कोरोना-बंदी में भोला

April 2, 2020

रोहित धनकर

भोला कोरोना-बंदी में अपनी छत पर बैठा था। वह घर के अंदर बैठा-बैठा कुछ ऊब गया था, तो शाम ढलने पर छत पर चारपाई लगाई, हुक्का भरा (यह उसकी बहुत बुरी आदत थी) और चारपाई पर बैठ कर हुक्का गुड़-गुड़ाते हुए कुछ सोचने लगा। उसकी मुद्रा कुछ गंभीर थी, चारपाई पर पैर लटका कर बैठा था, कोहनियाँ दोनों घुटनों पर टिकी थी और ठुड्डी दोनों हाथों की एक-पर-एक बंधी मुट्ठी पर। जब वह सोचता था तो उसे ऐसे बैठने की आदत थी उसकी। ये हुक्का पीना और सोचना उस की दो बहुत बुरी आदतें थीं। अचानक भोला को कोई बोलता सुनाई दिया।

आवाज़: भोला किस सोच में डूबा है?

भोला ने नजर उठा कर देखा उसका पड़ोसी ज्ञानचंद अपनी छत से पूछ रहा था। ज्ञानचंद और भोला बिलकुल अलग-अलग तरह से सोचते थे। उन में सहमती कभी-कभार ही होती थी। दोनों में लेकिन बनती खूब थी। भोला कहता ‘ज्ञानु का ज्ञान अंधा है’, ज्ञानचन्द कहता ‘भोला तो बस बेअकल-भोला ही है’। अभी भोला को लगा चलो ज्ञानचन्द से कुछ बहस ही सही। ये घर-से-काम के चक्कर में भोला एकदम आलसी और काम-चोर हो गया था।

भोला: ज्ञानी, तुम टिपणीस जो लिखता है पढ़ते हो?

ज्ञानचन्द: हाँ, कभी-कभी। क्यों?

भोला: तुम्हें याद है इंदोर में 21 मार्च को जनता-कर्फ़्यू के बाद पाँच बजे लोग थाली-कटोरा बजते जुलूश की शक्ल में सड़कों पर आ गए थे। मोदी को समर्थन दिखाने के लिए?

ज्ञानचंद: हाँ, तो क्या हुआ? ये थाली-कटोरे वाले तो बेवकूफ़ियाँ करते ही रहते हैं।

भोला: हाँ, तब टिपणीस ने यही कहा था कि इन लोगों ने अपनी अंधभक्ति में दिन-भर के किए कराये पर पानी फेरदिया। और अपनी मोदी-भक्ति में लोगों को खतरे में डाल दिया। तो क्या तब टिपणीस मोदी समर्थकों और थाली छाप-हिंदुओं के विरुद्ध पक्षपाती (biased) हो रहा था? या सभी हिंदुओं के विरुद्ध हो रहा था?

ज्ञानचन्द: नहीं, वह तो ठीक ही कह रहा था। सही बात थी।

भोला: अच्छा, और जब योगी ने करोना-बंदी की अगली ही सुबह राम की मूर्ति दूसरी जगह स्थापित करने का तमाशा सरकारी अधिकारियों के साथ किया था, तब टिपणीस ने कहा की इसने आदेश तोड़ा है, ये धर्मांध आदमी है। तब वह पक्षपात कर रहा था, हिंदुओं के विरुद्ध? या हिंदुओं को बदनाम कर रहा था?

ज्ञानचन्द: नहीं भोला, वह ठीक कहा रहा था। पर तुम टिपणीस के चक्कर में क्यों पड़े हो?

भोला: हुम्म, और जब शायद इंदोर में ही, नवारात्रा के लिए जुलूश को धर्म के नाम पर सब के लिए खतरा फैलाना कहा तब? क्या वह पक्षपात था? वह हिंदुओं को बदनाम कर रहा था?

