एक तीसरी आवाज की अनसुनी

February 20, 2016

रोहित धनकर

रवीश कुमार का NDTV पर प्राइम टाइम (शायद १९ फरवरी का) बहुत ही सटीक और इस वक्त की चीख-चिल्लाहट में बेहद आवश्यक था. हमें और बहुत से ऐसे कार्यक्रम चाहियें. रवीश कुमार को इस के लिए धन्यवाद और जितनी हो सके उतनी प्रशस्ती मिलनी चाहिए. इस वक्त के अँधेरे और बेसमझी धारणाओं की लड़ाई को खूनी बनाने की कोशिश का पर्दा फास करने के ऐसे और प्रयाश और होने चाहियें. उन्हों ने बहुत सटीक सवाल उठाये हैं. अन्करों के काम को लेकर, भावनाओं का ज्वार पैदा करने को लेकर और तथ्यों की जाच को लेकर. यह एपिसोड सब को देखना चाहिए और इसपर सोचना चाहिए.

यह कार्यक्रम के इतना अच्छा होने के बावजूद मेरे मन में कुछ सवाल उठाता है. आशा है रवीश कुमार के चाहने वाले (जिन में मैं भी शामिल हूँ) इन सवालों को गलत नहीं समझेंगे. असहमती उनकी हो सकती है और वह जायज भी हो सकती है. मैं गलत हो सकता हूँ; पर जो सवाल हैं उनको रखना भी जरूरी है.

सब से पहले पूरे कार्यक्रम पर एक सवाल जो मुझे महत्त्वपूर्ण लग रहा है वह यह है कि अँधेरे की इन आवाजों को सुनाने की शुरुआत क्या इस नारों की आवाज से नहीं होनी चाहए थी, क्यों की यह बवाल तो यही से उठा?

  • कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी.
  • भारत की बर्बादी पर जंग रहेगी.
  • भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह.

सवाल यह नहीं है कि यह नारे किसने लगाए, पर लगाए तो. क्या यह आवाज भी इस शांत चिंतन का हिस्सा होनी चाहिए जिसके लिए रवीश कुमार इतनी सिद्दत से और इतनी जायज अपील कर रहे हैं?

रवीश कुमार अपनी भूमिका या टिप्पणियों में कुछ बातें कहते हैं जिनकी तरफ ध्यान देना और उनके निहितार्थ समझना जरूरी है. उन में से कुछ बातें ये हैं (यह शब्दसह नहीं है, पर अर्थ वही है):

  • कश्मीर में ये नारे (मेरी समझ में उपरोक्त) रोज लगाए जारहे हैं, वहां सरकार ने कितनों को गिरफ्तार किया?
  • वहां पकिस्तान के झंडे रोज फहराए जारहे हैं.
  • कश्मीर की समस्या इस्लाम की समस्या नहीं है.
  • अफज़ल गुरु दिल्ली में आतंकवादी है तो श्रीनगर में क्या है?

अच्छा होता रवीश कुमार इस पर कुछ और साफ़ बोलते. अब हमारे पास इस नतीजे पर पहुँचाने के आलावा क्या रास्ता है कि यह सब कहकर वे यह बताना चाहते हैं कि:

  • जो नारे कश्मीर में लगाए जा रहे हैं इनको JNU में लगाने की भी छूट होनी चाहिए, या कमसे कम उन्हें नरमी से जरूर देखाजाना चाहिए.
  • यदि पकिस्तान का झंडा कश्मीर में फहराया जाता है तो इसे दिल्ली में भी नरमी से देखाजाना चाहिए.

इन दो स्थापनाओं पर बहुत गंभीरता से विचार होना चाहिए. सवाल यह बिलकुल नहीं है कि जो सरकार कर रही है वह जायज है, जो कुछ एंकर कर रहे हैं वह जायज है, जो पटियाला हाउस में वकीलों ने किया वह जाजाज़ हैं. ये सब गलत है. हमें इसे तुरंत रोकना चाहिए. पर इस स्थापनाओं के माध्यम से हम ऐसे नारों को यदी जायज नहीं बता रहे तो नरमी से लेने लायक जरूर बता रहे हैं. सहन करने काबिल जरूर बता रहे हैं. नारे लगाने वालों को अपने समूहों में शामिल करने की वकालत अवश्य कर रहे हैं. क्या इस से ऐसे नारे लगाने वालों की संख्या बढ़ेगी? क्या इस से जो अभी ये नारे लगा रहे हैं उनका मनोबल बढेगा? क्या ये दोनों चीजें इन नारों के पीछे की मनसा को पूरा करने में मददगार शाबित होंगी?

