्रमण, आदि।

जब भी ये बहसें होती है मुझे जॉन ड्यूवी की एक बात याद आती जो वे अपने एक प्रसिद्ध लेख “बच्चा और शिक्षाक्रम” के आरंभ में कहते हैं।

“सिद्धांत में गहरे अंतर कभी भी अकारण या आविष्कार नहीं होते। वे एक वास्तविक समस्या में परस्पर विरोधी तत्वों की उपज होते हैं, कोई समस्या जो केवल इसलिए वास्तविक है क्योंकि उसके तत्व, जैसे वे वर्तमान में हैं, परस्पर विरोधी हैं। किसी भी महत्वपूर्ण समस्या में ऐसी स्थितियाँ शामिल होती हैं जो एक दूसरे के विपरीत होती हैं। समाधान केवल शब्दों के उन अर्थ से दूर हो कर आता है जो पहले से तय होते हैं, और किसी अन्य दृष्टिकोण से स्थितियों को देखने से, अर्थात समस्या को ताजा रोशनी में देखने से आते हैं।”

ड्यूवी की इस बात में हम “सिद्धान्त” की जगह “लोगों के मत” पढ़ें, तो यह वर्तमान बहस में मदद कर सकती है। हालांकि इस के साथ दो लोकतान्त्रिक मूल्यों को भी मिला कर देखना होगा। लोकतंन्त्र का एक महत्वपूर्ण मूल्य “fraternity” या “भाईचारा” है। इसी की अन्य अभिव्यक्तियाँ “concern for others’ wellbeing” या “दूसरों के लिए सद्भाव” भी हैं। हम इस तरह की सारी बहसों में अपने विरोधी को मूर्ख या बेईमान या किसी राजनैतिक विचारधारा द्वारा भटकाया हुआ मान लेते हैं। यह लोकतन्त्र में “सद्भाव” के सिद्धान्त के विरुद्ध है। इस प्रवृत्ति में हम समस्या में निहित विरोधी तत्वों को देखने से इंकार करते हैं और दूसरे के विचारों और मान्यताओं को गलत या देश-हित के विरुद्ध करार देकर छुट्टी पालेते हैं।

लोकतन्त्र का एक और मूल्य “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” केवल “अभिव्यक्ति कर्ता” के लिए ही नहीं है। यदि हम सच में इस मूल्य का अर्थ समझते हैं और इसके लिए प्रतिबद्ध हैं तो यह उस अभिव्यक्ति के श्रोता से भी कुछ मांग करता है: कि हम दूसरे की बात को उसे काटने या नकारने से पहले उस के कारणों, तर्कों और भावनाओं को समझें।

इस दृष्टि से देखें तो हमें बहस के दोनों तरफ सच्चाई के (या औचित्य) के कुछ तत्व नजर आ सकते हैं, और दोनों ही तरफ कुछ भ्रम और गैरवाजिब आग्रह या मान्यताएँ भी। इन से बाहर निकले बिना हमारी बहस केवल वितंडा होती है।

उदाहरण के लिए लोगों का मोदी और उसकी पार्टी के पुराने वक्तव्य याद दिलाना आतंकियों का समर्थन नहीं है, जैसा की मोदी समर्थक मान बैठते हैं। न ही ये पक्के तौर पर काँग्रेस का समर्थन कहा जा सकता है। यह एक राजनैतिक पार्टी के मौकापरस्त व्यवहार की तरफ इशारा करना है। और इस इशारे की आम जन में बहस और चिंतन के बेहतर बनाने में बहुत जरूरत है। दूसरी तरफ, बीजेपी समर्थक जब इसे आतंकी समस्या से ध्यान हटा कर बीजेपी पर आक्रमण का हथियार मान लेते हैं तो वे भी आंशिक रूप से सही हैं, क्यों की ऐसी चीजें जो लोग प्रचारित करते हैं वे सब पार्टियों के अतीत के व्यवहार को सदा ही निष्पक्ष रह कर प्रचारित नहीं करते। वे भी कुछ राजनैतिक लाभ के लिए करते हैं। तो कोई साझी समझ बनाने के लिए यह देखना जरूरी है कि पार्टियों के मौकापरस्त और दोगले व्यवहार (जिसकी वर्तमान में बीजेपी दोषी है) को जन-स्मृति में रखना लोक हित में है, क्यों कि वह उनके निर्णयों में मदद करेगी। साथ ही यह याद दिनलना कि ये मौकापरस्त और दोगला व्यवहार केवल बीजेपी का ही दोष नहीं है, ये दुर्भाग्य से आम बात है। साथ ही राष्ट्र की आतंकवाद के विरुद्ध एकजुटता को भी ध्यान में रखना होगा। मौकापरस्ती की याद दिलाना जरूरी है, पर उसके तरीके में इस एकजुटता पर आक्रमण नहीं होना चाहिए। दोनों को अपने बद्ध-दायरों और अंध-भक्ति से बाहर निकालना होगा।

