डर हमें मूर्ख और दब्बू बना रहा है (2)

July 4, 2022

रोहित धनकर

… कल आए आगे

भाग 2: सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

हमारे कथित-उदारवादी और बहुत से राजनीतिज्ञ लगातार कह रहे हैं कि देश में मुस्लिम हिंसक प्रदर्शनों और उदयपुर में कन्हैया लाल की हत्या के लिए नूपुर शर्मा जिम्मेदार है। और अब तो इस चिंतन पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी मौखिक मुहर लगा दी। न्यायालय ने कहा “The way she has ignited emotions across the country. This lady is single handedly responsible for what is happening in the country.” (मेरे द्वारा काम चलाऊ अनुवाद: “जिस तरह से उस ने (नूपुर ने) देशभर में भावनाएं भड़काई हैं, देश में जो कुछ हो रहा है उस के लिए यह महिला अकेली जिम्मेदार है।”) न्यायाधीशों ने और भी बहुत कुछ कहा, पर मैं अपना ध्यान इस लेख में इसी कथन पर केन्द्रित करना चाहता हूँ।

सब से पहले हम यह समझलें कि किसी से यह आग्रह कि “दूसरों को बुरी लगाने वाली बात नहीं बोलनी चाहिए”, सभ्य समाज में व्यवहार कुशलता का और नैतिकता का आग्रह है। जहां तक हो सके इस को मानने में मुझे कोई आपत्ति नहीं लगती। हालांकि इस की भी सीमा होती है। पर “अ” के कथन को “ब” की करणी के लिए “जिम्मेदार” मानना बिलकुल अलग बात है, और इस के निहितार्थ बहुत खतरनाक हैं। यदि यह बात सर्वोच्च न्यायालय में पीठासीन न्यायाधीश कहता है, तब यह एक कानूनी चोला धारण कर लेती है। हमारे सभी कथित-उदारवादी बुद्धिजीवी इस कथन का पक्ष ले रहे हैं। और तो और वकीलों की संस्था बार असोशिएशन भी इस का पक्ष ले रही है। ये सब बहुत खुश हो रहे हैं और उसे सरकार और पुलिस को न्यायालय की लताड़ बता रहे हैं।

यही कारण है की इस छोटी सी बात का मैं यहाँ लंबा विश्लेषण कर रहा हूँ। मेरे पास इस पर न कोई गहन ज्ञान है न कोई महान नैतिक सिद्धान्त, पर इस के तार्किक निहितार्थों को एक साथ देखना मुझे जरूरी लगता है। तभी हम इस विचार और टिप्पणी की गंभीरता और उस से संभव नुकसान को ठीक से देख पाएंगे। यह विश्लेषण भी मैं सिर्फ एक दिशा मेन कर रहा हूँ, इस के निहितार्थ समझने की दिशा में। नूपुर शर्मा के मुकदमे पर इस का क्या प्रभाव हो सकता है यह इस लेख का विषय नहीं है। बस इस कथन या लताड़ के निहितार्थ भर समझना चाहता हूँ।

  1. देश में क्या हो रहा है? नूपुर की टिप्पणी के बाद हुई कुछ चीजें (सब नहीं)
    1. मुसलमानों द्वारा उग्र प्रदर्शन हुए हैं, हिंसक दंगा हुआ है, पुलिस की गोली से दो ( शायद ?) लोग मरे हैं, “सिर तन से जुदा” के नारे लगे हैं, लोगों ने नूपुर को मारने की कासमें खा कर उनके विडियो सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित किए हैं, मारने के लिए दूसरों को उकसाया है, इनाम घोषित किए हैं, नूपुर के समर्थन करने वाले एक व्यक्ती की जघन्य हत्या हुई है, उस का विडियो वाइरल करके और लोगों को मारने का आग्रह किया है, एक और व्यक्ती की हत्या भी नूपुर के समर्थन से जुड़ी है या नहीं इस की जांच चल रही थी। अब यह सामने आया है कि यह भी इसी कड़ी का हिस्सा है, अर्थात दो हत्याएँ हो चुकी हैं।
    1. हिंदुओं द्वारा “कट्टर मुल्लों” को “काटने” ने नारे लगे हैं, श्री राम को नबी का बाप घोषित करने वाले नारे लगे हैं। नूपुर के समर्थन में जुलूस निकले हैं।
  2. सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि इन सब के लिए “अकेली” नूपुर जिम्मेदार है। इसे हम कैसे समझें?
    1. निहितार्थ 1:
      1. मुहम्मद के बारे में ऐसी टिप्पणी से जिसे मुसलमान पसंद नहीं करते, (चाहे वह उन्हीं के शास्त्रों के अनुसार सत्य हो), मुसलमान भड़काते हैं। यह भड़काना या तो एक यांत्रिक क्रिया है, जो बिना सोचे समझे होती है; या स्वाभाविक है। पर दोनों स्थितियों में इस प्रतिक्रिया पर उनका बस नहीं है। क्यों कि उनका बस होता तो भड़कने या ना भड़कने का चुनाव वे खुद कर सकते थे। और ऐसे में ज़िम्मेदारी नूपुर की नहीं भड़कने वाले मुसलमानों की भी होती। इस का अर्थ यह हुआ कि मुसलमान अपने ऊपर बिना नियंत्रण वाले मतारोपित (indoctrinated) व्यक्ति हैं, जिन की व्यक्तिगत चुनाव और अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी की योग्यता या तो विकसित नहीं हुई या फिर खत्म हो गई है।
      1. भड़काने के बाद हिंसा और हत्याएँ भी स्वचालित, बिना आत्म-नियंत्रण के होती हैं, उन पर भी मुसलमानों का कोई बस नहीं हैं। अतः वे जिम्मेदार नहीं हैं।
      1. पर मुसलमान तो हम सब के समान अधिकारों वाले भारतीय नागरिक हैं। और नागरिकता सिर्फ आत्म-नियंत्रण और स्वयं के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की ही होती है। ऐसा नहीं हो तो नागरिक को किसी अभिभावक की जरूरत होती है जो उस के लिए जिम्मेदार हो, उसके लिए निर्णय ले। वयस्क मुसलमान तो स्वतंत्र नागरिक है, हम सब मानते हैं। हम उनके समान अधिकारों की बात कराते हैं, अधिकार बिना ज़िम्मेदारी के नहीं होते।
      1. नूपुर की ज़िम्मेदारी होने की टिप्पणी का यह अर्थ तो कोई भी भारतीय नागरिक नहीं मानेगा, कोई भी मुसलमान नहीं मानेगा। कोई भी कथित-उदारवादी भी नहीं मानेगा, वे तो सदा मुस्लिम अधिकारों की ही बात करते रहते हैं। और मुसलमानों को स्वयं के कर्मों की ज़िम्मेदारी से इस अर्थ में मुक्त करना तो उनके अधिकारों को भी छीन लेगा। जहां तक मैं समझता हूँ, यह अर्थ तो सर्वोच्च न्यायालय भी नहीं मानेगा।
      1. अतः सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का यह निहितार्थ तो नहीं हो सकता कि मुसलमान अपने कामों के बारे में सोच कर निर्णय नहीं ले सकते, कि उनका अपनी प्रतिक्रिया पर नियंत्रण नहीं है।
    1. निहितार्थ 2
      1. मुसलमानों में अपने कामों और कथनों का चुनाव करने की और उनपर नियंत्रण की योग्यता तो सभी इंसानों, भारतीय नागरिकों सहित, जैसी ही है। पर मुहम्मद पर टिप्पणी से उनको गुस्सा आता है, गुस्से में वे हिंसा करते हैं, हत्याएँ भी करते हैं।
      1. ये हत्याएँ और हिंसा उन के धर्म-शास्त्रों के अनुसार जायज ही नहीं बल्की अनिवार्य हैं। इस लिए उनको यह करने का हक़ है। तो ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति की (नूपुर की) हुई जिसने इस जायज गुस्से, हिंसा और हत्या को आरंभ करने वाली टिप्पणी की। यही हिंसा करने वाले मुसलमानों की भी मान्यता है।
      1. यदि यह निहितार्थ मान्य है तो 1929 (?) में राजपाल की हत्या से लेकर आज तक नबी और इस्लाम की शान में गुस्ताखी के नाम पर जितनी हत्याएँ हुईं वे सब जायज हैं, उन में मुसलमानों का कोई दोष नहीं है। आगे यदि मुसलमान किसी बात/कथन पर नाराज हो जाते हैं, और कथन करने वाले या उस को समर्थन देने वाले की हत्या कर देते हैं, तो यह उस व्यक्ति की स्वयं की ज़िम्मेदारी है। मुसलमानों की नहीं।
      1. अर्थात भारत के नागरिकों को इस्लाम से संबन्धित वही बात कहनी चाहिए जिसकी इजाजत मुसलमान देते हैं। भारतीय संविधान इस क्षेत्र में मुसलमानों की इच्छा के आधीन है।
      1. पर मुसलमान तो सिर्फ इस्लाम पर कुछ कहने से ही नाराज नहीं होते; वे तो मस्जिद के आगे संगीत से, सड़क रोक कर नमाज पढ़ने से माना करने पर, मस्जिद से अजान के शोर की शिकायत करने पर, और आम जीवन की ऐसी बहुत सी चीजों पर नाराज होते हैं। तो अर्थ यह हुआ की भारत के बाकी नागरिकों को अपना जीवन मुसलमानों की मान्यताओं के अनुसार जीना चाहिए। नहीं तो मारे जाएंगे, और यह मारा जाना जायज होगा।
  3. निहितार्थ 2 को मानने के कारण:
    1. ऐसा लगता है की कथित-उदारवादियों और न्यायालय की मान्यता कि “देश में जो हो रहा है उस के लिए अकेली नूपुर जिम्मेदार है” की परतों को तर्क से उधेड़ते जाएँ तो अंत में निहितार्थ 2 पर आकार टिकेगी। वे साफ तौर पर इसे स्वीकार तो नहीं कराते, शायद इतने कड़े ढंग से मानते भी ना हों, पर अर्थ तो यही निकलता है।
    1. पर यह तो बहुत खतरनाक मान्यता है। इसे अपने होशो-हवास में नातो कथित-उदारवादी स्वीकारेंगे ना ही न्यायालय। हालांकि उनका व्यवहार और उन के कथन यही सिद्ध करते हैं।
    1. तो फिर उन के ऐसे खतरनाक सिद्धान्त के अनुसार व्यवहार करने, भाषण देने, पर दूसरों के सामने बोल कर स्वीकार ना करने के क्या कारण हो सकते हैं? मैं नहीं जनता।
    1. पर एक अनुमान यह हो सकता है कि वे जानते हैं कि कुछ मुसलमान मुहम्मद, कुरान और इस्लाम पर कुछ कहने से नाराज होंगे। कि वे हिंसा करेंगे, हत्या भी कर सकते हैं।
    1. पर भारतीय राज्य में, न्याय व्यवस्था में और समाज में इतना साहस और ताक़त नहीं है कि वे मुसलमानों की इस हिंसा को रोक सकें। वे सब इन मुसलमानों के सामने असहाय हैं।
    1. जब किसी बुराई को रोक नहीं सको तो जीवन बचाने के लिए, व्यवस्था बचाने के लिए, देश बचाने के लिए उसे स्वीकार करलो। मुझे लगता है असली सिद्धान्त यह है। बाकी लफ्फाजी है।
    1. इस का अर्थ यह है की समाज, देश, हमारा चिंतन और हमारी जुबान; मुसलमानों के पास बंधक है।
    1. यह हद दर्जे की कायरता है।

