संस्कार और शिक्षा

January 13, 2025

रोहित धनकर

“मैं भूगोल-विद्या सीखा, खगोल-विद्या (आकाशके तारोंकी विद्या) सिखा, बीजगणित (एलजब्रा) भी मुझे आ गया, रेखागणित (ज्योमेट्री) का ज्ञान भी मैंने हासिल किया, भूगर्भ-विद्याको भी मैं पी गया। लेकिन उससे क्या? उससे मैंने अपना कौनसा भला किया? अपने आसपासके लोगोंका क्या भला किया? किस मकसदसे मैंने वह ज्ञान हासिल किया? उससे मुझे क्या फायदा हुआ?” (मोहनदास करमचन्द गांधी, हिन्द स्वराज, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, शताब्दी संस्करण २००९, (तीन भाषाओं में, गांधी का स्वयंकृत हिंदी अनुवाद), पृष्ट २१४।)

आजकल शिक्षा की किसी भी विवेचना में “संस्कार” शब्द का उपयोग बहुत निरापद नहीं है। इस शब्द से अपने आप को समतावादी और बुद्धिमान मानने या दिखाने की कोशिश करने वाले लगभग सभी लोग चिड़ते हैं। जैसे ही “संस्कार” शब्द सुना, वे इसे तुरंत ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, हिन्दुत्ववादी राजनीति, पुरातन और प्रतिगामी हिंदू सोच और जातिवाद आदि से जोड़ने लगते हैं। यह प्रवृत्ति शायद संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रति कथित आधुनिकचिंतन के बहाने से बहुत सूक्ष्म और नियोजित तरीक़े से पनपाई गई कुछ हद तक सुसुप्त घृणा का नतीजा है।

इस बौद्धिक-फैशन के चलते शिक्षा और संस्कार के संबंधों पर बात करने से पहले “संस्कार” शब्द के अर्थों पर विचार करना ज़रूरी हो जाता है। तो आइए पहले यह देखते हैं कि इस शब्द के अर्थ क्या हैं।

पुष्पपाल सिंह के “राजकमल बृहत् हिन्दी शब्दकोश” में संस्कार शब्द को निम्न प्रकार समझाया गया है:

“पूर्व जन्म, कुल-मर्यादा, शिक्षा, सभ्यता आदि का मन पर पड़ने वाला प्रभाव; हृदय और आचार-विचार आदि को परिष्कृत तथा उन्नत करने का कार्य; परंपरा से चला आया कोई कृत्य, जिसका किसी विशेष अवसर पर विधान हो; हिंदुओं में धार्मिक दृष्टि से जन्म से मृत्यु तक होने वाले १६ संस्कार (कुछ लोगों के अनुसार १२ संस्कार) जो इस प्रकार हैं—गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जत्कर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत, कर्णभेद, विद्यारंभ, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवा, और अंत्येष्टि। शुद्ध करने वाला कोई कृत्य, कुछ विशिष्ट अवसरों पर होने वाला कोई ऐसा धार्मिक या सामाजिक कार्य; मृतक की अंत्येष्टि क्रिया।”

यह व्याख्या अन्य हिन्दी शब्दकोशों—जैसे भार्गव आदर्श हिन्दी शब्दकोश, बृहत् प्रामाणिक हिंदी कोश, आदि—से संगत है। संस्कृत कोश आप्टे, मोनियर विलियम्स, वाचस्पत्यम्, शब्द कल्पद्रुम, आदि कई और अर्थ भी देते हैं। पर संस्कार शब्द के मूल अर्थों में उपरोक्त व्याख्या से कोई विरोध नहीं है। मैंने उपरोक्त व्याख्या इस लिये चुनी है कि यह इस शब्द को तीन स्तरों पर समझने की ओर स्पष्ट संकेत देती है: (१) संस्कार शब्द का मूल-भाव (मन पर पड़ने वाला प्रभाव) , (२) उस मूल-भाव के सकारात्मक उपयोग से संबंधित कर्म (परिष्कृत तथा उन्नत करने का कार्य), और (३) विशिष्ट कार्य जो मूल-भाव का उपयोग करके परिष्कार के उदारण हैं (१६ संस्कार)। यहाँ सवाल यह नहीं है कि ये १६ संस्कार किसी तरह का परिष्कार करते हैं या नहीं। सवाल सिर्फ़ यह है कि इन्हें संस्कार कहने के पीछे तर्क यह मान्यता है कि “ये परिष्कार करते हैं”, चाहे यह मान्यता ग़लत ही क्यों ना हो।

  • इस दृष्टि से संस्कार शब्द का मूल-भाव किसी अनुभव से मन पर पड़ने वाला स्थाई प्रभाव या इम्प्रैशन या डिस्पोजिशन है। यह मनोविज्ञानिक दृष्टि से सीखना और उस से बनाने वाली स्थाई प्रवृति/रुझान का नाम है।
  • बिंदु (१) में उल्लिखित वांछनीय प्रभाओं को उत्पन्न करने वाले कार्य या परिस्थितियों को भी संस्कार शब्द से इंगित करने का रिवाज है, पर यह मूल-भाव का व्यत्पन्न और उस पर निर्भर अर्थ है।
  • वे कर्म जो बिंदु (२) में चाहे गये प्रभावों के उत्पन्न होने में सहायक हो सकते हैं या सहायक माने जाते हैं, उन्हें भी संस्कार शब्द से इंगित किया जाता है। पर ये मात्र उदाहरण हैं जो बिंदु (१) और (२) में दिये अर्थों पर निर्भर हैं, उनके उपजीवी हैं।

अतः हम कह सकते हैं कि संस्कार शब्द का मूल अर्थ मन-बुद्धि पर पड़ने वाला स्थायी प्रभाव ही है। और हम संस्कार शब्द के शिक्षा से संबंध के मात्र एक पहलू को इसी अर्थ में समझाने की बहुत ही संक्षिप्त कोशिश करंगे।

अब आरंभ में उद्धृत गांधीजी के कथन के माध्यम से शिक्षा और संस्कार का संबंध देखने की कोशिश करटते हैं। उक्त कथन में गांधीजी कहते हैं कि भूगोल, खगोल, बीजगणित, रेखागणित और भूगर्भ-विद्या सिखने से ना तो उनका कुछ भला हुआ नाही उन में दूसरों का भला करने की कोई योग्यता आई। आगे हक्सली की लिबरल शिक्षा की परिभाषा को उद्धृत करके गांधी जी कहते हैं कि यदि यह असली सीखा है तो मुझे उपरोक्त शास्त्र सिखने से यह शिक्षा नहीं मिली।   

