कविता पर बेबुनियाद बवाल

May 22, 2021

रोहित धनकर

पिछले 3-4 दिन से राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की पहली कक्षा की हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में एक छोटी-सी कविता को लेकर विवाद मचा हुआ है, कथित सामाजिक माध्यमों पर। सामाजिक माध्यम आजकल बहुत महत्वपूर्ण हो चलें हैं। बहुत लोगों के पास किसी बिन्दु पर गहनता में जानने का समय और रुची नहीं होती। विषय भी उनके चिंतन और कर्म क्षेत्र से हट कर हो सकता है, अतः हर एक से हर विषय पर समय लगाने की मांग भी नहीं की जा सकती। दूसरी तरफ इस प्रकार की सतही जानकारी और बहस के आधार पर लोग अपने विश्वास भी बनाते ही हैं। और हर नागरिक का हर विश्वास लोकतन्त्र की दिशा और दशा को प्रभावित भी करता ही है। इस लिए इन बहसों को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। यही कारण है सामाजिक माध्यमों के बढ़ते महत्व का।

खैर, कविता यहाँ दी हुई है। इसे पढ़ें और इसके नीचे दिये गए पढ़ाने के निर्देश भी पढ़ें।

कविता

यह कविता बच्चों से बातचीत करने, कल्पना करने का मौका देने और सोचने के लिए काम में ली जा सकती है। भाषा की कई क्षमताओं के लिए उपयोग की जा सकती है।

बवाल इस में आए शब्द “छोकरी”, “चूसना” और कथित द्विआर्थकता को लेकर उठाया जा रहा है।

“छोकरी” शब्द पर ऐतराज मुझे शिक्षक के नाते देखूँ तो हिन्दी में पूरानी वर्चश्वशाली मान्यताओं का हिस्सा लगता है। यह शुद्धता-वादी मानसिकता का और शुद्धता या मानकता एक छोटे तबके की खड़ी बोली में निहित होना मानने का परिणाम है। यह सोच बच्चों की पढ़ाई और हिन्दी की समृद्धी दोनों की जड़ें काटती है। एक बड़े ग्रामीण तबके की भाषा को केवल हिन्दी से बाहर नहीं करती, बल्कि उस को गँवारू-बोली का खिताब भी देती है। ऐतराज करने वाले लोग यह नहीं समझते की बच्चे नई चीज अपनी पुरानी समझ से जोड़ कर ही सीख सकते हैं। और जब विद्यालय आते हैं तो उनकी पूरी समझ अपनी भाषा में ही होती है। अतः छोकरी जैसे शब्दों को पुस्तकों से निकाल कर हम उनकी भाषा को नकारते हैं और उनकी समझ की जड़ें काट कर सीखने को मुश्किल बनाते हैं।

शैक्षिक दृष्टि से यह ऐतराज प्रतिगामी है। इस में संस्कृति की रक्षा का नारा शामिल करने से यह गैरबराबरी और वर्चश्व की राजनीती को भी बल देता है। और सामाजिक राजनैतिक नजर से भी प्रतिगामी हो जाता है।

“चूसना” शब्द पर ऐतराज कविता में द्विआर्थकता देखने का परिणाम लगता है। इस में भी “मेरी भाषा शुद्ध और शालीन भाषा” का दंभ है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में बहुत से कथन ऐसे होते हैं जो एक तबके के लिए सामान्य और किसी दूसरे के लिए ऐतराज करने काबिल हों। पर यहाँ तो मुझे कुछ ऐसा भी नहीं लगता। कविता में वैसे भी द्विआर्थकता खोजना बहुत आसान है। क्योंकि कविता बनती ही भावों की समृद्धता से है। मुझे लगता है यहाँ द्विआर्थकता ऐतराज करने वाले पाठकों के मन में उपजती है। और उसे वे इस कविता पर आरोपित कराते हैं।

यह तो हुई इस कविता पर ऐतराज की बात। पर मेरे मन में इस पर कुछ लिखने को लेकर झिझक भी थी। उस का कारण यह है की मुझे यह ऐतराज तो बेसमझी या फालतू विवाद उठाने की मानसिकता का नतीजा लगता है; पर मैं इस कविता को कोई बहुत अच्छा पाठ (text के अर्थ में) नहीं मानता। मेरी कविता की समझ तो बहुत ही सीमित है, पर अध्यापक के नाते मुझे इस में एक बड़ी समस्या लगती है। यह एक अकैडमिक बिन्दु है, शिक्षणशास्त्र से संबन्धित। इस को लेकर उपरोक्त प्रकार का विवाद नहीं उठाया जा सकता, ना ही इस विचार में से इस तराह के विवादों के लिए समर्थन मिल सकता है।

भाषा शिक्षण में मेरा मानना यह है कि टैक्स्ट की एक आंतरिक तार्किक-संगती होती है। वह सदा सामान्य अर्थों में सार्थकता और आम तर्क से जुड़ी हो यह जरूरी नहीं। बच्चों के लिए बिना अर्थ के शुद्ध तुकबंदी मात्र भाषा की शब्दावली और ध्वनी विन्यास का आनंद लेने के लिए बहुत जरूरी है। तो मैं यहाँ सामान्य अर्थ में सार्थकता की बात नहीं कर रहा। टैक्स्ट की आंतरिक तार्किक-संगती का उदाहरण आप अक्कड़ बक्कड़ में देख सकते है:

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ। सौ में निकाला धागा चोर निकाल कर भागा।

सामान्य अर्थों में इस में कोई सार्थक-तार्किकता और संगती नहीं है। बहुत शब्द अर्थहीन भी हैं। पर इस में विचारों और बिंबों का एक तारतमयपूर्ण प्रवाह है। जिस कविता पर बात चल रही है उसमें इस का अभाव है। मेरे विचार से भाषा के दुनिया को समझने में समार्थ उपयोग के लिए इस में ‘विचारों और बिंबों के तारतम्यपूर्ण प्रवाह’ के प्रती सचेतता और लगाव सीखना जरूरी है। अतः यह कविता मुझे बहुत बढ़िया कविता नहीं लगती बच्चों के लिए।

पर इस पर जिन बिन्दुओं पर ऐतराज उठाए जा रहे हैं वे निश्चित रूप से शिक्षा और राजनीती दोनों की दृष्टि से प्रतिगामी हैं। और उनको सिरे से नकार देना चाहिए। जिस मानसिकता से वे ऐतराज उपजे हैं उस का विरोध होना चाहिए।

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22 मई 2021