कथित-उदारवादी आपनी विचारधारा के चलते और उस विचारधारा से मिलने वाली प्रशंसा के फ़ायदों के लिए इस कायरता को स्वीकार कर सकते हैं। वे ऐसा भी मान रहे हो सकते हैं कि वास्तव में अल्पसंख्यकों का यह अधिकार होता ही है। पर ऐसा लगता नहीं। क्यों की हिंदुओं के इस अधिकार को वे पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में स्वीकार नहीं करते। वे अपनी भारतीयता और हिन्दू को दोषी मानने की आदत के चलते यह भी मान सकते हैं की सारा दोष है ही हिंदुओं का। पर इस के लिए उन्हें पूरी तरह मतारोपित (indoctrinated) या मूर्ख मानना होगा। मेरे विचार से वे विवेचना शक्ति रखने वाले औसत से ज्यादा बुद्धिमान लोग हैं, तो कारण मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा हूँ। पर शायद वे यह मानते हैं कि भारत के लिए बहुसंख्यक हिंदुओं का सांप्रदायिक हो जाना, अल्प संख्यक मुसलमानों की सांप्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक है। अतः हिंदुओं को लगातार दोष दे कर, अपराध बोध के सहारे उनकी सांप्रदायिकता को नियंत्रित करना चाहते हों। इस पर कभी फिर लिखूंगा जब मुझे कुछ और ठीक से समझ आ जाएगा। यहाँ सवाल यह है की भारतीय समाज इस कायरता को क्यों स्वीकार करे? भारतीय समाज में मैं सभी मजहबों और धर्मों को मानने वालों की बात कर रहा हूँ। एक कारण यह हो सकता है की मजहबी-अंधे मुसलमानों की मुख्य टकराहट हिंदुओं से है। अतः बाकी अपने आप को या तो निरपेक्ष मान रहे हैं या सुरक्षित। इस लेख में उनको मैं बस बाकी दुनिया के देशों को देखने भर की सलाह दूंगा।

तो फिर हिन्दू इस को क्यों स्वीकार करें? और जो लोग इस कायरता को स्वीकार नहीं करना चाहते उनके पास तरीका क्या है? आरिफ़ मुहम्मद खान आरती टिक्कू के साथ एक वार्तालाप (https://www.youtube.com/watch?v=wsCO2Dt5hUE) में इस भय से निजात पाने का और इस पर हत्याएं करने वालों को जवाब देने का और सरकार की आँख खोलने का एक तरीका बताते हैं। इस विडियो को 13 से 16 मिनट तक सुनें। वे कुछ भिन्न परिस्थितियों में स्पेन का उदाहरण देते हैं। पर वह तरीका वर्तमान भारतीय परिस्थिति में और सामाजिक माध्यमों को काम में लेते हुए यहाँ भी सफ़ल हो सकता है। श्री खान का स्पेन में ईसाई युवकों द्वारा अपनाया तरीका तो आप स्वयं सुनलें। यहाँ उसका परिवर्तित रूप नीचे लिखे कुछ बिन्दुओं के आधार पर बनाया जा सकता है:

  • पहले यह समझें की ईशनिन्दा को सामान्यकृत किसी एक मजहब के लिए नहीं किया जा सकता। छूट लेनी है तो सब से लेनी होगी।
  • आज कल हिन्दू भी ईशनिन्दा (यह उनकी अवधारणा ही नहीं है, वे प्रतिकृया में मुसलमानों की नकल कर रहे हैं) के लिए गिरफ्तार और दंडित करने की बात करने लगे है। उन्हें समझना चाहिए कि यह गलत दिशा है।
  • इस मुहिम में भाग लेने वालों को पहले चरण में मुहम्मद और देवी-देवताओं को अपमान जनक रूप से पेश नहीं करना चाहिए। बल्कि आज के सहृदय व खुश इंसान के रूप में पेश करना चाहिए।
  • उदाहरण के लिए मान लीजिये हो सामाजिक माध्यमों पर हजारों-लाखों लोग एक साथ कृष्ण के साथ या काली के साथ बातचीत करने हुए, हँसते हुए और हाथ में मदिरा का पात्र और सामने स्टीक रखी हुई दिखाएँ। दृश्य बैठक व्यवस्था आदि की दृष्टि से महाभारत कालीन हो सकता है।
  • इसी तरह मुहम्मद को भी हाथ में मदिरा के गिलास और सामने सलामी या सोसजेज़ के साथ दिखाएँ। दृश्य मुहम्मद के जमाने की अरब संस्कृति के अनुसार हों सकता है।
  • ये दृश्य दोनों तरह के कट्टर लोगों को आपत्ति जनक लगेंगे। पर हजारों (कम से कम 50 हजार) एक दिन में एक साथ पोस्ट होंगे तो न कट्टर पंथी कुछ कर पाएंगे, ना ही सरकार। फिर बात-चीत भी ऐसी दिखाई जा सकती है जो सम्मान जनक पर सवाल करने वाली है।
  • यदि यह चरण सही-सलामत पार हो जाये तो आगे सोचा जा सकता है।