प्रोफेसर हक्सली ने उक्त उद्धरण में उदार (लिबरल) शिक्षा के कई गुण लिखे हैं। इस छोटे आलेख में मैं उन सभी का ज़िक्र करने के बजाय सिर्फ़ तीन गुणों की बात करूँगा। और यहाँ हक्सली के उद्धरण का अनुवाद भी मेरा अपना काम-चलाऊ अनुवाद है। मैं गांधी जी के हिन्द स्वराज में दिये अनुवाद को पक्षपाती या ग़लत मानता हूँ। तो हक्सली के अनुसार उदार-शिक्षा उस व्यक्ति को मिली है:

  • “जिसका मन प्रकृति के मूलभूत सत्यों के ज्ञान से भरा हुआ है”,
  • “जिसकी बुद्धि स्पष्ट, शांत, तर्कशील है”, और
  • “जिसने सभी तरह की दुष्टता से घृणा करना और दूसरों का अपने समान सम्मान करना सीख लिया है।”

अब यह देखते हैं कि गांधी जी ने जो शास्त्र गिनाये हैं वे इस प्रकार की शिक्षा में मददगार हो सकते हैं या नहीं।

पहली बात, “मन प्रकृति के मूलभूत सत्यों के ज्ञान से भरा हुआ” होना तो एकदम सीधी और साफ़ बात है ही। भूगोल, खगोल-विज्ञान और भूगर्भ-विज्ञान “प्रकृति के मूलभूत सत्यों” को ही शिक्षार्थी के मन-बुद्धि में सृजित करना चाहते हैं। ये शिक्षण के अनुभव के माध्यम से बनी अवधारणायों और उन की संरचनाओं के मध्यम से होता है। यही मन-बुद्धि में संस्कार बनाना है। पर यह शिक्षा के उद्देश्यों और संस्कार निर्मिति की सब से नीचे वाली सीढ़ी है। इस सीढ़ी पर प्राप्त ज्ञान (संस्कार) जीवन में सीधे काम आ सकते हैं, अर्थात् स्वयं और दूसरों का भला कर सकते हैं।

दूसरी बात, बुद्धि का “स्पष्ट, शांत, तर्कशील” होना। गांधी जी द्वारा व्यर्थ बताये सभी पंचों शास्त्र (भूगोल, खगोल, बीजगणित, रेखागणित और भूगर्भ-विद्या) साक्ष्य और तर्क के आधार पर निष्कर्ष निकालना सिखाते हैं। यह इन शास्त्रों के विषय-वस्तु (कंटेंट) को सीखने का बौद्धिक परिणाम होता है। विषय-वस्तु अपने आप में उपयोगी होती है, पर शैक्षिक दृष्टि से वह कुछ अधिक महत्वपूर्ण और उच्चमुल्यवान वस्तु सिखाने के साधन के रूम में भी काम में ली जाती है। वह उच्चमुल्यवान वस्तु चिंतन की स्पष्टता, विवेकशिलता (तर्क सहित) और सत्य की शांत खोज है। और यह सिखाने का और कोई तरीक़ा नहीं है, विभिन्न शास्त्र पूर्ण समझ के साथ सिखाने के अलावा। यह विवेकशालता भी संस्कार का ही दूसरा अधिक उन्नत रूप है। यह एक मनोवृत्ति (डिस्पोजिशन) भी पैदा करती है: किसी चीज को स्वीकारने से पहले उसके सत्य की तथ्य-तर्क-संगत जाँच करने की मनोवृति। यह मनोवृत्ति विवेक का मूल है।

तीसरी बात, “सभी तरह की दुष्टता से घृणा करना और दूसरों का अपने समान सम्मान करना” सिखाना। यह नैतिक विकास की तरफ़ संकेत है। यदि सचेत और समझ के साथ उपरोक्त पाँच शास्त्र और साथ ही इतिहास, समाज विज्ञान और साहित्य सिखाया जाता है तो वह इस लिये भी कि हम अपने आप को मानव समुदाय के एह हिस्से के रूप में देख सकें। और दूसरों को अपने जैसा देखना नैतिकता का मूल है।

अतः ये तीनों चीजें मिलकर मानव मन और बुद्धि का परिष्कार करती है। उसे संस्कारित करती हैं। सद्भाव पूर्ण विवेकशील स्वायत्तता की मानवीयता का केंद्र बिंदु है। यही संस्कार शिक्षा के माध्यम से विकसित किया जाता है। इसी लिए “संस्कार” शब्द का एक अर्थ “शिक्षा” भी है। शिक्षा मानव के परिष्कार का नाम तो है ही।

यह छोटा-सा आलेख दो मुद्दों पर बात करने के लिए लिखा गया है। एक, संस्कार शब्द से अनुचित चिड़ को इंगित करने के लिए। दो, यह कहते कई लोग सुनाई देते हैं कि “स्कूली विषयों का जीवन में कोई बहुत महत्व नहीं है, वे आगे काम में नहीं आते”। जैसे यह कहना कि “गणित में ट्रिगोनोमेट्री मैंने आगे कभी काम में नहीं ली” या “ग्रेविटी का न्यूटन का सूत्र मेरे कभी काम में नहीं आया” या “रसायन विज्ञान के समीकरण कभी काम में नहीं आये”, आदि। यह भ्रामक विचार है। शिक्षा का असली मुद्दा इन शास्त्रों की विषयवस्तु घोटलेना नहीं होता है। बल्कि इनके माध्यम से विभिन्न मनोवृतियाँ और योग्यताएँ विकसित करना होता है। जो हमें सद्भाव और विवेक सिखाती हैं। यही मानव का परिष्कार है। अतः गांधी जी का यह कथन चाहे किसी विशेष और खींचे हुए अर्थ में सही हो, चाहे उस वक़्त किसी राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति करता हो; शिक्षा की दृष्टि से ग़लत है।

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Sri Aurobindo’s idea of true and living education