ज्ञानचन्द: बिलकुल नहीं, वह धर्म के नाम पर इन हिंदुओं के समाज को खतरे में डालने वाले करनामे को गलत कहा रहा था। और यह कारनामा धर्म के नाम पर तो था ही। इस में बदनाम करने की क्या बात है।

भोला: हुम्म, अच्छा, अब वह कहा रहा है कि तबलिगी जमात ने जानते-बूझते इतने लोगों को एकत्रित होने दिया। कि जमात का हैड मौलाना साद (Sa’ad) बार बार अपने भाषणों में कहता रहा (17 मार्च, 26 मार्च) कि अल्लाह का अज़ाब अल्लाह को और इस्लाम को नकारने से आता है, एकत्रित हो कर इबादत (नमाज़) से नहीं। और मस्जिदों में सामूहिक नमाज़ से दूर होता है। कि मस्जिदों से दूर रहने की सलाह मुसलमानों के खिलाफ साजिस है। कि यह मौका मस्जिदों से दूर रहने का नहीं बल्कि लोगों को मस्जिदों में ज्यादा बुलाने का है। टिपणीस कहता है कि यह धर्म के नाम पर गैर-जिम्मेदाराना काम है। कि इस में मौलाना के मुरीद मुसलमान अन्य मसलमानों की, अपनी स्वयं की और गैर-मुसलमानों की जान के लिए अपने विवेकहीन विश्ववास के कारण खरतारा फैला रहे हैं। तो क्या अब वह मुसलमानों के विरुद्ध पक्षपाती हो रहा है? क्या वह मुसलमानों को बदनाम कर रहा है? क्या वह biased है?

ज्ञानचन्द: (अपनी सफाई से तरासी दाढ़ी खुजलाते हुए) उम्म हूँ  उम्म …

भोला: (भोला बोलते हुए नीचे जमीन पर देख रहा था। ज्ञानचन्द की आवाज न आने पर गर्दन उठा कर देखा तो ज्ञानचन्द इधर-उधर देख रहा था) क्या हुआ ज्ञानी? दाढ़ी में जूएँ हो गई क्या?

ज्ञानचन्द: हुम्म, हाँ, टिपणीस के पास क्या प्रमाण हैं कि इतने लोग जानते बूझते एकत्रित होने दिये? कि मौलाना सच में मस्जिदों में ज्यादा लोगों को आने को कहा रहे है?

भोला: ज्ञानी भाई, दिल्ली सरकार के आदेश 12, 13, 16 और 19 मार्च के जमात के सामने थे। मौलाना के औडियो और विडियो (उन में मौलाना नहीं दिख रहे पर किसी ने इंकार नहीं किया है कि आवाज़ उन की ही है) इन्हीं की वैबसाइट से, उन्हीं के नाम के साथ विडियो का नाम भी दिया है, तारीख भी दी है। ये सब प्रमाण नहीं हैं क्या?

ज्ञानचन्द: ये सब गोदी मीडिया चनेल्स की मुसलमानों को बदनाम करने की साजिस है।

भोला: पर विडियो तो लोगों ने खुद उनकी साइट www.delhimarkaz.com से लिए हैं। जमात कह रही थी कि हजार के करीब लोग फंसे है, दिल्ली सरकार ने निकाले तो कोई 2300 निकले। दो दिन में अचानक जो इन्फ़ैकशन के केस बढ़े हैं वे जमात के लोगों से संबन्धित हैं। तो bias कहाँ है यह सब कहने में? ये मुस्लिम-विरोधी क्यों है?

ज्ञानचन्द: भोला, अपनी मुस्लिम-विरोधी मानसिकता से निकालो। ये सब मुसलमानों के विरुद्ध कु-प्रचार है।

भोला: पर ज्ञानी, कई मुसलमानों ने लेख लिखे हैं, टीवी पर कहा है कि जमात ने यह अपराध किया है। कोई भी सब मुसलमानों के विरुद्ध नहीं कहा रहा। पर बड़ी तादाद में मौलाना जैसों के मुरीदों को जरूर कह रहे हैं। मुसलमानों के विरुद्ध बात है तो वे मुसलमान क्यों बोल रहे हैं? और यदि मौलाना जैसों की मानने वाले बहुत लोग हैं तो चिंता की बात तो है ही, इस को नकारने से क्या बनेगा?

