संवेदना-शून्य सरकार और मजदूर

May 8, 2020

रोहित धनकर

जब 24 मार्च 2020 को देशभर में लोकडाउन शुरू हुआ तब केंद्र सरकार के दिमाग में प्रवासी-मजदूर का अस्तित्व भी नहीं था। सब के विकास का नारा लगाने वाली सरकार ने अपनी योजना में, प्रबंधन में, कहीं भी प्रवासी मज़दूरों के बारे में नहीं सोचा। वे कैसे जीएंगे, क्या करेंगे, किन परिस्थितियों में रहेंगे, क्या खाएँगे, आदि, कोई भी सवाल सरकार ने न अपने आप से पूछा न किसी को उसका जवाब दिया। कानूनी तौर पर शायद प्रवासी मजदूरों की व्यवस्था करना और उनके हित के बारे में सोचना राज्य-सरकारों की ज़िम्मेदारी हो। मैं ठीक से नहीं जानता। पर नैतिक तौर से इनके बारे में सोचना और कोई कारगर योजना बनाना केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है इस से इनकार नहीं किया जा सकता। पर केंद्र सरकार की तो चेतना में भी भारतीयों का यह समूह नहीं था। हर वाक्य में एक सौ पैंतीस करोड़ भारतीयों का जिक्र करने वाले प्रधानमंत्री के जहन में आधे करोड़ के लग-भाग (शायद ऊपर, मुझे आंकड़े ठीक पता नहीं हैं) भारतीयों का अस्तित्व तक नहीं होना, इस वाक्य को निरर्थक कर देता है। यह संवेदना विहीन और लोगों को भावनात्मक स्तर पर बरगलाने वाला वाक्य बन जाता है। जो आपके जहन में ही नहीं है, उसकी आप क्या रक्षा करेंगे और क्या उसका विकास करेंगे।

तर्क के लिए मान लेते हैं कि उस वक़्त कई तरह के दबाओं और जल्दबाजियों के चलते भूल हो गई। पर प्रवासी मजदूरों की समस्या तो दूसरे ही दिन सामने आगई थी। उसके बाद उनकी कठिनाइयां, असहनीय स्थितियाँ और मजबूरियां जग जाहिर थीं। उनके लिए की गई हर व्यवस्था अपर्याप्त और देर से हो रही थी। न उन्हें उनके घरों में (जैसे भी वे हैं) रहने देने की व्यवस्था हो सकी, ना उनकी मजदूरी मिलती रहे इसकी व्यवस्था हो सकी, ना ही वे अपने-अपने गाँव को जा सकें इसकी कोई व्यवस्था हो सकी। सरकारें और हजार व्यवस्थाएं करती रहीं, पर इन लाखों लोगों के लिए हर व्यवस्था में कमियाँ रही।

तब से दो बार लोकडाउन बढ़ चुका है। दोनों बार में उनके लिए की गई घोषणाएँ और व्यवस्थाएं ना काफी साबित हुई हैं। अब जब इन के लिए रेलगाड़ियां चलाने की बात हुई तो कर्नाटक जैसे राज्यों ने भवन-निर्माण कंपनियों के कहने से वह भी बंद कर दी। इस के लिए तर्क दिया जा रहा है कि रेलगाड़ियां तो फंसे हुए लोगों के लिए चलाने की बात है। प्रवासी मजदूरों के लिए तो भवन-निर्माता और सरकार रहने, खाने और मजदूरी की व्यवस्था कर रही है। अतः ये ‘फंसे हुए लोग’ नहीं हैं। शायद यह बात ठीक है, ये फंसे हुए लोग नहीं हैं। जैसे योगेंद्र यादव कह रहे हैं ये “बांधक-मजदूर” हैं। और बंधकों को कैसे जाने दें!

यदि बंधक नहीं हैं तो रेलगाड़ियां बंद किए बिना, इन्हें काम और मजदूरी का विश्वास दिला कर रोकने की कोशिश करते। उन्हें जिन शहरों में ये हैं वहाँ रहने के लिए मजबूर करने के बाजाय सुविधाएं दे कर मर्जी से रुकने के लिए मनाते। जब रेलगाड़ियों में जाने के लिए कोई नहीं मिलता तो बंद कर देते। 40-42 दिन लोकडाउन का कष्ट भोगने के बाद ये आपके वादों पर भरोसा नहीं कर रहे और अपने गाँव-घर जाना चाहते हैं तो इन्हें कैसे दोष दिया जा सकता है?