January 5, 2025

Rohit Dhankar
“… that alone will be a true and living education which helps to bring out to full advantage, makes ready for the full purpose and scope of human life all that is in the individual man, and which at the same time helps him to enter into his right relation with the life, mind and soul of the people to which he belongs and with that great total life, mind and soul of humanity of which he himself is a unit and his people or nation a living, a separate and yet inseparable member.” (Sri Aurobindo, Early Cultural Writings, in THE COMPLETE WORKS OF SRI AUROBINDO, Sri Aurobindo Ashram Publication Department, Pondicherry, 2003, p.425)
Aurobindo here is talking of three deeply interconnected but independent entities: one, the Individual; two the Nation or the people to whom that individual belongs; and three, Universal Humanity.
(1) For the Individual: he recommends “bring out to full advantage, makes ready for the full purpose and scope of human life all that is in the individual man”. That means development of the Individual educatee’s mental (including moral), physical, and emotional (including relational) capabilities to prepare him/her to the full purpose of human life. In today’s India this would mean development of understanding (knowledge), values and practical skills to finds one’s appropriate place in the society and choose the kind of life one wants to live.
(2) For the nation: Aurobindo considers an Individual in the society or the people to whom s/he belongs; what he seems to have in mind is the nation. Education according to him “helps him (the individual) to enter into his right relation with the life, mind and soul” of the nation. What does entering into right relation with life, mind and soul of the nation mean? Certainly, it means understanding the national life, the way national society thinks and makes choices, and the deeper moorings of the national thought in terms of cultural and spiritual beliefs, historically formed over many millenia. This kind of understanding will include a sense of belonging, appreciation, pride as well as critical analysis of the functioning and repertoire of beliefs in the society. A blind faith or love or devotion cannot be called a “right relation”, nor a detached disdain can be called so. Blind faith etc. goes against development of the full capabilities of the individual, point (1) above, because full purpose of life most certainly includes making right choices on one’s own as well. Detached disdain cuts the very basis on which individual ‘self’ and self-respect can develop.
(3) For the Universal Humanity: For Aurobindo the nation is part of the “great total life, mind and soul of humanity” as an individual is part of the nation. The individual has a twin relationship with the universal humanity: himself/herself as a member and through his/her nation which is also a “separate and yet inseparable member” of universal humanity. “Separate” perhaps here means “an undoubtedly distinguishable” (Indian, American, Chines, etc.) and “inseparable” as they all are possible in the totality of universal humanity and are certainly shaped and guided and nurtured by it. Thus, one is an Indian (for example) and a human. Her Indianness gives her a distinct identity and her humanity gives her a larger picture within which she judges, evaluates and even shape the Indianness. This kind of ‘twin relation’ negates aggressive nationalism where one nation becomes a perpetual rivel in conflict with all other nations. This helps the individual develop a nationalism which has deep benevolence to all other nationalities and urges him/her to understand them and cooperate with them, recognizing their right to flourish as of his/her own nationality.
This three pronged ideal of education makes the vision of education well rounded and complete. It prepares the student for a robust national life as well as global responsible citizenship, and universal brotherhood.
How does one bring this ideal to the practice in all our schools? We at Digantar exploring this and many other such ideals through appropriate educational practices. And find much common in other universal ideals of education with this.


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अंबेडकर फैशन

December 20, 2024

रोहित धनकर
प्रधानमंत्री से लेकर हर आम नागरिक तक सब भारत के संविधान को “बाबा साहब का दिया संविधान” कहते हैं। यह फ़ैशन है। यह आम जन और विशेषरूप से नवयुवा पीढ़ी को मूर्ख बनाने की साजिस भी है। और झूठ है।
भारत की संविधान सभा में कुल सदस्य 389 थे, जिनमें से 292 प्रांतों के प्रतिनिधि थे, 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे तथा 4 दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कुर्ग और ब्रिटिश बलूचिस्तान के चीफ कमिश्नर प्रांतों के प्रतिनिधि थे।
संविधान सभा में कुल २२ समितियाँ थीं। उन में से १३ प्रमुख समितियाँ निम्न लिखित हैं। (यह विकिपीडिया से लिया है, चाहें तो और अधिक आधिकारिक स्रोत देखलें।) इन सब के अध्यक्षों के नाम ध्यान से देख लें।

प्रमुख समितियाँ

  1. प्रारूप समिति – भीमराव रामजी अम्बेडकर
  2. संघ शक्ति समिति – जवाहरलाल नेहरू
  3. संघ संविधान समिति – जवाहरलाल नेहरू
  4. प्रांतीय संविधान समिति – वल्लभभाई पटेल
  5. मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय और ऐक्सक्लूडेड क्षेत्रों पर सलाहकार समिति – वल्लभभाई पटेल। इस समिति में निम्नलिखित उपसमितियाँ थीं:
    a. मौलिक अधिकार उप-समिति – जे.बी. कृपलानी
    b. अल्पसंख्यक उप-समिति – हरेंद्र कुमार मुखर्जी,
    c. उत्तर-पूर्व सीमांत जनजातीय क्षेत्र और असम बहिष्कृत और आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति – गोपीनाथ बोरदोलोई
    d. बहिष्कृत और आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र (असम के अलावा) उप-समिति – ए वी ठक्कर
  6. प्रक्रिया समिति के नियम – राजेंद्र प्रसाद
  7. स्टेट्स कमेटी (राज्यों के साथ बातचीत के लिए समिति) – जवाहरलाल नेहरू
  8. संचालन समिति – राजेंद्र प्रसाद
  9. राष्ट्रीय ध्वज पर तदर्थ समिति – राजेंद्र प्रसाद
  10. संविधान सभा के कार्य हेतु समिति – जी वी मावलंकर
  11. हाउस कमेटी – बी पट्टाभि सीतारमैया
  12. भाषा समिति – मोटुरि सत्यनारायण
  13. बिजनेस कमेटी का आदेश- के एम मुंशी

संविधान सभा का काम-काज कुछ व्यवस्थित चरणों में चला था, जो निम्न प्रकार थे:

  • समितियाँ ने अपने क्षेत्र के मुद्दों पर रिपोर्ट पेश की।
  • बी. एन. राव ने रिपोर्टों और अन्य देशों के संविधानों पर अपने शोध के आधार पर एक प्रारंभिक मसौदा तैयार किया।
  • बी. आर. अंबेडकर की अध्यक्षता वाली मसौदा समिति ने एक विस्तृत मसौदा संविधान प्रस्तुत किया जिसे सार्वजनिक चर्चा के लिए प्रकाशित किया गया।
  • मसौदे संविधान पर चर्चा की गई, और संशोधन प्रस्तावित और अधिनियमित किए गए।
  • संविधान को अपनाया गया, जिसमें कांग्रेस पार्टी (जिसे कांग्रेस की संविधान पार्टी के रूप में जाना जाता है) के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक समिति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह सभा उस वक्त भारत का प्रतिनिधित्व करती थी। उपरोक्त प्रक्रिया और समितियों के काम से स्पष्ठ है कि संविधान किसी एक व्यक्ति का नहीं था। किसी भी लोकतांत्रिक देश का संविधान एक व्यक्ति का दिया नहीं हो सकता। ऐसा सिर्फ़ अधिनायकवाद में ही संभव है, लोकतंत्र में नहीं।
ध्यान देने की बात है कि भारत का आम नागरिक संविधान को उद्द्येशिका (preamble) और मौलिक अधिकारों से आगे नहीं जानता। यह भी पढ़ता नहीं, सुनता है। उद्द्येशिका का लगभग समस्त भाव जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत १९३० के संविधान में उपस्थित था। साथ ही जवाहर लाल नेहरू के संविधान सभा में दिये भाषण में भी था। मौलिक अधिकारों की समिति के अध्यक्ष सरदार पटेल थे। अतः इन दोनों में उनका योगदान अति महत्वपूर्ण था।
यह मैं अंबेडकर के योगदान और महत्व को कम करने के लिए नहीं लिख रहा। उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण था। पर संविधान एक महती सामूहिक प्रयास और बौद्धिक विमर्श का नतीजा था, किसी एक व्यक्ति की देन नहीं। साथ की भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ने वह ज़मीन तैयार की थी, जिस में संविधान सभा बन सकी।
“बाबा साहब का संविधान” एक वोट बैंक प्रेरित राजनैतिक नारा है। यह वर्तमान फ़ैशन है। यह देश के नवयुवा नागरिकों को भ्रमित करता है। दु:ख की बात यह है कि आज के कथित बौद्धिक, राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक, और इतिहास के प्राध्यापक भी इस मूर्ख, भ्रामक और घातक नारे के प्रचार में लगे हैं। इन में से एकआध तो सामाजिक माध्यमों पर इतिहास के चैनल भी चलाते हैं। पर सब अपनी बेईमानी और स्वाहित के चलते झूठ को आगे बढ़ा रहे हैं, जब कि इन का काम लोकतंत्र में बुद्धुपना और झूठ फैलाने वाले हर प्रचार की पोल खोलता है।



द साबरमती रिपोर्ट: एक टिप्पणी

November 26, 2024

रोहित धनकर

कल द साबरमती रिपोर्ट देखी। अपने आप को निष्पक्ष बता कर ढोल पीटने वाले मीडिया का बिलकुल सही चित्रण किया गया है। उनकी तथाकथित पंथ-निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों से साँठ-गाँठ भी बहुत सटीक और साफ़ दिखाई गई है। लेकिन बहुत कुछ सिर्फ़ इशारों में।

जस्टिस बनर्जी रिपोर्ट का पूरा शर्मनाक नाटक बहुत साफ़ नहीं बताया गया है। इस विषय पर बहुत कुछ है जो शर्मनाक है और जिस पर अभी सार्वजनिक बहस खुल कर नहीं हुई है। गोधरा ट्रेन में आग लगाई जाने के बाद और गुजरात दंगों के बाद भारतीय मीडिया, कुछ कथित ग़ैर-सरकारी संस्थाओं और व्यक्तियों की काली करतूतों का पूरा खुलासा अभी बाक़ी है।

कभी भविष्य में शायद इस चीज का विश्लेषण हो कि गुजरात दंगों के बाद चलाये गये नरेटिव का मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में बहुत बड़ा योगदान रहा है। भारतीय जनता पार्टी की २०१४ की जीत गोधरा ट्रेन में आग लगाने की घटना को दबाने और दंगों के बाद चलाये गये एक-तरफ़ा आख्यान की अनाभिव्यक्त प्रतिक्रिया का नतीजा भी थे। इस आख्यान ने एक स्वभावत: पंथ-निरपेक्ष (राजनैतिक मामलों में पंथ निरपेक्ष, सब जगह नहीं) समाज को अपने साथ दसकों से हो रहे दुराव को देखने पर मजबूर किया। लोगों का कांग्रेस और जातिवादी क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टियों से विश्वास उठ गया। पंथ-निरपक्षता (सिक्यूलरिज्म) की विकृत परिभाषा और वोट बैंक के लिए उसका स्वार्थपूर्ण उपयोग धीरे धीरे उजागर हो गया। इस दृष्टि से यह फ़िल्म गोधरा ट्रेन में आग लगाने की घटना को भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ देने वाली घटना ठीक ही बताती है।

फ़िल्म में यह दिखाया गया है कि गोधरा कांड के सच को मीडिया और राजनीतिक पार्टियों ने दबा दिया। लोगों को उस सच का पता नहीं चला। मेरे विचार से यह ग़लत है। मीडिया (कथित निष्पक्ष मीडिया) ने उसे दबाने की पुरज़ोर कोशिश की। राजनैतिक पार्टियों ने उसे नकारा। हमारी कथित-उदारवादी जमात ने उसे हादसा सिद्ध करने की कोशिश की। पर मुझे उस वक़्त का माहौल और छोटे समूहों में होने वाली चर्चाएँ याद हैं। लोग यह जानते और मानते थे कि आग हादसे में लगी नहीं, जान बूझ कर लगाई गई थी। यह ठीक है कि ऐसा लिखा नहीं गया, नाही उन जगहों पर बोला गया जहां की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है। पर लोग जानते थे। हम लोग अभिव्यक्ति पर सरकारी बंदिश की तो बहुत बात करते हैं, पर हमारी कथित-उदारवादी जमात अपने विरोधी विचार की अभिव्यक्ति को जिस सफ़ाई और मुस्तैदी से रोकती है उस की समझ अभी भी समाज में बहुत कम है। आप किसी कथित-बौद्धिक समूह में उस के आख्यान के वुरुद्ध तथ्य और तर्क रख कर देखिए। आप को ५ मिनट में पता चल जाएगा कि उस विश्लेषण को किस तरह तुरंत रोका जाता है। तो लोग इस घटना की सच्चाई जानते थे, मानते थे; पर कहते नहीं थे।

मेरे विचार से फ़िल्म में एक और गलती है। आख़िर में राम मंदिर और राम की पूर्ति पर कैमरा केंद्रित करने की ज़रूरत नहीं थी। इस से फ़िल्म का आख्यान बाधित हुआ है और यह बायस्ड लगाने लगी है। यह ठीक है कि जलाये गये डब्बे में अधिकतर लोग अयोध्या की राम मंदिर से संबंधित यात्रा करके आये थे। पर यह बात फ़िल्म के आख्यान में मज़बूती के साथ आनी चाहिए थी, ना कि राम मंदिर और राम की मूर्ति पर कैमरा केंद्रित करके।

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Job opportunity: Principal

October 25, 2024

An opportunity for those who can take-up a challenging job

We are reporting this advertisement. A few candidates whom we found suitable among the earlier applicants seem to have got jobs elsewhere before we completed the process. This time we will keep the process brief.

It is a challenging job. However, there is a very good team and a stable organisation to support the principal. Details of expectations are given in the job description.