यह मैं किसी को चिड़ाने के लिए करने की बात नहीं कर रहा, बल्की मजहब और धर्म पर आलोचना की स्वतन्त्रता, जो कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हिस्सा है, को समाज में सहज मान्यता दिलवाने के लिए करने की बात कर रहा हूँ। शालीनता पर दृढ़ता के साथ। पर इस के लिए एक अच्छी मजबूत रीढ़ की हड्डी, तथा साफ और ईमानदार दिमाग की जरूरत है। मैं नहीं जनता भारत में ये चीजें जरूरी मात्रा में उपलब्ध हैं या नहीं।

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2 जुलाई 2022

रोहित धनकर

यहाँ अभिव्यक्त विचार मेरे हैं। मैं जिन संस्थाओं से जुड़ा हूँ उनके नहीं, नाही वे संस्थाएं इन विचारों का समर्थन करती हैं।


डर हमें मूर्ख और दब्बू बना रहा है

July 3, 2022

रोहित धनकर

भाग 1: ईशनिन्दा

हम यदि भारतीय आलोचक और सृजनात्मक मेधा को कुंद नहीं करना चाहते तो हमें हर नागरिक को ईशनिन्दा (blasphemy) का हक देना होगा। सभी लोकतंत्रों में मजहबी गुरुओं, ईश्वरों और पैगंबरों की आलोचना और निंदा की भी छूट है। भारतीय संस्कृति में देवों पर कटाक्ष, उनकी आलोचना और उनकी हंसी उड़ाने की पुरानी परंपरा है। चाहे हम अपनी परंपरा के हिसाब से देखें, चाहे लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हिसाब से, अवतारों, देवताओं, और पैगंबरों की आलोचना, निंदा और उनकी हंसी उड़ाना मजहब के दिमाग पर सिकंजे से निकलने के लिए जरूरी है। साथ ही हर मजहब एक राजनैतिक विचारधारा (ideology) भी है, खास कर आज पहचान-राजनीति (identity politics) के जमाने में। भारतीय संविधान में शरिया और हिन्दू-राष्ट्र के लिए गुंजाइश निकालने की बात रोज हो रही है। ऐसे में यदि आप मुहम्मद, कुरान, अल्लाह, मनु, देवता, कृष्ण आदि की आलोचना का हक नहीं देंगे, तो लौकिक राजनैतिक विचारधाराओं (secular political ideologies) के साथ अन्याय होगा। क्यों की उनके परवर्तकों, मनीषियों पर कटाक्ष और उन पर कथित-अपमानजनक टिप्पणियाँ तो आप करने देंगे; पर मजहबी राजनैतिक विचारधाराओं के परवर्तकों की मूर्खता, धोखेबाज़ी, झूठ और हिंसा पर लोगों को कटाक्ष नहीं करने देंगे। यह विचारधारा लोकतान्त्रिक बहस में कानूनी असमानता बनाती है। और अंत में लोकतन्त्र की जड़ खोद देगी। क्यों की कोई भी मजहबी राजनीति लोकतन्त्र को सहन नहीं कर सकती।

सब मजहबों और धर्मों में उनके आरध्यों की निंदा पर आक्रोश होता है। वह अभिव्यक्त भी होता है। पर सब में ना तो वह समान होता है नाही जघन्य हत्याओं तक पहुंचता है। या तो न्यायालयों में मुकदमों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है या सड़कों पर प्रदर्शन के माध्यम से। हो सकता गिनेचुने अवसरों पर कुछ तोड़-फोड़ हो जाये, पर वह जल्द ही नियंत्रित करली जाती है। पर मुस्लिम (इस पूरे लेख में मैं “मुस्लिम”, “मुसलमान” शब्दों से सिर्फ उन मुसलमानों की बात कर रहा हूँ जो मजहबी-अंधे और कट्टर हैं। मेरी टिप्पणियाँ उन मुसलमानों पर नहीं हैं जो नबी आदि के नाम पर हत्याओं के विरोधी हैं) प्रतिकृया इस से बहुत अलग होती है। वह बहुत व्यापक होती है, हिंसक होती है और हत्याएं करती है। यह भय पैदा करने के लिए होती है। भय जरूरी है कट्टर-इस्लाम के लिए। क्यों की इस का विवेकशील, नैतिक, और आध्यात्मित आधार बहुत ही कमजोर है। कुरान को तार्किक दृष्टि से पढ़ने पर यह एकदम साफ हो जाता है कि यह मजहब डर और लालच पर चलता है। फिर भी मुसलमान इसे शांति का मजहब साबित करना चाहते हैं। मुहम्मद को आदर्श मानव सिद्ध करना चाहते हैं। यदि खुली विवेचना होगी तो कुरान की आयतें और हदीस उनके शांति और मुहम्मद के आदर्श मानव होने के दावों की धज्जियां उड़ा देंगी। इस लिए लोगों को कुरान, मुहम्मद और हदीस पर खुल कर बात करने से रोकना जरूरी है। क्यों की विवेक सम्मत तर्क में वह कहीं टिकेगा नहीं, इस लिए जघन्य हिंसा के माध्यम से डर पैदा करना जरूरी है। यह ठीक वैसे ही हिंसा और डर पर चलता है जैसे बंबईय्या फिल्मों के गुंडों की हफ्ता वसूली हिंसा से फैलाये डर पर चलती है। डर गायब, तो हफ्ता गायब। डर गायब तो इस्लाम के शांति और मुहम्मद के आदर्श होने के दावे गायब। तो बोलने वाले को मार दो, यही रास्ता बचता है।

ऐसा नहीं है की विरोध, प्रदर्शन और हिंसा की धमकी हिन्दू भीड़ नहीं देती। देती है। हुसैन के चित्रों पर विरोध इसका उदाहरण है। और भी बहुत से उदाहरण है विभिन्न पुस्तकों पर प्रतिबंध और प्रदर्शन और हिंसा की धमकी के। जैसे औब्रेय मेनन की ‘The Ramayana’, रामानुजन का लेख ‘Many Ramayanas: The Diversity of a Narrative Tradition in South Asia’, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कोर्स से हटवा दिया गया था। पर इन सब में, जहां तक मैं जनता हूँ, किसी का गला नहीं काटा गया। और हिन्दू बहुमत ने ही इन उग्रता से विरोध करने वालों को नियंत्रित कर लिया। क्यों की हिंदुओं में इस तरह की मजहबी कट्टरता का विरोध करने वाले बहुत लोग हैं। साथ ही हिन्दू शास्त्रों में कहीं कथित ईशनिन्दा के लिए कत्ल की आज्ञा नहीं है। इस्लाम में एक तो इस तरह की हिंसा के विरोध करने वाले कम हैं, जो हैं वे स्वयं डरते हैं, अतः बोलते नहीं। और इस्लाम की किताबें इस की अनुमति ही नहीं आज्ञा देती हैं।

यदि दो किताबों में लिखे हुए और उस पर मजहबी लोगों की प्रतिकृया की तुलना करें तो आप बहुत फर्क पाएंगे। औब्रेय मेनन की ‘द रामायण’ 1954 में प्रकाशित हुई और हिन्दू विरोध के कारण 1956 से प्रतिबंधित है। यह राम कथा को एक आम कथा के रूप में पेश करती है, किसी धार्मिक कथा के रूप में नहीं। बहुत से चरित्रों का मज़ाक उड़ाती है जिनमें दशरथ, लक्ष्मण, ब्राह्मण, ऋषि और राम भी हैं। पर कुछ ऐसे वाक्य भी हैं जिन पर आज तो हिन्दू भी बहुत उग्र हो जाएँगे। एक दृश्य में लंका विजय के बाद लक्ष्मण और सीता बात कर रहे हैं। जिस में सीता यह स्वीकार करती है कि उसने ऋषियों को बचाने के लिए रावण से एक सौदा किया था। उस के तहत वह रावण के साथ सोई थी, और इस में रावण ने उसे बाध्य नहीं किया।