बीजेपी इस वक्त इस घटना का उन्माद फैलाने के लिए उपयोग कर रही है। और देश के किसी भी नागरिक (कश्मीरी सहित) को बिना प्रमाण के इस घटना के लिए दोषी मानना वास्तव में देशप्रेम (patriotism) के विरुद्ध है; क्यों कि देशप्रेम में एक प्रमुख भाव देशवासियों के प्रति सद्भाव और उसके हितों की परवाह और रक्षा करना है। अतः इस वक्त देश के विभिन्न भागों में रह रहे कश्मीरियों से दुर्व्यवहार या उनपर आक्रमण न केवल घोर कानूनी अपराध है बल्कि देशप्रेम की दृष्टि से घोर अनैतिक भी है। ऐसा करने वाले लोग हम सब का और इस देश का अहित कर रहे हैं। उन्हें न तो उचित ठहरा सकते हैं, नही विधिसम्मत दंड से मुक्त रख सकते हैं। भारत के सभी नागरिकों की सुरक्षा भारत के अभी भागों में राज्य की ज़िम्मेदारी है। और प्रत्येक नागरिक की नैतिक ज़िम्मेदारी भी है।

पर साथ ही जो लोग ये उन्माद फैला रहे हैं या इस के कारण अनुचित रूप से कश्मीरियों से दुर्व्यवहार कर रहे हैं वे भी भारत के ही नागरिक हैं। इन के साथ व्यवहार में भी “बंधुत्व” के और “wellbeing” के मूल्यों के कारण आम नागरिक के (अर्थात हम सब के) कुछ कर्तव्य बनाते हैं। जहां कानूनी रूप से गलती करने वालों को कानन सम्मत कड़े-से कड़ा दंड जरूर मिलना चाहिए; वहीं उन को समझने-समझाने के लिए उनकी भावनाओं को समझना और उन से संवाद भी जरूरी है। उन्हें सिर्फ मूर्ख या भटकाये हुए मानना भी देशभक्ति और लोकतन्त्र के मूल्यों के वुरुद्ध है।

अतः केवल ऐसे उदाहरण देदेना कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा 70 सीआरपीएफ़ के जवानों की हत्या के समय देश के अन्य भागों में छत्तीसगढ़ियों पर आक्रमण नहीं हुए, अब कश्मीरियों पर आक्रमण केवल फैलाये जा रहे उन्माद के कारण हैं, सही तो है पर येथेष्ट नहीं है। यह भी देखना होगा कि छत्तीसगढ़ की घटना में किसी आम छत्तीसगढ़िए ने उसे उचित नहीं ठहराया, जश्न नहीं मनाया, उसका समर्थन नहीं किया, खुशी नहीं जताई। जब कि कश्मीरी भारत के अन्य भागों में रहते हुए भी ऐसे करने के उदाहरण प्रस्तुत करते रहे हैं। यह नोट करना किसी भी तरह से कश्मीरियों से दुर्भाव को उचित ठहराना नहीं है। पर कुछ लोगों कि भावनाओं और उनके पीछे कारणों को समझने की कोशिश है। और साथ ही कश्मीरियों के व्यवहार में अनुचत्य के तत्वों को इंगित करना भी, जो कि विवेक-सम्मत संतुलित संवाद के लिए जरूरी है।

ये सब कहने का तात्पर्य यह है कि हमें एक न्यायोचित और समरस समाज चाहिए तो अपनी प्रतिबद्धता को पार्टियों और राजनैतिक विचारधाराओं की अंद्ध भक्ति से हटा कर सचेत रूप से चुने हुए मूल्यों को समर्पित करना होगा।

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18 फरवरी 2019