If you want to see the location and satellite view of the school just type “Digantar Vidyalaya Bhavgarh” in google maps. History and pedagogy of the school and philosophy of the organisation can be found at digantar.org.

Detailed Job Description

Principal Position at Digantar Vidyalaya, Jaipur

Introduction

Digantar, established in 1978 as an alternative school in Jaipur, provides completely free education to 186 children across its two schools, serving the local community. We are embarking on a transformative journey to ensure the financial self-sustenance of one of the two Digantar Vidyalayas and to expand our unique self-paced, independent learning approach. Under Vision 2030, we plan to introduce a model in one of our Vidyalayas where 50% of students will continue to receive free education, while the other 50% will pay fees.

For further information visit: https://www.digantar.org

Key Responsibilities

In order to transform our existing school, we need a principal with a deep commitment to the level of obsession to actualize this vision into reality. While we aim to keep the job description concise – essentially, ‘Transform and Run the school!’- Below are the key indicators for the broader responsibilities of the position:

  1. Make and implement strategies to achieve the 50-50 model of free and fee-paying students while ensuring socio-political equality and quality education.
  2. Community Engagement and Admissions: Build partnerships with parents, community members, and educational partners to support the school’s mission and ensure admissions of both fee-paying and non-fee-paying students.
  3. Oversee Curriculum and Pedagogy: Refine and align the curriculum with pedagogy, recruit teachers and plan capacity building programmes.
  4. Implement Financial Models: Develop fundraising strategies, and build community support to ensure the school’s financial self-sufficiency.
  5. Ensure Compliance and Efficiency: Oversee school operations, including curriculum alignment, resource management, infrastructure upgrades and sustain school culture. 

Essential Qualifications

  1. Master’s degree in any of the subjects from a recognized university.
  2. A degree in education, such as a B.Ed. or its equivalent, or an M.Ed., is required.
  3. A Ph.D. in the relevant area will be advantageous.
  4. Experience of 5 years or above as a principal of a financially successful school.
  5. Proficiency in English and Hindi languages is essential.
  6. Excellent communication skills with the ability to convince parents and build partnerships.
  • Knowledge of educational aspects, policies, and a strong conviction in the idea of education.
  • Proven leadership experience in education, ideally in a transformative role.
  • Deep understanding of progressive educational practices and their implementation.
  • Strong financial intelligence and experience in managing budgets and fundraising initiatives.
  • School principal holds a pivotal role within the administrative structure of schools, collaborating effectively with fellow administrators, staff, teachers, students, and parents. She/he must have the disposition to maintain harmonious and productive relationships with all these stakeholders.

Remuneration and Location

  1. The consolidated salary that is negotiable up 1, 10,000/- per month.
  2. The job location is Jaipur.

Selection Process and Important Dates

  1. Please fill in the basic information using the link provided below and upload your CV given at the end of the form: https://bit.ly/Information_Digantar.
  2. The deadline for submitting the form is 2nd November 2024.
  3. After reviewing the information and CVs, selected candidates will be informed via phone or email by 4th November 2024 for the next steps.

For shortlisted candidates, the selection process will consist of two stages:

  1. An online conversation with the Secretary of Digantar
  2. A final in-person interview conducted by a panel of approximately 4 to 5 members.

For further information, please contact: Mr. Khyaliram Swami, Mobile No: 9214181380 Email: kswami.digantar@gmail.com


Capacity building of the teachers: For NCFSE 23

October 21, 2024

For implementation of NCFSE 2023


लोकतंत्र को ख़तरा किस से है?