यह अभिव्यक्ती की आजादी का तर्क है जिस पर मैंने अपने पिछले ब्लॉग पोस्ट में लिखा है और जिसका कुछ मित्रों ने विरोध किया है. उनका यह कहना है की सरकार और ABVP के जायज और तीव्र विरोध में ऐसा माहोल बनाने का कोई तत्त्व नहीं है जो ऐसे नारों को नरमी से लेने की वकालत करता हो. मुझे रवीश जी के इस प्रोग्राम से लगता है ऐसा तत्त्व है, और यह कार्यक्रम इस का एक उदाहरण है.

यह सही है कि कश्मीर की समस्या की शुरुआत में इस्लाम का तत्त्व बहुत कम था. मेरा मानना है कि कुछ हद तक पकिस्तान के कबायलियों के वेश में आक्रमण करने के दिन से कश्मीर की समस्या में इस्लाम का तत्त्व था; क्यों कि पकिस्तान ने यह इस्लाम के नाम पर किया था. फिर भी कश्मीर की जनता भारत के साथ थी और केवल स्वायत्त निर्णय चाहती थी, जो उनका जायज हक़ था. और यह मूलतः राजनैतिक समस्या ही थी. पर आज यह उतनी ही इस्लाम की समस्या है जितनी राजनीती की. बल्की अब यह इस्लाम-प्रेरित राजनीती की समस्या है. नहीं तो पकिस्तान के झंडों का, ISIS के झंडों का, नारों की शुरुआत नराए-तदबीर (?) (अल्लाह हो अकबर) से करने का कोई स्पस्टीकरण नहीं है.

अब सवाल यह है कि वे भारतीय जो सरकार की आवाज दबाने की कोशिशों को गलत मानते हैं, ABVP और BJP के समर्थकों के हुड़दंग को गलत और राष्ट्र के लिए नुकशानदेह मानते हैं; पर उनके मन में नारों को लेकर उपरोक्त चिंताएं भी हैं; वे क्या रुख लें?

क्या उनकी आवाज ऎसी आवाज नहीं है जो सरकारी खेमे के विरुद्ध है, पर जिसे सरकार का विरोध करने वाले भी नहीं सुनना चाहते? क्या इस चिंता को अनसुना करना और इसे अभिव्यक्त करने वालों को सरकारी-खेमे की वर्त्तमान गतिविधियों का समर्थक मान लेना जायज है? क्या रवीश जी के TV के अँधेरे में इस आवाज को भी सुनना चाहिए था? मुझे लगता है इस आवाज को नहीं सुनकर सही रस्ते पर मजबूती से चल रहे बुद्धी-जीवी और रवीश जी जैसे एंकर सरकारी-खेमे को आम जानते के सामने एक नाजायज तर्क करने का मौक़ा दे रहे हैं. यदी उनकी इस चिंता की आवाज से असहमती है तो उनको बहुत सफलता नहीं मिलेगी. और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

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सोशल मीडिया पर गाली-गलोच एक बड़ी बीमारी का लक्षण भर है

September 20, 2015

रोहित धनकर

मैं TV कभी-कभी ही देखता हूँ. रवीश कुमार के कुछ लेख भर पढ़े हैं. दो-चार रिपोर्ट्स भी देखी हैं. वे सब मुझे बहुत सुलझे हुए और सटीक विश्लेषण लगे. इस तरह के लेखन या रिपोर्टिंग के लिए कोई गाली-गलोच करे यह बहुत ही बेवकूफी की बात है.

फेसबुक पर कई दोस्तों की पोस्ट से पता चालता है कि कुछ लोग वर्त्तमान सरकार और विशेष रूप से प्रधानमन्त्री मोदी के विरूद्ध कुछ भी बोलने पर गाली-गलोच करने लगते हैं. ये निसंदेह ऐसे लोग लगते हैं जो यातो बहुत मूर्ख है, या फिर समझते हैं कि सोशल-मीडिया में हल्ला मचाने से लोग विश्लेषण करना और बोलना बंद करदें गे. इन के करतबों से इनके आकाओं को भी कोई लाभ नहीं होनेवाला. विचार-विमर्श और अभिव्यक्ती की आजादी के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है. अतः तथ्य का जवाब तथ्य और तर्क का जवाब तर्क से देने के बजाय धमकी और गाली देना public debate को खत्म करने की कोशिश होती है. इस का विरोध करने की और इसे रोकने की जरूरत है.

पर मुझे यह भी लगता है की सोशल मीडिया पर बहुत बार विरोध भी केवल विरोध और इस से अपने ऊपर धान आकर्षण के लिए होता है. यह भी debate के लिए शुभ नहीं है. इस वक्त सोशल मीडिया में शोर और मूर्खता पूर्ण दावे संतुलित विचार की तुलना में कहीं अधिक हो रहा है. पर गाली और अशोभनीय भाषा का उपयोग मोदी और बीजेपी समर्थकों की तरफ से कहीं ज्यादा है. यह शायद इस लिए की उनकी वैचारिक क्षमता विरोधियों की तुलना में बहुत कम है. और क्यों की वे ठीक से तर्क नहीं कर सकते इस लिए मूर्खों की तरह गाली पर उतर आते हैं.

