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रोहित धनकर

क्या कश्मीर में हालत सामान्य है?

Is everything normal in Kashmir?

हमें सरकार परास्त मीडिया और सरकारी लोगों से सुनने को मिल रहा है कि कश्मीर में सब सामान्य है। सामान्य माने लोग अपनी जिंदगी में मसरूफ़ हैं, बच्चे स्कूल जा रहे हैं, बड़े काम पर जा रहे हैं, बाजार खुले हैं, आवागमन के साधन चल रहे हैं, संचार साधन सब को उपलब्ध हैं, आदि आदि।

The government people and their supporter media are telling us that everything is normal in Kashmir. Normal means people are going about their life unhindered; children are going to schools, adults are going to work, markets are open, transport is working, communication is functioning, and so on.

मेरे पास वर्तमान की यदि कोई भी जानकारी न हो, कश्मीर से कोई भी खबर, अच्छी या बुरी, न भी आ रही हो तो क्या ये विश्वास करने काबिल है की धारा 370 हटाने के बाद और संचार माध्यमों पर बंदिश के बावजूद वहाँ सब सामान्य है?

Even if I have zero information of what is presently going on in Kashmir, can I believe this? Is it possible that after diluting article 370 and blocking means of communication everything is normal?

जब तक सामान्य तौर पर खबरें आती थीं (5 अगस्त तक), वहाँ 30 वर्ष से आतंकवाद का दौर चल रहा था। कई बार आतंकियों के मारे जाने पर हिंसक बंद हुए हैं, सुरक्षा बालों पर नाबालिग बच्चों द्वारा पत्थर-बाजी लगातार कारवाई जाती रही है। अलगाव-वादी धड़ल्ले से भारतीय राज्य को चुनौती देते रहे हैं। ये सब जनता के व्यापक समर्थन के बिना असंभव है। तो यह कैसे हो सकता है कि अब अचानक वे सब शांति-दूत हो गए और सब सामान्य हो गया?

Till we received information from Kashmir, 5th August, there was a serious Islamist terrorist separatist movement there for last 30 years. Many a times there have been violent public protests against killing of terrorists. Minor children were being used for stone pelting on security forces. Separatist were openly challenging Indian state and were raising slogans of “I am Pakistani” in large public. All this is not possible without substantial public support.

यह संभव है की दूर दराज के कुछ गाँव सामान्य हों। पर अलगाव-वाद के शहरी गढ़ सामान्य होंगे यह विश्वास करना मुश्किल है। यह विश्वास करने का आग्रह करना हमें अपने सामान्य चिंतन के तरीकों और पूर्व-ज्ञान को तिलांजली देने का आग्रह करना है। अर्थात, कश्मीर में सब कुछ सामान्य है की रत लगाने वाले हमें यातो मूर्ख समझते हैं, या चाहते हैं की हम आँख मूँद कर उनपर विश्वास करलें, अर्थात अपने विवेक से नाता तोड़ लें।

When these were the conditions so recently, is it possible that now everything is suddenly gone normal? Yes, it is possible that some far-flung villages are normal. But can it be believed that the urban hubs of separatism and Islamist terrorism have become normal now since the dilution of article 370? Urging us to believe such an impossibility is tantamount to asking us to abandon our ways of thinking and discard all our previous knowledge of Kashmir. All this means that those wo are continuously repeating that everything is normal in Kashmir take us for fools or want to we should abandon our reason and have blind faith on them.

कश्मीर में 13,000 बच्चे गायब हैं?

13,000 children are missing in Kashmir?

कुछ जाने माने नामी-गिरामी मानवअधिकारों के परोंकार हमें बताते हैं की कश्मीर में 5 अगस्त के बाद 13,000 बच्चे गायब हो गए हैं, जो सुरक्षा बालों ने किए हैं। क्या ये संभव है?

Some well known human rights activists are telling us that 13,000 children are missing (implied abducted by security forces) in Kashmir after 5th August. Is it believable?

इस पर पहला सवाल तो यही उठता है की उन्हें अपनी 3-4 दिन की यात्रा में यह संख्या कहाँ से मिली? वे स्वयं इतने कम समय में 13,000 बच्चों के घरों में जा कर उनके गायब होने की पुष्ठी करने में तो सक्षम नहीं हो सकते। और यदि घरों में गए भी हैं तो भारत-विरोध का इतना जबर्दस्त महोल होने की स्थिति में उन्हें जो जानकारी दी गई है वह पूरी की पूरी सही है, इस की जांच कैसे की?

The immediate question that arises is: how did they arrive at this figure in their 3-4 days so-called fact-finding visit? It is not possible for them to conduct a house to house survey in such a short time. Even if they have visited so many houses how did they confirm that all the information given to them in a strong anti-India atmosphere is correct?