June 9, 2024

रोहित धनकर
लोकतंत्र के समाप्त होने के, संविधान ख़त्म करने के और अधिनायकवाद या फासीवाद स्थापित होने के नारे पिछले १० साल में बार बार लगते रहे हैं। मैं नहीं मानता कि उन नारों में कुछ सच्चाई थी। वे सब झूठ के पुलिंदे थे। मैं बीजेपी समर्थक कभी नहीं रहा हूँ, अब भी नहीं हूँ। पर मुझे लगता है सत्य, स्वतंत्रता और समानता पार्टियों और मज़हबों से बड़े मूल्य हैं। और जहां वे ख़तरे में होते हैं तब हमें सचेत हो जाना चाहिए। पर स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में फ़र्क़ भी होता है। स्वतंत्रता किन्ही सार्वस्वीकृत नियमों (संविधान, क़ानून) के दायरे में स्व-निर्देशित व्यवहार को कहते हैं; और उच्छृंखलता नियमों को ताक पर रख कर अपनी मनमर्ज़ी करने का नाम है। स्वतंत्रता लोकतंत्र का प्राण है, आधार है। उच्छृंखलता लोकतंत्र की बीमारी है, जो हद से गुजर जाने पर लोकतंत्र का अंतिम क्रियाकर्म कर सकती है। लोकतंत्र को ख़तरा स्वतंत्रता के बाधित होने से भी आ सकता है और उच्छृंखलता को बढ़ावा देने से भी। मैं समझता हूँ कि इस वक्त लोकतंत्र को दूसरे प्रकार का ख़तरा है।
प्लेटो के रिपब्लिक में नीचे दिया संवाद इसी उच्छृंखल स्थिति के बाद तानाशाही ख़तरे की बात करता है, इसे थोड़ा ध्यान से पढ़िये:
[“क्या इसी प्रकार जनतंत्र के विनाश का कारण भी उसी वस्तु की अत्यधिक वासना नहीं है जो जनतंत्र का लक्षण बतलाई जाती है तथा जो उस (जनतंत्र) की दृष्टि में श्रेय की कसौटी है?”
“तुम इसका लक्षण या कसौटी किसको कहते हो?”
मैंने उत्तर दिया, “स्वतंत्रता को। क्यों कि तुम कहा जाता हुआ सुनोगे कि यह स्वतंत्रता अपने सुंदरतम रूप में जनतांत्रिक राष्ट्र में ही उपलब्ध होती है, अतएव स्वतंत्र प्रकृति का व्यक्ति केवल जनतांत्रिक शासन में ही रहना स्वीकार करेगा।”
उसने कहा, “सो क्यों नहीं, यह कथन तो तुम सर्वत्र सुन सकते हो।”
मैंने कहा, “तो, जैसा कि मैं अभी कहने वाला था, क्या इसी की अतिशय वासना और अन्य सब वस्तुओं की अवहेलना ही वह चीज नहीं है जो इस शासन प्रणाली में भी क्रांति उत्पन्न कर के तानाशाही की आवश्यकता के लिए पथ प्रशस्त करने वाली है।”
उसने पूछा, “कैसे?”
“मैं समझता हूँ कि जब स्वतंत्रता पान करने के लिए तृषित जनतंत्र राष्ट को नेताओं के स्थान में बुरे चषकवाहक (साक़ी) मिलजाते हैं, तथा जब वह राष्ट्र इस अविमिश्रित शुद्ध मदिरा (स्वतंत्रता) से छक कर मदमस्त्त हो उठता है तो यदि उस के तथाकथित शासनकर्ता उसके प्रति अतिशय मृदुलता और विनम्रता का व्यवहार नहीं करते तथा उसके प्रति स्वतंत्रता का अत्यधिक मात्रा में वितरण नहीं कराटे तो यह यह उनको दंड देता है और उनके ऊपर अभिशप्त ऑलीगार्क (बनियाशाह) होने का दोषारोपण करता है।”
उसने उत्तर दिया, “हाँ, वे ऐसा ही करते हैं।”
मैंने कहा, “यह तो है ही। और जो लोग शासकों की आज्ञा मानते हैं उनका यह राष्ट्र, इन को स्वेच्छादास और निरर्थक व्यक्ति कह कर निरादर करता है, किंतु जो शासक प्रजाओं के समान होते हैं अथवा जो प्रजाजन शासकों के सदृश होते हैं इनको वह सार्वजनिक और व्यक्तिगत रूप में प्रशंसा और आदर प्रदान करता है। क्या यह बात अनिवार्य नहीं है कि ऐसे राष्ट्र में स्वतंत्रता की भावना मर्यादा के छोर तक पाँच जाये?”
“अवश्यमेव।”]
यह उद्धरण मैं इस लिये नहीं दे रहा हूँ कि प्लेटो ने रिपब्लिक में जो कुछ लिखा वह सब सही है, पर वर्तमान स्थिति को समझने के लिए ये सटीक उदाहरण है।
लोकतंत्र क्यों कि स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति-गरिमा पर टिका होता है; इस लिये इस के बने और विकसित होने के लिए लोगों का व्यवस्थाओं में भरोसा होना ज़रूरी है। भरोसे का अर्थ यह नहीं होता कि व्यवस्था के हर अंग (संसद, चुनाव आयोग, उच्चतम न्यायालय, आदि) को हर बात में एकदम सही माना जाये। ये संस्थाएँ ग़लतियाँ कर सकती हैं, इनका दुरुपयोग भी संभव है सत्ता के द्वारा। पर ज़िम्मेदार नागरिक, राजनैतिक दल, राजनेता और कथित बुद्धिजीवियों (यदि इन में अभी भी बुद्धि बची हो) का यह कर्तव्य होता है कि वे इनकी ग़लतियों को सत्य और विवेक के आधार पर बिना इन पर भरोसा ख़त्म किए सुधारें, सुधारने की कोशिश करें। ना कि झूठ फैलाकर इन संस्थाओं में भरोसा ही ख़त्म कर दें।
अभी तजा बात है इस लिये हम सभी जानते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने वोटिंग मशीन में भरोसा तोड़ने की भरपूर कोशिश की। चुनाव आयोग में भरोसा तोड़ने की भरपूर कोशिश की। जब इन को कुछ हद तक अच्छे नतीजे मिले तो अब पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अवैध बताने की कोशिश ज़ोरों पर है। बड़े नेता (जयराम रमेश और ममता बैनर्जी) बीजेपी की आज सपथ लेने वाली सरकार को अवैध कह रहे हैं। योगेन्द्र यादव का फ़रमान है कि इस सरकार के पास जनादेश नहीं है, और नाही इक़बाल (सरकार चलाने के लिये ताक़त)। यह पूरी प्रक्रिया को अवैध ठहराना है। और एक पूरी फ़ौज इन आप्त-वचनों को फैलाने में लगी है।
इन से पूछा जाना चाहिए कि संवैधानिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार अवैध कैसे है? यदि गठबंधन के बहुमत से कांग्रेस की कई सरकारों के पास जनादेश माना गया था तो इस सरकार के पास क्यों नहीं? जनादेश चुनाव में बहुमत के अलावा और कहाँ से आता है? इस का वह गुप्त स्रोत क्या है जो श्री रमेश, सुश्री बैनर्जी और श्री यादव जानते हैं, पर भारतीय जनता नहीं जानती? यह कोई आध्यात्मिक चीज़ है क्या को नेहरू परिवार के पास ही सुरक्षित रहती है? इक़बाल है कि नहीं यह तो सरकार बनाने के बाद पता चलेगा।
ये दावे और इस तरह के आख्यान (narratives) लोगों के मन में देश के ढाँचे के प्रति अविश्वास फैलाते हैं। विदेशों में लोगों को यह कहने का आधार देते हैं कि भारत में लोकतंत्र नहीं है। जिस देश में ६० करोड़ से ऊपर लोगों ने मतदान किया हो, हिंसा बहुत कम हुई हो, आराम के अगली सरकार बन रही हो, विपक्षियों को अपनी सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ (जो दसकों से करते रहे हैं) की स्वतंत्र हो; वहाँ वैधता ना होने, जनादेश ना होने के क्या अर्थ हो सकते हैं? शिवाय इसके कि ‘वैधता और जनादेश वह है जो हम चाहते हैं, जो हमें ना पसंद है वह सब अवैध’। इस के अलावा जनता ने कोई निर्णय किया तो यातो वह मूर्ख है या उस के निर्णय की वैधता नहीं है। अजीब बात है, इस प्रकार के आत्मकेन्द्रित विचार रखने वाले और लोक के निर्णय को अवैध बताने वाले लोकतंत्र की बात करते हैं!