धार्मिक हिंदुओं के लिए यह बहुत अपमान जनक है। इस पुस्तक में ऐसी और भी बातें हैं। पर क्या विरोध हुआ? हाँ। क्या हत्या हुई? नहीं। जहां तक मैं जनता हूँ हत्या की धमकी तक नहीं दी गई। किताब अब भी प्रतिबंधित है भारत में, पर दुनिया भर बार में मिलती है। यहाँ तक की अमेज़न इंडिया पर भी मिलती है। मेनन को किसी ने नहीं मारा, उन की मृत्यु 1989 में, 77 वर्ष पाकर, त्रिवेन्द्रम में हुई।

‘द सटेनिक वरसेस’ (शैतानी आयतें) शलमान रश्दी का उपन्यास है। यह बहुत जटिल शैली में लिखा प्रतीकात्मक उपन्यास है, इस शैली को साहित्य वाले ‘जादुई वास्तविकता’ (magical realism) कहते हैं। पाठक को बहुत सावधान रहना पड़ता है यह ध्यान में रखने के लिए कि क्या कौनसे चरित्र के सपने में चल रहा है, और क्या वास्तव में। इस में बहुत कुछ है जिस पर मुसलमान नाराज हो सकते हैं। मैं सिर्फ दो उदाहरण दूंगा। जहीलिया विजय के बाद जब महौन्द की सेना उस के सभी आलोचकों को ढूंढ कर दंड दे रही थी या उसका चलाया मजहब कुबूल करने पर माफ कर रही थी, तब एक मामूली कवि, बाल, जिसने महौन्द पर एक व्यग्यात्मक कविता लिखी थी, वह बहुत डर गया। और जा कर एक वैश्यालय में छुप गया, जिस का नाम “हिजाब” था। कुछ दिन बाद वहाँ की औरतों के आपसी मनोरंजन के लिए और व्यापार बढ़ाने के लिए वहाँ एक नाटक शुरू हुआ। सब औरतें और वहाँ की मालकिन बाल से नाटक में पैगंबर की तरह बात और व्यवहार करने लगीं, और वहाँ जो औरतें थीं उन के नाम पैगंबर की पत्नियों की नकल पर रख दिये। आदि।

द सैटेनिक वरसेस में एक और घटना है जो दार्शनिक और धर्मशास्त्र की दृष्टि से इस से भी ज्यादा खतरनाक है। जाहिलिया (Jahiliya) के लोग महौन्द (Mahound) (Jahiliya और Mahound से रश्दी का क्या तात्पर्य है यह गूगल बाबा से पूछ लें) को एक प्रस्ताव देते हैं कि यदि अल्लाह लत, उज्जा और मनत को मान्यता देदे तो वे महौन्द के दीन को मान्यता दे देंगे, और महौन्द को शहरी की परिषद का सदस्य चुनलेंगे। महौन्द अपने पहाड़ पर जाता है। वापस आता है तब बहुत कुछ कहता है जिसमें अल्लाह इन तीनों देवियों को और उन की सिफारिश (intercession) को स्वीकार करता है। अर्थात उन की भी पूजा की जा सकती है और उन की सिफारिश कयामत के दिन लोगों को जन्नत या जहन्नुम भेजने में काम आएगी।

पर इस से महौन्द के साथी बहुत नाराज और निराश होते हैं। उन के विरोध के कारण महौन्द फिर अपने पहाड़ पर जाता है, और दूसरी आयतें आती हैं। जिन में जिब्रील बताता है की कल वाली आयतें जिब्रील के वेश में शैतान ने दीं थी, वे अल्लाह की तरफ से नहीं शैतान की तरफ से थीं। और आज अल्लाह की तरफ आई आयतों के अनुसार ये देवियाँ काल्पनिक हैं, और इनकी कोई मान्यता नहीं है। यह उदाहरण इस्लाम के लिए दार्शनिक और धर्मशास्त्र की दृष्टि से बहुत खतरनाक है। तार्किक दृष्टि से देखे तो यह कुरान को महौन्द की जाने-अनजाने कल्पना साबित कर देता है, जो उस की इच्छाओं से संचालित होती है, अल्लाह से नहीं। एक बड़ी तार्किक समस्या यह है कि चालो इन कुछ आयतों का को पता चल गया कि वे शैतान से आईं थीं। पर ऐसी और कितनी आयतें होंगी यह कैसे पहचानें? इस बात की क्या गारंटी है कि महौन्द जिसे अल्लाह का दूत जिब्रील समझ रहा है वह शैतान नहीं है जिब्रील के वेश में? तो फिर यह किताब अल्लाह की है या शैतान की कैसे तय करें? जहां तक मैं समझता हूँ इस्लामिक धर्मशास्त्र (theology) में इस पहेली का कोई हल जरूर होगा। पर इस बात को ऐसे उठाना मुसलमानों ने धोर आपत्तीजनक माना।

ये दोनों उदारण निहायत ही आपत्तिजनक और भड़काऊ हैं। और उपन्यास में ऐसा और भी बहुत कुछ है। पर उपन्यास में यह अपनी जगह एक साहित्यिक कल्पना भी है। और पश्चिमी लोकतंत्रों ने इसे साहित्य में जगह देने को उपयुक्त माना, साथ ही अभिव्यक्ति और सृजना की स्वतन्त्रता का हिस्सा भी माना। पर भारत ने पुस्तक के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। आग दुनिया भर में फ़ेल गई। हिंसक प्रदर्शन हुए, कई देशों में। ईरान के खुमैनी ने रश्दी का सिर कलम करने का फतवा जारी कर दिया और बीस लाख डालर का इनाम भी घोषित किया। करोड़ों की लागत से इंग्लैंड और अम्रीका ने रश्दी की सुरक्षा की व्यवस्था कई वर्षों तक की। पर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को बरकरार रखा। इस मामले में कई अनुवादकों और प्रकाशकों की हत्याएं हुई।

ऊपर लिखी चीजें सब जानते हैं। यहाँ यह सब दोहराने का कारण इस बात को चिह्नित करना है की कथित ईशनिन्दा पर आक्रोश सब मजहबों और धर्मों में हो सकता है, पर उस की ऊग्रता और प्रतिबद्धता भिन्न-भिन्न है। उसे बराबर करके देखना भ्रामक है। बाकी विरोध परदर्शित करते हैं और न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं। कट्टर इस्लाम को मानने वाले लगातार हत्याएं और हिंसा करते हैं। इस इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिए इस्लाम बाकी सब से ज्यादा खतरनाक है। और इस का विरोध भी, जो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता चाहते हैं उनकी तरफ से, बाकी सब से ज्यादा होना चाहिए।

(जारी …. भाग 2: सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी कल)

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2 जुलाई 2022

रोहित धनकर

यहाँ अभिव्यक्त विचार मेरे हैं। मैं जिन संस्थाओं से जुड़ा हूँ उनके नहीं, नाही वे संस्थाएं इन विचारों का समर्थन करती हैं।


Mutual respect can be founded only on reason

June 14, 2022

Rohit Dhankar

This is a rejoinder to Prof. Tahir Mahmood’s article “The Past and Prejudice” published in The Indian Express on 14th June 2022. Professor Mahmood is a respected scholar of law and an Ex-member of The Law Commission of India. The article is written in good faith and as far as I can understand with genuine wish for peace and harmony in the country. And still I am writing a rejoinder to it, not because I do not want peace and harmony, but because I believe peace and harmony requires much more than goodwill and good heart in some people. You can celebrate Eid and Diwali together in a spirit of mutual good-will, but that sentiment may be so fragile that a single utterance may blow it to pieces. Unless this mutual goodwill is based on recognition of truth, reason and clear understanding of limits to which it could be stretched; peace and harmony based on it will always be precarious. If we still do not understand it after more than hundred year of public debates on harmony and constant riots, we must be making some fundamental mistake in our thinking and judgment, or we must be scared of recognizing something too disturbing. I am writing this rejoinder to point out what we might be missing in our thinking, and believe unless we pay attention to these points, our goodwill is neither genuine nor of practical value.