मैं दावे से तो नहीं कहा सकता, पर जितना भारतीय समाज और उसमें गरीबी के बँटवारे को जितना समझता-जानता हूँ उस से लगता है कि प्रवासी-मजदूर भारत का सब से गरीब तबका है। शायद शहरों के बेघर लोग ही इन से ज्यादा निर्धन हैं। गाँव में गरीबी की मार और अपने राज्यों में काम की कमी के कारण ही ये लोग दूर-दराज काम की खीज में गए हैं। शायद प्रवासी मजदूरों में बहुत बड़ा प्रतिशत उन जातियों के लोगों का है जिन का भारतीय समाज में सदियों से शोषण होता रहा है। जिन्हें उत्पादन के साधानों की माल्कियत से वंचित रखा गया। अपनी बौद्धिक उन्नति के संसाधनों से जबर्दस्ती वंचित रखा गया। अशिक्षित रखा गया।

अशिक्षा और जानकारी की कमी के कारण यह समूह अफवाहों और बहकावे का शिकार भी आसानी से हो सकता है। पर दूसरी तरफ यह निर्माता और मेहनती समूह भी है। जिस समूह को सरकारों और राज्यों से सहायता के केवल वादे मिले हों (वह भी पिछले 70 साल में ही) वह अपनी समस्याओं को अपने आप हल करने की जीवट भी रखता है। हजारों मील दूर अपने गाँव पैदल चलदेना जीवट की भी निशानी है। यह ठीक है कि यह मजबूरी है, यह भूख और बेघर परिस्थिति से बचाने के लिए मजबूरन उठाया गया कदम है। मैं कोई इस परिस्थिति का महिमा मंडन नहीं करना चाहता। पर जो मेहनती इंसान इस चुनौती को स्वीकार करता है उसकी हिम्मत को भी देखना पड़ेगा।

प्रवासी मजदूरों के लिए रेलगाड़ियां चलाने का काम केंद्र सरकार को करना चाहिए। और उन से किसी तरह का भाड़ा नहीं लेना चाहिए। जो राज्य-सरकारें, निर्माण-कंपनियाँ और कारखाने-दार मजदूरों को अपने यहाँ रखना चाहते हैं उन्हें स्वतंत्र महोल में मजदूरी और अन्य शर्तों पर मोल-भाव करने का अवसर बनाना चाहिए। घर जाने के साधन काट कर जो मजदूरी और शर्तें तय होंगी वे तो भूख का डर दिखा कर सत्ता के बल पर मजबूर करना होगा। सब के विकास, सब के साथ और सब के विश्वास का नारा लगाने वाली सरकार देश के साधन हीन लोगों को बंधक बना कर असमान परिस्थितियों में साधन और सत्ता-सम्पन्न तबके के दबाव में, अपने घर से दूर शहरों में रुकने के लिए नहीं छोड़ सकती। यह शोषण का बहुत नग्न रूप है।

इंटेरप्रेनुएरशिप और ज्ञान आधारित समाज का राग आलापने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए की संपन्नता और जीवन के लिए अंत में भौतिक उत्पाद की जरूरत होती है। पदार्थ के साथ काम करके उसको जीवनोपयोगी रूप देना होता है। और यह काम किसान और यही तबका करता है, जिसे आप अपनी योजनाओं में आखिर में याद करते हैं, और तब भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं कराते।

रेल की पटरी पर सामान्य स्थिति में चलते हुए किसी की दर्दनाक मौत हो जाये तो उसे पटरी पर चलाने वाले की ना समझी का परिणाम माना जा सकता है। पर कल्पना करिए की आप को हजारों मील दूर अपने गाँव जाना है। आप के पास कोई विस्तृत नक्शा नहीं है। आप को शायद नक्शा पढ़ना भी नहीं आता। ऐसी परिस्थिति में रेल की पटरी एक रास्ता दिखाती है। इस लिए, जब किसी को हजारों मील दूर पैदल अपने गाँव-घर का रास्ता खोजने के लिए मजबूर कर दिया जाये तो इस तरह की दर्दनाक मौत सरकारों की नैतिक ज़िम्मेदारी होती है। और पूरे समाज के लिए आत्म-विवेचना की महती जरूरत को रेखांकित करती है।

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8 मई 2020