आप इन लोगों को ठीक से समझना चाहते हैं तो थोड़ा यह देखिये कि समाज में विवेकशील विचार की बाकी जगह क्या स्थिती है. यह देखिये की टीवी धारावाहिक क्या संदेश देते हैं और उनमें आनंद लेने के लिए कितनी अक्ल चाहिए. क्या वे पूरी तरह विचार को ख़त्म करने की मुहीम नहीं लगेते? यह देखिये की टीवी पर चलने वाली बहाशों में वैचारिक मशाला कितना होता है विचार-विहीन पूर्व-निर्धारीं मतान्धता  कितनी? क्या इन बहाशों में भाग लेने वाले लोग, चाहे वे बीजेपी के हों या कोंग्रेस के, अपने अपने मालिकों के भोंपू नहीं लगते? यह देखिये की राजनीति और पार्लियामेंट में क्या विवेक की कोई कीमत है? यह देखिये कि बाबाओं और अम्माओं में अंधश्रद्धा कितनी है?

इस सब को ध्यान से देखेंगे तो पायेगे कि इस वक्त जो सिद्धांत देश में चल रहा है वह है: जिससे मेरा स्वार्थ सधता लगता है वह बात सही है; तथ्य और तर्क कुछ नहीं होता, शोर ही लोकतंत्र में कारगर हथियार है. इस सिद्धांत को मानने वालों को बहुत अशानी से जाती के नाम पर, धर्म के नाम पर और धन के नाम पर मूर्ख बनाया जा सकता है. और इस तरह मतान्ध बनाए गए लोग विवेक से सामना होने पर केवल और केवल भावनात्मक प्रतिक्रया करते हैं; वह वास्तविक जीवन में वास्तविक हिंसा में अभ्व्यक्त होती है और वर्चुअल दुनिया में वर्चुअल हिंसा में. धमकी और गाली-गलोच वर्चुअल हिंसा का ही रूप है.

भारत में जो बुद्धीमान अकादमिक पिछले ४० वर्षों से विवेक को ताकत वालों का नाजायज हथियार मानने और भावना को उस से ज्यादा महत्वापूर्ण मानने के लिए थ्योरी बनाते रहे हैं, विमर्श में विवेक के उपयोग को दूसरे लोगों को दबाने का साधान मानते रहे हैं उन बौद्धिकों को अब इस स्थिती के विश्लेषण में अपने सिद्धांत को देखना चाहिए. उनको यह समझना चाहिए कि ये लोग अपनी मूर्खता पूर्ण भावनाओं का ही इजहार कर रहे हैं. उनके आकाओं को, इन के मन में स्थापित मान्यताओं को, जब आप चुनौती देते हैं और उनके पास विवेकपूर्ण जवाब नहीं होता तो वे अपनी भावना के सहारे आप के विवेक का जवाब देते हैं; और वह धमकी या गाली के रूप में आता है. हमें यह समझाने की जरूरत है कि भावायें पब्लिक debate में स्वीकार्य और अस्वीकार्य दोनों तरह की हो सकती हैं. और कौनसी स्वीकार्य और कैसी अस्वीकार्य है इस का निर्णय भावना से बहार निकल कर ही हो सकता है, भावना के सहारे नहीं. यदि केवल-और केवल बहुमात से निर्णय करना चाहते हैं तो गाली-गलोच समूह इन्टरनेट पर अपना बहुमत साबित कर रहा है, अतः किसी को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए. पर कष्ट तो है. इस का अर्थ यह है की स्वाकार्य-अस्वीकार्य भावना और विचार के लिए ना तो भावना अकेली यथेष्ठ है नाही बहुमत. तो केवल विवेक ही बचता है इस मूर्खता से लड़ने के लिए. यह सब मैं इस लिए लिखा रहा हूँ की पिछले ४० वर्षों में तर्क और विवेक की मिट्टीपलीद करने में हम में से बहुत से बौद्धिकों के महत्त्वपूर्ण योगदान किया है. तो अब पब्लिक स्पेस में हमें ही विवेक को पुनः स्थापित करना होगा. और अभी भी यदी इसे स्वीकार नहीं करना चाहते तो जैसी आप की भावनाए वैसी गाली-गलोच-मूर्खों की, फिर परेशानी क्या है? सोशल मीडिया पर गाली और धमकी समाज में व्यापक स्तर पर विवेक पर हो रहे हमलों का एक रूप है, असली बीमारी विवेक-विहीनता है.

और आखिरी बात यह कि मुझे लगता है (मैं गलत हो सकता हूँ, क्यों की मैं सोशल मीडिया को बहुत नहीं समझता) कि हम सोशल मीडिया और उस पर गाली-गलोच करने वाले मूर्खों को उनकी औकात से ज्यादा महत्व दे रहे हैं. उन को उसी स्पेस में बेवकूफ और असभ्य साबित करना अधिक उपयोगी होगा.

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