One more preliminary before I go on to the substantial task of this rejoinder. I can not write in brief and make my intended point clearly at the same time, thus, am very bad in writing journalistic publishable articles. At the same time the academic style bores me, therefore, what I write is also not academic. This is a conversational peace written in common sense style, which often may sound unnecessarily lengthy. Still I hope that at the least a few people will read it to the end.

In writing his very lucid and goodwill piece Prof. Mahmood makes four arguments, as far as I could understand. They can be listed as follows:

  1. We should not indulge in religious polemics of bygone days,
  2. Muhammad is widely respected by very wise and knowledgeable people,
  3. We have national and international laws against hurting others’ religious feelings,
  4. We believe in universal tolerance and that all religions are true.

I have taken the liberty of changing the order of these points as they occur in the article. Prof. Mahmood’s argument is that since these four points are worth accepting, or are accepted, making derogatory statement against religious figures, and especially against Muhammad, should be strictly avoided. I will take these claims one by one and try to show what is the problem in accepting some of them and why critical analysis of religious figures is necessary even if some of these claims are accepted. In the process I will quote Prof. Mahmood extensively to avoid confusing and misinterpretation, in all quotes emphasis and italics are mine.

1. We should not indulge in religious polemics of bygone days

Ordinarily it is very good and sane advise and I will accept it whole heatedly. But there is a serious problem in this moral norm.

Alluding to Nupur Sharma’s comments on TV Prof. Mahmood writes: “But then, where did they find those stories about the Prophet? What they have said about the Prophet must have been based on hearsay, but that hearsay emanated from some thoughtless statements in old Urdu books, including some by Muslim writers. Of course, these statements have been forcefully refuted by latter-day researchers on Islam. But why would unprincipled critics bother to research the truth?

Several stories from old religious books — of all communities indeed — may not be compatible with modern concepts of human rights and gender justice. However, ours is not the age for indulgence in religious polemics of the bygone days. We are citizens of a modern nation whose Constitution is secular and subjects us to a fundamental duty – “to promote harmony and the spirit of common brotherhood amongst all the people of India.” We must live by these ideals and stop looking for controversial elements in outdated religious literature for fighting each other, to the detriment of national interest.

There are several problems in these statements hidden underneath the obviously sane and goodwill message. I will take up only a few of them. One, Prof. Mahmood says that what Ms. Nupur Sharma said are based on “hearsay” are written on “old Urdu books”, and “forcefully refuted”. Ms. Sharma (i) referred to flying horse on which Muhammad himself claimed to have visited the haven in one night, (ii) reference in Quran to flat earth, (iii) Muhammad’s marriage to Aisha at 6 and consummation of marriage at 9 years of her age. I have written about all of them here. The first one has references in Quran and there are several Hadith detailing the whole story. The second has reference in the Quran, though possibility of a different interpretation exists. The third has many Hadith which all corroborate these ages.

Would Prof. Mahmood openly agree that Quran and Hadith collections are “hearsay”? They are not in old Urdu books, but in Islamic scriptures, originally Arabic. Quran is the fountainhead of Islamic thought and hadith is explanation of the Quran by deeds and words of Muhammad himself. Yes, there are researchers who try to refute the marriage age, but the traditional Islamic scholars and general Muslim public has not accepted that refutation and stick to the hadith.

Prof. Mahmood is right in pointing out that there is much in religious books of all communities that is not compatible with modern ethics and with our constitution. He is also rightly points out that we should live according to the ideals of the constitution. But he does not notice that the need to discuss, criticize and debunk all obscurantist religious literature arises precisely to be able to live by the constitution and keep the constitution rational, secular and liberal. Let me give a few examples.

Today there is ban on cow slaughter in many Indian states. Imagine an atheist Indian citizen who believes that this ban is undue restriction on the food choice of citizens, and argues against this ban. A believing Hindu comes up with the argument that we should respect sentiments of Hindus attached with cow, and that Hindus never ate beef. Our atheist, of course, can argue that as per our constitution religious feelings of any community are not enough to restrict choices of other citizens. But he may also like to counter the part of the argument that Hindus never ate or recommended beef eating by quoting from Upanishads1. It would be legitimate, useful and even necessary; and of course a constitutional right of our atheist. Thus, a discussion on Vedas and Upanishads may be necessitated in an argument on freedom of choice of food for constitutionally living Indian citizens.

Let’s take another example. The idea of Uniform Civil Code (UCC) is constantly opposed by Muslims in the name of following their religion. UCC like beef-ban is a public issue of concern for all citizens. In opposing UCC Muslims clerics and ordinary Muslims often claim that many provisions in it are likely to be against Sharia and quote from Quran, hadith and Islamic law books to support their argument. I would argue that in such situation, which is a reality, it becomes necessary for Indian citizens arguing to show that what is written in Quran and Hadith, like much in Upanioshads and Vedas, is actually retrograde and can not be accepted today. For example rights of women, gay, and other differently sexually oriented people as well as the issues of polygamy.

What I am arguing is that the obscurantist ideas in old religious scriptures impact our lives today, and therefore, have to be discussed and criticized, opposed and debunked today. Freedom of expression as far as criticism of Muhammad and Quran is concerned is another such issue. It has motivated dozens of murders in the memory of living people. If one bans criticizing religious scriptures then one is depriving citizens of their right to argue their point fairly and freely; and giving undue advantage to obscurantist and anti-constitutional ideas.

2. Muhammad is widely respected by very wise and knowledgeable people

This is an argument from authority, and one can give examples of equally good scholars, if not politicians, who criticized Muhammad. One can mention Voltaire or even Vivekananda2, for example. But the real argument I want to make is that historical personalities and great leaders of humanity may have many good qualities and may be seen as reformers; and at the same time may have very bad acts and sayings in their account. Unless Prof. Mahmood rejects all hadith, one is likely to fund much in there which does show Muhammad in very reprehensible light. The story behind verses of Chapter 66 of The Quran, itself is nondigestible for a modern mind. In addition one can see Sunan Ibn Majah 18533, Sahih al-Bukhari 24784, Sunan an-Nasa’i 40645, Sunan Abi Dawud 4506 and many more which will not allow a modern person to take statements in appreciation of Muhammad on trust, even if they come from as highly respected personalities as Gandhi. Therefore, argument on authority do not take us too far.

Prof. Mahmood claims “I am, however, not a religious person and look at the Prophet not as a miracle-performing superhuman figure, as many Muslims do, but as a revolutionary social reformer who in the words of eminent Indian jurist late Laxmi Mall Singhvi was “a thousand years ahead of his time”.” Well, then let us understand properly that no reformer and revolutionary is above criticism and no one demands “sar tan se juda” for criticizing and even insulting a revolutionary reformer. But more importantly this “a thousand years ahead of his time” argument crops up too often and it is seriously flowed. Even if one accepts for the sake of argument that Muhammad was 1000 years ahead of his time and was a great reformer, we can not forget that he also freezes that reform at his own time by declaring that he is the seal of prophets7. Even the interpretation of Quran is frozen in the seventh century by as authentic an interpreter as Ibn Kathir. He says that Quran should be explained first by Quran itself, second by Hadith, third by the saying of the companions, and fourth by the second generation Muslims. Thus effectively being guided by people who were all dead by end of seventh or maximum by mid-eighth century. And then “Whoever explains the Quran with his opinion or by what he has no knowledge of, then let him assume his seat ion the fire”.8 Thus, arresting this revolution, if it ever was, in the eighth century.