ज्ञानचन्द: जब और धर्म, खास कर हिन्दू लोग ऐसी ही गलती करते हैं तो इतना हल्ला क्यों नहीं मचाता?

भोला: जब ऐसी गलती पर हिंदुओं को लोग दोष देते हैं तो उनके पक्ष में कब ऐसी दलीलों की बाढ़ आती है? गलती की, लोगों ने बोला, कोई समझदार व्यक्ति बचाव में नहीं उतारा। बात खत्म हो जाती है। पर जमात का नाम लिया को ढेरों तुम जैसे ज्ञानी बचाव में उतार पड़े। तो लोगों को भी अपनी बात के प्रमाण देने पड़ते हैं। बात बढ़ती है। और फिर ज्ञानी साहब, मौलाना के अलावा किस धर्म गुरु ने कहा है कि किसी भी हालत में एकत्रित होना, समूहिक पूजा-पाठ मत छोड़ना? और यदि ऐसा कहा और किया है, तो उस को दोष देने से कौन रोक रहा है? बताओ कब और किसने कहा?

ज्ञानचन्द: भोला, तुम में अक्ल तो पहले ही कम थी, आजकल टिपणीस की तरह से तुम भी मुस्लिम-विरोधी हो गए हो।

भोला: पर अंध-ज्ञानी भाई, (भोला ने चिढ़ाने के लिए कहा) मैंने तो जो कुछ कहा उस के लिए तथ्य या तर्क दिये। तुमने मेरे तथ्यों को तो नहीं नकारा। तर्कों को भी नहीं काटा, तो दोष किस लिए?

ज्ञानचन्द: तुम संदर्भ और व्यापक परिदृश्य देखने में असमर्थ हो। शूक्ष्म विश्लेषण करने में असमर्थ हो। तुम्हें समझ नहीं आ रहा।

भोला: तो समझाओ भाई, मैंने क्या छोड़ा है? क्या गलती की है? ये मुस्लिम-विरोध आदि उपाधियाँ क्यों दे रहे हो?

ज्ञानचन्द: अभी मुझे काम है, फिर कभी समझाता हूँ। पर भोला, सोचो, जो लोग फंसे थे मरकज़ में, वे गरीब लोग हैं, उनके कुछ धार्मिक विश्वास है। विज्ञान और धर्म में एक-दूसरे को नकारने की जद्दो-जहद चलती रहती है। इन में से बहुत से लोगों को वैज्ञान की चिकित्सा उपलब्ध भी नहीं है। तो मौलाना जो कहा रहा था वह चिकित्सा के अभाव में धर्म के सहारे की बात भी हो सकती है।

(यह कहते हुए ज्ञानचन्द अपने घर में जीना उतार कर नीचे चला गया।)

भोला सोचने लगा: जमात तो बिलकुल गरीब संस्था नहीं है। वहाँ धर्म-प्रचारक लोग आए थे वे भी कितने गरीब हैं, पता नहीं। फिर क्या किसी को अपने धर्म को चिकित्सा के अभाव में सहारा बनाने के लिए दूसरों की जान को खतरे में डालने का हक़ मिलजाता है? हो सकता है की गरीब लोग चिकित्सा के अभाव में धर्म का सहारा लें; पर क्या मौलाना भी यही सोचता था?

भोला को ये बातें समझ में नहीं आईं। पर सोचा ज्ञानी पड़ोसी है जाएगा कहाँ। फिर पकड़ लेंगे कभी। इन दिनों तो घर से भाग भी नहीं सकता। जब बहुत जरूरत होगी छत पर चढ़ कर आवाज़ लगा लेंगे। यही सोचते हुये भोला अपना हुक्का ताजा करने छत से नीचे चला गया।

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2 अप्रैल 2020