इस के साथ अब कुलविंदर कौर के दुष्कृत्य को मिलने वाले समर्थन, उसे दंड से बचाने के लिए चलाई जाने वाली मुहिम और विपक्षी दलों तथा कथित बुद्धिजीवियों की इस मामले पर चुप्पी को मिलाकर देखिए। एक तरफ़ सरकार को अवैध बताना, जनादेश विहीन और इक़बाल-हीन बताना; और दूसरी तरफ़ जातीवाद (जाट वाद) और किसान-वाद के नाम पर ऐसा महोल बनाना कि सरकार को कुलविंदर के साथ नरमी बरतनी पड़े। कुलविंदर को विधि सम्मत दंड ना देपाने पर सरकार इक़बाल-हीन सिद्ध हो जाएगी। दंड दिया तो जाट किसान-वाद के नाम पर झूठा आंदोलन खड़ा हो जाएगा। इस आंदोलन में ख़लिस्तानी तत्व मुखर रूप से सामने आयेंगे (पिछला किसान आंदोलन याद करिए)। इसे देखते हुए सरकार को कड़ाई करनी पड़ेगी। कड़ाई की तो, लोगों को आंदोलन की स्वतंत्रता नहीं है के नारे लगेंगे। साथ ही चुनी हुई सरकार के अवैध होने और उसके पास जनादेश ना होने का आख्यान आपने चला ही रखा है। तो आप अराजकता और झूठे आख्यानों के आधार पर लोकतंत्र की जड़ों पर कुठाराघात करेंगे।
यह ज़िम्मेदार नागरिकों, दलों और बुद्धिजीवियों का व्यवहार तो नहीं है। सत्ता के लिए ललचाये हुए, और उसे किसी भी क़ीमत पर हथियाने की कोशिश करने वालों का ज़रूर है।
इधर कुछ अतिउदारों को यह बात समझ में नहीं आरही कि ड्यूटी पर तैनात सुरक्षा-कर्मी का अपने व्यक्तिगत, या सामूहिक, आक्रोश के आधार पर किसी पर आक्रमण (१) भारतीय नागरिक के नाते अपराध है, और (२) सुरक्षा-कर्मी के नाते अनुशासनहीनता है। उन्हें अपने भावनात्मक लगावों के कारण यह नहीं दिख रहा कि कुलविंदर और सातवंत सिंह के दुष्कृत्यों में फ़र्क़ सिर्फ़ मात्रा (डिग्री) का है, श्रेणी (category) या गुण-अवगुण (quality) का नहीं। आप थोड़े आक्रोश (धरने पर बैठने वालों को पैसे के लिए आये बताना) के लिए थप्पड़ मारने को जायज़ बतायेंगे तो बड़े आक्रोश (धर्म पर आक्रमण) के लिए हत्या को भी जायज़ बताना पड़ेगा। या फिर विवेक का पल्ला छोड़िए और यह कहिए कि आप के लिये आपकी भावना ही अंतिम कसौटी है। पर याद रखिए, यह कहते ही बाक़ी सभी को भी सिर्फ़ भावना के आधार पर निर्णय और कर्म का अधिका मिल जाता है। आप ऐसा समाज चाहते हैं तो ज़रूर उस के लिये कोशिश करें, आप का हक़ है। पर फिर बौद्धिक होने, सुविचारित बात कहने, नागरिकता और समानता आदि की लफ़्फ़ाज़ी बंद कर दीजिए। ये दोनों वैचारिक धाराएँ एक साथ नहीं चल सकती।
दूसरी तरफ़ बीजेपी और उसकी सरकार है। इन के पास १० वर्ष थे। इस दस वर्षों में उस ने बार बार सिद्ध किया कि उसके पास वैचारिक दृढ़ता नहीं है। वह डरपोक है, सुविधा के अनुसार निर्णय लेती है; न्याय और सत्य के अनुसार नहीं। इस में कुछ अच्छे निर्णय लिये: धारा ३७० हटाना, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (Citizenship (Amendment) Act), मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, आदि। भारतीय कृषि अधिनियम 2020 सरकार में हिम्मत की कमी के कारण वापस लेना पड़ा। यह मैं इस लिये कह रहा हूँ कि उसे वापस लेने के बजाय सुधार बेहतर रहता। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (जो कि निहायत ज़रूरी है) के मामले में इतना डर गई सरकार कि उसकी बोलती ही बंद हो गई।
पर बीजेपी सरकार ने ग़लतियाँ भी की हैं। राम मंदिर को अत्यधिक महत्व देना और प्रधानमंत्री का पद पर रहते हुए अतिशय धार्मिकता का प्रदर्शन। सभी गौहत्या बंदी संबंधी अधिनियम (राज्यों में) और गौ-हत्या पर होने वाले बवालों को ना रोक पाना, आदि। लेकिन इन से ना तो संविधान को कोई ख़तरा था नाहीं लोकतंत्र को। संविधान में अब तक सौ से कुछ ऊपर संशोधन हो चुके हैं। इन में से निन्नावे तो २०१३ से पहले ही हो चुके थे। यदि इन सशोधनों के बावजूद संविधान और लोकतंत्र ज़िंदा रहे तो कुछ और हो जाने पर भी रहते, और रहेंगे; क्यों की संशोधन तो होंगे।
बात का लब्बो-लबाब (वह जो कुछ भी होता हो) यह है कि सरकार के नूर्णयों और कार्यों के गुण-अवगुण देखे बिना हर निर्णय का विरोध लोकतंत्र को ठप्प करने की साजिस होती है। संस्थानों के हर उस निर्णय का विरोध जिसे आप ना पसंद करते हैं, उन संस्थानों के प्रति विश्वास को कम करता है। यह लोकतंत्र की जड़ों में तेल देना है; और ऐसा करने वालों की अलोकतांत्रिक मानसिकता को उजागर करता है। जनता और प्रक्रियाओं का अपमान है। देश की छवि को अकारण धूमिल करता है, जिसका नुक़सान हर भारतीय को होता है।
इस वक़्त भारत में दोनों बड़े राजनैतिक दल बुरे हैं, कोई भी अच्छा नहीं है। बीजेपी में बुराइया हैं, उसमें मुसलमान विरोध का स्वर भी है। पर वह मुसलमानों को दोयम दर्जे के नागरिक नहीं बनाना चाहती। बस उन्हें विशेष रियायतें देने से उसे परहेज़ है। और मुसलमानों में एक बड़े तबके की उग्र-आक्रामकता को वह सहन नहीं करना चाहती। कांग्रेस में भी बुराइयाँ है। वह रीढ़विहीन चापलूसों की अधिनायकवादी पार्टी है, जो नेहरू-गांधी परिवार की जेब में बैठी है। उस का हिंदू विरोध अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का नतीजा है; जो कि कांग्रेस की १९२० के बाद की स्थाई नीति है। लंबी अवधि में भारत में लोकतंत्र को हिंदुत्व से नहीं तुष्टिकरण से ख़तरा है। अभी कांग्रेस का आख्यान (narrative) संचालन में पलड़ा भारी है; इस लिये नहीं की उसकी नीतियाँ बेहतर हैं। बल्कि इस लिये की उस के पास आख्यान-संचालन को समझने वाले बौद्धिक है। अतः आम जनता यह सब ठीक से देख-समझ नहीं पा रही। बीजेपी को अपने ही छिछारों में और स्पष्टता की ज़रूरत है, उसे अभी अपनी सैद्धांतिकी दुरुस्त करनी है; और इस काम के लिए उस के पास बौद्धिक-क्षमता नहीं है। तो हम भारतीय नागरिक अभी बहुत ख़तरे में हैं। इस लिये हमें बहुत सावधानी की ज़रूरत है।
हम नागरिक के नाते अपनी विचारधारा के अनुसार समर्थन-विरोध करें, खुल कर करे; पर व्यवस्था में अविश्वास और अराजकता का साथ ना दें। बाक़ी दो या अधिक विचार धाराओं में वैचारिक संघर्ष लोकतंत्र के लिए शुभ ही है।