3. We have national and international laws against hurting others religious feelings

To my mind this is the strongest argument Prof. Mahmood is advancing. However, the history of riots, agitations, threats, announcement of bounties and murders makes one very suspicious about it. This is a story of continuous attack on freedom of expression from old times, the space is closing. And unless this pressure to close the space is resisted, it will demand more and more. Prof. Mahmood rightly notes that a “new section (295A) was added” to existing laws “in 1927 to lay down penalties for “deliberate and malicious acts intended to outrage religious feelings of any class by insulting its religion or religious beliefs.” In its background was an incident of defamatory outburst against Islam and its founder.” But forgets to note that Rangila Rasul was published as a reaction to “Sitaka Chhinala”9; and that the Published Mahashy Rajpal was murdered. And the murderer was declared a hero of Islam by such important people as Iqbal. The support of the highest leaders of Muslim community to such murders, to my mind, was the cause behind the “notorious fact that many prominent Hindus who had offended the religious susceptibilities of the Muslims either by their writings or by their part in the Shudhi movement have been murdered by some fanatic Musalmans.”10 I would like to quote somewhat extensively from Dr. Ambedkar to show that the problem is bigger than we think and the triggers for violence are too extensive to deal with the laws without making Hindus more or less mute on Islamic issues. Please see the names and triggers for killing four people between December 1923 and September 1934, roughly 11 years: “First to suffer was Swami Shradhanand, who was shot by Abdul Rashid on 23rd December 1926 when he was lying in his sick bed. This was followed by the murder of Lala Nanakchand, a prominent Arya Samajist of Delhi. Rajpal, the author (sic) of the Rangila Rasool, was stabbed by Ilamdin on 6th April 1929 while he was sitting in his shop. Nathuramal Sharma was murdered by Abdul Qayum in September 1934. It was an act of great daring. For Sharma was stabbed to death in the Court of the Judicial Commissioner of Sind where he was seated awaiting the hearing of his appeal against his conviction under Section 195, I. P. C, for the publication of a pamphlet on the history of Islam. Khanna, the Secretary of the Hindu Sabha, was severely assaulted in 1938 by the Mahomedans after the Session of the Hindu Maha Sabha held in Ahmedabad and very narrowly escaped death.”

The next para is important: “This is, of course, a very short list and could be easily expanded. But whether the number of prominent Hindus killed by fanatic Muslims is large or small matters little. What matters is the attitude of those who count towards these murderers. The murderers paid the penalty of law where law is enforced. The leading Moslems, however, never condemned these criminals.” This is the problem, and it can not be solved only by law or by preaching others to respect Mohammad. It can only be solved by unconditional condemnation of such violence by serious and thinking Muslims.

4. We believe in universal tolerance and that all religions are true

Tolerance is great and important. Prof. Mahmood quotes Swami Vivekananda “I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true.” This seems to be directed to Hindus, as Vivekananda is “proud to belong to” that religion. As I said tolerance is important, but can tolerance always be one sided? There are umpteen number of obscene pictures on the social media depicting Sita and Parvati, Krishna, Durga and Mahishasur. Derogatory pictures of Ram, Krishna and almost every Hindu god. There is plenty of literature which openly and often rightly criticizes Ram and Krishna for various deed of their mythical lives. There may be some idiotic tweets against all this, but there is no violent agitation; maximum one sees attempts to take such people to court, which is a constitutional right of all citizens. So there is plenty of tolerance there.

But when it comes to say something on Muhammad the country burns or someone gets murdered. Prof. Mahmood says “The anguish of the Muslim masses on the condemnable incidents of insult to their Prophet is understandable, yet its violent expression also tarnishes his fair name. Such a reaction to his denigration by a few misinformed individuals cannot be justified on the touchstone of what is known in law as the “choice of evil defence”.”

The “anguish” is “understandable”, but “violent expression also tarnishes his fair name”. One wonders whether it is only a matter of tarnishing “his fair name” or the lives, respect for freedom of expression of others, fear in the society and belligerence is also involved? And is it a matter of “a few misinformed individuals” or a very substantial section of the Muslim population? The slogans for beheading Ms. Sharma, earlier protests and violence on 10th June 2022 does not seem to square with this assessment of “a few misinformed individuals”

Considering all religions true is again a problematic statement, even if from Swami Vivekananda. First, it seems the other way round to me, they all seem to be false rather then true to me. But let’s pass that. There is hardly a Muslim who would say that Quran might be wrong. Or if there is something in Quran that does not fit with the idea that all religions are true should be ignored or discarded. Or that Quran can be figuratively interpreted to square with the idea of all religions are true. If these three assumptions are true, then I suggest a little survey. Open The Quran randomly at any place. You will have two pages in front of you. Count how many times the Quran declares all other religions false and prescribed punishment for those who do not accept the one true religion—Islam, in these two pages. My guess is you will find on an average 4 instances of calling all others religions false and prescribing very severe punishment for non-believers. I wonder how Prof. Mahmood square his recommendation of accepting all religions as true in face of this Quranic fact? Being an open-minded professor of law he may be able to say that in spite of Quran, all religions are true; but how many Muslims will be able to accept that? Then, is this a simple rhetoric or an advice to Hindus alone? The point I am making is that this advice can work only if all believe in this. It cannot be demanded from Hindus alone.

Professor Mahmood’s article is only a good-hearted attempt at moving towards peace and harmony without building proper foundations for this. Glossing over the contemporary truths of our society will never help us go past the present day social rift. I see even very modern, very well educated, advocate of scientific attitude Indians (Hindus and Muslims both) demanding arrest of Nupur Sharma. The government may be partial and biased, it may show promptness in arresting Ratan Lal and may avoid taking action on Ms. Sharma; but liberal citizens should rather argue for their freedom of expression rather than demanding arrest. Those who argued for Hussain’s freedom to paint what he wanted, who argued for Ratan Lal not to be arrested; are now suddenly asking Ms. Sharma to be arrested. This is plain and simple hypocrisy and double standard. If we continue on this path, at the first stage, there shall be thousands for whom demands of arrest will be raised, as there are thousands making fun of Hindu gods. And at the next stage, it will be impossible to say anything about religion in this country. That will cripple democracy and kill all democratic discourse. This is also very amusing to see that the people who never tire preaching dissent would like to kill all dissenters as soon as they show dissenting views regarding Islam.

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14th June 2022

Rohit Dhankar

Professor, Azim Premji University, Bangalore.

Secretary, Digantar, Jaipur.

The views expressed in this article are strictly personal, and neither of the organizations I am working for endorses them.

1“He who wishes that a son should be born to him who would be a reputed scholar, frequenting the assemblies and speaking delight- ful words, would study all the Vedas and attain a full term of life, should have rice cooked with the meat of a vigorous bull or one more advanced in’ years, and he and his wife should eat it with clarified butter. Then they would be able to produce such a son.” Brihad-Aranyak Upanishad 6:4:18, page 940. The Brihadaranyaka Upanisad, Translated by Swami Madhavananda, Published by Advaita Ashrama, Almora, 1950.

2“Think of the good Mohammed did to the world, and think of the great evil that has been done through his fanaticism! Millions massacred through his teachings, mothers bereft of their children, children made orphans, whole countries destroyed, millions upon millions of people killed!” Swami Vivekananda, Raja Yoga, Brentano’s, New York, 1920, page 79.

3“Abdullah bin Abu Awfa said “When Muadh bin Jabal came from Sham, he prostrated to the Prophet who said: ‘What is this, O Muadh?’ He said: ‘I went to Sham and saw them prostrating to their bishops and patricians and I wanted to do that for you.’ The messenger of Allah said: ‘Do not do that. If I were to command anyone to prostrate to anyone other than Allah, I would have commanded women to prostrate to their husbands. By the One in Whose Hand is the soul of Muhammad! No woman can fulfill her duty towards Allah until she fulfills her duty towards her husband. If he asks her (for intimacy) even if she is on her camel saddle, she should not refuse.’”

4Narrated `Abdullah bin Mas`ud: The Prophet (ﷺ) entered Mecca and (at that time) there were three hundred-and-sixty idols around the Ka`ba. He started stabbing the idols with a stick he had in his hand and reciting: “Truth (Islam) has come and Falsehood (disbelief) has vanished”.”

5“’Ali came to some people of Az-Zutt, who worshipped idols, and burned them. Ibn ‘Abbas said: “But the Messenger of Allah [SAW] said: ‘Whoever changes his religion, kill him.’”

6“Narrated Uthman ibn Abul’As: The Prophet (nay peace be upon him) commanded him to build a mosque at Ta’if where the idols were placed.”

7Quran 33:40. “Muhammad is not the father of any of your men, but he is the Messenger of Allah and the last (end) of the Prophets. And Allah is Ever All-Aware of everything.”