यदी, यह संख्या उन्हें किन्हीं सामाजिक या राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने बताई है तो उन की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की? क्या लंबे समय से भारत विरोध में शामिल कार्यकर्ताओं के बयान पर बिना सोचे समझे विश्वास किया जा सकता है? जिन लोगों ने इन को यह सूचना दी उन्होने संचार माध्यमों की अनुपस्थिति में और आवागमन में अवरोध के बावजूद ये जान कारी पूरे कश्मीर से कैसे प्राप्त की?

If these ‘facts’ are given to them by local social-political activists, how did they ascertain the reliability of this information? Is it reasonable to believe anti-India activists without further corroboration? Further, how did their informers arrived at these figures in absence of means of communication and under conditions of restricted movement?

चलिये तर्क के लिए मान लेते हैं की वर्तमान भारत सरकार एक दानवी सरकार है। पर कश्मीर प्रशाशन में, कश्मीर पुलिश में तो बहुर सारे स्थानीय लोग भी हैं। तो क्या वे सब अचानक इतने निर्दई और दानवीय हो गए की इतने बच्चों को धड़ाधर गायब कर देंगे? क्या भारतीय सुरक्षाबल इतने बड़े पैमाने पर इतने अत्याचार कर सकते हैं? यहाँ बात किसी एक सुरक्षाकर्मी के किसी को मार देने की, या कुछ बुरा कर देने की नहीं है। बल्की बहुत बड़े स्तर पर सुनियोजित अत्याचार का मामला है। मुझे यह संभव नहीं लगता।

Let’s assume for the sake of argument that present Indian government is an evil government. Still, the local administration and local police are largely maned by local Kashmiris. Is it possible that they all suddenly became so evil and ruthless that will start abducting so many children? The issue is not of one security personnel losing control and killing someone. Abducting 13,000 children is possible only under a general policy by large number of security personnel. I don’t find it believable.

तर्क करने के लिए ये मानते हैं की चीन की तरह इन बच्चों को किसी जगह लेजाकर कट्टर-पंथ से हटाने की कोई कोशिश की जा रही है। तो फिर ,यदि इनके पास ऐसे सधान थे की ये सारे कश्मीर के गायब बच्चों की सही जानकारी पाने में सक्षम थे, तो इनको उन बच्चों का क्या हुआ? वे कहाँ हैं? उनके साथ क्या किया जा रहा है? यह जानकारी जुटाने में क्या मुश्किल हो सकती है? ये लोग हमें यह आगे की जानकारी क्यों नहीं दे रहे?

For the sake of argument, let’s again assume that the children are abducted, and taken to camps to de-radicalize. In such a case, if these fact-finders had means to find out the number of missing children, they should have means to find out where they are taken and what is being done to them. Why are they not telling us this? Is it possible that they are resourceful enough to find out how many children are missing in the whole of Kashmir but not resourceful enough to find our where they taken to?

निष्कर्ष: ये भी हमें अपने विवेक तो तिलांजली दे कर इन पर अंधा विश्वास करने का आग्रह कर रहे हैं। हमें मूर्ख समझ रहे हैं।

One has to conclude that these avataars of truth are also asking us to abandon our reason and have blind faith on them.

सूचना के अभाव में काम चलाऊ निष्कर्ष

A tentative conclusion in absence of information

तर्क को काम करने के लिए सही सूचना चाहिए। विवेक थोड़ा ज्यादा व्यापक और गहरे स्तर पर सार्थक नतीजों तक पहुँचने की कोशिश कर सकता है। उस में अपनी पुरानी जानकारी, मानव-स्वभाव के बारे में हमारी मान्यताओं, और अपनी सम्पूर्ण समझ के आधार पर कुछ अंतर-दृष्टि पाने की कोशिश होती है। सही या गलत मुझे तो अभी यही लग रहा है कि दोनों पक्ष हमें मूर्ख समझ रहे हैं। दोनों अपने-अपने स्वार्थ के लिए जान-बूझ कर झूठ बोल रहे हैं।

Strict logic works only on availability of correct information. Reason, understood a little loosely, attempts to make sense at a little deeper level. It is reasonable to use our earlier information of India, Kashmir, Indian state, human nature, nature of Indian people and overall Indian politics; including robust history of lies from the BJP as well as the left leaning intellectuals. Right or wrong, I think both are taking us for fools. Both parties are motivated by their own wasted interests and are telling deliberate lies.

यह बहुत खतरनाक खेल खेला जा रहा है। दोनों तरफ से। पाश की नकल करते हुए कह सकते हैं: देश के लिए सब से खतरनाक होता है नागरिकों के विश्वास का मर जाना।

Both are playing a dangerous game. To borrow from Pash: Erosion of trust in its citizens is the most dangerous thing for a nation.

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27 सितंबर 2019