अराजकता को बढ़ावा मत दीजिए

June 8, 2024

(विशेष रूप से किसानों से आग्रह)
रोहित धनकर
कुलविंदर कौर के चंडीगढ़ हवाई अड्डे पर कंगना राणावत को थप्पड़ मारने के बाद पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बहुत से व्यक्ति और किसान संगठन उस के इस निकृष्ट कृत्य और अपराध की प्रसंसा कर रहा हैं। इसे उचित बता रहे हैं। उसे मदद कहने की और उस के लिये धरने आदि देने की बातें कर रहे हैं। मेरा पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसानों से विशेष आग्रह है कि इस पर विचार करें।
बात कंगना या कुलविंदर की नहीं है। बात कुलविंदर के किसान की बेटी या जाट बेटी होने की भी नहीं है। (मैं नहीं जानता की उसकी जाती क्या है, और ना ही यह महत्वपूर्ण है।) बात ड्यूटी पर एक सुरक्षा कर्मी के भारतीय नागरिक और चुने हुए जनप्रतिनिधि को अकारण थप्पड़ मारने की है। जिन लोगों की सुरक्षा के लिए कुलविंदर की नौकरी लगी, उसे प्रशिक्षण मिला, और उसे वेतन मिलता है; उन्हीं में से एक को उसने शारीरिक तौर पर नुक़सान पहुँचाया, आक्रमण किया। यह सिर्फ़ कंगना को मारने की बात नहीं है। यह सुरक्षा कर्मी के विश्वास योग्य ना होने का मामला है। अपनी ड्यूटी के दुरुपयोग का मामला है।
इस देश में लोगों को अपने विचार अभिव्यक्त करने की आजादी है, पर आक्रमण करने की नहीं। राणावत के बयान किसान आंदोलन और उस में बैठने वाले लोगों के बारे में ग़लत हो सकते हैं। पर उस के लिये एक सुरक्षा कर्मी अपनी ड्यूटी का फ़ायदा उठा कर अनुशासनहीनता नहीं कर सकता।
यदि आप लोग इस कुकृत्य को उचित मानते हैं और आप थोड़ा भी तर्क समझ सकते हैं, तो आप को पता होना चाहिये कि ठीक यही तर्क गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, लोंगेवाल और कई अन्य नेताओं की हत्याओं को भी उचित सिद्ध कर देता है। आप लोगों के बहुत बच्चे पुलिस, फ़ौज, और अन्य सुरक्षा एजेंसीज़ में है। आप उनको क्या संदेश दे रहे हैं, सोचिए। क्या आप देश को अराजकता की तरफ़ धकेलना चाहते हैं? यदि ऐसा करेंगे तो सब से अधिक नुक़सान आप का ही होगा। जिन लोगों ने देश के लिए इतना बलिदान किया है वही ऐसी बातें करें, यह बहुत की दुख की बात है।
किसान संगठन अपने आंदोलन में ख़लिस्तानी तत्वों की नियंत्रित नहीं कर पाये थे। ना ही उन को बाहर निकाला, ना ही उनकी खुलकर निंदा की। यह दुर्भाग्य पूर्ण था। किसान आंदोलन का तरीक़ा भी ग़लत था। उसको सहयोग और धन खालिस्तान समर्थकों से मिल रहा था। मोदी सरकार इस के सामने झुक गई, क्यों की उस की रीढ़ कमजोर थी। इस से आप लोगों को फिर से ऐसे चक्रों में आने से बचना चाहिए। फिर से आप ने कोई बखेड़ा किया तो आप फिर से देश विरोधी तत्वों को नियंत्रित नहीं कर पायेंगे।
किसी और देश में सुरक्षा कर्मी ने ऐसा किया होता तो ३० सेकंड्स में उस को पिन-डाउन करके हाथों में हथकड़ी लग जाती। कुलविंदर यहाँ भाषण देती और अपनी सफ़ाई देती घूम रही थी। यह भी हमारी सुरक्षा व्यवस्था की ही कमी है।
मैंने बहुत से ट्वीट्स देखे हैं जो इस बात को बढ़ावा दे रहे हैं। ये लोग या तो ना समझ हैं या धूर्त।
अंत में मोदी सरकार से: यदि आप अराजकता फैलाने वालों, उस के समर्थकों और उन्हें धन के लालच में उकसाने वालों पर निर्णायक करवाई नहीं कर सके, पिछले कार्य काल की तरह धमकी के आगे घुटने ही टेकते रहेंगे, तो लोग ठीक कह रहे हैं, आप का कोई इक़बाल (राज करने की ताक़त) नहीं रह जाएगा। आप के लिये देश चलाना असंभव हो जायेगा। कुलविंदर के पक्ष में आंदोलन की धमकी और असंख्य लोगों का प्रचार कि बीजेपी के पास ना जनादेश है ना ही इक़बाल, जुड़े हुए हैं। ये अराजकता फैलाना चाहते हैं। बीजेपी सरकार बंगाल में हिंसा नहीं रोक सकती, ग़ैर ज़िम्मेदार झूठ का प्रचार नहीं रोक सकती, कुलविंदर जैसों के पक्ष में ग़लत आंदोलन नहीं रोक सकती; तो फिर कर क्या सकती है? इसे क्यों राज करने दिया जाये?
कुलविंदर के मामले में जाटों का बहुत नाम लिया जा रहा है। मैं मानता हूँ कि सब जाट ऐसे नहीं सोचते। लेकिन यदि समझदार जाट चुप रहते हैं और इन जान बूझ कर अराजकता फैलाने वालों के विरुद्ध नहीं बोलते हैं, तो वे भी दोषी हैं। इन में एकाध लोग झूँझुनु ज़िले के भी हैं, जैसे @Saroj302 ये बहन जी। जो अमूमन बेवक़ूफ़ी की ही बात करती है। झूँझुनु मेरा भी ज़िला है। इन लोगों के पुप्रचार का विरोध करें। झूँझुनु के बहुत बच्चे फ़ौज और दिल्ली पुलिस में हैं, बहुत से तैयारी कर रहे हैं। इन को ग़लत संदेश और ग़लत सोच से बचायें।