8Tafsir Ibn Kathir, translated by Shaykh Safiur-Rahmqan Al-Mubarakpuri, published by Darussalam, Riyadh. Page 29-33

9“Rangila Rasul was written in reply to Sitaka Chhinala—a pamphlet written by a Muslim alleging that Sita, wife of Rama, the hero of Ramayana, was a prostitute.” B.R. Ambedkar, page 169, Pakistan or Partition of India, published by Dr. Ambedkar Foundation, New Delhi.

10ibid page 156


Blasphemy: its uses and abuses

November 16, 2020

Rohit Dhankar

These days, again, deliberate blasphemy is becoming a hotly debated topic on social media.  This new wave of interest in blasphemy started after slaying of the French teacher Samuel Paty for showing Muhammad cartoons. This act of mindless bigotry invited President Emmanuel Macron’s tough stand against Islamic terrorism, which, in turn, provoked further Islamic violence in Europe and threatening protest in many parts of the Islamic world. Many Islamic clerics and Muslim politicians supported by large numbers of believers in Islam seem to hold the view that the only punishment for insulting Muhammad is beheading. The underlying message of this attitude is that ‘in expressing your views publicly and debating in your own countries you will have to behave according to standards dictated by us, or we will kill you’. A completely unjustifiable supremacist stand on part of Islam. This is a successfully practiced centuries old, though crude, method of controlling peoples thinking. Limiting discourse is a sure way of controlling thinking, as thoughts develop in conversation in societies.

This tendency, though most pronounced and most violently practiced in Islam, is by no means unique to Islam. All religions and all believers in religious precepts do have this tendency, even if not always practiced so violently. As a reaction another section of people is resorting to mindless blasphemy. I came across some examples on a twitter handle depicting Rama and Muhammad in a homosexual embrace and a similar depiction of Sita and Kali.

The twitter handle announces more ‘art’ like this, involving Hindu Goddess Kali and Muhammad. The person(s) seems to be mainly interested in Islamic religious figures and Hindu gods/goddesses. In my view this is precisely the kind of blasphemy that needs to be avoided and discouraged. By discouraging, however, I most certainly do not mean beheading, trolling, banning or any kind of forcible restriction. All I mean is expressing opinion against such art.

To my mind this expresses only filth of mind. Why do I say that?

When blasphemy is used as a tool against curbing of freedom of expression and action it serves a purpose of widening discourse and making an important point to protect freedom. But when it is indulged in only to test the limits of tolerance of real or pretending believers it creates undue reaction which will eventually harm the openness of discourse.

To use it as a tool against imposition of undue restrictions on freedom of expression one has to make relevant points through it. For example if one makes cartoons of Rama to bring out or critique issues in his preaching, behaviour; or preaching and behaviour of his followers, believers and pretending believers; then it serves a point in the ongoing ideological struggle and discourse. There can be many issues in Ramayana of this nature, depending upon one’s interpretation. One can take Shanbuk’s killing, Rama’s and Lakshamana’s behaviour with Shurpanakha, Sita’s agni-pariksha, Sita’s banishment to forest, and so on.

Similarly, with Muhammad. One can take his bigotry, issues of child marriage, behaviour with his wives and slave girls, his preachings on war-booty, claims of revelation, claims of angels fighting alongside Muslims, necessity of fighting in jihad and so on. This kind of blasphemy will serve the purpose of bringing out issues in Quran and Muhammad’s own behaviour.

But making caricatures of sexual indulgence and imagining other kinds of deliberately insulting caricatures serves no purpose. Of course, one can stretch the point that Quran pronounces horrendous punishment for homosexuality, and therefore, showing Muhammad in homosexual relations is a comment on his preaching on the issue. But in my view, it should be done only if there are any indications of Muhammad himself being inclined to homosexuality, if there is reliable evidence of such acts on his part. Simply because he was against homosexuality does not justify, to my mind, such caricatures. Also, if there is any evidence in mythology (any version of Ramayana) of Rama being inclined to homosexuality it may bring out a point in the discourse.

What I am trying to argue is that the blasphemy regarding religious figures and divinities (prophets, gods, sons and daughters of The God, etc.) should be around the historical or theological evidence. That will help in bringing out characteristics of those figures which arrest discourse and human freedom. And will weaken the arguments of their believers on the basis of authority of these figures. On the other hand mindless juvenile filth will discredit the attempts of useful and positive blasphemy, will create a reaction against it and destroy its power of pungent irony and deep cutting satire.

On the pain of repetition, I am not talking of banning blasphemy or killing for it. All I am arguing for is a thoughtful use that opens up minds and avoiding uses which will finally blunt the weapon itself.

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16th November 2020


Quran and violence 5: Two views from the same book

January 24, 2015

Rohit Dhankar

(Continued from part 4. This post is rather long for a blog. But I want to conclude it now.)

In this concluding part I will begin with looking at two articles, one of them written by a very well-known and rightly respected scholar of Islam Maulana Wahiduddin Khan and the other by some Dr. Jawwad Ahmed Khan from Jeddah who runs a blog called “Fundamentalist: How can the Ummah survive when its Prophet is cursed!”. [https://funadamentalist.wordpress.com/2010/11/23/blasphemy-reason-behind-aggressive-persuasion-and-islamic-perspective/]

The choice is deliberate to underline the tension between the liberal Muslims scholars and the fundamentalists.

Maulana Wahiduddin Khan’s article

The Maulana wrote the article under consideration in The Times of India on 2nd October 2012, titled “Blasphemy in Islam: The Quran does not prescribe punishment for abusing the Prophet”. He argues in this article that “[I]n Islam, blasphemy is a subject of intellectual discussion rather than a subject of physical punishment. This concept is very clear in the Quran.”

The Maulana quotes several verses from the Quran to prove his point. He admonishes Muslims for setting up “media-watch” offices and the attitude to “hunt for anyone involved in acts of defamation of the Prophet, and then plan for their killing, whatever the cost.” He further argues that this attitude goes against the freedom granted by the God (to test people) and the modern secularism; and Muslims should desist from this.

Dr. Jawwad Ahmed Khan

Dr. Khan argues for the exact opposite in his blog article “Blasphemy: Reason behind aggressive persuasion and Islamic perspective”. Why this blog article of an individual is interesting is that he also quotes verses after verses and in addition strengthens his argument on the authority of Islamic scholars.

Dr. Khan quotes four great Imams of Islam one by one, and on the further authority of Muhammad bin Sahnun comes to the conclusion that “There is consensus (ijma) amongst ulama that anyone who insults the Prophet (Peace be upon him) and finds his defects then such a person is “KAFIR” and there is promise of Allah’s torment upon such a person and in sight of Ummah the ruling regarding him is to “KILL HIM” rather whosoever doubts in Kufr of such a person then he/she commits kufr himself. The research in this matter is that anyone who abuses the Prophet (Peace be upon him) is Kafir and he is to be killed unanimously, this is “MADHAB OF ALL 4 IMAMS” Ishaq bin Rahwiyah and others have mentioned this Ijma. If the abuser happens to be a Dhimmi (non Muslim living in Muslim land) then according to Imam Malik (rah) and people of Madina he is to be killed as well.”

“The Prophet (peace and blessings of Allaah be upon him) sometimes chose to forgive those who had insulted him, and sometimes he ordered that they should be executed, if that served a greater purpose. But now his forgiveness is impossible because he is dead, so the execution of the one who insults him remains the right of Allaah, His Messenger and the believers, and the one who deserves to be executed cannot be let off, so the punishment must be carried out”.
How is it possible to come to opposing conclusions while taking the same text as authority?

These opposite conclusions are puzzling to say the least. One can dismiss Dr. Khan’s interpretation as an unknown fundamentalist. But seems it will not do. As great Islamic scholars like the famous Ayatollah Khomeini came to the same conclusion in the case of Satanic Verses of Rushdie. And also Dr. Khan quotes great Islamic scholars.

One answer (among perhaps many others) can be found if one looks at the verses quoted by Maulana Khan and Dr. Khan respectively. Maulana Khan quotes verses 36:30, 40:24, 15:6, 16:101, 7:66 and 6:108. Interestingly all these verses are from the Makkan period after the revelations started. Muhammad at this time was behaving as a preacher and trying to convert the Makkan people. As far as blasphemy is concerned he routinely called their gods as false gods in these verses, who are just fabricated and have no authority. Obviously the believers were less in numbers and relatively weak in all kinds of power. The mission was to convert more from the Makkan population.

However, even at this time what Maulana Khan claims regarding blasphemy (that it was an issue of intellectual discussion) does not seem to be established. Most of these verses tell the believers stories about the prophets in the past who were reviled as liars, fabricators, etc. and several among them claim that these people who insulted the prophets were destroyed by the Allah. Maulana’a own translation of verse 36:30 makes this point clear if read with verses 36:29 and 36:31; that is, immediately before and after the quoted verse. The translation is “29 it was but one great blast and they fell down lifeless. 30 Alas for human beings! They ridicule every messenger that comes to them. 31 Do they not see how many generations We have destroyed before them? Never shall they return to them.” This hardly constitutes an intellection argument.

The points I am making are: 1. All the verses Maulana quotes are from the Makkan period of preaching. 2. They do not ask the believers to take any action against the blasphemers but issue threats directly from the Allah.

This issue becomes more curious when one notes the verses quoted by Dr. Khan. The verses quoted by Dr. Khan in support of killing the blasphemers are: 49:2, 24:63, 5:33, 9:65-66, 33:57 and 33:61. All these verses are from the Madina period.

In between the acrimony between the believers and polytheists intensified, Muhammad lost hope of converting them, and had to migrate to Madina. In Madina the believers came in power, formed a state, started plans for making the state an undisputed power in Arabia and making the Allah’s proclamation of He being the only God and Muhammad being the last prophet universal. Thus the religious movement turned into a political ideology and the prophet turned into a ruler. This was not use of religion for political gains; it was simply the metamorphosis of the religion itself into an empire building political ideology. There remained no religion outside the ideology and the ideology was based on the faith. They were the two sides of the same coin. And the coin was to have purchase for unmitigated power.

In this new situation blasphemy against the God and the prophet Muhammad could not be tolerated. However, one finds blasphemous verses against earlier prophets here and there, which may be quoted as examples of tolerance; but they are not about Muhammad, the seal of prophet-hood.

I looked at about a dozen articles on both sides of the divide; those who argue for a more tolerant attitude to blasphemy and those who argue killing blasphemers without fail. Largely the pattern of quoting verses from earlier Makkan period by the first and quoting verses from the Madina period by the second holds.

It seems the believers are trying to settle the issue on the authority of the Quran. The liberals among them are choosing the earlier revelations and the fundamentalists are choosing the later ones. [This requires more study, should be considered only an initial tentative hypothesis.]

 

Conclusion

The argument that Quran does not sanction violence against non-believers and those who are seen as enemies of Islam is not sustainable. The violence emanates from the Quran’s God himself. He is a violent God. Those who disobey him are killed and destroyed in this world and burnt in the hell fire hereafter. But then as far as hereafter is concerned many of the Gods love to burn people in the hell fire and cut them to pieces again and again, be they Hindu or Christian. It seems the very idea of God (in most of its forms, though not all) requires a very strong doze of fear and threats. So Allah is by no means unique in being the fountainhead of at the least imaginary violence in the hell. The issue seems to be how single-mindedly one believes in this ghastly imagination.

Since the argument that Quran does not sanction violence can be so easily refuted it cannot help deter fundamentalists. In addition repeated attempts to prove that they should not commit violence because their religion and religious book does not sanction it, actually ends up reinforcing the authority of their religion, as the only source of guidance. This precludes other humanitarian ideas from consideration, and renders them irrelevant. A more truthful, just, and perhaps even effective way could be to call a spade a spade. Admit that Quran is a violent book, that it often calls on believers to kill non-believer, it teaches them to hate idolaters, polytheists, and to wage a jihad to eradicate them, at the least in some parts of it. And explaining these parts away does not seem to be possible.

But it (The Quran) is also full of contradictions, repetitions and impossible stories. (I am sure, all religious texts, be they Hindu or Christian, have contradictions, impossible stories, adverse judgment and often even violence against their own unbelievers.) Therefore, it cannot be a book sent by the God, unless the God Himself is taken to be a creature whom today’s humans see as violent and even evil. It is a creation of ordinary human being(s) pretending or being under delusion to be messenger of the God. If people want to believe in it and prophet-hood of Muhammad, they are of course free to do so, no one has the right to stop them and ask them not to believe. But if they want others to live according to this book and obey Muhammad as prophet then they are taking their religious zeal too far beyond its legitimate scope. Other people have other religions and non-religions, and even the hated irreligion; and they have freedom to make their own choices.

There being sanction of violence in Quran, however, does not necessarily make the whole religion violent, nor does it mean that all believers are necessarily violent. To construct a non-violent interpretation of a religion based on Quran, however, has to be a strenuous theological task. There are practicing Muslims who are engaged in this task, but they will always be under pressure as their interpretation is striving against the natural reading and original impulse of the Quran.

The book Quran and Muhammad no more belong exclusively to the Muslims alone. Both, the book and Muhammad, have a profound effect on today’s world. Islam has become a political ideology like democracy, communism, Hindutva, and so on. Muhammad has become an ideologue like Gandhi, Marx, Plato, and so on. They impact peoples’ lives, I mean non-believers’ lives as well. And people in a democracy have full right to comment, criticise and lampoon all that impacts their lives. One cannot demand that ‘your life will be effected by my ideological beliefs but you cannot open your mouth against them’. That is plain oppression.

If someone reads Quran and finds it a violent book full of repetitions and contradiction and overwhelmingly plagiarised from the Bible, then that person has full right to express that thought.

If one reads the Quran, which is freely available in the market and can be downloaded for free from the internet, one can hardly miss that it contains many chapters and verse that are of direct benefit to Muhammad. They contain curses on his enemies, chapters 104 and 111, for example. Some give Muhammad special sanctions (33:50) and others threaten his wives into submission (66:1-5). A non-believer who notices all this is sure to suspect the genuineness of all three: the Allah, the Quran and Muhammad; in spite of elaborate explanation which all depend on first accepting the faith. The believers cannot ask these people not to think these thoughts, or not to speak them out if they have occurred to them. This would mean controlling other peoples’ minds and making others live according to the believers’ faith. No one has the right to expect that, no one has the right to impose one’s faith on others.

One should also understand that speaking out as a critique of, say; democracy, Hindutva, Islam, or communism; dos not mean forcing their respective believers into discarding these ideologies. This simply is expression of ideas in a free world. Therefore, the believers’ argument that free speech is being forced upon them is wrong. No one asks them to adopt free speech if they do not like to do so. None asks them to read books they do not like. But some of them would like to force other to abandon free speech even if others don’t like abandoning it.

In addition to these simple issues of coherence and credulity, the Quran raises many social and political questions. The issue of status of women (common to all religions), of non-believers in Islamic thinking, the issue of critical examination of doctrines and so on. These are genuine and important issues in a free society. The believers cannot expect everyone to accept their view points on these issues. Such issues cry for debate and democracies survive on open debates. Therefore, the believers have to learn to listen to hard questions and to engage in debate without losing their cool.

Obviously the same goes for the Hindu zealots in India, the argument is generalizable to all religious fundamentalism. As I said above, the topic in this article is Quran, that does not mean that Hindu zealots don’t have to learn to live with nude Saraswatis, critique of their religious books, those who don’t share their reverence for cows and medicinal benefits of cow’s urine.

As a matter fact, most of Muslims one meets can think on these issues with as much calm and criticality as anyone else can. It is a minority that gets up in arms on such issues, but that minority has to be restrained by the thinking majority in the community of believers. And in democracies, for the reasons above mentioned, right to expose a religion cannot be restricted to its believers alone. A fearless and un-tempered critique of all religious texts is everyone’s fundamental right. Those who demand respectful comment (in case of disagreement) on religious texts are asking people to be submissive in the face of belligerent threats. However, as a moral choice of someone to be respectful to faiths seems to be commendable to me. But that attitude cannot be made into obligation; it has to remain a personal morally preferred position. And when this respectful stance becomes so prevalent that some of the faithful (belonging to any faith) start demanding it as their right; it is a duty of a democratic citizens to speak against it clearly and resolutely.

(Concluded)